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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

एक खयाल


बड़ा

सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का वह दोहा था-

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर
पथिक को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥

यह सही है कि बड़ा होने का मतलब होता है नम्र और विनय से भरा व्यक्ति जो उस पेड की तरह होता है जिस पर फल लदे हैं जिसके कारण वह झुक गया है।  बड़ा होना भी तीन प्रकार का होता है। एक बड़ा तो वह जो जन्म से होता है, दूसरा अपनी मेहनत से बड़ा बनता है और तीसरा वह जिस पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  

अपने परिवार में मैं तो सब से छोटा हूँ।  बडे भाई तो बडे होते ही हैं।  बडे होने के नाते उन पर परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां भी थीं।  पैदाइशी बड़े होने के कुछ लाभ हैं तो कुछ हानियां भी हैं।  बड़े होने के नाते वे अपने छोटों पर अपना अधिकार जमा देते हैं और हुकुम चलाते हैं तो उनके नाज़-नखरे भी उठाने पड़ते हैं।  उनके किसी चीज़ की छोटे ने मांग की तो माँ फ़ौरन कहेगा- दे दे बेटा, तेरा छोटा भाई है।  छोटों को तो बड़ों की बात सुनना, मानना हमारे संस्कार का हिस्सा भी है और छोटे तो आज्ञा का पालन करने लिए होते ही हैं। परिवार में बडे होने के नुकसान भी हैं जैसे घर-परिवार की चिंता करो, खुद न खाकर भी प्ररिवार का पोषण करो आदि। अब जन्म से बडे हुए तो ये ज़िम्मेदारियां तो निभानी भी पड़ेंगी ही।

जन्म से बडे कुछ वो सौभाग्यशाली होते हैं जो बड़े घर में पैदा होते हैं।  वे ठाठ से जीते हैं और बडे होने के सारे लाभ उठाते हैं।  बडे घर में जन्मे छोटे भी बडे लोगों में ही गिने जाते हैं।  इसलिए ऐसे लोगों के लिए पहले या बाद में पैदा होना कोई मायने नहीं रखता।  उस परिवार के सभी लोग बडे होते हैं।

दूसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जो अपने प्ररिश्रम से बडे बन जाते हैं।  एक गरीब परिवार में पैदा होनेवाला अपने परिश्रम से सम्पन्न होने और बुद्धि-कौशल से समाज में ऊँचा स्थान पाने वाले लोगों के कई किस्से मशहूर हैं ही।  ऐसे लोगों को ईश्वर का विशेष आशीर्वाद होता है और उनके हाथ में ‘मिदास टच’ होता है।  वे मिट्टी को छू लें तो सोना बन जाय!  अपने बुद्धि और कौशल से ऐसे लोग समाज में अपना स्थान बनाते है और बड़े कहलाते हैं।  

ऐसे बडों में भी दो प्रकार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।  कुछ बडे लोग अपने अतीत को नहीं भूलते और विनम्र होते है।  उनमें अभिमान नाममात्र को नहीं होता।  इसलिए समाज में उनका सच्चे मन से सभी सम्मान करते हैं।  दूसरी प्रवृत्ति के बडे लोग वे होते हैं जो शिखर पर चढ़ने के उसी सीड़ी को लात मार देते हैं जिस पर चढ़कर वे बडे बने रहना चाहते हैं।  वे अपने अतीत को भूलना चाहते हैं और यदि कोई उनके अतीत को याद दिलाए तो नाराज़ भी हो जाते हैं।  इन्हें लोग सच्चे मन से सम्मान नहीं देते;  भले ही सामने जी-हुज़ूरी कर लें पर पीठ-पीछे उन्हें ‘नया रईस’ कहेंगे।  ऐसे बड़े लोगों के इर्दगिर्द केवल चापलूस ही लिपटे रहते हैं।  कभी दुर्भाग्य से जीवन में वे गिर पडे तो उनको कोई साथी नहीं दिखाई देगा।  सभी उस पेड के परिंदों की तरह उड़ जाएंगे जो सूख गया है।

तीसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जिन पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  इस श्रेणी में धनवान भी हो सकते हैं या गुणवान भी हो सकते हैं या फिर मेरी तरह के औसत मध्यवर्गीय भी हो सकते हैं जिन्हें कभी-कभी समय एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देता है जब वे अपने पर बड़प्पन लदने का भार महसूस करते हैं।  हां, मैं अपने आप को उसी श्रेणी में पाता हूँ!

मैं एक मामूली व्यक्ति हूँ जिसे अपनी औकात का पता है।  मैं अपनी क्षमता को अच्छी तरह से परक चुका हूँ और एक कार्यकर्ता की तरह कुछ संस्थाओं से जुड़ा हूँ।  जब मुझे किसी पद को स्वीकार करने के लिए कहा जाता है तो मैं नकार देता हूँ। फिर भी जब किसी संस्था में कोई पद या किसी मंच पर आसन ग्रहण करने के लिए कहा जाता है तो संकोच से भर जाता हूँ।  कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब मुझे स्वीकार करना पड़ता है तो मुझे लगता है कि मैं उस तीसरी श्रेणी का बड़ा हूँ जिस पर बडप्पन लाद दिया जाता है।  इसे मैं अपने प्रियजनों का प्रेम ही समझता हूँ, वर्ना मैं क्या और मेरी औकात क्या।  क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा! मुझे पता है कि बड़ा केवल पद से नहीं हो जाता बल्कि अपने कौशल से होता है।  ऐसे में मुझे डॉ. शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव की यह कविता [बहुत दिनों के बाद] बार बार याद आती है--

बड़ा को क्यों बड़ा कहते हैं, ठीक से समझा करो
चाहते खुद बड़ा बनना, उड़द-सा भीगा करो
और फिर सिल पर पिसो, खा चोट लोढे की
कड़ी देह उसकी तेल में है, खौलती चूल्हे चढ़ी।

ताप इसका जज़्ब कर, फिर बिन जले, पकना पड़ेगा
और तब ठंडे दही में देर तक गलना पड़ेगा
जो न इतना सह सको तो बड़े का मत नाम लो
है अगर पाना बड़प्पन, उचित उसका दाम दो!

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

घूस का लेन-देन


भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण


[भ्रष्टाचार का मुद्दा दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है।  इस मुद्दे पर मेरे  कुछ विचार २ अक्टूबर २००० (गांधी जयंति) को ‘स्वतंत्र वार्ता’ में प्रकाशित हुए थे।  शायद आज भी वे और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं, इसलिए यहाँ उसे पुनः उद्धृत कर रहा हूँ]


भ्रष्टाचार के मामले में विश्व के कुल राष्ट्रों में भारत को एक ‘विशिष्ठ’ स्थान प्राप्त है।  यह कोई गर्व की बात नहीं है अपितु गौरतलब बात ज़रूर है।  आए दिन भ्रष्टाचार के कई मामले समाचारपत्रों में छपते हैं जो सनसनी तथा खीज पैदा करते हैं।

एक समय ऐसा था कि कोई घूस देने के लिए हिचकिचाता था यह सोच कर कि सामने वाला न जाने क्या समझ बैठे और कैसे उससे घूस की बात करें।  एक नीली नोट दिखाई और काम बन गया।  अब तो सौ रुपये कोई चपरासी भी नहीं लेता है!!

जैसे-जैसे भ्रष्टाचार बढ़ता गया, वैसे-वैसे हिचकिचाहट भी खत्म होने लगी- देनेवाला भी खुलेआम देने लगा और लेनेवाला भी बिना शर्म-ओ-हया के हाथ फैलाने लगा।  पर इस बेइमानी में भी एक ईमान होता था।  घूस लेनेवाला उस काम को अंजाम देता था जिसके लिए उसने पैसे लिए हैं।  रफ़्ता-रफ़्ता हालत यह हो गई है कि अब देनेवाले को यह भरोसा भी नहीं रह गया है कि पैसे देने के बाद भी काम बनेगा या नहीं! यानि, इस बेइमानी के काम में भी बेइमानी आ गई है।

हाल ही में, समाचार पत्र में यह समाचार देखने को मिला जिसमें हैदराबाद के सरकारी कर्मचारियों के एक नेता श्री पूर्णचंद्र राव का बयान छपा था कि छोटी-छोटी रिश्वत के मामलों को पकड़ कर कर्मचारियों को परेशान किया जा रहा है।  इसका अर्थ यह है कि वे छोटी-छोटी चोरियाँ कर सकते हैं और अधिकारी को उनकी अनदेखी कर देनी चाहिए!  पर इन्हीं छोटी चोरियों से उनकी जुर्रत इतनी बढ़ जाती है कि ये भ्रष्टाचार के बड़े फाटक खोल देती है।  सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता अब ऐसी हो गई है मानो भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है और घूस लेना कोई बुरी बात नहीं है, वह तो केवल काम करने के लिए एक ‘तोहफ़ा’ मात्र है।

एक और चौंकानेवाला समाचार दिल्ली उच्च न्यायालय में दिल्ली नगर निगम के वकील रमण दुग्गल का आया।  उन्होंने स्वीकार किया कि निगम के अधिकारी व अभियंता भ्रष्ट हैं पर उनके खिलाफ़ इसलिए कार्रवाई नहीं की जा सकती कि तब निगम में कोई कर्मचारी नहीं बचेगा!!

हैदराबाद के एक भूतपूर्व मुख्य अभियंता सुरेंद्र बहादुर श्रीवास्तव के पास से करीब तीन करोड़ रुपये बरामद होने की खबर अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक ‘अ-भूतपूर्व’ डिप्टी कमिशनर, वाणिज्य कर विभाग, श्री ए.जे.फ़्रेंकलिन के पास से चार करोड़ मूल्य की सम्पत्ति ज़ब्त होने का समाचार फैला।  ऐसा लगता है कि हर राज्य के अधिकतर सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।   अर्थात, भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण हो गया है।

भारत की सड़कों पर इतने पढ़े-लिखे बेरोज़गार घूम रहे हैं।  यदि सारे भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ़ कार्रवाई करके उन्हें निकल दिया जाए और इन बेरोज़गारों को नौकरी दी जाए तो इससे दो लाभ होंगे।  एक तो  कार्यालयों में ईमानदारी आने की संभावना बढ़ जाएगी क्योंकि नए कर्मचारी भ्रष्टाचार का परिणाम देख चुके होंगे।  दूसरे, यदि वे भी भ्रष्ट बनें तो उनकी जगह दूसरे बेरोज़गार को रोज़गार दिया जा सकेगा।  इस प्रकार बेरोज़गारी की समस्या का हल भी हो सकेगा।

भ्रष्टाचार को अब तक एक मामूली तथ्य समझकर उसकी अनदेखी की गई जिसका गंभीर परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ वर्ष बाद भी भारत की गिनती संसार के भ्रष्टतम देशों में होने लगी है।  क्या हमारे राष्ट्र के नेता भ्रष्टाचार के इस राष्ट्रीयकरण का सफ़ाया करने के लिए दृढ़संकल्प हैं???

इससे पहले उन्हें अपने गिरेबां में झाँक कर देखना होगा, अपना चरित्र सुधारना होगा, केवल तब ही वे राष्ट्र चरित्र के निर्माण की ओर अग्रसर हो सकते हैं।  क्या हमारे नेता इस इन्किलाब के लिए तैयार हैं?  क्या ‘सत्यमेव जयते’ को साकार बनाने का प्रण लेकर वे इस सत्य और अहिंसा के देश को पुनः वही आचरण दे पाएँगे जिसके लिए भारत की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी???


गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

स्त्री विमर्श


यौन उत्पीड़न - कितना सच, कितना झूठ

घटनाएँ २००७ की हैं जो उस समय चर्चा के केंद्र में थी और यह मुद्दा आज भी प्रासंगिक हैं।

हैदराबाद की संगीता शर्मा ने आत्महत्या कर ली।  अपने अंतिम संदेश में उसने लिखा था कि उसे यह चरम निर्णय इसलिए लेना पड़ा क्योंकि उसके साथी द्वारा यौन उत्पीड़न किया जा रहा था।  वह हाई कोर्ट की वकील थी।  उसने जो कुछ लिखा, उसका उसे पूरा अहसास रहा होगा और वह यह चाहती होगी कि कम से कम उसके मरने के बाद ऐसे कदम उठाए जाएँ जो महिला उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कारगर हों और कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा की ओर सरकार का ध्यान जाए।

संगीता शर्मा की मृत्यु का परिणाम यह हुआ कि यह खबर कुछ दिन तक अखबारों की सुर्खियों में रही, हमेशा की तरह नेताओं ने खोज-बीन करके अपराधी को नहीं बख़्शने का वादा किया।  कुछ सामाजिक संस्थाओं ने ज़ोर शोर मचाया तो कुछ ने एक स्त्री की मानसिक असंतुलन की बात कही और मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दूसरी घटना राजस्थान की है।  जयपुर जिले व सत्र न्यायालय में संध्या भारद्वाज एक कनिष्ट लिपिका के पद पर कार्यरत थी।  उन्होंने आरोप लगाया कि सालावाड पुलिस निरीक्षक राजीव दत्ता के नेतृत्व में झूठे मामले में फंसाकर उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जा रहा है।  जयपुर के कई राजनैतिक और गैर-राजनैतिक संगठनों ने संध्या भारद्वाज के इस आरोप का खंडन किया और कहा कि झालावाड के अपराधिक तत्वों ने साजिशाना ढंग से संध्या के माध्यम से राजीव दत्ता को निशाना बनाया है क्योंकि उस कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपराधी तत्वों की नाक में दम कर रखा है।

एक और घटना संसद में सांसद रहे साक्षी महाराज पर आरोप की है।  उन पर आरोप लगाया गया कि वे दुर्गा भारती नामक उनकी शिष्या के साथ यौन उत्पीड़न कर रहे हैं।  गौरतलब है कि दुर्गा भारती एक साधारण परिवार की बेरोज़गार महिला थी जो साक्षी महाराज के सम्पर्क में आकर मात्र चार वर्षों में एक विद्यालय की शिक्षिका से महाविद्यालय की प्राचार्य बन गई।  जब तक दुर्गा भारती तरक्की की सीढियां चढ़ती रही और साक्षी महाराज की मुख्य शिष्या बनी रही, उसे कोई शिकायत नहीं थी।  फिर यह यौन उत्पीड़न का मामला अचानक कैसे उभरा?

ऐसे कई समाचार आए दिन आते रहते हैं जो पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियाँ बनती हैं और कुछ समय बाद उन्हें भुला दिया जाता है।  क्या ही अच्छा हो कि सनसनी फैलाने की बजाय ऐसे मुद्दों की तह तक जाएँ और अपराधी [चाहे वह पुरुष हो या स्त्री] को दण्डित करें।


मंगलवार, 27 सितंबर 2011

हिंदी की दयनीय स्थिति


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास को महात्मा गांधी ने हिंदी के प्रचार के लिए स्थापित किया था जिसे देश की संसद ने AN INSTITUTION OF NATIONAL IMPORTANCE BY ACT 14 OF 1964 का सम्मान दिया है। परंतु इस और इस जैसी कई हिंदी सेवी संस्थाओं के साथ सरकार जो दोयम दर्जे का बर्ताव कर रही है, उस पर क्षोभ प्रकट करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव व प्रसिद्ध भाषा विज्ञान शास्त्री प्रो. दिलीप सिंह ने सभा की हैदराबाद से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के सितम्बर २०११ अंक में जो लेख लिखा है, उसके कुछ मुख्य अंश  दे रहे हैं।  इन विचारोत्तेजक मुद्दों पर हर हिंदी प्रेमी को विचार करना चाहिए। ]

प्रो. दिलीप सिंह, कुल सचिव, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के विचार


ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झाँकते नजर आएँगे। 

समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता।  इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। 

इन संस्थाओं के प्रबुद्ध हिंदी सेवी तथा भारत-भर के हिंदीतर क्षेत्रों में कार्य करने वाले ‘रिसोर्स पर्सन्स’ के सहयोग से ये काम योजनाबद्ध और समयबद्ध ढंग से करके हिंदी भाषा के अद्यतन स्वरूप और पुरोधाओं के योगदान को हिंदी जगत के समक्ष रखा जा सकता है और पिछड़ा, पुराना-धुराना, रूढ़िवादी होने का जो आरोप तथाकथित प्रबुद्धजन हमारी संस्थाओं पर लगाते रहते हैं, उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर आगे के इतिहास में इन संस्थाओं का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया जा सकता है। संदेही मानसिकता वालों को यह लग सकता है कि स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बस का नहीं है कि वे इन कामों को अंजाम दे सकें। पर हम जैसे लोग जो दक्षिण भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित हिंदी संस्था में काम कर रहे हैं, इनकी क्षमता को पहचानते हैं। 

आँखों में खून के आँसू आ जाते हैं इन स्म्स्थाओं की विपन्नता देख कर।  आर्थिक सहायता के नाम पर सरकार कुछ ठीकरे इनके सामने फेंक देती है।  क्या आप विश्वास करेंगे कि जो हिंदी अध्यापक [प्रचारक] गाँव-गाँव में हिंदी शिक्षण की अलख जगाता है उसे एक हज़ार रुपए महावार दिए जाते हैं।  जो कार्यकर्ता रात दिन काम करते हैं, उनका वेतन भी कुछ हज़ार से ज़्यादा नहीं है।  विश्वविद्यालय विभाग[उच्च शिक्षा और शोध संस्थान] के प्राध्यापकों को आठ हज़ार, रीडर को बारह हज़ार और प्रोफ़ेसर को सोलह हज़ार रुपए का अनुदान भारत सरकार प्रदान करती है। [अन्य विश्वविद्यालयों में यह राशि लगभग पचास हज़ार से एक लाख रुपए प्रति माह है!]  इस प्रकार की विपन्नता में भी हिंदी भाषा के लिए विस्तीर्ण कार्य दक्षिण भारत में किया जा रहा है।

 ‘हम हिंदी जैसी दरिद्र भाषा की बेचारी संस्थाएँ हैं’ - यह हीन ग्रंथि हमारे कार्यकर्ताओं को भी ग्रसे हुए है। हिंदी को ‘मातृभाषा-अन्य भाषा’ के घेरे से बाहर खींच कर उसे ‘भारतीय भाषा’ कहने, मानने और बनाने की आवाज उठाने में हम संकोच करने लगे हैं। हमारी रगों में हिंदी है लेकिन हमारी आत्मा हिंदी में नहीं है। हिंदी या मातृभाषाओं को पीछे ढकेलने वाले रथों के चक्र को पीछे ढकेलने की जगह हम बस हाथ उठा-उठा कर चिल्ला रहे हैं कि देखो-देखो वे रथ को चढ़ाए आ रहे हैं - चाहे वह अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का रथ हो, चाहे हिंदी-विरोध का, चाहे प्रशासनिक स्तर पर भारतीय भाषाओं की अवहेलना का या चाहे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को येन केन प्रकारेण झुठलाने और चुनौती देने का। 
हाँ, अब वह भी कह देना चाहिए जिसकी वजह से मेरा मन उद्वेलित हुआ। मैं जानता हूँ कि मेरी लेखन-शैली इतनी आक्रामक पहले कभी नहीं हुई है। पर मजबूर हूँ। बहरों को सुनाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोलना पड़ा। संयम फिर भी बरता गया है। कुछ ही माह पहले हिंदी के एक स्वनामधन्य मठाधीश दक्षिण भारत की किसी हिंदी संस्था में अपने ‘पधारने’ का किस्सा सुनाते हुए मुँह बिचका कर कह रहे थे - ‘कैसी हैं ये संस्थाएँ। न ढंग की बिल्डिंग, न कैंपस। छोटे-छोटे कमरे, स्कूली बरामदे, हुँह।’ फिर मुझसे पूछा ‘क्या आपके यहाँ का भी यही हाल है?’ मेरे जवाब की परवाह किए बिना अपनी ही रौ में कटाक्ष-भाव से शातिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले - ‘चलते समय उस संस्था के अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि आपको कैसा लगा तो मैंने कह दिया कि मुझे तो यही लगा कि ऐसी हिंदी संस्थाओं को आग लगा देनी चाहिए। आज हिंदी कहाँ की कहाँ पहुँच गई है फिर जरूरत क्या है इस प्रचार-फ्रचार की।’   मैंने अब अपनी बात कही संक्षेप में, वही सब जो इस लेख में लिखा है। पर वे तो ठाने हुए थे और हिंदी का भाग्यविधाता होने के अहं में चूर थे। अपनी इस खामखयाली से भी वे पूरी तरह मुतमइन थे कि आज नहीं तो कल ये संस्थाएँ अपनी मौत आप मरेंगी। इन्हें तो खत्म होना ही है। बकने दीजिए उन्हें ....।


हमने बरसों-बरस हिंदीतर भाषी ज़मीन पर हिंदी का पौधा रोपा है। अपनी दीवानगी का खाद-पानी दे कर हमारे पूर्वजों ने इसे सींचा है। क्या इस लहलहा रहे पौधे को हम यों ही सेंत में मुर्झाने देंगे। कदापि नहीं।


रविवार, 18 सितंबर 2011


ये हिंदी किस ‘भाषा’ का नाम है?
डॉ. राधेश्याम शुक्ल

[हैदराबाद से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘स्वतंत्र वार्ता’ के साप्ताहिकी में डॉ. राधेश्याम शुक्ल [संपादक] का एक विस्तृत लेख छपा है जिसे उन्होंने तीन भागों में लिखा है।  इन लेखों का सारसंक्षेप यहां साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।  इन विस्तृत लेखों को उनके ब्लाग ‘नव्यदृष्टि’ navyadrishti.blogspot.com पर देखा जा सकता है।] 

हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति व हिंदू जाति की तरह देशव्यापी [व देश के बाहर भी] उपस्थिति के बावजूद हिंदी की कोई सुस्पष्ट पहचान या परिभाषा नहीं बतायी जा सकती।  वास्तव में इस देश के लोगों को हिंदी नाम की भाषा व हिंदू नाम की जाति व धर्म की कोई जानकारी नहीं थी।  

पश्चिम से यानी यूनान, अरब, फ़ारस, मध्येशिया आदि से आये लोगों ने यहां के लोगों को बताया कि वे हिंदू हैं, उनकी भाषा हिंदी है और उनका देश हिंदुस्तान।  इस देश की धरती, यहां के निवासियों, उनकी भाषा व धर्म को यह नाम तो बहुत पहले मिल चुका था, किंतु यह स्थापित तब हुआ, जब यहां बहुत से मुस्लिम आ गए और मुस्लिम शासन स्थापित हुआ।  

इस शब्द की राष्ट्रीय  पहचान अब भी बनी हुई है, लेकिन भाषा के स्तर पर यह सिकुड़ कर केवल उत्तर के कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है और उत्तर में भी उसकी एक परजीवी की हालत बनी हुई है।  यद्यपि इसको बोलने-समझने वाले पूरे देश में क्या दुनिया भर में फैले हुए हैं, लेकिन इसे उत्तर के कुछ प्रांतों की ही स्वाभाविक भाषा माना जाता है और उसी को हिंदी क्षेत्र और वहां के निवासियों को ही हिंदीभाषी कहा जाता है।  बाकी क्षेत्र को गैर हिंदी क्षेत्र और गैर हिंदी भाषी माना जाता है।  वहां के हिंदी विद्वनों को गैर हिंदी भाषी हिंदी विद्वान की संज्ञा दी जाती है। तो भाषा के स्तर पर आकर हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की परिभाषा इस तरह सिकुड़ गयी कि उसकी ठीक-ठीक पहचान ही मुश्किल हो गयी।

देश के स्वतंत्र होने पर जब हम अपनी विविध प्रकार की पहचान समेटने की स्थिति में आए, तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की सारी संगति बिगड़ चुकी थी।  अब न यह देश हिन्दुस्तान रह गया था, न यहां के निवासी हिंदू थे और न यहां के निवासियों की भाषा हिंदी रह गयी थी।  जब राष्ट्र के रूप में अंग्रेज़ों का दिया देश हमने स्वीकार किया तो भाषा के रूप में उनकी दी हुई भाषा भी अपना ली और उनकी दी ‘बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुरंगी, बहुभाषी’ खिचड़ी [प्लूरल] पहचान भी स्वीकार कर ली।  अपनी इस नई पहचान में राष्ट्रीय एकता की भावना का कोई तत्व शेष नहीं रह गया- न भाषा, न संस्कृति, न जाति, न धर्म।

राजनीतिक स्वार्थ व अवसरवाद ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘भेदभाववाद’ को अधिक महत्व दिया और भाषा के संदर्भ में तो इतना भी परवाह करने की ज़रूरत नहीं समझी गई।  क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर प्रांतों का निर्माण करके क्षेत्रीयता को संतुष्ट कर दिया गया और राष्ट्र के स्तर पर तो ‘इंडिया’ और ‘इंग्लिश’ स्वीकार की ही जा चुकी थी।

वस्तुतः हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान परस्पर सम्बद्ध शब्द और भाव हैं।  प्रारंभ में इनका धर्म [मज़हब या रिलिजन] से कोई संबंध नहीं था, लेकिन अब हिंदू शब्द तो केवल धर्म [रिलिजन] की पहचान बन गया है, वह भी एक ऐसे धर्म की, जिसकी अब तक कोई सर्वमान्य परिभाषा ही नहीं बन सकी है।  न तो इस हिंदू का देश हिंदुस्तान रह गया और न इस हिंदू की भाषा हिंदी बन सकी।

इतना तो स्पष्ट है कि बाहर के लोगों ने सिंधु नदी के पूर्व के सारे लोगों को हिंदू, उनकी भाषा को हिंदी और पूरे समुद्र पर्वत क्षेत्र को हिंदुस्तान कहा।  उन्होंने यहां के मज़हब का कोई ज़िक्र नहीं किया।  अब उनकी मूल बात मानें, तो इस देश की सारी भाषाएं हिंदी हैं।  यहां पाली या अपभ्रंश के लिए ‘ज़बाने हिंदी’ शब्द का प्रयोग किया गया है।  आशय यह कि बाहर से आए मुसलमान चाहे जिस भाषा क्षेत्र- तुर्की, अफ़गानी [पश्तो], फ़ारसी, अरबी आदि से आए रहे हों, लेकिन वे यहां के बाज़ारों, कस्बों व शहरों की भाषा ही यहां इस्तेमाल करते थे।

ऊपरी स्तर पर विद्वानों के बीच व्यवहृत संपर्क भाषा संस्कृत थी और निचले स्तर पर व्यवहार के लिए इस्तेमाल होने वाली आम आदमी की भाषा को केवल ‘भाषा ही कहा जाता रहा है।  मुसलमानों के आने से यह हुआ कि इसमें फ़ारसी, तुर्की, पश्तो और अरबी के भी कुछ शब्द मिल गए।  मूलतः इसी भाषा को हिंदी या हिंदवी कहा गया है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों के इस देश में आने के कई सौ साल बाद तक भाषा में कोई मज़हबी भेद नहीं पैदा हुआ था।  आम बोलचाल और व्यवहार की भाषा बदल रही थी, लेकिन उसकी कोई हिंदू मुसलिम पहचान नहीं बन रही थी।  लिपि को लेकर भी कोई झगड़ा नहीं था।  इस देश में राजकाज की भाषा फ़ारसी बन जाने के बाद भी [जो मुगल बादशाह अकबर के ज़माने में हुई] उसकी पहचान मज़हब के साथ नहीं जुड़ी।
लाल किले में मुग़ल बादशाह   शाहजहां का दरबार
जहां हिंदुस्तानियों की ज़ुबान हिंदी या हिंदवी से अलग
‘ज़ुबाने उर्दुए मुअल्ला’ ने रूपाकार ग्रहण किया।

भारत में आने के बाद यहां की भाषा को ‘हिंदी’ नाम इन मुस्लिम हमलावरों द्वारा ही दिया गया था, लेकिन अब यह ‘हिंद’ यानी इस देश की भाषा बन गई थी और यहां के मूल निवासियों को हिंदी की संज्ञा मिल गई थी।  लाल किले के दरबार से ही ‘उर्दू’ [ज़बाने उर्दू-ए-मुअल्ला का संक्षिप्त रूप] ने अपना नया भाषाई और मज़हबी रंग रूप करना शुरू किया।  उसने पर्शियन लिपि की नश्तालिक लिखावट शैली [घसीटवाली] अख़्तियार की।  दक्षिण एशियायी ज़रूरत के अनुसार उसमें कुछ अक्षर [हर्फ़] बढ़ाए गए और इस रूप में उसे हिंदी या हिंदवी से एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हुई।  अभी तक हिंदी या हिंदवी की एक कोई लिपि नहीं तय थी।  वह पर्शियन व तुर्की लिपि में भी लिखी जाती थी, नागरी में भी और अन्य भारतीय लिपियों में भी।  लेकिन अब उर्दू का नश्तालिक फ़ारसी शैली में लिखना अनिवार्य हो गया।  उर्दू का छंद विधान व वर्ण्य विषय भी फ़ारसी शैली का हो गया।

भाषा के इस मज़हबीकरण की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी।  अब हिंदू के नाम से अभिहित भारतीयों ने अपनी अलग भाषाई पहचान के लिए ‘हिंदू’ शब्द से जुड़ी इस ‘हिंदी’ को अपनी भाषा के रूप में विकसित करना शुरू किया।  हिंदी में संस्कृत के शब्दों को अधिक संख्या में शामिल करना शुरू कर दिया।  भाषा के इस मज़हबी विभाजन को अंग्रेज़ी सत्ता ने आकर और पुष्ट किया, क्योंकि इसमें उसका दीर्घकलिक राजनीतिक हित था।


राबर्ट काल्डवेल : दक्षिण-उत्तर का भाषाई व
सांस्कृतिक विवाद खड़ा करने वाला पहला मिशनरी


भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा की नीति १८३५ में लागू हुई।  लगभग उसी समय दक्षिण में एक मिशनरी का पदार्पण हुआ, जिसका नाम राबर्ट काल्डवेल था।  यह इवेंजलिस्ट मिशनरी भाषा विज्ञान में भी रुचि रखता था।  उसने निम्न जातियों के धर्मांतरण का काम तेज़ी से चलाया।  काल्डवेल ने श्रमपूर्वक तमिल भाषा का अध्ययन किया।  उसने पहली बार दक्षिण भारत की भाषाओं को एक अलग भाषा परिवार घोषित किया। ‘द्रविडियन लैंग्वेज’ शब्द को पहली बार काल्डवेल ने प्रचलित किया।  उसकी इस अनूठे शोध के पहले दक्षिण भारत की भाषाएं भी संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं से संबद्ध मानी जाती थीं।  दक्षिण की प्राकृत भाषाएं निश्चय ही उत्तर की प्राकृत भाषाओं से भिन्न थीं, लेकिन हिमालय से समुद्र पर्यंत पूरे क्षेत्र के लिए विद्वानों की संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त संस्कृत से दक्षिण की ये भाषाएं भी समान रूप से प्रभावित थीं।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में गैरब्राह्मणवादी आंदोलन के ‘रेडिकलाइज़ेशन’ का श्रेय काल्डवेल को ही जाता है।  मज़हबी विस्तार का लक्ष्य पाने के लिए जो पृथकतावादी सिद्धांत गढ़ा, उससे देश आज तक आक्रांत है।  अंग्रेज़ शासकों को इससे दक्षिण में भी अंग्रेज़ी विस्तार को और मदद मिली।

फ़ारसी और अंग्रेज़ी के इस देश में आने के पूर्व संस्कृत के समानांतर एक जनभाषा भी देश में विद्यमान थी, जो समान्य जनों के स्तर पर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा थी।  इसकी पहचान जाने अनजाने भाषाई राजनीति के चक्कर में लुप्त हो गई।  राबर्ट काल्डवेल के पूर्व दक्षिण में भी कोई भाषाई या लिपि द्वेष के लिए स्थान नहीं था।  देश भर में प्रचलित लिपियों में से एक नागरी लिपि का चयन या विकास किया गया था।  इस देश की सारी लिपियां ब्राह्मी से विकसित हैं।  उनकी लेखनशैली भिन्न हो सकती है, किंतु उनकी वर्णमाला एक ही है।

अभी मात्र पाँच सौ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में [श्रीलंका पर्यंत] क्षेत्रीय भाषाओं और लिपियों के साथ संस्कृत भाषा और नागरी लिपि भी प्रचलित थी।  ९००ई. तक तो अपभ्रंश की देशव्यापी उपस्थिति की बाकायदे पहचान भी हो चुकी है।  लेकिन इस्लामिक आक्रमणों और उनके साम्राज्य विस्तार के कारण संस्कृत और अपभ्रंश दोनों का देशव्यापी या अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप छिन्न-भिन्न होने लगा और १३वीं शताब्दी के अंत तक अपभ्रंश और संस्कृत दोनों का अखिल भारती स्वरूप समाप्त हो गया।

वास्तव में देश में फैली राजनीतिक व संस्कृति अराजकता का सब से बड़ा कुप्रभाव भाषा पर पड़ा और राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता टूटने के कारण भाषाई एकता भी बिखर गई।  क्षेत्रीय सांस्कृतिक, भाषाई, राजनीतिक व मज़हबी इकाइयां बन जाने के कारण उनके बीच प्रतिस्पर्धा की भावना भी शुरू हो गई।  इस प्रतिस्पर्धा ने हर तरह की अराजकता को और बढ़ा दिया, जिसका बाद में आनेवाले ईसाइयों ने भरपूर फायद उठाया।

यह ध्यान देने की बात है कि अरबी, फ़ारसी, तुर्की मिश्रित इस उत्तरी भाषा [हिंदी] को दक्षिण के लोगों ने कभी दिल से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसे वे मुसलमानों की भाषा समझते थे।  इसकी प्रतिक्रिया में उनका अपनी क्षेत्रीय भाषाओं व लिपियों के प्रति आग्रह बढ़ता गया।  विड़म्बना देखिए कि बाद में मुस्लिम शासकों व विद्वानों ने भी इसी हिंदी भाषा और उसकी लिपि का परित्याग कर दिया, क्योंकि वे यहां के लोगों यानी हिंदुओं या भारतीयों से अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे।  इसलिए उन्होंने अपनी भाषा को ‘उर्दू’ नाम दिया और उसके लिए पर्शियन लिपि स्वीकार की।  

वास्तव में इस देश से यह गलतफ़हमी दूर होनी चाहिए कि हिंदी किसी क्षेत्र या मज़हब की भाषा है।  न संस्कृत किसी जाति, क्षेत्र या मज़हब की भाषा थी, न अपभ्रंश और न उसकी उत्तराधिकारिणी हिंदी।  इसे उत्तर भारत की कुछ भाषाओं का समूह भी नहीं कहा जाना चाहिए।  इस सामूहिकता की अवधारणा से उत्तर भारत की अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का बहुत नुकसान हुआ है।