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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

चक्की- एक समीक्षा


महिला जीवन है एक ‘चक्की’

एक संवेदनशील महिला अपने जीवन के इर्दगिर्द होते पारिवारिक घटनाओं को जब देखती है तो स्त्री पर होनेवाले प्रभावों को महसूस करती है।  इन घटनाओं में कभी भोगा हुआ यथार्थ होता है तो कभी किसी अन्य महिला से सुनी-सुनाई या फिर पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी घटनाएँ होती हैं।  ऐसी ही संवेदनशील महिला जब कलम की धनी हो तो वो इन घटनाओं को कागज़ पर उकेर लेती है।  जीवन की इस पिसती चक्की में नारी की इन्हीं कुछ घटनाओं पर आधारित हैं तेलुगु की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. मुदिगंटि सुजाता रेड्डी का कहानी संग्रह ‘चक्की’। डॉ. सुजाता रेड्डी ने अपनी सीधी-सादी शैली में स्त्री विमर्श पर लिखी बीस कहानियाँ इस पुस्तक में संग्रहित की है।  इन कहानियों से प्रभावित होकर डॉ. बी.सत्यनारायण ने इन्हें हिंदी में अनुवाद किया है।

‘चक्की’ की कहानियों में स्त्री के जीवन से जुडी कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों का जायज़ा भी लिया गया है।  शीर्षक कहानी ‘चक्की’ में उस महिला की दयनीय स्थिति दर्शायी गई है जिसका पति अच्छा कमाता तो है पर परिवार की सुध नहीं लेता, केवल अपने पर सारा धन लुटाता है।  परिवार चलाने के लिए कुछ रुपये दे देता है जो दाल-रोटी के लिए भी काफी नहीं होते।  दूसरी ओर बढ़ते बच्चों की अपनी फरमाइशें होती हैं जिन्हें उसकी पत्नी अपना पेट काटकर पूरा करती है।

स्त्री विमर्श का दूसरा जवलंत मुद्दा दहेज और अहम्‌ का है।  स्नेहलता देवी का पत्र, मोक्ष, न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति जैसी कहानियों में ब्याह और दहेज के मामलों पर प्रकाश डाला गया है।  इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार ने यह जतलाया है कि आज की नारी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती है और अपने माता-पिता का बोझ नहीं बनना चाहती।  दूसरी ओर पुरुष की यह प्रवृत्ति होती है कि किसी न किसी समय पत्नी पर यह ताना मारेगा कि ‘तेरे पिता ने क्या दिया... अंत में अंगूठा दिखा दिया ना!’[पृ.५९]  आज की नारी पढ़-लिख कर अपना कैरियर खुद बनाना चाहती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना चाहती है।  यही संदेश देती है कहानी- स्नेहलता देवी का पत्र।

प्रायः यह देखा गया है कि जब पति-पत्नी, दोनों कमाते है तो अहम्‌ का टकराव हो जाता है।  पुरुष चाहता है कि पत्नी अपनी कमाई भी पति के हाथ में रख दे और पत्नी अपनेआप को आर्थिक रूप से स्वतंत्र रखना चाहती है। लालच और अहम्‌ की इन परिस्थितियों में कभी-कभी स्त्री अनिश्चितता के दोराहे पर खडी दीखती है।  जैसे ‘मोक्ष’ कहानी की नायिका का यह सोचना कि ‘ऐसी स्थिति में यदि वह कुछ करने को कहे तो पति की बदनामी! बेइज़्ज़ती! वह जो कहेगा, वही मुझे करना है। नहीं तो उसका पुरुषाहंकार आहत होगा।’[पृ.६५]

युवा लड़कियों के लिए सड़कों पर घूम रहे रोड-रोमियो कभी कभी जी का जंजाल बन जाते है।  इस संग्रह की कहानियाँ- रौडीइज़म और मेरा अपराध क्या है?, इन्हीं मुद्दों पर लिखी गई हैं।  उनकी छेड़छाड में सड़क पर ऐसा भी हादसा हो सकता है कि महिला पूछ सकती है- मेरा अपराध क्या है?

इसे एक विड़म्बना ही कहा जाएगा कि जब किसी महिला में अपने ही घर-परिवार को छोड़ने की छटपटाहट हो  और इसका कारण पुरुष ही नहीं, स्त्री भी हो सकती है।  बुढ़ापे में जब बहू का राज होता है तो ‘आज़ादी’ कथा की सास को अपनी हमउम्र सखियों को घर बुलाने और हँसने बोलने की भी मनाही की जाती है।  ऐसे में उसे वृद्धाश्रम की ओर मुँह करना पड़ता है।  कुछ ऐसी ही छटपटाहट उस ‘बंदिनी’ माँ की होती है जो विदेश में अपनी पुत्री की संतान की देखरेख के लिए जाती है और उसे शिशु को चूमने-पुचकारने की भी मनाही होती है।

स्त्री का सब से कठिन समय वह होता है जब वह विधवा हो जाती है और सामाजिक कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति वर्जिय मानी जाती है।  किसी भी शुभकार्य में उसका आगे ठहरना अशुभ माना जाता है।  इसी तरह के अंधविश्वासों का विरोध करती कहानियाँ है- उसकी अपनी बेड़ियां और न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।

स्त्री विमर्श के संदर्भ में लेखिका ने महिला के उस पहलु को उजागर किया है जिसके चलते पुरुष तो ख्याति पाता है परंतु उसके पीछे खड़ी स्त्री के बलिदान को कोई नहीं देख पाता।  उन्होंने इस कहानी संग्रह के प्राक्कथन में कहा भी है- ‘कहते हैं कि प्राचीन भारत में, समाज की बात हो या फिर परिवार की, स्त्री का सर्वत्र आदर होता था, उसे देवी समझा जाता था, उसकी पूजा की जाती थी।  किंतु स्री को किसी पूजा की आवश्यकता नहीं है।  उसकी भी अपनी एक हस्ती है, यह सोचकर ढंग से व्यवहार करें, यही काफ़ी है।  लोग उसके अतित्व और उसकी अस्मिता की कद्र करें, यही काफ़ी है।  एक ओर स्त्री की पूजा की गई और दूसरी ओर अनादि काल से उसे मोहिनी के रूप में देखा गया।’

आशा है कि स्त्री समस्याओं, इच्छाओं और अभिलाषाओं को समझने में ये कहानियाँ सही संदेश देने में सफल होंगी।


पुस्तक विवरण
पुस्तक का नाम  : चक्की [कहानी संग्रह]
लेखिका :  डॉ. मुदिगंटि सुजाता रेड्डी [तेलुगु]
अनुवादक : डॉ. बी. सत्यनारायण [हिंदी]
मूल्य : १५० रुपए
प्रकाशक : मिलिंद प्रकाशन
४-३-१७८/२, कंदास्वामी बाग
सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद-५०० ०९५





रविवार, 23 अक्टूबर 2011

स्त्री विमर्श


‘एक औरत-तीन बटा चार’ --- सुधा अरोडा
एक अवलोकन

[डॉ.दीप्ति गुप्ता, पुणे की यह समीक्षा पढ़ने को मिली।  स्त्री विमर्श पर लिखी प्रसिद्ध कहानीकार सुधा अरोडा की कहानियों पर आधारित यह समीक्षा पठनीय लगी, सो यहाँ प्रस्तुत है]

औरत की ज़िंदगी का दुखद सच दर्ज करती ‘सुधा अरोरा’ की कहानी ‘एक औरत-तीन बटा चार‘ मेरी नज़र में....
                  

       औरत की पीड़ा और  वेदना पर केंद्रित आज तक बहुत  कहानियाँ मैंने पढीं, लेकिन यह एक  ऎसी कहानी थी, जिसे  पढ़ कर मेरे आँसू जो बहने शुरू हुए तो बहते ही रहे और अंत तक चेहरा आँसुओं से तर रहा.
हाल ही में जून माह में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित  हिन्दी की  शीर्षस्थ लेखिका ‘सुधा अरोड़ा’ का कहानी संग्रह ‘एक औरत - तीन बटा चार’ पढ़ा. यूं तो इस संग्रह की सभी कहानियाँ जीवन के महत्वपूर्ण आयामों से जुडी हैं  लेकिन  जिस  कहानी  ने  मुझे  भीतर  तक   झकझोर   दिया  वह  है :           ‘एक औरत - तीन बटा चार’.
इस कहानी ने जिस पुरजोर ढंग से मुझे अपनी गिरफ्त में लिया, उससे बाहर निकलने में मुझे पूरे पच्चीस दिन लगे. मेरी दृष्टि में यह इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है. इस कहानी का शीर्षक ही नहीं अपितु शुरुआ़त भी  बड़ी चुम्बकीय और जिज्ञासा जगाने वाली है  -


‘‘ तीस बरस पुराना एक घर था. वहाँ पचास बरस पुरानी एक औरत थी. उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं.’’ 



                     इस कहानी में नायिका कहीं भी रोती बिसूरती  नहीं लेकिन उसका दर्द , सिर से पाँव तक कतारबध्द हुआ, उसके समूचे व्यक्तित्व से कतरा-कतरा रिसता है. उस एकाकी औरत का दर्द मेरे दिल में  ऐसा घनीभूत हुआ कि मैं उससे न सिर्फ अभिभूत हुई बल्कि बड़े कष्ट में रही. ऐसे दर्द से सामना होने पर, उससे पहचान होने की वजह से , हम अनजाने ही उसे अपने में सोखते चले  जाते हैं. यह शायद तादात्म्य होने की प्रक्रिया थी. ऐसा तभी घटता है जब हमारे अंदर सूक्ष्म अनुभूति को ग्रहण करने वाली पारदर्शिता और संवेदनशीलता हो. वह मेरे अंदर शायद कहीं खामोश पडी थी, जो इस कहानी को पढते ही सक्रिय हो उठी और लेखिका द्वारा सर्जित नायिका की एक-एक चिटकन, भटकन, बोझिल धडकन  के साथ एकात्म होती गई. कहानी में नायिका को  पढते हुए, ब्रिटिश लेखिका Jill Briscoe  की यह उक्ति ‘The storms  in  my  life  have become  workshops ’ मुझसे बार बार-बार टकराने लगी ! हर एक की ज़िंदगी के झंझावात उसे कुछ न कुछ सीख देते हैं. इस कहानी की नायिका तूफ़ान के बदले तूफ़ान उठाने के बजाय खामोश रहना सीख लेती है  - घर को  घर बनाए रखने की खातिर, लेकिन उसकी  इस कुर्बानी के बावजूद भी, उसका घर सच्चे अर्थों में घर बना रहता है क्या ? जब घर को सहेज कर रखने वाली के दिल में न सुकून हो, न प्रफ्फुलता, उलटे भावनात्मक रुग्णता के चलते वह गहन खामोशी का शिकार बन गई हो, तो ऎसी कुर्बानी का क्या लाभ ? उस घर में सब साजो सामान के होते हुए भी एक खालीपन अखरता है. सन्नाटे के साए तले वह घर, खुद-ब-खुद ऊंची-ऊंची दीवारों वाला एक मकां बन के रह जाता है. 


                 यह महज़ एक इत्तेफाक है कि नायिका का कहानी में कोई नाम नहीं है.  मेरे अनुसार,  यह इत्तेफाक यानी उसका कोई नाम न होना, कहानी के शीर्षक से पूरी तरह तालमेल में जाता है, क्योकि जो औरतें  पूरी तरह घरेलू  है, सिर्फ पति से ही नहीं, घर की चारदीवारी से भी उनका विवाह  हुआ होता है - उनके नाम  होकर भी  ‘नहीं’ के बराबर होते हैं , वे इस्तेमाल ही कहाँ  होते है ? खासतौर से एक घरेलू  नारी की  पहचान उसके नाम से उतनी नहीं होती जितनी कि उस पर लदे रिश्तों से होती है...किसी की बेटी , किसी की पत्नी, किसी की माँ.  इन रिश्तों के खोल में वह ऎसी समाती है कि अपनी  पहचान, अपना नाम  सब भूल जाती है.  दूसरे भी उसे , उसके नाम से न पहचान कर पिता या पति  के नाम से ही पहचानते हैं.  इसलिए नायिका का नाम हो या ना हो फर्क ही  क्या पडता है. ‘अनाम नायिका’ की कहानी होते हुए भी यह ‘ हर नाम ’ की  कहानी है.  वह ‘अनाम’ पात्र कहानी में पूरी तरह छाई हुई है.   इस कहानी में नायिका अपने बेतरतीब, बिखरे व्यक्तित्व के कारण पाठक मन को बेइंतहा अजीबोगरीब ढंग से अपने से बांधे रखती है. अपनी इस खूबी के कारण वह प्राणविहीन औरत कहानी का प्राण है,  बिखरी होने पर भी केंद्रबिंदु है. अजीब सा विरोधाभास  है लेकिन है बड़ा ख़ूबसूरत और चित्ताकर्षक ! कहानी की शुरुआत में दूसरे पैरा की ये पंक्तियाँ – ‘‘घर के साहब और बच्चों की उपस्थिति में भी  उनका जहाँ-तहाँ फैला सामान उनकी बाकायदा उपस्थिति की कहानी कहता था.’’  हांलाकि ये पंक्तियाँ घर में सिर्फ बच्चों और पति के फैलाव की बात करती हैं , लेकिन इसके साथ-साथ एक शब्द मेरे ज़ेहन में उभरा कि उस फैलाव से घर में अकेले होने पर अधिक उलझती,  उस फैलाव को अधिक बेडौलपन से महसूस करती - उस औरत का बिखराव घर में हावी था. आगे -    


‘उस घर को ‘घर’  बनाती हुई, यहाँ से वहाँ घूमती वह एक खूबसूरत औरत थी’’ -  

कहानी की इस पंक्ति में प्रच्छन्न रूप से चलता, एक और भाव  है कि वह औरत उस फैलाव के नीचे पसरे अपने स्थायी बिखरेपन को,  मानो अधिक समेटना चाहती थी.  उस मकां को अकेले अपनी जान लगा कर ‘घर’ बनाती  हुई, इस कमरे से उस कमरे में भटकती हुई,  एक ऎसी औरत थी जिसकी खूबसूरती,  वीरानी से एकरस हो,   उदासी बन सदा के लिए सरापा उसके व्यक्तित्व पर छप गई थी. 


                  दिल तो अकेला होता अक्सर सुना है, किन्तु जब सबके होते हुए भी जीवन अकेला हो, तो उसकी वेदना की कोई सीमा नहीं होती.  वह पीड़ा आकाश की तरह बिना ओर-छोर की होती है. ‘ आखिरी उंगली पर डस्टर लपेटे - हर कोने की धूल साफ़ करती हुई, हर चीज़ को  करीने से रखती हुई ’ - उस एकाकी नारी की त्रासदी ही यही है कि घर की चीजों की धूल और साहब और बच्चों के कमरे का कचरा साफ़ करते-करते, वह उसे  मानो अपने में समेटती जाती है.
‘ हर चीज़ को करीने से रखने वाली वह औरत,' अपने अंदर कुछ भी करीने से नहीं सहेज पाती. अपने लिए उसे फुर्सत ही नहीं है.  ‘फिर रात को सबके चेहरे की तृप्त मुस्कान को अपने चेहरे पर लिहाफ की तरह ओढ़ कर सोती हुई ’  वह  निरीह सबकी मुस्कान को अपने चेहरे पर पहन कर,  उसके तले अपनी पीड़ा और मन के सन्नाटे के गुबार को छिपाती हुई,  सच में,  कितना सो पाती है यह तो वह ही जानती होगी.  कहानी में आगे की पंक्तियाँ हांलाकि घर की चीजों की, लजीज़ खाने  की, ख़ूबसूरत बर्तनों की बात करती हैं,  किन्तु इन सबसे जुडी घर की सबसे  ‘महत्वपूर्ण चीज़,' किन्तु घर के लोगों के लिए नितांत  ‘महत्वहीन’  उस औरत के मन के भाव,  उसके खामोशी से काम करते रहने के बावजूद भी,  मेरे मन में इस तरह गुंजायमान होते रहे कि मैं कहानी से हट कर उस औरत के अंदर की कहानी,  उसके मन के एकाकी दुःख को,  भावनात्मक उजाडपन को पढती रही.  दर्द पीकर,  खामोशी से, एक के बाद  एक काम करती जाती, वो औरत एक भी आँसू नहीं टपकाती, लेकिन मैं उसकी खामोशी, असहज एकाकीपन से  असहज हो  नम  आँखों  से  कहानी पढती जाती थी - मानो मैं उससे रू-बरू थी और सामने बैठी उसे चलते-फिरते देख रही थी, उसके हर हाव-भाव से उजागर होती पीड़ा को महसूस रही थी.  ‘‘इस दिनचर्या से समय निकालकर वह औरत बाहर भी जाती - बच्चों की किताबें लेने, साहब की पसंद की सब्जियां लेने, घर को ‘घर’ बनाये  रखने का सामान लेने !’’ यूं  कोई पढ़े तो ये सामान्य पंक्तियाँ नज़र आएगीं लेकिन एक ओर मुझे इन शब्दों की पोर-पोर में बसी अकुलता ने विचलित किया तो दूसरी ओर ढेर वीरानियों के साथ जीती  उस औरत के साहस ने भी प्रभावित किया कि पथरीले दर्द से टूटने  और घर के किसी अकेले कोने में दुबक कर रोने  के बजाय, वह घर को  ‘घर’ बनाने में लगी रहती है.  मानो किसी अदृश्य अनुशासन के तहत, वह अपने हिस्से का दर्द,  अपने हिस्से की पीड़ा, खुशी से खाती-पीती  है  और इसी से यंत्र चालित सी, कामों को करती जाती है ! उसने अपने को  समझदारी और खूबसूरती से दो हिस्सों में बाँट लिया है.  जब भी वह घर से बाहर जाती है, तो एक चौथाई हिस्सा घर में छोड़ जाती है, जो उसके लिए ‘सेफ्टी एलार्म’ का काम करता है.  वह बाहर जाकर चाहे घर का  सामान खरीद रही हो या सहेलियों के साथ चाय नाश्ता करती बैठी हो, घर में छोड़े गए, एक चौथाई हिस्से की आवाज़ सुन कर झटपट उठ खडी होती है.  जैसे ही वह घर में कदम रखती है,  वह एक चौथाई हिस्सा उसके तीन चौथाई से गले मिल, एक हो जाता है और उसे  सुख-चैन से भर देता है. आजीवन यही सिलसिला कर्तव्यपरायण,  भावुक और संवेदनशील औरतों  के साथ चलता रहता है.  घर लौट कर वह एकाकी औरत, स्कूल से आए बच्चों को बांहों में भर  कर, ताज़ा नाश्ता देकर, साहब का इंतज़ार करती है. यह पढ़ कर एब्राहम  लिंकन की यह पंक्ति एकाएक मेरे मन में कौंधी और उस एकाकी औरत पर सही उतरती लगी -
 Lonely men seek companionship while  lonely women sit at home and  wait...!  
पति के आने पर,  उसकी आवभगत कर, अपना जीवन जैसे सार्थक करती है. लेकिन जब इतना ख्याल-प्यार करने पर भी उसे रूखा-सूखा  व्यवहार मिलता है, तब अंदर से कितना निरर्थक महसूस करती है...! अपने   लक्ष्यहीन जीवन  की त्रासदी उससे बेहतर कौन जानता होगा ?


                 घर की खुशियों, पति की हिदायतों, बच्चों की फरमाइशों  के वितान में उसे पता  ही नहीं चलता कि उसके दो हिस्सों के बीच फासला कितना बढ़ गया  हैं,  क्योंकि हर दिन, हर रात उसका घर के लिए नियत हिस्सा (Cardiomegaly - ह्रदय रोग की  तरह ) इस कदर फैलता जाता है कि वह उसके अपनी पहचान वाले तीन चौथाई हिस्से को ढांप लेता है. अपनी बेजान, कंपकंपाती पहचान को बनाए रखने की नाकामयाब कोशिश में, घबरा कर वह, दूसरों के लिए जीवंत रहने वाले, अपने एक चौथाई हिस्से को ओढती जाती है.  उसे पता  ही नहीं चलता कि उसका  तीन बटा चार हिस्सा कब एक चौथाई में लुप्त हो गया.  इस नए रूप के चलते अब वह जब भी बाहर जाती है तो वह ‘वह’ नहीं  होती - सिर्फ बच्चों की माँ होती या पति की आज्ञाकारी पत्नी होती या घर की ‘केयरटेकर’ होती है, जिसे बाहर निकलते  ही घर लौटने की  जल्दी  सताने लगती है  और तब तक वह  बेचैन रहती है, जब तक घर नहीं  लौट आती.   इस  मानसिकता से उसका  अपना वजूद गुम होता जाता है.  वह जान ही नहीं पाती - अपनी उस खोती  हुई पहचान को.  उसके इस पराए रूप को दख उसकी सहेलियां, नाते-रिश्तेदार खामोश रहते हैं, अनदेखा करते. घर लौटकर वह ‘अपने उसे एक चौथाई हिस्से को  ढूँढती फिरती है’ - इस अभिव्यक्ति को पढकर मेरी आँखें छलछ्ला आई.    यदि आपको कभी कोई, इस कमरे से उस कमरे में, रसोई से बालकनी में, इस तरह भटकता दिखे, तो समझ लें कि ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ है.  वह महिला  उखडी  हुई है  और अपनी पहचान खोज रही है, जो उसे घर के किसी कोने में, न अलमारी में, न दराज़ में, कहीं भी नहीं मिल रही है.  कहीं हो तो मिलेगी न  ! क्योकि उसकी पहचान अन्य प्राणियों की पहचान तले दबी हुई है. औरत  इसी तरह तो बँटी होती  है.  इसके अलावा भी उसके कई टुकड़े होते है.  एक टुकड़ा बच्चों के लिए सक्रिय होता है,  तो एक हिस्सा पति को समर्पित रहता है,  तो एक टुकड़ा सास-ससुर की सेवा पर तैनात रहता है. जब कभी मेहमान, नाते-रिश्तेदार रहने आते हैं, तो इन टुकड़ों में से किसी तरह वह अपना एक  और टुकड़ा करती है और उसे उन मेहमानों की सेवा में लगा देती है.  यूं टुकड़ों में बँटी वह जीने की आदी हो जाती है .... अपने अस्तित्व से कोसों दूर चली  जाती है फिर भी उफ़ तक नहीं करती.  सबसे अधिक कष्ट की बात यह है कि   उसका  ज़रूरत के अनुसार इस तरह टुकड़े-टुकड़े होना उसकी जानकारी के दायरे में घटता रहता है फिर भी वह बिफरती नहीं.  किसी को उसके इस तरह टुकड़े-टुकड़े होने की भनक नहीं पडती. जब-जब वह चिटकती है, टूटती है, बिखरती है, तो उसके आसपास रहने वाले अपनों को उसके  चिटकने, टूटने की न तो आवाज़ सुनाई  देती है और न उसमे पड़ती दरारें दिखाई देती हैं. इस पर भी, वह टूट कर अपने आप को जोडने की कोशिश करने में लगी रहती है.  कितना मुश्किल होता है ऐसे टूटने को अंदर ही अंदर जोडना, अपने को ‘वनपीस’ बनाए रखना.  कितना भी जगह-जगह से अपने को तरह-तरह की झूठी तसल्ली से जोड़े, दरारे तो रह ही जाती हैं जिनसे पीड़ा  धृष्टता से निकल कर - कभी उसके चेहरे पर मुर्दनगी बन कर सिमट जाती है,  तो कभी आँखों में नमी बन कर तैर जाती है, फिर भी घर के लोग उसे देख नहीं पाते.  वह माँ, बहू, पत्नी के धागों से कठपुतली की तरह बंधी - उन धागों के चलाने वालों के इशारे पर नाचती, सबको सुबह से लेकर रात तक खुशी की चमक से भरती है.  जैसे ही घर के सूत्रधार रात के निस्तब्ध अंधेरे  में सो जाते हैं, वह भी निश्चेष्ट कठपुतली बन जाती है.


                   वह औरत घर की चीजों से टकराते हुए, बदहवास  सी  होकर अक्सर, अपने एक चौथाई  हिस्से को इधर-उधर बेताबी से खोजती है, जो इतना ढीला हो गया है, इतना छीज गया है कि उसे पहचानने में समय लगता है.  वह एक चौथाई  हिस्सा कभी प्लास्टिक के फूलों में, तो कभी घर के ओने-कोने में मिलता है.  घर की औरत का घर के लिए नियत हिस्से को यों इधर-उधर ढूँढना - मेरे दिल को बार-बार बोझिल बनाने को काफी था.  वह अक्सर ही अपने तीन चौथाई हिस्से को अपने में समेटे, एक चौथाई हिस्से को इधर-उधर खोजती फिरती है - बौराई सी, व्याकुल सी, कमरों में, लान में....कभी वह उसे गेंदे की क्यारी के किनारे, ईंटों की तिकोनी बाड़ पर लुढ़का हुआ मिलता है, तो कभी जूतों के बीच धूल मिट्टी खाता मिलता है.  वह उसे झाड पोंछ कर, सबकी नज़रों से बचाती,  अपने दुपट्टे में छिपाती, साथ लिए चलती है.  बड़े हो गए बच्चे सामने पड़  जाते हैं तो उसे कुछ छिपाते देख पूछ बैठते है – ‘‘यह तुमने पल्लू में क्या छिपा रखा है ?’’ अपने मरे गिरे, बेजान से ‘एक बटा चार हिस्से’ को, बेचारगी से भरी पहचान को, अपनों से ही छिपाने  का दर्द  कितना असहनीय  हो सकता है,  उसे  या  तो  झेलने  वाला  जान  सकता  है या  उस  दर्द  से  गुज़रा  व्यक्ति  जान  सकता  है.  बच्चों  के  पूछने  पर  वह  और  अधिक  सतर्कता  से  उसे  ढक  लेती  है और  हकबकाई  सी  कहती है – ‘’कहाँ कुछ भी तो नहीं....’’ उस तीन बटा चार औरत के इन शब्दों की लाचारगी पर किसका दिल न भर आएगा ? कभी-कभी वह प्यार से उमड़ कर सबके द्वारा अनदेखे, उस एक बटा चार हिस्से के बारे में बड़े हो गए बच्चों से बात करने का साहस जुटाती है तो इतनी ही देर में कि वह कुछ बोल पाती, जीवन की रफ्तार में दौड़ते-भागते बच्चे – ‘ओ.के ,  समथिंग पर्सनल..’ कह  कर आगे बढ़ लेते है.  वह फिर वैसी ही अपने भोथरे हिस्से को जिसमें उसके दिल की कुछ धडकनें, कुछ संवेदनाएं, कुछ निहायत ही  कोमल भावनाएँ भी जहां-तहां चिपकी हुई हैं, पल्लू में छिपाए सन्न सी खडी रह जाती है. न जाने कितनी बार इन भावनात्मक चोटों से गुज़रती है वह.  किन्तु अब ये सब  चोटें उसका अपना अंश बन चुकी हैं.  

                    केनेडियन  लेखिका ‘सबरीना वार्ड हैरीसन’ ने कहा है -“What  we  don't  let out,  traps us…… So  we  don't  say  anything. And we become enveloped by a deep loneliness.
उपेक्षा से उपजे दर्द को बाहर उगलने के बजाय खामोशी से झेलना, अपने जीवन  में वीरानियों को दावत देना है.  ठीक यही इस कहानी में, दो हिस्सों में बँटी  औरत के साथ घट रहा है.  मन की बात किसी से बाँटती ही नहीं, बाँट लेने से शायद  वह खुद तो न बँटती.  कभी वह साहस जुटाती भी है अपनी बात कहने  का तो, कह नहीं पाती और दूसरों के पास इतना समय नहीं कि दो घडी फुर्सत के निकाल कर उससे कुछ पूछे, उसकी सुनें और इस तरह अपनों से उपेक्षित वह, ‘अकेलेपन’ की परतों में लिपटती जाती  है. 

                    घर में फर्नीचर के वार्निश का बेरौनक होना, पौधे का मुरझाना, सोफे की गद्दियों की सीवनों का उधड़ना, दरवाजो, खिडकियों के कांचों का धुंधलाना, तस्वीरों के फीके पड़े रंग - ये सब तो उसे नज़र आते है किन्तु  इन सबके साथ, उसका अपना एक चौथाई और तीन बटा चार हिस्सा जो दिन-पर-दिन धुंधलाता जा रहा है, वह उस पर कभी ध्यान ही नहीं देती.  देती भी है तो  अनदेखा करती देती है.  चीजों के फीकेपन  और उधडेपन में वह अपना फीका  और उधड़ा अस्तित्व भूल जाती है.  अपने अस्त-व्यस्त बेरौनक अस्तित्व  की  सिलवटों, झोल को सम्हाले वह एक धुंधली उम्मीद के साथ रोज साहब का इंतज़ार करती है कि शायद आज उसे  इस तरह उखडा, उधड़ा देख कर,  वे उसके बिगड़े अनुपात के बारे में कुछ पूछें, लेकिन साहब या तो दो मेहमानों के साथ घर आते हैं - मेहमानों के आने की सूचना देना भी गँवारा नहीं करते, या कभी -कभी होटल में ही खाकर देर गए लौटते हैं.  फिर किसी फ़ाइल में उलझ कर  घर में होने पर भी नहीं होते.  इस तरह रात उतर आती है, सब चैन और  सुकून से सो जाते हैं और वह अपने हिस्से में सदा के लिए आई बेचैनी से गले लग  कर, उस ढीले हिस्से को थपक-थपक कर सुला देती है.  कैसा अकेला,  वीरान जीवन है उसका...! उसकी  यह  स्थिति पाठक  के  मन  में  गहरी निराशा और अवसाद को जन्म देने के साथ-साथ, उसे मिटाने का एक आक्रोश भी देती है.


                     इस अवसाद के तहत कहानी की नायिका कई बार मटमैले लगने वाले  उस ‘अपने’ घर से कहीं दूर चली जाना चाहती है लेकिन इससे पहले कि वह पलायन करती, एक दिन साहब तेज़ दर्द से कहराने लगते हैं.  जांच-पडताल के बाद  हकीम, बिगड़े अनुपात के बारे में कुछ पूछें, लेकिन साहब या तो दो मेहमानों के साथ घर आते हैं - मेहमानों के आने की सूचना देना भी गँवारा नहीं करते, या कभी -कभी होटल में ही खाकर देर गए लौटते हैं.  फिर किसी फ़ाइल में उलझ कर  घर में होने पर भी नहीं होते.  इस तरह रात उतर आती है, सब चैन और  सुकून से सो जाते हैं और वह अपने हिस्से में सदा के लिए आई बेचैनी से गले लग  कर, उस ढीले हिस्से को थपक-थपक कर सुला देती है.  कैसा अकेला,  वीरान जीवन है उसका...! उसकी  यह  स्थिति पाठक  के  मन  में  गहरी निराशा और अवसाद को जन्म देने के साथ-साथ, उसे मिटाने का एक आक्रोश भी देती है.


                     इस अवसाद के तहत कहानी की नायिका कई बार मटमैले लगने वाले  उस ‘अपने’ घर से कहीं दूर चली जाना चाहती है लेकिन इससे पहले कि वह पलायन करती, एक दिन साहब तेज़ दर्द से कहराने लगते हैं.  जांच-पडताल के बाद  हकीम,वैद्य बताते हैं कि लगातार वर्षों से बाईं  ओर झुक कर काम करने की आदत के कारण, साहब की गर्दन और पीठ की शिराओं में संकुचन हो गया है, इसलिए दवाओं के बाद भी मर्ज़ लाइलाज है.  किन्तु  उनकी पत्नी कहलाई जाने वाली, वह अस्तित्वहीन औरत उनकी उस विवश घडी में उनका  ऐसा  मज़बूत सहारा बनती है कि उसके द्वारा की जाने वाली सेवा से वे ठीक होने लगते हैं.  चलने के लिए एडजस्टेबल छडी मंगाई जाती है, लेकिन कमज़ोर बाँए हिस्से के लिए वह छडी व्यर्थ सिध्द  होती है  और दो हिस्सों  में बँटी हुई निरर्थक वजूद लिए जीती वह औरत उनका सार्थक और स्थायी सहारा बन जाती है.  साहब की ज़रूरत को देखते हुए उसका तीन चौथाई हिस्सा जो उसका अपना था, उसकी पहचान था, वह साहब को समर्पित हो जाता है.  लेकिन इस घटना से एक बात औरत के पक्ष में जाती है; साहब के स्वस्थ होने के साथ-साथ औरत का निष्क्रिय,  बेजान हिस्सा भी सक्रिय और स्वस्थ होने लगता है. हमेशा के लिए साहब के पार्श्व में उसकी जगह ‘सहारे’ के रूप में स्थायी होने के कारण शायद उसे अपनी एक पहचान मिल गई थी.  हालात से विवश साहब द्वारा उनके पार्श्व  में अपने लिए जगह पाकर वह सुख और सुकून महसूस करती है. वह साहब के निकट संपर्क में रहने की खुशी का 'कारण'   नज़रंदाज़ कर सिर्फ उनके पास बने रहने, उनको सहारा देने में अपने तीन बटा चार हिस्से  के अस्तित्व की सार्थकता देखती है इसलिए ही उसका वह तीन चौथाई हिस्सा बड़ा खुश और सेहतमंद होने लगता है. इस सकारात्मक  बिंदु पर कहानी  अंत हो जाती  है  उस उपेक्षित, एकाकी औरत के जीवन में  गुनगुने उजाले  की  कुछ उम्मीद बंधा कर.

                     निसंदेह यह एक कालजयी कहानी है, जो हर युग, हर काल - अतीत,वर्त्तमान  और भविष्य के नारी व्यक्तित्व को  किंचित परिवर्तन के साथ परिभाषित करती है और करती रहेगी. वे नारियाँ मेरी बात से ज़रा भी असहमत न होएं जो घर से बाहर  काम पर या मस्त  होकर, अपनी मर्जी से घूमने जाती हैं - बड़े साहस से घर-परिवार की आवाजों से परे - अपने को ये ‘ऑटो सजेशन्स’ देती हुई - ‘‘वे भी तो इंसान हैं, उन्हें भी अपनी ज़िंदगी जीने का कुछ तो हक है.’’ यदि वे भी  अन्तस्तल को टटोलेगीं  तो पायेगी कि ऊपर की बलात् कठोर बनाई गई परतों के नीचे  घर-परिवार व बच्चों की चिंता से त्रस्त और ध्वस्त परतें ही है. बाहर रहते हुए भी बीच-बीच में न जाने कितनी बार पति का , बच्चों का ख्याल उनके मन में उठता है. वे चाह कर भी कुछ घंटों, कुछ दिनों के लिए कहाँ अपने को अलग कर पाती हैं ? कुछ दिनों के लिए दूर होकर भी उनके अस्तित्व में समाई रहती हैं, इतना ही नहीं, अगर घर के लोग उदारता से उन्हें घूमने फिरने का मौक़ा भी दें तो वे और सघनता से घर-परिवार की ओर पलट जाती हैं. समस्या तो वे खुद हैं अपने लिए. उनकी भावुकता और ममता उन्हें ले डूबती है. 

                    कहानी यद्यपि बँटी-बिखरी औरत से शुरू होती है और उसी पर अंत लेकिन, कहानी की खासियत यह है कि वह अपनी मुख्य पात्र की तरह न कहीं बंटी  हुई , न कहीं बिखरी हुई,  बड़ी ही सुगठित और कसावट के साथ बुनी हुई - एक उत्कृष्ट कहानी बन पडी है ! किसी भी बिंदु , किसी भी रेखा पर कहानी भटकती नहीं बल्कि रवानगी से भरी हुई,  पाठक मन पर अपनी अमिट छाप छोडती है.  अनूठी अंतर्दृष्टि को संजोती, औरत से जुडी ज़मीनी सच्चाईयों को उजागर करती इस भावप्रवण कहानी के लिए सुधा जी की जितनी भी सराहना की जाए कम है.  

                                                                                     दीप्ति



गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

स्त्री विमर्श


यौन उत्पीड़न - कितना सच, कितना झूठ

घटनाएँ २००७ की हैं जो उस समय चर्चा के केंद्र में थी और यह मुद्दा आज भी प्रासंगिक हैं।

हैदराबाद की संगीता शर्मा ने आत्महत्या कर ली।  अपने अंतिम संदेश में उसने लिखा था कि उसे यह चरम निर्णय इसलिए लेना पड़ा क्योंकि उसके साथी द्वारा यौन उत्पीड़न किया जा रहा था।  वह हाई कोर्ट की वकील थी।  उसने जो कुछ लिखा, उसका उसे पूरा अहसास रहा होगा और वह यह चाहती होगी कि कम से कम उसके मरने के बाद ऐसे कदम उठाए जाएँ जो महिला उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कारगर हों और कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा की ओर सरकार का ध्यान जाए।

संगीता शर्मा की मृत्यु का परिणाम यह हुआ कि यह खबर कुछ दिन तक अखबारों की सुर्खियों में रही, हमेशा की तरह नेताओं ने खोज-बीन करके अपराधी को नहीं बख़्शने का वादा किया।  कुछ सामाजिक संस्थाओं ने ज़ोर शोर मचाया तो कुछ ने एक स्त्री की मानसिक असंतुलन की बात कही और मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दूसरी घटना राजस्थान की है।  जयपुर जिले व सत्र न्यायालय में संध्या भारद्वाज एक कनिष्ट लिपिका के पद पर कार्यरत थी।  उन्होंने आरोप लगाया कि सालावाड पुलिस निरीक्षक राजीव दत्ता के नेतृत्व में झूठे मामले में फंसाकर उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जा रहा है।  जयपुर के कई राजनैतिक और गैर-राजनैतिक संगठनों ने संध्या भारद्वाज के इस आरोप का खंडन किया और कहा कि झालावाड के अपराधिक तत्वों ने साजिशाना ढंग से संध्या के माध्यम से राजीव दत्ता को निशाना बनाया है क्योंकि उस कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपराधी तत्वों की नाक में दम कर रखा है।

एक और घटना संसद में सांसद रहे साक्षी महाराज पर आरोप की है।  उन पर आरोप लगाया गया कि वे दुर्गा भारती नामक उनकी शिष्या के साथ यौन उत्पीड़न कर रहे हैं।  गौरतलब है कि दुर्गा भारती एक साधारण परिवार की बेरोज़गार महिला थी जो साक्षी महाराज के सम्पर्क में आकर मात्र चार वर्षों में एक विद्यालय की शिक्षिका से महाविद्यालय की प्राचार्य बन गई।  जब तक दुर्गा भारती तरक्की की सीढियां चढ़ती रही और साक्षी महाराज की मुख्य शिष्या बनी रही, उसे कोई शिकायत नहीं थी।  फिर यह यौन उत्पीड़न का मामला अचानक कैसे उभरा?

ऐसे कई समाचार आए दिन आते रहते हैं जो पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियाँ बनती हैं और कुछ समय बाद उन्हें भुला दिया जाता है।  क्या ही अच्छा हो कि सनसनी फैलाने की बजाय ऐसे मुद्दों की तह तक जाएँ और अपराधी [चाहे वह पुरुष हो या स्त्री] को दण्डित करें।


गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

नीलम कुलश्रेष्ठ- एक समीक्षा






चुनौती देती, लड़ती व जीतती स्त्री की  कहानियाँ- ‘हैवनली हेल’

स्त्री विमर्श पर आजकल कई लेखिकाएं कलम चला रही हैं जिनमें नीलम कुलश्रेष्ठ का नाम अग्रणी रचनाकारों में आता है।  उनका कहानी संग्रह ‘हैवनली हेल’ भी इस बात का द्योतक है कि स्त्री विमर्श के कई पहलू हैं और उन पर प्रकाश डालना साहित्यकार का कर्तव्य बनता है।  नीलम कुलश्रेष्ठ के इस कहानी संग्रह में कुल चौदह कहानियां हैं जिनके माध्यम से उन्होंने कुछ ज्वलंत और कुछ परम्परागत पहलुओं पर प्रकाश डाला है।

‘हैवनली हेल’ कहानी संग्रह की पहली कहानी ही पाठक को प्रभावित करने के लिए काफी है।  इस कहानी का शीर्षक है ‘तू पन कहाँ जाएगी’ जिसमें झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली मंगी जैसी महिलाओं के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। स्लम में रहने वाली ये महिलाएँ काम भी करती हैं, अपने पति से पिटती भी हैं लेकिन जीने के लिए उन्हें इसी सहारे की आवश्यकता होती है जिसे ‘मरद’ कहते हैं।  इन्हीं परिस्थितियों को  झेलती मंगी को देखते हुए उसकी पुत्री ढिंगली बड़ी होती  है और ब्याह के बाद उससे भी वही सुलूक होता है।  वह अपनी माँ के पास आकर शरीर के ज़ख्म दिखाती है तो माँ समझाती है कि ‘ये सारे मरद एक जैसे होते हैं।  क्या तूने मेरे निसाँन नहीं देखे? बस्ती की कोई पन औरत छाती ठोंककर कह पन नहीं सकती कि उसके सरीर पर उसके मरद के निसाँन नहीं है। बस्तीवाली औरतों को ये सब सहने को पन पड़त है।"[पृ.२०]  बेटी विद्रोह करती है कि वह अपने पति पर दावा ठोकेगी। वह कहती है,‘मैं कुछ पन नहीं जानती।  उस आदमी पन कोरट करेगी।’ पहले तो माँ समझाती है कि ऐसा करने पर उसका आदमी नई औरत को खोली में डाल लेगा।  फिर भी, जब बेटी अपने फैसले पर अडिग रहती है तो वह भी सोचने लगती है कि उसने अपने कंधे पर थैला डाले कितने रास्ते नापे हैं लेकिन कोरट के रास्ते का तो सपने में भी नहीं सोचा था।  वह बरबस मन ही मन उसे आशीष देने लगती है, और कहती है ‘जा, ढिंगली जा। अपने मरद पर कोरट कर। ऐसी दुनिया ढूँढ़ जहाँ के मरद धुत होकर अपनी औरतों के सरीर पर निसाँन पन नहीं डालते हों।’ [पृ.२०]

इस कहानी में झुग्गी-झोपड़ी की भाषा का प्रयोग करके इसे बहुत ही प्रभावशाली  रूप दिया गया है और यह संदेश भी कि आज की अनपढ़ नारी भी अपने अधिकारों को समझने लगी है।  परम्परागत स्त्री को यह समझाया जाता  है कि उसका घर ही उसका ‘हैवन’ है भले ही वह उसमें ‘हेल’ की त्रासदी झेल रही हो।  उसे सिखाया जाता है कि वह सहनशील और ममता की मूर्ति बनी रहे और पुरुष के सारे आक्रमण झेले, भले ही उसे वहाँ संरक्षण में रोटी और घर के साथ घूँसे भी मिलें। इसके विपरीत आज की नारी विद्रोह करके अपने वजूद का अहसास दिलाना चाहती है क्योंकि उसमें आत्मविश्वास जाग चुका है।

इस संग्रह की कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनमें यह जताया गया है कि नारी को पुरुष के सहारे की आवश्यकता होती है। चाँद अब भी बहुत दूर है, हवा ज़रा थम के बहो, एक फेफडेवाली हंसी, ऐसी ही कुछ कहानियाँ हैं जिनमें स्त्री को पुरुष के शारीरिक व मानसिक बल की ज़रूरत पडती है।  ‘चाँद अब भी बहुत दूर है’ की ज्योति एक नौकरीपेशा आधुनिक सोचवाली नारी है। जब उसका बॉस उसे गलत संदेश देता है तो वह घर लौट कर रोती रहती है। उसका पति उसे ढाढस बंधाता है और नौकरी छोड़ कर दूसरी नौकरी करने के लिए कहता है। तब उसे अहसास होता है कि पति के सहयोग में कितना बल है।  जो अब तक पुरुषप्रधान समाज के विरुद्ध अपनी सोच रखती थी, वही अब करवा  चौथ के महत्त्व  को समझती है। ‘हवा ज़रा थम के बहो’ में संन्यासिन शैलमयी आनंदमयी अपने अनुयायी को ब्याह कर लेने की राय देते हुए कहती है कि ‘जीवन की यह विचित्रता है।  चरम विलासी भोग या परम सात्विक योग, दोनों ही अपने आप में अधूरे हैं- नितांत अधूरे! अपने पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए भटकते हुए किसी दहकते हुए नक्षत्र की भांति।’[पृ.४६]  यह अविवाहित संन्यासिन   प्रेम मे मिले सुख के बारे में इस तरह बताती है- ‘ और साधु संतों की बात तो नहीं जानती, लेकिन जब-जब वह मुझसे मिलने आया, तब-तब मुझे मोक्ष की अनुभूति हुई।’ [पृ.५५]

इसी प्रकार, ‘एक फेफडे वाली हंसी’ उस गरीब महिला की कहानी है जो एक व्यक्ति के साथ बिना ब्याह रचाये रहने लगती है।  उनके बीच ‘केवल सौगंध की डोर’ बंधी थी और जब वह व्यक्ति शराब के लिए घर की चीज़ें  भी चुराता है तो वह ‘इस डोर’ के टूटने से घबरा कर चुप रहते हुए अपनी बेबसी दर्शाती है-‘आप तो जानती हो कि मै इसके साथ एक धागे जैसे सौगन्धनामे के साथ रह रही हूँ,  जिसे वह एक झटके में तोड़ सकता है।’ [पृ.६१]

समाज में नारी का  शोषण होता रहा है।  यह शोषण विभिन्न रूप लेकर आता है और ऐसा भी नहीं है कि केवल पुरुष ही नारी का शोषण करता है। ऐसी भी  परिस्थितियों पर बुनी गई कुछ कहानियाँ हैं जिनमें नारी की सबसे बड़ी बेबसी उसका शरीर है। उठी हुई उँगली, सीढियाँ, लेकिन, सौंतेला पति -  ऐसी ही कहानियाँ हैं।

कोई भी संरक्षक एक बड़ी होती लड़की की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता।  ‘उठी हुई उँगली’ उस लड़की की कहानी है जो पिता से तिरस्कृत रही और मौसी के पास पली।  बडी होती लड़की को पिता ने अस्वीकार किया तो ताऊ के यहाँ नौकरानी की तरह पलती रही। ब्याह के बाद दहेज न मिलने के कारण पति से भी तिरस्कार ही मिला। एक दिन जब पति फिर उस पर हाथ उठाने जाता है तो वह हाथ रोक कर कहती है-‘तुम्हारे साथ क्या जीना, जीना कहलाता है।  मैं तो मरने को तैयार हूँ लेकिन उस नीच बाप की बेटी के साथ तुम्हारे दो बच्चों की माँ भी तो मर जाएगी।’ [पृ.४२] 

स्त्री का शोषण कहीं स्त्री करती है तो कहीं अपने भी करते हैं।  इसका भी उदाहरण हमें नीलम कुलश्रेष्ठ की कुछ कहानियों में मिलता है।  ‘कटी हुई औरत’ की देवी एक हादसे में अपने हाथ खो बैठती है।  वह घर के मंदिर में बैठ कर पूजा करती है। कोई स्त्री अपने कष्ट लेकर उसके पास आती है तो वह ढाढ़स बंधाते हुए कहती है कि उसके कष्ट कुछ ही दिन में दूर हो जाएँगे जो सच भी निकलता है।  बात मुहल्ले से शहर तक फैल जाती है और चढावे के लालच में अब उसका शोषण सारा परिवार करने लगता है।इतना ही नहीं, प्रेमी बनकर आया व्यक्ति शादी के बाद वही धंधा अपने घर में प्रारंभ कर देता है जिससे पीछा छुड़ाने के लिए ही देवी ने ब्याह किया था।

शोषण के विरुद्ध जब नारी आवाज़ उठाती है तो या तो उसका गला दबा दिया जाता है या उसे निकाल-बाहर किया जाता है।  ‘जर्नलिज़्म’ कहानी में शिक्षा संस्था का मालिक एक महिला जर्नलिस्ट को  अपनी संस्था के काम निकालने के लिए नौकरी पर रखता है पर जब वह नारी देह का लाभ उठाकर उसके काम करने को नकार देती है तो अंत में उसे मजबूर होकर नौकरी छोड़नी पड़ती है।  कहानीकार ने इसका परिणाम इस तरह बताया है- ‘इसका अंत वही होता है जो अक्सर नारी सशक्तता का झंडा उठानेवालियों का या उसूलों की सलीब को उठानेवालों का होता है यानि इस व्यवस्था के बाहर पटका हुआ ‘बैक टू द पेवेलियन’ यानि कि घर।  यानि कि अंगद स्त्री होते तो इस व्यवस्था की सुदृढ़ता से घबरा कर स्वतः ही दरबार से पैर हटा रहे होते।’[पृ.११५] 

लेकिन’ कहानी में भी नारी इसी परिस्थिति से  दो-चार होती है। संस्थानों के काम करने वाली महिलाओं का शोषण उनके पदाधिकारी करने की चेष्टा करते हैं।  जब उन्हें नकारा जाता है तो वे ऐसा बदला लेते हैं जिसका कोई काट भी नहीं होता।  लेखिका कहती है कि ‘इन प्रतिष्ठानों को चलानेवाले लोगों के मन की ज़हरीली गैस निष्कासित होकर किसके जीवन से खेल जाए, पता नहीं।  यहाँ प्रतिभाशाली महिलाओं की औकात बताते हुए उन्हें इस विभाग से उस विभाग तक चकरघिन्नी-सा घुमाया जा सकता है।  उनकी लिखित शिकायतों को रद्दी की टोकरी में फेंका जा सकता है क्योंकि ऊपर भी उन्हीं जैसे उन्हीं के आका बैठे होते हैं।  कमर में हाथ डलवाती, अपने पर झुकते हुए चेहरे को तरल करती औसत महिलाओं को सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ने मे मदद करते हैं।[पृ.१२४]

इस पुस्तक के अंत में  शीर्षक कहानी ‘हैवनली हेल’ है जिसमें स्त्री-पुरुष के अहम की लड़ाई का मार्मिक  चित्रण किया गया है।  एक उद्योगपति और उसकी महिला दोस्त [या दुश्मन कहें] के अहम का युद्ध है।  उद्योगपति के पास सब कुछ है पर वह इस महिला को नहीं पा सका जो अपने छोटे उद्योग से खुश थी।  इस महिला को बचपन से स्वर्ग ही मिला था- साफ़ सुथरा अच्छाइयों से पगा। परंतु इस खुशी को नष्ट करने और उसे अपने वश में करने के लिए वह पुरुष उस महिला का उद्योग बंद कराने के पैंतरे चलाता है।  वह सोचती है कि ‘कैसी होती है इस तरह के मर्दों की दुनिया जो बेहतरीन फर्नीचर, कालीन, कम्प्यूटर्स की तरह सुंदर लड़कियाँ अपने एम्पायर के लिए जुटा लेते हैं। फिर क्यों उस जैसी उम्र की स्त्री पर दूर से मानसिक दबाव डाला जा रहा है?’ [पृ.१४५]  दूर रह कर भी वे मानसिक रूप से लड़ते रहे।  ‘कितना मर्मांतक होता है स्त्री-पुरुष के अहं का टकराव, निरंतर घात-प्रतिघात करना और सहना, आसान नहीं होता दूसरे को चोट देना।  इस चोट की प्रतिक्रिया स्वयं पर भी होती है। मन लहुलुहान हो जाता है।’  फिर भी अहम के चलते लोग जलते जाते हैं और अपने स्वर्ग जैसे माहौल को नरक बना लेते हैं, शायद  इसे ही ‘हैवनली हेल’ कहते हैं।

स्त्री-पुरुष के संबंधों के अलावा महिला जीवन की  आर्थिक व सामाजिक निर्भरता और आत्मविश्वास जगाने का संदेश इन कहानियों में भली प्रकार गूंथा गया है।  इसमें कोई शक नहीं कि लेखिका का वह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है जिसे  वे पुस्तक की भूमिका में पूछती हैं  कि इस पुरुष प्रधान समाज में ‘पुरुष सत्ता को चुनौती देती, लड़ती व जीतती स्त्री किससे बर्दाश्त होती है?’

पुस्तक विवरण
पुस्तक का नाम : हैवनली हेल
लेखिका : नीलम कुलश्रेष्ठ
मूल्य : १५० रुपए
प्रकाशक : शिल्पायन
१०२९५, लेन नं. १
वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा  
                दिल्ली-११० ०३२



शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

सोलहवां साल- स्त्री विमर्श



जब मैं सोलह साल की थी

रुपहले सुनहरे सांझ सवेरे और छोटे पंखों की ऊँची उड़ान-
पद्मा सचदेव

कितनी आशाएं, कितने सुखद स्वप्न ले कर युवती का सोलहवां साल आता है।  गलियों में रस्सी कूदती, छज्जों-चौबारों पर गिट्टे खेलती और गुडियों का ब्याह रचाती अबोध बालिकाओं को क्या पता इनमें से कौन किसी राजा के ऊँचे महल-चौबारों की दीवारों में चिनी जायेगी, किसके भाग्य में फटी चूनर पसार कर चौराहे में भीख मांगना लिखा है।  कौन ससुरालवालों के अत्याचार और अकारण क्रोधाग्नि में भस्म हो जाएगी।  और कौन भाग्यशालिनी अपनी सास के दुलार और पति के प्यार में जी उठेगी।

सोलहवां साल लगने पर गुड़िया का ब्याह रचाने की प्रवृत्ति नहीं होती।  बचपन में खेल, खेल में ही माँ, पत्नी, बहन, सास, ननंद और दादी माँ तक सारे रोल निभा लेनेवाली युवती की आँखों में सचमुच का एक नया घर बनाने का स्वप्न साकार करने की आशा तीव्र हो उठती है।  पग-पग कोई अनजानी सूरत लाज में भिनो-भिगो जाती है।

सन सैंतालीस में बंटवारे के दिनों में जो गोलियां चली थी,  उनमें से एक हमारे घर भी आ लगी थी।  पिता जी संस्कृत और हिंदी के प्राध्यापक थे।  मीरपुर कालेज से जम्मू कालेज में तबादला हो कर आ रहे थे।  रास्ते में ही उनकी अकाल मृत्यु हुई।  तब मैं सात वर्ष की रही होऊँगी।  मुझ से छोटा भाई आशुतोष छह बरस का और ज्ञानेश्वर छह महीने का।  जब भी किसी के मुँह से सुनाई देता ये प्रो. जयदेव बड़ू जी के बच्चे हैं, तो कलेजे में एक छुरी-सी चभने जैसी वेदना होती।

चौबीस-पच्चीस वर्ष की अपूर्व सुंदरी, दुनियादारी से अनभिज्ञ मेरी भोली माँ के कंधों पर वैधव्य का ये बोझ असहनीय था।  उस दिन से आज तक मैं बूढ़ी ही रही।  बचपन बचपन की तरह नहीं बीता और सोलहवां साल बिलकुल ही सुखद न था।  लेकिन मन में जो अकांक्षाएं थी,  अपनी अतुल क्षमता का जो झूठा छलावा था, उसे सहेलियों व उन रुपहले-सुनहले सांझ-सवेरों को याद कर के आज भी यह मन होता है कि वे दिन अभी एक बार एक पल के लिए लौट आयें तो उन्हें आँखों में बंद कर लूं, बाहों में भींच लूँ और कभी कभी जाने न दूँ।

डोगरी में कविता लिखने के मेरे वे नये-नये दिन थे।  उन दिनों रोज़ ही एक न एक गीत या कविता मैं लिखा करती थी।  डोगरी संस्था के हमारे श्री रमनाथ शास्त्री कहते, बेटा तुम्हें परीक्षा भी तो देनी है, कविता बाद में लिख लेना।  लेकिन कविता कोई लिखता थोड़े ही है।  वह तो कोइ हाथ में कलम पकड़वा कर लिखवा जाता है।  कपड़े धोते समय डंडे के ताल पर मैंने एक गीत लिखा था-

निक्कड़े पन्गडू, उच्ची उड़ान
जाईयै थम्मना, कियां शमान
चानणियां गलें कियां लानियां।
[मेरे पंख छोटे हैं, उड़ान बहुत ऊँची है, मैं आसमान को कैसे थाम लूँ ।  चांदनी को कैसे गले लगाऊँ।]

जिस अंधेरी और बरसाती रात में मैंने डोगरी में पहला गीत लिखा था, उस रात यूँ लगा था, जैसे मैं आकाश में उड़ रही हूँ।  और दूसरे दिन की सांझ को डोगरी के एक विशाल कवि सम्मेलन में मैंने वह गीत गाया,  तो उसके तुरंत ही बाद अपने कांपते और ठंडे जिस्म के साथ मैं स्टेज से नीचे आ गई थी और अपनी प्यारी सहेली चन्नी के साथ [जो आजकल डॉ. चंद्र रामपाल है] पानी पीने एक चायवाले की दुकान पर चली गई थी।  दूसरे दिन कालेज में वह गीत उर्दू के एक अखबार में प्रकाशित हुआ पड़ा था।  तब मैं उर्दू पढ़ लिख नहीं सकती थी।  लेकिन एक लड़के ने हिम्मत करके बताया था, इसमें मेरा छोटा सा परिचय और कविता छपी है।  सारा दिन मुझे यूँ लगता रहा, जैसे किसी लड़के से प्रेम करने की मेरी चोरी पकड़ी गई हो, मेरे भाई आशु ने माता जी को पढ़कर सुनाने की चेष्टा भी की थी, लेकिन मैंने वह पर्चा फाड़ दिया था और रोती हुई अन्यत्र यह कह कर चली गई थी कि यह मेरा नाम नहीं है मैंने कुछ नहीं लिखा।  अभी कुछ महीने पहले मेरी कविता की पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, तो मैंने खुद माताजी को चिट्ठी लिखी है।  यही अंतर है उन दिनों में और आज के दिनों में।

वे दिन जब भी याद आते हैं, याद आता है मन और आँखों में बसा हुआ मेरा पुरमंडल गाँव।  तीर्थ स्थान होने की वजह से बैसाखी, चैत्र चतुर्दशी, अमावस्या और शिवरात्री को वहाँ हज़ारों की संख्या में लोग आते हैं।  जिस पहाड़ी पर हमारा घर है, वहाँ उन दिनों घूमते-घूमते मैं घंटों बिता देती थी।  एक एक पौधा, एक एक चट्टान मेरे जाने पहचाने थे।  बरसात के दिनों मे पुष्या देविका में आई बाढ़ का पानी देखना बहुत ही सुखद लगता था।  वे दिन बीते एक ज़िंदगी ही बीत गई लगती है, लेकिन एक वेदना, एक कसक लिए वह याद कभी नहीं भूलती।

कानों में उंगलियां डाल कर लंबी तानों में डोगरी गीत गाते डोगरा गबरु जवोनों को जिसने सुना, जिसने मेले में युवतियों की, घूंघट की ओट में से शीशे का गजरा पसंद करती बांकी चितवन देखी, पानी की बावलियों पर ननंद और भाभियों की छेड़खानी में जो सम्मिलित हुआ, जिसकी नींद छाछ बिलोती भाभी की लाल पीली चूड़ियों की झंकार से टूटती थी, और दूर कहीं लद्दाक,ल्हासा, असकर्दू या ऐसे ही बर्फ़िले प्रदेश में सीमा पर तैनात डोगरा वीर की पत्नी का विरह गीत सुन कर, जो कांप-कांप जाता था, वही मेरा सोलहवां साल था।

अपने पिछड़े हुए और बीमार समाज में त्याग, प्यार और बलिदानों से घर-बार संजोती ममतामयी ललनाओं के दुखी जीवन से दुखी होकर मैं रोती रही हूँ।  मैं सोचती हूँ समाज के अत्याचारों का जो नरक हमारी माताओं-बहनों व दादियों-नानियों ने देखा वह नरक क्या हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ भी देखेंगी?  कई बार समाज से विद्रोह करने को मन हुआ है।

आज भी अपनी स्नेहमयी पूज्या सास और पति के प्रेम में मैं  अपनी उन असहाय लाचार बहनों को नहीं भूल पाती हूँ, जैसे बचपन के वे दिन नहीं भुलाए जा सकते॥

[लेख का आयोजन आशारानी व्होरा ने ‘धर्मयुग’ के लिए किया था]