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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

चक्की- एक समीक्षा


महिला जीवन है एक ‘चक्की’

एक संवेदनशील महिला अपने जीवन के इर्दगिर्द होते पारिवारिक घटनाओं को जब देखती है तो स्त्री पर होनेवाले प्रभावों को महसूस करती है।  इन घटनाओं में कभी भोगा हुआ यथार्थ होता है तो कभी किसी अन्य महिला से सुनी-सुनाई या फिर पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी घटनाएँ होती हैं।  ऐसी ही संवेदनशील महिला जब कलम की धनी हो तो वो इन घटनाओं को कागज़ पर उकेर लेती है।  जीवन की इस पिसती चक्की में नारी की इन्हीं कुछ घटनाओं पर आधारित हैं तेलुगु की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. मुदिगंटि सुजाता रेड्डी का कहानी संग्रह ‘चक्की’। डॉ. सुजाता रेड्डी ने अपनी सीधी-सादी शैली में स्त्री विमर्श पर लिखी बीस कहानियाँ इस पुस्तक में संग्रहित की है।  इन कहानियों से प्रभावित होकर डॉ. बी.सत्यनारायण ने इन्हें हिंदी में अनुवाद किया है।

‘चक्की’ की कहानियों में स्त्री के जीवन से जुडी कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों का जायज़ा भी लिया गया है।  शीर्षक कहानी ‘चक्की’ में उस महिला की दयनीय स्थिति दर्शायी गई है जिसका पति अच्छा कमाता तो है पर परिवार की सुध नहीं लेता, केवल अपने पर सारा धन लुटाता है।  परिवार चलाने के लिए कुछ रुपये दे देता है जो दाल-रोटी के लिए भी काफी नहीं होते।  दूसरी ओर बढ़ते बच्चों की अपनी फरमाइशें होती हैं जिन्हें उसकी पत्नी अपना पेट काटकर पूरा करती है।

स्त्री विमर्श का दूसरा जवलंत मुद्दा दहेज और अहम्‌ का है।  स्नेहलता देवी का पत्र, मोक्ष, न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति जैसी कहानियों में ब्याह और दहेज के मामलों पर प्रकाश डाला गया है।  इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार ने यह जतलाया है कि आज की नारी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती है और अपने माता-पिता का बोझ नहीं बनना चाहती।  दूसरी ओर पुरुष की यह प्रवृत्ति होती है कि किसी न किसी समय पत्नी पर यह ताना मारेगा कि ‘तेरे पिता ने क्या दिया... अंत में अंगूठा दिखा दिया ना!’[पृ.५९]  आज की नारी पढ़-लिख कर अपना कैरियर खुद बनाना चाहती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना चाहती है।  यही संदेश देती है कहानी- स्नेहलता देवी का पत्र।

प्रायः यह देखा गया है कि जब पति-पत्नी, दोनों कमाते है तो अहम्‌ का टकराव हो जाता है।  पुरुष चाहता है कि पत्नी अपनी कमाई भी पति के हाथ में रख दे और पत्नी अपनेआप को आर्थिक रूप से स्वतंत्र रखना चाहती है। लालच और अहम्‌ की इन परिस्थितियों में कभी-कभी स्त्री अनिश्चितता के दोराहे पर खडी दीखती है।  जैसे ‘मोक्ष’ कहानी की नायिका का यह सोचना कि ‘ऐसी स्थिति में यदि वह कुछ करने को कहे तो पति की बदनामी! बेइज़्ज़ती! वह जो कहेगा, वही मुझे करना है। नहीं तो उसका पुरुषाहंकार आहत होगा।’[पृ.६५]

युवा लड़कियों के लिए सड़कों पर घूम रहे रोड-रोमियो कभी कभी जी का जंजाल बन जाते है।  इस संग्रह की कहानियाँ- रौडीइज़म और मेरा अपराध क्या है?, इन्हीं मुद्दों पर लिखी गई हैं।  उनकी छेड़छाड में सड़क पर ऐसा भी हादसा हो सकता है कि महिला पूछ सकती है- मेरा अपराध क्या है?

इसे एक विड़म्बना ही कहा जाएगा कि जब किसी महिला में अपने ही घर-परिवार को छोड़ने की छटपटाहट हो  और इसका कारण पुरुष ही नहीं, स्त्री भी हो सकती है।  बुढ़ापे में जब बहू का राज होता है तो ‘आज़ादी’ कथा की सास को अपनी हमउम्र सखियों को घर बुलाने और हँसने बोलने की भी मनाही की जाती है।  ऐसे में उसे वृद्धाश्रम की ओर मुँह करना पड़ता है।  कुछ ऐसी ही छटपटाहट उस ‘बंदिनी’ माँ की होती है जो विदेश में अपनी पुत्री की संतान की देखरेख के लिए जाती है और उसे शिशु को चूमने-पुचकारने की भी मनाही होती है।

स्त्री का सब से कठिन समय वह होता है जब वह विधवा हो जाती है और सामाजिक कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति वर्जिय मानी जाती है।  किसी भी शुभकार्य में उसका आगे ठहरना अशुभ माना जाता है।  इसी तरह के अंधविश्वासों का विरोध करती कहानियाँ है- उसकी अपनी बेड़ियां और न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।

स्त्री विमर्श के संदर्भ में लेखिका ने महिला के उस पहलु को उजागर किया है जिसके चलते पुरुष तो ख्याति पाता है परंतु उसके पीछे खड़ी स्त्री के बलिदान को कोई नहीं देख पाता।  उन्होंने इस कहानी संग्रह के प्राक्कथन में कहा भी है- ‘कहते हैं कि प्राचीन भारत में, समाज की बात हो या फिर परिवार की, स्त्री का सर्वत्र आदर होता था, उसे देवी समझा जाता था, उसकी पूजा की जाती थी।  किंतु स्री को किसी पूजा की आवश्यकता नहीं है।  उसकी भी अपनी एक हस्ती है, यह सोचकर ढंग से व्यवहार करें, यही काफ़ी है।  लोग उसके अतित्व और उसकी अस्मिता की कद्र करें, यही काफ़ी है।  एक ओर स्त्री की पूजा की गई और दूसरी ओर अनादि काल से उसे मोहिनी के रूप में देखा गया।’

आशा है कि स्त्री समस्याओं, इच्छाओं और अभिलाषाओं को समझने में ये कहानियाँ सही संदेश देने में सफल होंगी।


पुस्तक विवरण
पुस्तक का नाम  : चक्की [कहानी संग्रह]
लेखिका :  डॉ. मुदिगंटि सुजाता रेड्डी [तेलुगु]
अनुवादक : डॉ. बी. सत्यनारायण [हिंदी]
मूल्य : १५० रुपए
प्रकाशक : मिलिंद प्रकाशन
४-३-१७८/२, कंदास्वामी बाग
सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद-५०० ०९५





गुरुवार, 17 नवंबर 2011

राजनीति और राष्ट्रीय पहचान

[हैदराबाद की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती विनिता शर्मा जी [shabdam1.blogspot.com] की सुपुत्री डॉ. गीतिका कोम्मुरि की पुस्तक पर एक समीक्षा प्रस्तुत है।  इतनी चिंतनपरक पुस्तक की रचना के लिए  डॉ. गीतिका कोम्मुरी और श्रीमती व श्री शर्मा जी को बधाई।  आखिर कौन माता-पिता ऐसी संतान पर गर्व  नहीं करेंगे! ]

भारतीय पहचान और सुरक्षा की राजनीति

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डॉ. गीतिका कोम्मुरि अमेरिका की कैलिफ़ोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय में सामाजिक शास्त्र पढाती हैं और वे भारतीय होने के नाते भारत के सामाजिक व राजनीतिक परिवेश से अच्छी तरह परिचित भी हैं।  उन्होंने गम्भीर शोध करके अपनी पुस्तक ‘इंडियन आयडेंटिटी नेरेटिव्स एण्ड द पोलिटिक्स ऑफ़ सेक्यूरिटी’ में ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए जिन की रुचि न केवल शोधार्थियों को बल्कि विदेश नीतिधारकों को भी आकर्षित करेगी।

डॉ. गीतिका कोम्मुरि ने इस पुस्तक में देश-विदेश के अंतस्संबंधों की जानकारी देते हुए बताया है कि देश की अपनी पहचान, आपसी व्यवहार और राष्ट्रीय हितों का विश्लेषण करते हुए विदेश नीति निर्धारित की जाती है।  भारत में दो प्रकार की राजनीतिक सोच पनप रही है। एक तो धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर है और दूसरे धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के पक्षधर।  मोटे तौर पर यदि राजनितिक पार्टियों की दृष्टि से देखें तो कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष कहलानी वाली पार्टियां एक ओर हैं तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा सहयोगी दल।

इस पुस्तक में सन्‌ १९९०-२००३ तक के घटनाक्रम को लेकर विश्लेषण किया गया है, जिसमें भारत-पाकिस्तान के सम्बंधों में पड़ रहे प्रभाव की जांच भी की गई है।  साथ ही पाकिस्तान को लेकर  भारत-चीन के आपसी सम्बंधों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।  पुस्तक के प्रथम छः अध्यायों में राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा की राजनीति पर विस्तृत चर्चा है जिससे पाठक को अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने में सहायता मिलेगी।

भारत और पाकिस्तान की सब से बडी गांठ है कश्मीर समस्या जिसमें अब चीन भी जुड गया है।  भारत के लिए यह केवल आंतरिक समस्या है।  साठ वर्ष की यह समस्या अब केवल इस बहस पर आ कर टिकी है कि जम्मू और कश्मीर को कितनी स्वायतता दी जाय और कैसे दी जाय।  भारत की राजनीतिक पार्टियों के भिन्न विचारधारा [धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक-सांस्कृतिक नीति] के बावजूद उनमें दो राय नहीं रह गई हैं कि अब जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।  

डॉ. गीतिका कोम्मुरी ने अपने विश्लेषण के तार स्वातंत्रयोत्तर समय से जोडा है परंतु उत्तर-साम्राज्यवादी सिद्धांत को दरकिनार करते हुए  पाश्चात्य विद्वानों की धारणाओं पर अपने निष्कर्ष निकाले हैं।  जब विदेश नीति की बात आती है तो हर राजनीतिक पार्टी जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति वही विचार रखती और वही कदम उठाती है जो शायद आम जनता की अभिव्यक्ति भी करती है।  इसका जीता-जागता उदाहरण लेखिका ने यह दिया है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और १९९९ में कारगिल युद्ध समाप्त हुआ था तो  इस युद्ध को पूर्ण युद्ध होने से न केवल रोका गया बल्कि वाजपेयी जी ने लाहौर का दौरा भी किया और सद्भावना बनाए रखने में योगदान दिया।

इस पुस्तक से न केवल आम पाठक को राष्ट्रीय पहचान और विदेशी नीति व सुरक्षा संबंधी जानकारी मिलेगी बल्कि विदेश नीति के निर्धारकों और इस विषय पर कार्य कर रहे शोधार्थियों को  भी इस पुस्तक से लाभ मिलेगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

पुस्तक परिचय:

पुस्तक का नाम : इंडियन आयडेंटिटी नेरेटिव्स एण्ड द पोलिटिक्स ऑफ़ सेक्यूरिटी
लेखिका : डॉ. गीतिका कोम्मुरि
मूल्य : ७९५ रुपये
प्रकाशक : सेज पब्लिकेशन्स
                नई दिल्ली, भारत॥






सोमवार, 4 जुलाई 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-३

मणिपुर में हिंदी का इतिहास-३
प्रो. देवराज


[पिछली पोस्ट की टिप्पणी में आदरणीय डॉ अमर कुमार जी ने कहा है कि मैं ‘अपने विचार रखूं कि इस बयान के पीछे निहित सोच का पता चले’।  प्रो. देवराज जी की इस पुस्तक की भूमिका पढ़कर मुझे लगा कि इसमें मणिपुर में हो रहे हिंदी के विकास का संपूर्ण इतिहास दिखाई देता है।  हाल ही में यह बवाल मचाया गया था कि हिंदी का लेखन तो उत्तर में ही होता है।  वैसे, लोगों की सोच यह भी रही है कि लेखन तो मात्र दिल्ली में ही होता है और बाकी सब कूड़ा है!!  ऐसे लोग शायद हिंदी के इतिहास की जानकारी कम ही रखते हैं; या फिर, उससे विमुख हैं।  इस लेख से उन जैसे तथाकथित साहित्यकारों को पता चलेगा कि देश के कोने-कोने में लोग अपने-अपने तरीके से, अपनी-अपनी क्षमतानुसार अपना तन-मन-धन लगा कर भी राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा करते आ रहे हैं- तब से,  जब राष्ट्रभाषा शब्द  बोलना  भी वर्जित था।  इस लेख से पता चलता है कि किन विपरीत परिस्थितियों में हिंदीतर कहे जानेवाले प्रांतों में लोग  अपने प्राण की बाज़ी लगा कर भी देश और भाषा की सेवा के लिए कृतसंकल्प रहे।  उस छोटी सी शुरुआत ने अब विशाल तरु का रूप धारण कर लिया है।]

मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल


हिंदी की व्यवस्थित शिक्षा देने के लिए १९३३ में इम्फाल के व्यापारी-समाज के विशेष प्रयास से सेठ भैरोदान मोहता [बिकानेरवासी] के नाम पर ‘भैरोदान हिंदी स्कूल’ की स्थापना हुई।  इसकी मुहूर्त पूजा पं. राधामोहन शर्मा ने की और समाज के आग्रह पर वे इसी विद्यालय में हिंदी का अध्यपन भी करने लगे।  मणिपुर में हिंदी शिक्षण की समस्त सुविधाओं से युक्त यह पहला विद्यालय था, जिसमें अध्यापकों को नियमित वेतन भुगतान पर नियुक्त किया गया।  श्री टी. बिशेश्वर शास्त्री के प्रयास से १९५१ में इसका सरकारीकरण हुआ।

संस्थागत हिंदी-प्रचार आंदोलन की दृष्टी से मणिपुर में हिंदी-प्रचार का कार्य १९२७-२८ में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ द्वारा प्रारम्भ हुआ।  पहले से ही मणिपुर के जो कार्यकर्ता राष्ट्रीय चेतना से युक्त हो चुके थे, उन्होंने सम्मेलन के कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।  अंगरेज़ सरकार के अनेक विरोधों के बावजूद सम्मेलन ने इस क्षेत्र में परीक्षा केंद्र चलाया तथा हिंदी के प्रचार का कार्य किया।  ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के अंतर्गत मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना १९३९-४० में हुई।  यह उल्लेखनीय तथ्य है कि प्रारम्भ में अंगरेज़ सरकार ने ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द पर आपत्ति करते हुए इस नाम से कार्य करने की मनाही कर दी थी।  इस पर, मूल उद्देश्य को मह्त्व प्रदान करते हुए हिंदी प्रचारकों ने इसका नाम ‘मणिपुर हिंदी प्रचार समिति’ रखकर कार्य करना शुरू किया और जैसे ही अनुकूल अवसर मिला, पुनः ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ नाम रख लिया।  इस संस्था द्वारा ५१ राष्ट्रभाषा विद्यालय, १३ राष्ट्रभाषा महाविद्यालय तथा ५० से अधिक परीक्षा केंद्र प्रारम्भ किए गए।  १९५९ में इम्फाल जेल में भी एक परीक्षा केंद्र शुरू किया गया, जिससे बंदी लोग हिंदी सीख कर परीक्षा दे सकें।

‘मणिपुर हिंदी प्रचार सभा’, ‘नागरी लिपि प्रचार सभा’, ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’, ‘मणिपुर ट्राइबल्स हिंदी सेवा समिति’ आदि अन्य संस्थाएँ हैं, जिन्होंने इस राज्य में हिंदी-आदोलन की जड़ें मज़बूत करने का कार्य किया।  ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ और ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षा संघ’ आदि भी हिंदी का वातावरण तैयार करने का प्रयास करते हैं। केंद्रीय हिंदी शिक्षण योजना [गृह मंत्रालय के नियंत्रण में संचालित कर्मचारी हिंदी शिक्षण योजना], हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, आकाशवाणी की हिंदी शिक्षण एवं हिंदी कार्यक्रम योजना आदि को भी यदि सम्मिलित किया जाए, तो इस राज्य में हिंदी की अच्छी तस्वीर उभरती है।  मणिपुर विश्वविद्यालय में एक समृद्ध हिंदी-विभाग कार्य कर रहा है।  यह १९७९ में तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय विस्तार केंद्र के नियंत्रण में प्रारम्भ हुआ था।  इसमें स्नातक कक्षाओं के अध्यापन के साथ ही उच्च स्तरीय शोध कार्य भी किया-कराया जाता है।

मणिपुर राज्य में हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है।  ‘युमशकैश’ और ‘महिप पत्रिका’ यहाँ से प्रकाशित होनेवाली नियमित - मासिक एवं त्रैमासिक - पत्रिकाएँ हैं।  इसके साथ ही ‘कुन्दोपरेङ्‌’ नामक पत्रिका अनियतकालीन रूप में प्रकाशित होती हैं।  स्कूल-कालेज से लेकर विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं में भी सम्बंधी सामग्री का स्वतंत्र विभाग होता है।  ये प्रयास हिंदी-प्रचार के इतिहास में उल्लेखनीय मह्त्व रखते हैं।

मणिपुर राज्य में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटी ‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ अन्य सभी संस्थाओं से विशिष्ट है।  कारण यह, कि इस संस्था ने हिंदी भाषा के प्रचार अथवा परीक्षा संचालन तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित न रख कर हिंदी एवं मणिपुरी भाषाओं के भाषायी एवं साहित्यिक विकास का स्मरणीय प्रयास किया है।  

[साभार- ‘संकल्प और साधना’ पुस्तक में प्रो. देवराज द्वारी लिखी गई भूमिका]

पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम :  संकल्प और साधना
[‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ और उसके प्रमुख आधार स्तंभों का मूल्यांकन]
लेखक : देवराज
मूल्य : ८० रुपए
प्रकाशक : पत्रिका विभाग, 
मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल
विधानसभा मार्ग, इम्फाल - ७९५ ००१ [मणिपुर]


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-२


मणिपुर हिंदी का इतिहास-२ 
प्रो. देवराज

आधुनिक-काल में भारतीय पुनर्जागरण का परिणाम सामाजिक और राष्ट्रीय-जागरण के रूप में सामते आया।  महर्षी दयानन्द, महर्षी अरविन्द, राजा राममोहन राय आदि ने सम्पूर्ण भारतीय जीवन को झकझोर दिया।  यह अनुभव किया जाने लगा कि रूढ़ सामाजिक-मूल्यों के अस्वीकार के बिना भारतीय समाज को नहीं बचाया जा सकता।  इसी प्रकार राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया गया।  ‘भारतीय जनता के समस्त दुखों का मूल दासता है’ इस सोच ने आधुनिक भारत के निर्माण में क्रांतिकारी सहयोग दिया।  हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में खोजनेवाला भी यही नारा था।  अंगरेज़ों से इस देश को मुक्त कराने के लिए, भारत की सम्पूर्ण जनता को जगा कर यह बताना आवश्यक था कि अंगरेज़ इस देश के लिए अभिशाप हैं और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर खड़े होना अनिवार्य है।  इस महान कार्य के लिए भाषाओं की खोज के क्रम में हिंदी का नाम सामने आया।  हिंदी ही समस्त भाषाओं में ऐसी थी, जो अधिकांश भारतीय जनता द्वारा बोली और समझी जाती थी।  फिर भाषा वैज्ञानिक कारणों से इसे आसानी से सीखा जा सकता था।  इसने व्यापार की भाषा के रूप में विशाल क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली थी।  साथ ही धर्म, इतिहास और संस्कृति के व्यापक भारतीय मानकों को इस भाषा ने बहुत पहले से इस देश के व्यापक क्षेत्र तक पहुँचाना शुरू कर दिया था।  इन सब कारणों से एक मत से हिंदी को सामान्य सम्पर्क की भाषा के रूप में मान्यता मिली।  आगे चलकर हिंदी को स्वतंत्रता-संघर्ष की मुख्य भाषा बनने का अवसर मिला तथा जनता यह समझने लगी कि भारत के स्वतंत्र होते ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया जाएगा।  इसके साथ ही महात्मा गाँधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने जो आशाएँ जगाईं, उनसे लगने लगा कि हिंदी स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भारत को प्रतिष्ठा दिलाएगी, जिसके माध्यम से लोगों को अभिव्यक्ति-क्षमता के साथ-साथ रोज़गार भी मिलेंगे और जो समग्र भारत को एकता के सूत्र में बांधेगी।  जनता की इस आशा ने हिंदी-भाषी और हिंदीतर भाषी- दोनों प्रकार के प्रांतों में हिंदी के प्रचार को बल दिया।  ज्यों-ज्यों स्वतंत्रता निकट आती गई, वह प्रचार-बल बढ़ता गया।  हिंदी के प्रचार के लिए विभिन्न संस्थाएँ सामने आईं।  उन्होंने हिंदीतर-भाषी क्षेत्रों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य हाथ में ले लिया।  उधर हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के जो लोग शिक्षा आदि के लिए हिंदी भाषी क्षेत्रों में जाते थे वे अपने साथ राष्ट्रीय जागरण व हिंदी-प्रेम लेकर अपने-अपने क्षेत्रों में लौटे तथा हिंदी प्रचार कार्य के समर्पित कार्यकर्ता बने।  मणिपुर भी इस लहर से अछूता नहीं रहा।  परिणामस्वरूप इस राज्य में हिंदी-प्रचार आंदोलन का बीज अंकुरित हुआ।

श्री ललितामाधव शर्मा, श्री बंकबिहारी शर्मा, श्री थोकचोम मधु सिंह, पं. राधामोहन शर्मा एवं श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम को मणिपुर क्षेत्र के हिंदी प्रचार का आदि-स्तम्भ माना जाना चाहिए।  इन महानुभावों ने स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, सामान्य संपर्क की संभावना, आखिल भारतीय स्तर पर समस्त भारतीय नागरिकों के एक समान सोच, विश्वमंच पर भारत की प्रतिष्ठा की आकांक्षा आदि से प्रेरणा ग्रहण करके मणिपुर के इम्फाल नगर को मुख्यालय बनाया और सारे राज्य में हिंदी-प्रचार का कार्य किया।  उस काल में इस क्षेत्र में हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार देश-द्रोह माना जाता था।  अंगरेज़ सरकार जानती थी कि यदि हिंदी भाषा को फलने-फूलने दिया तो भारत की जनता अपने प्राचीन गौरव के बोध से भर उठेगी, जो उसके भविष्य के लिए अभिशाप सिद्ध होगा।  अंगरेज़ यह भी जानते थे कि हिंदी और भारतीय संस्कृति का चोली-दामन का साथ है।  हिंदी, मात्र भाषा की शिक्षा का माध्यम नहीं है, वरन उसमें राष्ट्रीय और सामाजिक-संस्कार तथा चारित्रिक-शिक्षा के साथ-साथ स्वाधीनता का ज्ञान कराया जाता है।  इससे भाषा और देश-भक्ति, दोनों का बोध साथ-साथ प्राप्त होता है।  यह बात ईसाइयत और अंगरेज़ी के प्रचार में प्रत्यक्ष बाधा थी।  अतः अंगरेज़ सरकार ने भाषा और धर्म के प्रचार को देशद्रोह करार दिया।  प्रचार के लिए बाहर से आनेवालों को हतोत्साहित किया और जो स्थानीय लोग प्रचार-कार्य करना चाहते थे, उन्हें तरह-तरह से डरा-धमका कर इस देश-सेवा से रोकने का प्रयास किया।  श्री बंकबिहारी जी ने निकट संबन्धी श्री भगवतादेव शर्मा [जो उन्हीं की प्रेरणा से हिंदी प्रचार में लग गए थे] ने जब राष्ट्रभाषा प्रचार का कार्य शुरु किया तब मणिपुर के तत्कालीन पोलिटिकल एजेन्ट ने उन्हें बुलाकर कहा कि ‘हिंदुस्तान कोई राष्ट्र नहीं है, फिर तुम लोग क्यों राष्ट्रभाषा, राष्ट्रभाषा चिल्लाते हो।  यहाँ की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, न तुम किसी राष्ट्रभाषा का प्रचार कर सकते हो।’  इतना ही नहीं उसने इस कार्य के लिए ‘सैडिसस’ शब्द का प्रयोग किया।  इससे उस समय की कठिनाइयों का कुछ अंदाज़ लगाया जा सकता है।

किंतु, इन लोगों ने अंगरेज़ सरकार द्वारा पैदा की गई कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया।  पहले घर पर ही बच्चों को हिंदी पढ़ाना शुरू किया फिर घर-घर जाकर लोगों को हिंदी और स्वतंत्रता के मह्त्व को समझाना।  इस प्रकार बहुत धैर्य के साथ हिंदी के प्रति सामान्य लोगों का रुझान पैदा किया और हिंदी के पठन-पाठन के लिए विद्यालय खोला।  इस प्रकार मणिपुर में हिंदी प्रचार के आधुनिक इतिहास की आधारशिला रखी गई।

हिंदी प्रचार के इस प्रारम्भीक-काल में तीन नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-- श्री भागवतदेव शर्मा, श्री अरिबम पं. राधामोहन शर्मा और श्री द्विजमणिदेव शर्मा।  इनमें से पं. राधामोहन शर्मा को थोकचोम मधु सिंह के साथ मिल कर हिंदी प्रचार के प्रारम्भिक काल में अनेक संकटों का सामना करते हुए हिंदी-विद्यालय शुरू करने और हिंदी का अध्ययन करने का गौरव प्राप्त है।  श्री द्विजमणिदेव शर्मा ने मणिपुर के राजा के शिक्षा-सलाहकार के रूप में हिंदी कि सेवा की।  इन्हीं के प्रयास से कुछ वर्षों बाद पहली बार हिंदी के कार्य के लिए राजकीय सहायता मिली।

मणिपुर का सबसे पहला विद्यालय थोकचोम मधु सिंह के घर में प्रारम्भ किया गया।  श्री थो. मधुसिंह केवल इकतीस वर्ष जीवित रहे, किंतु इस अल्प-अवधि में ही उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों से मणिपुरी समाज को नई दिशा देने का भरपूर प्रयास किया।  उस समय हिंदी की दबी-छुपी प्रतियोगिता बंगला भाषा के साथ भी थी।  अंगरेज़ों के साथ काम करनेवाले बंगला भाषी अधिकारी चाहते थे कि यदि अंगरेज़ी हटानी है तो उसके स्थान पर बंगला का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।    थो. मधु सिंह ने इस समस्या से निबटने का एक तरीका निकाला।  उन्होंने वैचारिक आदान-प्रदान के लिए इम्फाल में ‘डिबेटिंग-क्लब’ की स्थापना की।  उस क्लब में कई बार ‘हिंदी की आवश्यकता’ विषय पर वाद-विवाद का आयोजन किया और हिंदी का पक्ष स्वयं प्रस्तुत किया।  अपने ज़ोरदार तर्कों के बल पर वे यह सिद्ध करने में सफल रहे कि मणिपुर की जनता के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना सबसे उपयोगी और आवश्यक है।  इस प्रकार वाद-विवाद से जो विचार बने, उन्हें मूर्त रूप देने के लिए थो. मधु सिंह ने अपने संबंधी श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम और पं. राधामोहन शर्मा के सहयोग से अपने ही घर पर ‘हिंदी विद्यालय’ की स्थापना की।  ये तीनों सज्जन इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ाते थे।  स्मरणीय है कि उस काल में श्री बंकबिहारी शर्मा भी अपने कांङपोकपी निवासी मित्र पं. जनार्दन शर्मा के सहयोग से घर पर ही मंदिर के सामने के बैठके में लोगों को हिंदी पढ़ाना शुरू कर चुके थे।

कुछ समय बाद श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम ने मोइराङखोम और तेरा कैथेल में हिंदी स्कूल प्रारम्भ किए।  उन्होंने आगे चल कर ‘राष्ट्रलिपि स्कूल’ की स्थापना भी की, जो अब मणिपुर सरकार के नियंत्रण में चल रहा है।


क्र्मशः -अगली किश्त अंतिम 

बुधवार, 29 जून 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-१


{मणिपुर में हिंदी के इतिहास पर प्रकाश डालता यह लेख प्रो. देवराज ने ७ जून १९९८ में लिखा जब ‘मणिपुर हिंदी परिषद’ के स्थापना दिवस के अवसर पर ‘संकल्प और साधना’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ था।  यह लेख हिंदी और वैष्णव धर्म के बारे में विस्तार से ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता  है।  इस लेख के माध्यम से हम मणिपुर मे हो रही हिंदी की गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त कर सकते है।  इस पुस्तक में उन कर्मठ हिंदी सेवियों के बारे में भी जानकारी मिलेगी जो भाषा और संस्कृति की सेवा में जुटे हुए हैं।  देवराज जी मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल में डीन के पद पर रह चुके हैं।  यहाँ उनके इस लेख का प्रथम भाग प्रस्तुत है।]



संकल्प और साधना - मणिपुर हिंदी परिषद
देवराज

१८वीं शताब्दी में वैष्णव-पदावली ["ब्रजबुलि-पदों" के नाम से] मणिपुर के मंदिरों में गाई जाने लगी थीं।  इसे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य वैष्णव धर्म के संदेश के साथ लेकर मनिपुर पहुँचे थे।  इन भक्तों की चार विशेषताएँ थीं।  
एक- राधा-कृष्ण की सरस व मोहक लीलाओं को संगीतमय बनाकर आकषक रूप में प्रस्तुत करना; 
दो- बिना किसी विरोध को जन्म दिए स्थानीय जनता के मन में भक्ति व प्रेम की स्थापना करना; 
तीन- मणिपुर के लौकिक वातावरण को स्वीकार करके भक्ति को पढ़े बे-पढ़े सबके लिए सुलभ बनाना  और 
चार- समूह गान की परम्परा।  धीरे-धीरे वैष्णव-मत का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा।  गाँव-गाँव, घर-घर मंदिर बनाए जाने लगे और कीर्तन की ध्वनि गूँजने लगी।  मणिपुर के राजा वैष्णव मत में दीक्षित हो गए।  इससे राधा-कृष्ण और उनके माध्यम से भारत की वैष्णवी-सांस्कृतिक धारा इस राज्य में बहने लगी।

इस धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण का विशेष पहलू है- तीर्थ यात्राओं की परम्परा।  राधा और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले लोग मथुरा-वृंदावन के उन क्षेत्रों के दर्शन करना अपना परम सौभाग्य मानते थे, जहाँ राधा-कृष्ण ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न की थीं।  जो साधना-सम्पन्न थे, वे कभी-कभी प्रतिवर्ष इस यात्रा में भाग लेते थे।  इसके अतिरिक्त यथा-समय हरिद्वार, काशी, प्रयाग, गया, नवद्वीप आदि की यात्राओं का क्रम चलता रहता था।  मणिपुर के राजाओं व सम्पन्न जनसाधारण द्वारा इनमें से कुछ तीर्थ स्थानों पर बनवाए गए मंदिरों व रासमंडलों को आज भी देखा जा सकता है।  तीर्थ-यात्राओं का वह आयोजन मणिपुर निवासियों को भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और ब्रज भाषा तथा हिंदी की बोलियों के निकट सम्पर्क में लाता था।  ये लोग जब अपने घरों को लौटते थे तब उन्हें हिंदी के इन रूपों का परिचय प्राप्त हो चुका होता था।  साथ ही वे यह भी समझ चुके होते थे कि मणिपुर के बाहर मणिपुरी में काम चलाना कठिन है तथा इसके लिए व्यापक सम्पर्क की भाषा जानना आवश्यक है।  यात्रा की सुविधा और सम्पर्क की सरलता के लिए ये धर्म-प्रधान मणिपुरी अनजाने ही हिंदी को अपनी निज की भाषा स्वीकार कर लेते थे।  इस प्रकार पहले-पहल हिंदी ने मणिपुर में अपना स्थान बनाया।

भारतवर्ष पर मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही प्रब्रजन एकाएक बढ़ना शुरू हुआ।  मुसलमानों के लूट-पाट, राज्य स्थापना और शक्ति के बल पर इस्लाम के प्रचार को उद्देश्य बना कर भारत पर आक्रमण किए।  ११वीं शताब्दी के काल में ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन का क्रम चल पड़ा था।  इसके परिणाम सामने आए।  कुछ लोग कत्ल कर दिए गए, कुछ ने प्राणों की रक्षा हेतु धर्म बदलना स्वीकार कर लिया और कुछ ने इधर-उधर भाग कर अपने धर्म की सुरक्षा का प्रयास किया।  मणिपुर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे ब्राह्मण परिवारों के वंशज हैं, जिनके पूर्वज अपना धर्म बचाने के लिए इधर चले आए थे।  इनमें से काफी ब्राह्मण मिथिला के हैं।  गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से भी इस क्रम में अनेक ब्राह्मण आ गए थे।  अन्याय से बचने के लिए ये ब्राह्मण अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भाँति मणिपुर में यत्र-तत्र जहाँ भी अनुकूल परिवेश मिलता था, बस जाते थे।  जैसे-जैसे समय बीतता जाता था, ये लोग अपने को स्थानीय परिस्थितियों में ढाल लेते थे।  यहाँ की भाषा सीख लेते थे।  आज तो मणिपुर के सभी ब्राह्मण शर्मा लिखते हैं किंतु यदि इनके गोत्र पूछे जाएँ तो इनके मूल निवास स्थान का पता लगाना कठिन नहीं है।  प्राचीन काल में हिंदी के पक्ष में वातावरण बनाने में इन प्रब्रजित लोगों ने महत्वपूर्ण कार्य किया।  इसका कारण यह है कि संस्कृत और हिंदी जानने वाले इन ब्राह्मणों ने अपने को मणिपुरी समाज  के अनुकूल बनाकर अपना परम्परागत जीवन कर्म, पौरोहित्य प्रारम्भ कर दिया।  ये धार्मिक कृत्य में बीच-बीच में हिंदी का प्रयोग करते थे।  मंदिर में भोग चढ़ाने, धार्मिक-भोज और कीर्तन के अवसर पर पुरोहित प्रायः संस्कृत के शब्द भी बोलते थे।  वैष्णव धर्म के श्रद्धालु-जन उचित रूप में इन्हें समझ लेते थे।  इस प्रकार मणिपुर के जीवन में हिंदी का महत्व बढ़ता गया।

प्राचीन काल से ही अपने बल पर और राजाओं से छात्रवृत्ति प्राप्त करके मणिपुर के बाह्मण बालक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने नवद्वीप व काशी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थानों में जाया करते थे।  इनमें से काशी के, हिंदी के वातावरण से घिरे होने के कारण संस्कृत के साथ हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेना इनके लिए बड़ा सहज था।  इनमें से अनेक पौरोहित्य कर्म के साथ सक्रिय रूप से हिंदी के प्रचार में जुट जाते थे।  कुछ आकर हिंदी का व्यवस्थित शिक्षण भी प्रारम्भ कर देते थे।  इनके पूजा-पाट में भी संस्कृत और मणिपुरी के साथ हिंदी का पर्याप्त अंश होना स्वाभाविक था।  मणिपुर में ब्राह्मणों के घर में मंदिर और उसके सामने बड़ा सा चौकोर बैठका बनवाने की प्राचीन परम्परा आज भी मिलती है।  भगवान के दर्शन के बाद भक्त लोग इसमें इकट्ठे होते थे और एक निश्चित समय पर पुजारी इन्हें उपदेश करते थे।  इस उपदेश की मुख्य भाषा मणिपुरी होती थी और बीच-बीच में प्रसंग पड़ने पर हिंदी का प्रयोग होता था।  कीर्तन का माध्यम "ब्रजबुलि" की भाषा था ही, इससे हिंदी मणिपुर में बढ़ी।  इस प्रकार प्राचीन काल में हिंदी, धर्म तथा संस्कृत भाषा के साथ इस क्षेत्र में आई।


शुक्रवार, 27 मई 2011

स्रवंति-मई २०११ Srawanti-May2011



स्रवंति का मई २०११ अंक अंतरजाल के माध्यम से देखा। आवरण पृष्ठ से ही इस पत्र के स्तर का अनुमान लगा लिया।  आवरण पृष्ठ पर लिपि भारद्वाज द्वारा दिया गया फूल का सुंदर चित्र एकदम ‘बतकम्मा’ त्योहार की याद दिला गया। इस बार सम्पादकीय में डॉ. नीरजा का लेखन तेलुगु के मूर्धन्य साहित्यकार वीरेशलिंगम को समर्पित है।  इस प्रकार के सम्पादकीय से हिंदी पाठकों को तेलुगु रचनाकारों की जानकारी मिलती है।  वीरेशलिंगम जी के इस कथन में तथ्य है कि ‘केवल किताबें लिखकर प्रकाशित करने से कोई लाभ नहीं होता। जिस सत्य को हम मानते हैं उसे धैर्य और साहस के साथ आचरण में रखना अनिवार्य है।’

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का प्रथम दीक्षांत समारोह भाषण दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के लिए गर्व की बात है, साथ ही यह  भाषण साहित्य जगत की धरोहर भी कहलाएगा। उन्होंने सच ही कहा था कि भारत को छोटे पैमाने पर सारे संसार का नमूना माना जा सकता है क्योंकि यहाँ विभिन्न जातियों, भाषाओं और धर्मों के लोगों का सहअस्तित्व शांतिपूर्ण ढंग से होता रहा है। 

इस वर्ष हिंदी साहित्य के चार सुप्रसिद्ध रचनाकारों की शताब्दी मनाई जा रही है।  इस अंक के माध्यम से अज्ञेय जी की शताब्दी पर सभा में हुई संगोष्ठी की विस्तृत जानकारी डॉ. नीरजा की रिपोर्ट के माध्यम से मिली।  इस कार्यक्रम की सफलता की कहानी यहाँ दिये गए चित्र गा रहे हैं।  इस वर्ष बाबा नागार्जुन की जन्मशताब्दी भी है।  इस अवसर पर प्रो. दिलीप सिंह का लेख नागार्जुन को एक जनकवि ही नहीं एक अच्छे गद्यकार के रूप में भी स्थापित करता है।  जैसा कि उन्होंने कहा कि नागार्जुन की भाषा कोई कठिन साहित्य भाषा न होकर साधारण ‘बतकही’ के ‘कहन’ का पाठ है जिसकी मिसाल ‘बलचनमा’ जैसा उपन्यास है।  प्रो. दिलीप सिंह ने ठीक ही कहा है कि इस तरह का गद्य रचने से नहीं बनता बल्कि बनता है जीवन को काँछ-काँछ कर साफ की गई जमीन को फिर-फिर देखने से।

इस वर्ष शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशती भी है। इस संदर्भ में 'धरोहर' के अंतर्गत संकलित आचार्य  रामस्वरूप चतुर्वेदी के लेख ‘शमशेर: गद्य की लय’ में वे यह मानते हैं कि आलोचना के क्षेत्र में प्रायः कविता कम और कवि अधिक विवेचित हुए हैं।  इसीलिए शायद कवि उसकी रचना से अधिक प्रसिद्ध हो जाता है; परंतु शमशेर जैसे बहुत कम रचनाकार हैं जो यह कहते हैं- बात बोलेगी, हम नहीं।

जमींदारों, सामंतों, पटेलों और पूंजीपतियों द्वारा  अपनी भूमि पर कृषि करने के लिए बंधुआ मज़दूरों को एक वर्ष के लिए खरीदा जाता है परंतु कर्ज़ और ब्याज़ से दबे ये मज़दूर जीवन भर दयनीय स्थिति में जीते हैं। इसका जीताजागता उदाहरण पूरन सहगल के लेख में मिलता है जो इस अंक में संकलित है।

आशा है कि प्रो. वेंकटेश्वर जी के उस सुझाव को कार्यान्वित किया जाएगा जिसमें उन्होंने ‘अज्ञेय’ पर विशेषांक निकालने की बात कही है।

‘स्रवंति’के सफल प्रकाशन के लिए संकल्पबद्ध  सह-सम्पादक डॉ.जी. नीरजा को एक और संग्रहणीय अंक निकालने के लिए बधाई। समस्त सम्पादक मंडल का यह प्रयास स्तुत्य है।  इसे अंतरजाल पर ‘srawanti.blogspot.com'  पर भी देखा जा सकता है।  

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

प्लेग - रामधारी सिंह ’दिनकर’

अभी कविताकोश के लिए कुछ कविताएं टाईप कर रहा था, ‘दिनकर’जी की रेणुका पुस्तक से।  एक अलग रंग में लिखी उनकी कविता सामने आई तो सोचा कि इससे अपने ब्लाग की भी शोभा बढ़ाऊँ।  जैसा कि ‘दिनकर’जी ने खुद लिखा है, यह कविता पांचवी सदी ई.पू, के प्रसिद्ध यूनानी कवि एरिस्टोफ़ेन्स की कविता पर आधारित है।

प्लेग    


सब देते गालियाँ, बताते औरत बला बुरी है,
मर्दों की है प्लेग भयानक, विष में बुझी छुरी है।
और कहा करते, "फितूर, झगड़ा, फसाद, खूँरेज़ी,
दुनिया पर सारी मुसीबतें इसी प्लेग ने भेजीं।"
मैं कहती हूँ, अगर किया करतीं ये तुम्हें तबाह,
दौड़-दौड़ कर इन प्लेगों से क्यों करते हो ब्याह?

और हिफाजत से रखते हो इन्हें बन्द क्यों घर में?
जरा कहीं निकलीं कि दर्द होने लगता क्यों सर में?
तुम्हें चाहिए खुश होना यह जान, प्लेग बाहर है,
दो घंटे ही सही, मुसीबत से तो फारिग घर है।
पर, उलटे, उठने लगता तुममें अजीब उद्वेग,
हमें अकेले छोड़ किधर को गई हमारी प्लेग?

और गज़ब, खिड़की से कोई प्लेग कहीं यदि झाँके,
उठ जातीं क्यों एक साथ बीसों ललचायी आँखें?
अगर प्लेग छिप गई, खड़े रहते सब आँख बिछाये,
कब चिलमन कुछ हटे, प्लेग फिर कब झाँकी दिखलाये।
प्लेग, प्लेग कह हमें चिढ़ाओ, सको नहीं रह दूर,
घर में प्लेग बसाने का यह खूब रहा दस्तूर।*

*एरिस्तोफेन्स[यूनानी कवि: पाँचवी शताब्दी ई.पू.] की एक कविता से






मंगलवार, 11 जनवरी 2011

एक समीक्षा





एक लड़ाई- धुंध के विरुद्ध   

डॉ. सतीश दुबे [१९४०] एक वरिष्ठ रचनाकार हैं जिनके चार कहानी संग्रह, एक उपन्यास, पांच लघु कथा संग्रह आदि छ्प चुके हैं। इनके अलावा उनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं जिनमें साप्ताहिक हिंदुस्तान और मुक्ता जैसी पत्रिकाएं भी रही हैं। कहानी संग्रह ‘धुंध के विरुद्ध’[२००९] में उनकी बाईस कहानियां संग्रहित हैं जिनमें जीवन से जुडी समस्याओं और घटनाओं के अलावा समाज में हो रहे असामाजिक तत्वों द्वारा की जा रही अराजकता को भी उजागर किया गया है।

इस कहानी-संग्रह की पहली कहानी ‘लोहांगी’ में उस संवेदना को उजागर किया गया है जो किसी व्यक्ति के अतीत से जुडी हुई हैं। पिता की एक लोहे की छोटी-सी संदूकची को बच्चे हटा देना चाहते है पर वह उस धरोहर को बचाए रखना चाहता है जिसे पिताजी ने गांव के बढई के पास बैठ कर बडे मनोयोग से बनवाया था।  किरचे-किरचे ज़िन्दगी, शीलाजी रुकी नहीं, शिखर,आस्था, पटाक्षेप, किरकिराते संशय,  ऐसी कहानियां है जिसमें पति-पत्नी के रिश्तों, आपसी मन-मुटाव, बीती यादें, गलतफहमियां आदि पर प्रकाश डाला गया है। इन मन-मुटावों का परिणाम कभी तलाक तक भी पहुंच जाता है। 

कभी-कभी मीडिया के खेल में भी सम्बंध बिगड जाते हैं जिसका चित्रण ‘शीलाजी रुकी नहीं’ में मिलता है। शीलाजी एक स्वछंद विचारोंवाली तलाकशुदा महिला है जो सामाजिक कार्य में रुचि रखती है। उनका एक साक्षात्कार समाचार पत्र में छपता है। बातचीत के दौरान स्त्री-पुरुष सम्बंधों के सन्दर्भ में बतौर उदाहरण निजी ज़िंदगी के कुछ अनुभवों तथा नाज़ुक प्रसंगों का उल्लेख करती है जिसे भेंटकर्ता ने कूट-पद्धति से सेक्स सम्बंधी कुछ मुद्दों पर विस्तृत टिप्पणियाँ लगा कर छाप देता है। यह वार्ता शीलाजी की पुत्री के दफ़्तर में चर्चा का विषय बन जाती है।

आज के भ्रष्ट राजनीतिक माहौल में ज़मीन लूटने वालों, मासूम किसानों को कुछ पैसों का लालच देकर वहाँ कन्क्रीट जंगल खडा करके रातोरात धन कमाने वालों पर भी कहानीकार ने प्रकाश डाला है।  महामारी, धरती पर पड़ा विवश- जैसी कहानियों में कंक्रीट जंगल के ठेकेदारों पर प्रकाश डाला गया है। ‘धरती पर पड़ा विवश’ में एक पात्र कहता है ‘हर शहर की तरह कार्यकलाप जारी होने के बावजूद यहाँ दो काम तेज़ी से हो रहे हैं; एक तो पहले वैध बाद में अवैध करार दिए गए भवनों याने लाखों-करोड़ों की निर्माण सामग्री तथा श्रमिकों के श्रम को बुलडोज़र या बारूद चलाकर ध्वस्त करना और दूसरा वर्षों पुराने हरे-भरे वृक्षों पर आरियाँ चलाना।’

आज की मानसिकता यह है कि व्यक्ति के चरित्र को नहीं उसके तड़क-भडक को देखा जाता है। ‘आभार’ कहानी में इसका सुंदर चित्रण हुआ है। सवेरे-सवेरे पत्नी जब पति से प्रेज़ेंट लाने के लिए कहती है तो पति ने बढी हुई दाढ़ी और घरेलू कपडों में बाहर निकलने में संकोच किया। तब पत्नी कहती है ‘आपको कौन लग्न करने जाना है, दुकानवाला तो पैसा देखता है, आदमी का चेहरा-मोहरा नहीं।’ पति को रास्ते में कई उलाहनाएं झेलनी पड़ती है और अंततः वह प्रेज़ेंट लेकर आता है तो पत्नी की उलाहना भी- ‘ऐसा घामड़ हुलिया लेकर बाहर चले गए, लोगों ने देखा होगा तो क्या समझा होगा, नाइट-ड्रेस नहीं बदली तो कोई बात नहीं, पर बाल व्यवस्थित कर शेवंग नहीं की थी तो चेहरे पर क्रीम नहीं तो तेल ही चुपड़ लेना था।’

जनजातियों की ईमानदारी पर एक कहानी है ‘प्रेत संस्कार’ जिसमें यह दर्शाया गया है कि ईमानदार व्यक्ति चाह कर भी बेइमानी नहीं कर सकता। मकान मालिकिन एक जनजातीय लड़की को अपने पास काम के लिए रख लेती है और उसकी निष्ठा से इतनी प्रसन्न रहती है कि उसे पुत्री के समान देखती है।  एक दिन मालिकिन का ज़ेवर गुम हो जाता है और संदेह लडकी पर होता है।  बहुत तलाशने के बाद भी ज़ेवर नहीं मिलता और वह लड़की काम के लिए आना बंद कर देती है।  संदेह पुष्टि में बदल जाता है।  एक दिन वह लड़की आती है और ज़ेवर ढूढ़ने के बहाने पूजा के कमरे में जाती है और घोषणा करती है कि ज़ेवर मिल गया।  इसे भले ही प्रेत संस्कार कह लें या पाप-पुण्य का डर... पर निष्कर्ष तो यही है कि ईमानदार अपना ईमान नहीं छोड़ सकता।

डॉ. स्वाति तिवारी [सचिव, दिल्ली लेखिका संघ] ने इस कहानी संग्रह के ‘दो शब्द’ लिखते हुए सही कहा है कि ‘ कहानियों से गुज़रते हुए पाठक स्वतः अनुभव करता है भाषा में संवेदना के महीन धागों के रेखांकन को।  उनके पात्र सर्वहारा और शोषित होने के वावजूद अदम्य जिजीविषा से भरे होते हैं, तभी तो इन कहानियों के माध्यम से डॉ. दुबे कथाबोध की सारी संयत व विविधिताओं को समाहित कर सबल चिन्तक के रूप में सामने आते हैं।’  आशा है डॉ. सतीश दुबे के इस कहानी संग्रह ‘धुंध के विरुद्ध’ को पाठको का स्नेह मिलेगा।  


पुस्तक परिचय

पुस्तक का नाम : धुंध के विरुद्ध
लेखक         : डॉ. सतीश दुबे
प्रथम संस्करण  : २००९ ई.
मूल्य          : १९० रुपये
प्रकाशक        : साहित्य संस्थान
                ई-१०/६६०, उत्तरांचल कॉलोनी
                [निकट संगम सिनेमा] लोनी बार्डर
                गाज़ियाबाद- २०१ १०२   


गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

बुढापा : ‘ओल्ड एज’-[10] सिमोन द बउवा- Simone de Beauvoir

बुढ़ापा : ‘ओल्ड एज’ - सिमोन द बउवा [10] `Old age' - Simone de Beauvoir



Old age - Simone de Beauvoir - बुढ़ापा [10] - सिमोन द बुवा



उपसंहार  

जीवन का यह नियम है कि जो पैदा होता है वह मरता भी है।  कीट-पतंगों से लेकर मानव तक सभी प्राणी इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं परंतु एक अंतर के साथ।  कीट-पतंगे उन अवस्थाओं से नहीं गुज़रते जिनसे पशु गुज़रते हैं।  मनुष्य भी एक पशु है जो बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था से गुज़रते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है। इन अवस्थाओं से गुज़रते हुए वह अपने पीछे भावी पीढ़ी के लिए अपनी यादें भी छोड़ जाता है।  इन्हीं यादों को उकेरते हुए सिमोन ने अपनी  पुस्तक  ‘ओल्ड एज’ में मानव की इस अवस्था के बारे में बताया है जिसमें वह अपनेआप को कमज़ोर, असहाय और जरा से जूझते हुए पाता है। वृद्धावस्था में किसी का जीवन सुखमय होता है तो कोई समस्याओं से घिरा रहता है। अपनी पुस्तक के अंत में सिमोन निष्कर्ष निकालते हुए बताती हैं-

"जीवन में वृद्धावस्था के कष्ट झेलना मनुष्य की नियति है।  राजनीतिक व सामाजिक कारणों से  वृद्धावस्था की अलग पहचान बनी है।  यह एक वास्तविकता है कि वृद्धावस्था को कष्टदायी और दुखद माना जाता है।  इसे मृत्यु से अधिक भीतिकर  दृष्टि से देखा जाता है। जीवन के संग्राम में धन, वैभव, ख्याति- सब कुछ पाने के बाद भी कई बार यह सोच वृद्धावस्था में उभरते देखी गई है कि ‘यह सब कुछ किस लिए किया?’

"रोसो ने अपने लिखे का परिणाम अंत में शून्य बताया।  माइकलेंजिलो ने अपनी कलाकृतियों को कठपुतलियां समझा और उदास हो गए।  अपने पिछले अनुभवों से ज्ञान में वृद्धि होती है जो अपनी जगह सत्य भी है परंतु उस वृद्ध के लिए इस  ज्ञान का क्या मूल्य रह जाता है जिसके जीवन की ज्योति अंतिम प्रकाश लिए भड़क रही है!

"दर्द, बीमारी और वृद्धावस्था के अहसास को लेकर विज्ञान और टेक्नालोजी जो नहीं कर सके, वह सामाजिक नैतिकता कर सकती है अपनी सहानुभूति से।  बढ़ना, विकसित होना, बूढ़े होना और मर जाना- यही तो जीवन की प्रक्रिया है, पूर्वनियत और अपरिहार्य।  इस विषमता को भुलाने का जो एक ही रास्ता है वह है अपनी मंज़िल तय करो और उस पर आगे बढ़ते जाओ, मानवता के लिए समर्पित हो; सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक रचनात्मकता में सहभागी बनो।  किसी का जीवन उसी समय तक अर्थ रखता है जब तक वह अन्य के जीवन से प्रेम, भाईचारा, रोष और करुणा के माध्यम से जुड़ता है। परंतु ऐसा सौभाग्य  कुछ ही वृद्धों को मिलता है।

"वृद्धावस्था सब के लिए समान साधन व सुविधाएँ लेकर नहीं आती।  एक मज़दूर पचास वर्ष में बूढ़ा हो जाता है तो एक सम्पन्न व्यक्ति अस्सी वर्ष तक भी अपने आप को चंगा और जवान महसूस करता है। वृद्धावस्था में एक को उपेक्षित कर दिया जाता है तो दूसरे को आदर और सम्मान मिलता है।  एक के पास साधन नहीं है तो दूसरे के पास संसाधनों की कमी नहीं है।  यहीं पर आवश्यकता होती है एक अच्छी राजनीतिक ‘वृद्धावस्था नीति’ की। उस शोषित वर्ग को आसरा देने की आवश्यकता होती है जिसे समाज ने शोषण करके जल्दी बूढ़ा बना दिया है।

"इस प्रश्न  पर चिंतन  बेहद ज़रूरी है कि 'इस शोषित वर्ग के जीवन में सुधार लाने के लिए समाज को क्या कदम उठाने  चाहिए, जिससे इस वर्ग के सदस्य  भी मनुष्य कहलाएँ ?'  उत्तर सरल है- उसे मनुष्य समझा जाय; समाज उसे ऐसी ‘वस्तु’ न समझे जो बेकार हो गई है।  समाज सदा ही लाभ-हानि की तराज़ू में मनुष्य को तोलता रहा है, मानवता तो मात्र एक दिखावा है। उन्नीसवीं शताब्दी की मानवता दो हिस्सों में बँटी हुई थी - शोषक और शोषित।  वहाँ मानवता का प्रश्न नहीं था - बस, काम करो और पैसा लो। जो काम के लायक नहीं रहा, उसके प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं था, उसके लिए कोई संवेदना नहीं थी।

"वृद्धावस्था की यह दयनीय स्थिति सारी सभ्यता की असफलता है।  मनुष्य और मनुष्य के बीच परस्पर संबंध  की आवश्यकता है ताकि वृद्ध अपने को एक अलग प्रजाति का प्राणी न समझें।  वृद्धावस्था की तैयारी वृद्ध होने के बाद नहीं बल्कि बचपन और युवावस्था से शुरू करनी होगी।  यदि मनुष्य को  बचपन से ही समाज का अणु बनाया जाय तो वह समाज से अपने को कभी अलग नहीं समझेगा और सबके साथ हिलमिल कर रहेगा। परंतु ऐसी प्रथा तो किसी समाज या किसी देश में दिखाई नहीं देती।  समाजवादी देश भले ही यह कह लें पर उन्हें समानता लाने के लिए अभी एक लम्बा सफर तय करना है।  हम भले ही इसका सुनहरा ख्वाब देखते रहें पर यह एक दिवास्वप्न ही रहेगा क्योंकि वृद्धावस्था युवावस्था से अलग स्थिति है और इसे हर कोई अपने-अपने उपाय से जीवन के साथ  संतुलित करता है।  समाज व्यक्तियों का ध्यान उस समय तक रखता है जब तक वे लाभ देते हैं। इसका लाभ युवा पीढ़ी उठा लेती है क्योंकि उनमें क्षमता और शक्ति होती है जबकि वृद्ध के पास न क्षमता बच रहती है न शक्ति, उसके पास केवल आँखें होती हैं आँसू टपकाने के लिए।  जब तक हमारे पास ऐसी नीति नहीं है जो इन वृद्धों के आँसू पोंछ सकें, तब तक समय का यह चक्र वृद्धावस्था की दुर्गति को रोक नहीं पाएगा।"

सिमोन द बुवा ने इस पुस्तक में वृद्धावस्था पर विस्तृत चर्चा की है जिसमें उन विषम परिस्थितियों की जानकारी दी गई जिनसे विश्व के वृद्ध दो-चार होते हैं।  उन परिस्थितियों  के निवारण के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं।  अब यह सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिज्ञों का काम है कि किस प्रकार वे समाज के इस हताश वर्ग के लिए काम करें और उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में ढाढ़स बंधाएँ।  क्या हमारे समाजसेवी और नेता इसके लिए तैयार हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है!!!!     

और अंत में 
मैं आभारी हूँ प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी का कि उन्होंने इतनी उत्तम कृति उपलब्ध कराकर  मुझे उसका सारसंक्षेप लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। इसमें कितना सफल हो पाया, यह तो पाठक निर्णय करेंगे। किसी भी त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ :-)॥