बुधवार, 29 जुलाई 2009

अखाड़े


लुप्त होते अखाडे़


कबडी की तरह कुश्ती भी भारत का एक राष्ट्रीय खेल है। कुश्ती के लिए विशेष दंगल और अखाडे़ बनाये जाते हैं और पहलवान अपने गुरु से कुश्ती के पैंतरे सीखते हैं। इन अखाड़ों में न केवल कुश्ती के लिए बल्कि शारीरिक बल के लिए नियमित व्यायाम आदि पर भी बल दिया जाता है। किसी समय भारत के अखाडे़ बहुत प्रसिद्ध हुआ करते थे।

अब कुश्ती और अखाड़े धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। आज के नौजवान अखाड़ों में मिट्टी का लेप बदन पर पोत रखने या दण्ड पेलने की बजाय जिम में जाना अधिक पसंद करने लगे हैं। कभी तुलसीघाट पर घूमते हुए स्वामीनाथ जी के अखाडे़ का वह दृश्य याद आता है जहाँ युवक दण्ड पेलते, मुग्दर घुमाते या विभिन्न प्रकार के व्यायामों में व्यस्त दिखाई देते थे। इस अखाडे़ ने देश के प्रसिद्ध पहलवान दिए हैं जैसे कल्लू पहलवान, सियाराम पहलवान, अशोक पाल, राम नरेश जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम रोशन किया।

आधुनिक युग ने इन अखाड़ों को पछाड़ दिया है और उनका स्थान जिम ने ले लिया है; जहाँ विभिन्न प्रकार के आधुनिक यंत्र लगे होते हैं। अब मिट्टी का लेप और मुग्दर जैसे पिछडे़पन का प्रतीक बन गए हैं। सरकारी सहायता एवं प्रोत्साहन के अभाव में अब अखाड़ों और दंगल धीरे-धीरे इतिहास की गर्त में जा रहे हैं। इस प्रकार एक और भारतीय खेल अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है

रविवार, 26 जुलाई 2009

जातीयता की कविता

विता की जातीयता


जाति क्या है? एक परिभाषा यह है कि ऐसे वृहत समाज को ‘जाति’ कहेंगे जिसे एक भाषा, पूर्वज, इतिहास, संस्कृति आदि के माध्यम से जोड़ा जा सकता है; और मोटे तौर पर कहा जाय तो वह समाज जो इन तत्त्वों के प्रति गौरव का अनुभव करे। जातीयता में भाषा की अहम भूमिका होती है, जो जाति को एक सूत्र में बाँधे रखती है। भाषा है तो साहित्य है और साहित्य है तो कविता भी। भारतीय कवियों ने जातीयता पर कई रचनाएँ रचीं, जिनका स्वरूप भी समय के साथ बदलता रहा। जातीयता और उससे जुड़ी कविताओं के साहित्यिक स्वरूप की पड़ताल करती है डॉ. कविता वाचक्नवी की शोधपूर्ण कृति- ‘कविता की जातीयता’।



‘कविता की जातीयता’ को सात अध्यायों में बाँटा गया है। प्रथम अध्याय में ‘भारतीय संस्कृति और जातीयता की संकल्पना’ का परिचय मिलता है। जातीयता, भारतीय संस्कृति तथा आधुनिक हिंदी साहित्य में जातीयता जैसे विषयों को उद्धृत करेत हुए डॉ. कविता वाचक्नवी ने यह निष्कर्ष निकाला है कि "साहित्यानुशीलन की जातीय दृष्टि संस्कृति, भाषा, इतिहास, दर्शन, परम्परा, पूर्वज, भौगोलिक सीमा, संविधान, जनता, लोक सभ्यता व उसकी मानवीय संवेदना और बंधुत्व इत्यादि तत्त्वों पर आधारित है।"



दूसरे अध्याय- ‘आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त देशानुराग की भावना’ में भौगोलिक परिवेश, राष्ट्रभक्ति, भारतीय लोक, भाषा-प्रेम तथा इनसे जुड़े राष्ट्रीय नायकों के संदर्भों पर चर्चा की गई है। समयानुसार साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता तक संदेश पहुँचाते रहे हैं। इस संदर्भ में लिखिका ने ध्यान दिलाया कि " यह देखना महत्त्वपुर्ण है कि विविध कालखंडों में अपने समय को सम्बोधित करने के लिए, कभी वर्तमान की सम्भावना जगाने, कभी विचार का बीज वपन करने, कभी शौर्य और बल की उत्प्रेरक बनने के लिए वह [कविता] जिन माध्यमों का आश्रय लेती है, वे माध्यम वह कहाँ से व परम्परा में कितने गहरे डूब-उतरा कर खोजती है।"[पृ. ९९]



तीसरे अध्याय - ‘हिंदी कविता में अभिव्यक्त राष्ट्रीय हित की चिंता’ में देश के स्वतंत्रता-संघर्ष से लेकर पुनर्निर्माण की चुनौतियों तक में कविता की भूमिका पर चिंतन-मनन किया गया है। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान साहित्य ही ने तो ‘वन्देमातरम’ और ‘इन्क़िलाब ज़िंदाबाद’ जैसे नारे दिए हैं। डॉ. कविता वाचक्नवी का विचार है कि "भारत का वर्तमान और भविष्य, उसकी सुरक्षा और सम्मान, उसके निवासियों के प्रति अपनी सन्नद्धता और इनके हित-अहित के प्रति सतर्क दृष्टि के कारण निषेध और स्वीकार के विवेक का आग्रह कविता के जातीय हित-चिंतन को अभिव्यक्त करता है।" [पृ.१२७]



‘कविता की जातीयता’ के चौथे अध्याय का शीर्षक है ‘आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त भारतीय जनभावना’। इस अध्याय में एक कृषिप्रधान देश के संघर्षशील जन की भावनाओं से प्रेरित कविताओं को संदर्भित किया गया है। कृति के पाँचवें अध्याय में आधुनिक हिंदी कविता के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है जो भारतीय मानस तथा जीवन-मूल्यों से जुड़ी हैं। इस संदर्भ में डॉ. कविता वाचक्नवी कहती हैं कि "कविता ने मनुष्य में छिपी उन समस्त अच्छाइयों को उद्‌घाटित करने के अथक प्रयास किए, जिन्हें वातावरण, दृष्टिकोण, परिस्थितियाँ और स्वभाव आदि बीसियों परदे ढाँप-दबा देते हैं। [पृ.२४५]



छठे अध्याय में आधुनिक हिंदी कविता में जातीयता और दर्शन पर प्रकाश डाला गया है। इस अध्याय में जीवन, आस्था, अध्यात्म और मिथक जैसे विषयों की पड़ताल करने के बाद डॉ. कविता वाचक्नवी इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि "कुल मिलाकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पिछले लगभग डेढ़ सौ साल की काव्य-चेतना के मिथक सम्पूर्ण [इक्का-दुक्का को छोड़] भारतीय परम्परा से अधिगृहित व आयत्त किए गए हैं।"[पृ.३११]



‘उपसंहार’ में डॉ. कविता वाचक्नवी ने हिंदी कविता की डेढ़ सौ वर्ष की यात्रा का निचोड़ यह निकाला कि "आधुनिक हिंदी कविता ने इस सामासिकता, बहुलता अथवा कुटुम्ब संस्कृति के सभी पहलुओं का भारतेंदु युग से लेकर आज तक परिवर्तनशील सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सार्थक एवं सटीक चित्रण किया है।"[पृ.३३८] इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए लेखिका ने भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र, रामनरेश त्रिपाठी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, नागार्जुन आदि से लेकर धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, धूमिल, देवराज, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, ऋषभदेव शर्मा, उदय प्रकाश, राजेश रेड्डी इत्यादि कि कविताओं का विश्लेषण किया है।



पुस्तक के ‘प्राक्कथन’ में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने इस कृति की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा - "डॉ. कविता वाचक्नवी के इस ग्रंथ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता के पारम्परिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी, उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो जीन्स और डीएनए में वंश, जाति, देश आदि के तत्त्वों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है।.....मैं डॉ. कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय पर हिंदी पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद देता हूँ।" आशा है यह पुस्तक पाठकों और शोधार्थियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी सिद्ध होगी।



पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम : कविता की जातीयता
लेखक : डॉ. कविता वाचक्नवी
प्रथम संस्करण : २००९ई.
पृष्ठ संख्या : ३४५
मूल्य : २२५ रुपये मात्र
प्रकाशक : सचिव, हिंदुस्तानी एकेडेमी
१२ डी, कमला नेहरू मार्ग
इलाहाबाद - २११ ००१
[उ.प्र.]

शनिवार, 25 जुलाई 2009

एक विवाद और!

हिंदी अकादमी के सचिव का इस्तिफ़ा



प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाए जाने पर उठे विवाद के बीच अकादमी के सचिव ज्योतिष जोशी ने आज अपने पद से इस्तिफा दे दिया है।

सुपरिचित आलोचक ज्योतिष जोशी ने अकादमी की अध्यक्ष श्रीमती शीला दीक्षित को अपना त्यागपत्र सौंप दिया है। इससे पूर्व, श्री चक्रधर को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाए जाने के विरोध में संचालन सचिव की सदस्या एवं लेखिका अर्चना वर्मा ने भी अपना त्यागपत्र श्रीमती दीक्षित को सौप दिया था।

संचालन समिति के अन्य सदस्य सर्वश्री विश्वनाथ त्रिपाठी और नित्यानंद तिवारी भी श्री चक्रधर को उपाध्यक्ष बनाए जाने पर असंतोष व्यक्त किया है।

कल ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव, सहित्यकार रामशरण जोशी, पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल और आनंद प्रकाश ने भी श्रीमती दीक्षित को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया था। ज. स. म. के अध्यक्ष मैनेजर पाण्डेय और केदारनाथ सिंह ने भी अकादमी को स्वायत्त और राजनीतिक छाया से मुक्त करने की मांग की थी।

श्री जोशी ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि अकादमी में जिस तरह की परिस्थितियां बन रही थीं, उनमें उनके लिए कार्य करना मुश्किल हो गया था, इसलिए उन्होंने त्याग-पत्र देना उचित समझा। श्री जोशी ललित कला अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन कला’ के संपादक भी थे और प्रति नियुक्ति पर हिंदी अकादमी के सचिव बनाए गए थे

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

बर्मा भी परमाणू!?


खबर है कि म्यांमार[बर्मा] भी परमाणु बम बनाने की तैयारी में है और उत्तर कोरिया उसे इस काम में मदद कर रहा है। यह भी आशंका है कि उत्तर कोरिया उसे परमाणु तकनीक के बजाय सीधे परमाणु अस्त्र के विभिन्न अंश उसे उपलब्ध कर देना चाहता है, जिन्हें मात्र एक-दूसरे से जोड़कर परमाणु अस्त्र तैयार किया जा सकता है।

इसकी अंशतः पुष्टि उस समय हुई जब उत्तर कोरिया का एक मालवाहक जहाज़ ‘कांगनाम-१’ गुपचुप तरीके से उत्तर कोरिया से म्यांमार के लिए रवाना हुआ। अमेरिकी पोत को जब इसका पता चला तो उसने पीछा करना शुरू कर दिया। पोत को जब इसका संदेह हुआ तो वह वापस उत्तर कोरिया की तरफ़ भाग निकला। सेटेलाइट चित्रों तथा अन्य सूत्रों से मिली सूचनाओं के आधार पर बताया जा रहा है कि इस पोत में संभवतः स्कड मिसाइल के टुकडे़ भी लदे थे।

यद्यपि म्यांमार के लिए प्रमाणु क्षमता अर्जित करना आसान नहीं है, किन्तु यदि चीन और उत्तर कोरिया जैसे देश उसे परमाणु अस्त्रों से लैस करना चाह रहे हों, तो यह बहुत मुश्किल भी नहीं है। अमेरिका स्थित ‘विज्ञान एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान’ के अध्यक्ष डेविड अलब्राइट के अनुसार म्यांमार में चल रही उच्चस्तरीय गुप्त बैठकों तथा वहाँ सुरंग जैसे निर्माण के उपग्रह चित्रों से इस संदेह को बल मिला है कि वह परमाणु अस्त्र निर्माण जैसे किसी गोपनीय योजना पर काम कर रहा है।

‘आसियान’ [एसियायी देशों के सहयोग संगठन] की थाइलैंड में हो रही बैठक में शामिल होने के लिए पहुँची अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी इस बात पर चिंता व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि अमेरिका ने अब फिर एशिया में अपनी सक्रियता बढा़ने का निर्णय लिया है। शायद वह म्यांमार के बारे में भी अपना रुख बदलने का प्रयास करे। देखना है कि बदले समय में इस क्षेत्र में अमेरिका किस त्रह अपनी भूमिका अदा करता है।


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[दैनिक ‘स्वतंत्र वार्ता’ दिनांक २३ जुलाई २००९ के सम्पादकीय से साभार]

बुधवार, 22 जुलाई 2009

हिंदी बीमारी?

हिंदी- एक बीमारी???

अभी हाल ही में संसद में जब राज्यमंत्री जयराम रमेश जी अंग्रेज़ी में अपना वक्तव्य दे रहे थे तो सपा के मुलायम सिंह जी ने उन्हें हिंदी में देने के लिए कहा था क्योंकि मंत्री महोदय अच्छी तरह राष्ट्रभाषा से परिचित हैं।

राज्यसभा में फिर जब मंत्रीजी ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में देना प्रारम्भ किया तो भाजपा के सदस्य श्री कलराज मिश्र ने उन्हें टोकते हुए कहा कि वे अपना वक्तव्य हिंदी में दें। इस पर मंत्री महोदय ने हिंदी में धाराप्रवाह उत्तर तो दिया पर इससे पहले उन्होंने यह टिप्पणी भी की --"कलराज मिश्र जी यह मुलायम सिंह जी की बीमारी आपको भी पहुंच गई है।" रमेश जी का संकेत लोकसभा में सपा नेता मुलायम सिंह यादव द्वारा हिन्दी बोलने में सक्षम मंत्रियों के अंग्रेज़ी के प्रयोग को लेकर उठाए गए मुद्दे की ओर था।

इस टिप्पणी को लेकर भाजपा, सपा और बसपा के सदस्यों ने आपत्ति जताई और कहा कि हिंदी कोई बीमारी नहीं है। शोर-शराबे को शांत करते हुए सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी जी ने कहा कि सदन में हिंदी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं के इस्तमाल की अनुमति है। उन्होंने सभासदों को यह भी आश्वासन दिया कि वे रिकार्ड की जांच करेंगे और यदि हिंदी के विरुद्ध कुछ भी आपत्तिजनक लगेगा तो हटा दिया जाएगा। मंत्री महोदय ने भी कहा कि हिंदी का अपमान करने का उनका कतई उद्देश्य नहीं था और यदि ऐसा कोई संदेश निकला है तो वे उसके लिए क्षमा चाहते हैं।

आज जब करोडो़ रुपये हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकार खर्च कर रही है तो कम से कम वो मंत्री व सांसद जो हिंदी में सक्षम है, वे राष्ट्रभाषा का प्रयोग करके उसको देश में उचित स्थान दिलाने का कार्य तो कर ही सकते हैं। या फिर, क्या यह मान लें कि आज भी हम वही गुलामी मासिकता से ग्रसित हैं और उससे नहीं निकल पा रहे है???

सोमवार, 20 जुलाई 2009

इक यही बात न भूली- जूली

मटुकनाथ और जूली की जोड़ी

तीन वर्ष पूर्व प्रो.मटुकनाथ ने अपनी छात्रा जूली के टांका जोड़ कर एक सनसनी फैला दी थी। हाँ, वही मटुकनाथ चौधरी जिन्हें ‘लव गुरू’ कहा जाने लगा था। पटना विश्वविद्यालय के अंतरगत बी.एन.कॉलेज के हिंदी विभाग में कार्यरत मटुकनाथ को अपनी छात्रा जूली के साथ कक्षा में प्रेम का पाठ पढ़ाने के लिए जुलाई २००६ में निलम्बित किया गया था। उस समय उनकी पत्नी ने भरी सभा में दोनों का मुँह काला करके कमरे में बंद किया था।

पटना विश्वविद्यालय की सिंडिकेट ने तीन वर्ष तक गौर करने के बाद अब यह फैसला लिया है कि मटुकनाथ ने गुरु-शिष्य के सम्बंध को बट्टा लगाया है जिससे विश्वविद्यालय की छवि आहत हुई है। विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर एस.ऐ.अहसन ने सिंडिकेट की सिफ़ारिश पर मटुकनाथ को नौकरी से निकाल दिया है।

अब मटुकनाथ जी बिना किसी झिझक गा सकते हैं-

याद नहीं अब कुछ, सिर्फ़ यही बात न भूली
जूली......I LOVE YOU...



शनिवार, 18 जुलाई 2009

मौत सामने थी....

विमान में छेद और मौत सामने थी

यह एक सच्चाई है कि आदमी कभी यह नहीं सोचता कि किस पल कहाँ मौत उसके सामने आ खड़ी हो जाएगी! इसे भी भाग्य का खेल कहा जाएगा कि कोई-कोई मौत के मुँह से निकल कर आ जाता है। और...वह जब ऐसी घटना से उबरता होगा तो उसकी क्या मानसिकता होगी?

हाल ही में ब्रायन कनिंगघम को एक ऐसी ही घटना से गुज़रना पड़ा था जब उसने मौत को बिलकुल निकट से देखा। यह हादसा उस समय घटा जब अमेरिका के नैशविले से बाल्टीमोर जा रहे बोइंग-७३७ को आपात स्थिति में पश्चिम वर्जीनिया के चार्ल्सटन में उतरना पडा़।

विमान जब ज़मीन से सैकड़ों फ़ीट की ऊँचाई पर था तो पता चला कि यात्रियों के कैबिन में फुटबाल जितना छेद हो गया है। विमान में सवार ब्रायन उस समय सो रहा था। जब उसने यकायक लोगों का शोर-गुल सुना तो उसे कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है। सूर्य की किरणे सीलिंग से आ रही थीं। उसे आसमान साफ़ दिखाई दे रहा था और उसके सीट के ऊपर ही विमान में छेद हो गया था। विमान के भीतर हवा का दबाव बढ़ता जा रहा था। सभी लोग बेहद डरे हुए थे परंतु शांत थे। उन्हें परिचालकों ने ढाढ़स बंधाया और ओक्सिजन मास्क पहनने की हिदायत दी। पायलेट ने अपने कौशल से विमान को सुरक्षित ज़मीन पर उतार दिया।

ब्रायन जैसे लोग जिन्होंने इस घटना को झेला है, वे विमान में जब भी सवार होंगे, न जाने किस मानसिकता से गुज़र रहे होंगे, शायद वे भी बयान नहीं कर पायेंगे!!

बुधवार, 15 जुलाई 2009

इच्छा-मृत्यु

एक अंग्रेज़ी दम्पत्ति की इच्छा -मृत्यु

विश्व के कई देशों में इच्छा मृत्यु को अवैध करार दिया गया है जिनमें भारत और इंग्लैंड जैसे देश भी हैं पर स्विज़रलैंड इसका अपवाद है। स्विज़रलैंड में इच्छा मृत्यु को जायज़ माना जाता है पर साथ ही इसकी कुछ शर्तें भी हैं। जो लोग इन शर्तों को पूरा करते हैं, वे वहाँ की सामाजिक संस्थाओं से सहायता लेकर इच्छा मृत्यु को अपना सकते हैं।

हाल ही में एक ऐसी ही संस्था डिग्निटास क्लिनिक में इंग्लैंड की एक सुप्रसिद्ध दम्पत्ति ने इच्छा मृत्यु को गले लगाया। संगीत के प्रसिद्ध कंडक्टर सर एडवर्ड डौन्स और उनकी पत्नि जोन अपनी आयु और बीमारी से परेशान थे। सर एडवर्ड - जो बीबीसी फिल्हार्मोनिक के कंडक्टर रह चुके थे, अपनी ८५ वर्ष की आयु में लगभग अंधे और बहरे हो चुके थे। उनकी पत्नी जोन केंसर से पीढि़त थीं। परिवार में पुत्र-पुत्रियाँ तो थे पर उन्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा था। इसलिए उन्होंने इच्छा-मृत्यु का निश्चय लिया और ज़ूरिक के डिग्निटास क्लिनिक से सम्पर्क करके १० जुलाई २००९ को सदा के लिए सुख की नींद सो गए।

वर्षों से इस पर बहस जारी है कि इच्छा मृत्यु को जायज़ करार दिया जाय या नहीं और अब भी यह बहस जारी है....

सोमवार, 13 जुलाई 2009

तैरने से गर्भ

स्विमिंग पूल में तैरने से गर्भवती!!
रामायण का वह प्रसंग तो प्रसिद्ध है कि हनुमान जी का पुत्र समुद्र के मत्स्य से हुआ था। आधुनिक युग में यह स्विमिंग पूल में भी सम्भव है। यह कपोल-कल्पना नहीं! पोलैंड के वसॉ की एक महिला ने मिस्र की एक होटल पर दावा ठोक दिया है। इस महिला का मानना है कि उसकी बेटी स्विमिंग पूल में तैरने से प्रेग्नेंट हो गई है।
एजेंसियों के हवाले से यह बताया गया है कि १३ वर्षिय मैग्डलेना कविएत्कोवस्का छुट्टियाँ मनाने मिस्र गई और जब वह पोलैंड लौटीं तो पता चला कि वह गर्भवती है! उसकी माँ का मानना है कि मैग्ड्लेना स्विमिंग पूल में मौजूद स्पर्म से गर्भवती हुई और इसी आधार पर उसने होटल से मुआवज़ा मांगा है। माँ का यह भी दावा है कि अपनी यात्रा के दौरान उसकी बेटी किसी लड़के से भी नहीं मिली। अब वह अदालत में अपना पक्ष रखेगी!!!

शनिवार, 11 जुलाई 2009

भारत माता की जय

भारत माता की जय बोलना मना है!!

बिहार विधन सभा में उस समय हंगामा हुआ जब विधायक बुज़ुर्ग सत्यदेव नारायण आर्य ने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने पर राजद के कुछ सांसदों ने आपत्ति जताई।  राजद सांसद ने इसे सांप्रदायिक मसला बता सभापति से इसे कार्यवाही से बाहर निकालने की मांग की।  आसन पर बैठे सभापति महेश्वर सिंह ने राजद सदस्यों की आपत्ति पर इसे सदन की कार्यवाही से बाहर निकाल दिया।
क्या अब ‘भारत माता की जय’ के नारे को भी निषेध करार किया जाएगा????

सोमवार, 6 जुलाई 2009

हिंदी का उद्भव

‘समकालीन भारती साहित्य’ [मई-जून०९] के आमुख का अंश
हिंदी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास अत्यंत पुराना है। हिंदी साहित्य की प्रारम्भिक रचनाएँ ८वीं-९वीं सदी से हमें प्राप्त होने लगती हैं। विद्वानों का मानना है कि हिंदी का सम्बन्ध संस्कृत की अपेक्षा पालि से अधिक है। लगभग समस्त आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास अपभ्रंश भाषाओं से हुआ है, इसलिए उनमें एक गहरा रिश्ता है।
आज जिसे हम ‘हिंदी’ के नाम से व्यवहृत करते हैं, वह नाम उसे बहुत बाद में मिला। प्रारम्भ में इसे ‘भाषा’ के नाम से व्यवहृत किया जाता रहा है। हिंदी के उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है। कबीर ने संस्कृत और हिंदी अथवा ‘भाषा’ की तुलना करते हुए कहा था ‘संस्किरत है कूप जल, भाषा बहता नीर’। तुलसी और सूर भी इसे भाषा ही पुकारते हैं [भाषा भनिति थोर मति मोरी-तुलसी /लिखि भाषा चौपाई कही-सूर]। केशवदास की उक्ति का ध्यान करें तो यह प्रतीत होता है कि उनके समय में हिंदी या भाषा गँवारों की भाषा मानी जाती थी और उसमें रचना करना एक तरह से अपना अवमूल्यन करना था:
भाषा बोलि न जानही जिनके कुल के दास
तेहि भाषा कविता करी जड़मति केशवदास।
मुसलमानों के आगमन के पश्चात ही इसे हिंदुई, हिंदवी और हिंदी कहा गया। अमीर खु़सरो [१२५३-१३२५ई।] ने ‘हिंदवी’ और ‘हिंदी’ दोनों शब्दों का उपयोग भाषा के अर्थ में किया है। वह पहले भारतीय कवि थे जिन्होंने इस भाषा को ‘हिंदवी’ और ‘हिंदी’ कहा। जायसी भी इस देसी भाषा के लिए ‘हिंदवी’ शब्द का उपयोग करते हैं। [तुर्की, अरबी, हिंदवी भाषा जेति आहि। जामे मारग प्रेम का, सबै सराहै ताहि।]

मध्यकाल में हिंदी ‘हिंदवी’ नाम से ही लोकप्रिय रही। १८०० में फ़ोर्ट विलियम कालेज की स्थापना तक ‘हिंदी’ के लिए ‘हिंदवी’ नाम ही सुनाई पड़ता है। आज इसे हिंदुस्तान की भाषा के रूप में ‘हिंदुस्तानी’ कहा गया। फ़रिश्ता [१६०७], टेरी [१६१६ई।] और केटलियर[१७१५] और बाद में महात्मा गांधी ने इसके लिए ‘हिंदुस्तानी’ शब्द ही व्यवहृत किया।

दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों की भाषा को पहले ‘हिंदी’ कहा गया और बाद में उसे ‘खड़ी बोली’ का नाम दिया गया। जब वह दक्खिन में पहुँची तो पहले इसे ‘हिंदवी’ और ‘हिंदी’ कहा गया, बाद में इसे ‘दक्खिनी’ नाम से पुकारा गया। यही परिनिष्ठित हिंदी का पूर्व रूप है।
एक प्रश्न यह भी सामने आता है कि हिंदी का प्रथम ग्रंथ किसे माना जाए। राहुल सांकृत्यायन स्वयंभू द्वारा रचित पुमउ चरउ को हिंदी की पहली कृति मानते हैं। स्वयंभू अपभ्रंश के प्रतिष्ठित लेखक थे और गोदावरी के दक्षिण के रहने वाले थे तथा दक्षिण में प्रचलित यापनिप संप्रदाय के थे। पुष्पदंत ने भी स्वयंभू की शैली में महापुराण लिखा। वे राष्ट्रकूट दरबार के राजकवि और कृष्णराज तृतीय [९३९-९६८] के समकालीन थे। इससे स्पष्ट है कि दक्षिण में हिंदी के आदि रूप अपभ्रंश में रचनाएँ की गई।