सोमवार, ४ जनवरी २०१०

महिला की माया!

हिंदी ब्लाग जगत में बहुत सी ऐसी बहसें चल रही है कि कुछ लिखने में भी डर लगता है कि कौन किस बात का गलत अर्थ निकाल लें! इसीलिए माहौल को हल्का करने के लिए एक चुटकुला ही सही :-)


ग्यारह लोग एक हेलीकाप्टर से रस्सी से लटक रहे थे - दस पुरुष और एक महिला। रस्सी कमज़ोर थी और केवल दस का भार ही सह सकती थी। इसलिए किसी एक व्यक्ति को रस्सी छोड़ना था, वर्ना सब की जान को खतरा था। अब बलिदान कौन करे?


महिला ने भावुक होकर भाषण देना शुरू किया। उसने कहा कि वह स्वेच्छा से रस्सी छोड़ रही है, क्योंकि त्याग करना स्त्री का स्वभाव है। वह रोज़ ही अपने पति और बच्चों के लिए त्याग करती है और व्यापक रूप से देखा जाये तो स्त्रियां पुरुषों के लिए निःस्वार्थ त्याग करती ही आई है।


पुरुष भावविभोर हो उठे। जैसे ही महिला ने अपना भाषण समाप्त किया सभी एक साथ ताली बजाने लगे :-)


साभार - डेली हिंदी मिलाप [३ जनवरी २०१०]

गुरुवार, ३१ दिसम्बर २००९

स्त्री सशक्तीकरण

एक और उदाहरण

  • स्त्री सशक्तीकरण का एक और उदाहरण प्रस्तुत किया है हमारी न्यायपालिका ने! उच्चतम न्यायालय की जानकारी ‘भाषा’ के माध्यम से मिली है जो इस प्रकार है:


उच्चतम न्यान्यालय ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में एक कमाऊ पत्नी से अपने बेरोज़गार पति को अदालती खर्च के तौर पर दस हज़ार रुपये का भुगतान करने के लिए कहा है। बेंगलुरु के एक न्यायलय में चल रहे वैवाहिक विवाद में कानूनी लडाई चल रहे मुकदमे की सुनवाई के दौरान यह फ़ैसला सुनाया।


सामान्यतः दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ के तहत यह पति की ज़िम्मेदारी होती है कि वह अपनी पत्नी और अभिभवकों का भरण-पोषण करें। यह प्रावधान तलाक की कार्यवाही या उसके बाद भी लागू होता है। लेकिन इस मामले में शीर्ष न्यायालय ने यह देखने के बाद कि पति बेरोज़गार है, कमाऊ पत्नी मिरांडा को चेन्नई में रह रहे अपने बेरोज़गार पति संतोष के. स्वामी को अदालती खर्चे के लिए यह रकम देने का फ़ैसला सुनाया है।

अब कौन कह सकता है कि भारत की नारी अबला है और वह पुरुष के सहारे दिन बिता रही है???

शनिवार, २६ दिसम्बर २००९

पहला कौमी तराना



भारत सरकार [संस्कृति मंत्रालय] द्वारा प्रकाशिन ‘संस्कृति’ पत्रिका के नवीनतम [१६वें] अंक में डॉ. दरख़शाँ ताजवर कायनात के लेख ‘भारतवर्ष का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और उर्दू’ के लेख से उद्धृत:



जिस समय प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था उस समय पहला कौमी तराना लिखा गया जिसे नाना साहब के सहयोगी अज़ीमुल्लाह खाँ ने लिखा था। यह तराना उस समय के अखबार ‘पयामे-आज़ादी’ में प्रकाशित हुआ, जिसमें १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम से सम्बन्धित साहित्य प्रकाशित होता था। यह तराना ब्रिटिश म्यूज़ियम लन्दन में सुरक्षित है। इस तराने के कुछ शेर प्रस्तुत हैं :-

हम हैं इसके मालिक हिन्दोस्तां हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा
कितना कदीम कितना नईम सब दुनिया से न्यारा
करती है ज़रखेज़ जिसे गंगोजमन की धारा
इसकी खानें उगल रही हैं सोना हीरा पारा
इसकी शानों शौकत का दुनिया में जैकारा
आया फ़िरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ गुलामी की ज़ंजीरें बरसाओ अंगारा
हिंदू मुसलमाँ सिख हमारा भाई-भाई प्यारा
ये है आज़ादी का झण्डा इसे सलाम हमारा

साभार: संस्कृत पत्रिका, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार

बुधवार, १६ दिसम्बर २००९

स्त्री सशक्तीकरण- विमर्श



पिछली पोस्ट पर की गई टिप्पणियों में स्त्री सशक्तीकरण के कुछ मुद्दे उठाए गए जिन पर विस्तृत चर्चा हो सकती है। इसी क्रम में कुछ टिप्पणियों पर विमर्श--


पी.सी.गोदियाल जी ने बताया कि जिन पर यह ज़िम्मेदारी [स्त्री शिक्षा की] है, वही लोग लड़कियों के स्कूलों को बमों से उडा़ रहे हैं। निश्चय ही यह इशारा उन लोगों की ओर है जो महिलाओं को अशिक्षित रखकर उन्हें पुरुषों के ताबे बनाए रखना चाहते हैं। हमने इसका एक उदाहरण अपनी पिछली पोस्ट में अफ़गानिस्तान में पारित एक विधेयक के माध्यम से दिया ही है।


डॊ. टी.एस.दराल जी ने कहा है कि इस मामले में हम विकसित देशों को दोष नहीं दे सकते। प्रायः यह देखा गया है कि सम्पन्न घरानों में परिवार नियोजन हो रहा है जब कि समाज का गरीब तबका़ इसके उल्लंघन मे ही अधिक दिखाई देता है। अशिक्षा के कारण वे अपनी परिस्थितियों को ईश्वर के भरोसे छोड़ देते हैं, ‘भगवान की मर्ज़ी’ कहते हुए। यही बात गरीब देशों पर भी लागू होती है, जो परिवार नियोजन जैसी योजनाओं की अनदेखी करते हैं।


डॊ. महेश सिन्हा जी को लगता है कि भूख से ही जनसंख्या कम हो जाएगी। यह मानना इसलिए गलत है कि भूखे रहते हुए भी सोमालिया जैसे देश में अधिक जन संख्या है। इस भूख के कारण ही वे लुटेरे बन चुके है और अब विश्व जहाज़रानी के लिए एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।


रचना जी को यह भय है कि जब स्त्री शिक्षित हो जाएगी तो वह अपनी शिक्षा का उपयोग स्त्री सशक्तीकरण के लिए करेगी जिसे पुरुष बर्दाश्त नहीं कर सकेगा। वे समझती हैं कि शिक्षा का ‘दुर्गुण’ जागृति लाएगा, इसलिए नारी को अशिक्षित रखना ही पुरुष के हित में है। शायद रचना जी शिक्षा, संस्कृति, संस्कार, सभ्यता और स्त्री स्वतंत्रता को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं ले पाईं। स्त्री की स्वतंत्रता किससे? पिता, पुत्र, पति, भाई, सखा.... परिवार से!!!


यहाँ डॊ. ऋषभ देव शर्मा जी की टिप्पणी से कदाचित समाधान मिले। शर्माजी ने कहा है कि "सुशिक्षा होना सशक्त होना भी है। इसीलिए तो कुशिक्षित करने पर ज़ोर है।" कुशिक्षा का ही परिणाम है कि हम मानवीय मूल्य, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता, परिवार, प्रेम.... से परे हटते जा रहे हैं। स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक समझने की बजाय प्रतिद्वन्द्वि समझा जा रहा है। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का मंत्र जपा जा रहा है।


इस संदर्भ में ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की टिप्पणी पर ध्यान दिया जा सकता है कि "प्रगति करनी है तो माँ को शिक्षित करना होगा।" तभी तो कहा जाता है - THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE RULES THE WORLD.


सोमवार, १४ दिसम्बर २००९

महिला सुशिक्षित व सशक्त हो

एक अनुमान के अनुसार सन्‌ २०५० ई. तक विश्व की जनसंख्या साढे़-नौ सौ करोड़ हो जाएगी। इतनी बडी़ जनसंख्या के लिए अन्न, ऊर्जा एवं आम सुविधाएं जुटाना एक चुनौतिपूर्ण कार्य होगा। आज की जनसंख्या लगभग सात सौ करोड़ है। ऐसे में यदि जनसंख्या पर नियंत्रण पाना हो तो निश्चय ही विश्व भर की महिलाओं को- खास कर पिछडे़ देशों की महिलाओं को सुशिक्षित करना आवश्यक है।


आज स्थिति यह है कि फ़्रांस, रूस, अमेरिका और जापान जैसे विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर लगभग शून्य है जबकि विकासशील तथा पिछडे़ देशों की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे देशों में एशिया और अफ़्रिका के देश सब से आगे हैं। भारत, सोमालिया, सुडान जैसे देश गरीबी से जूझते हुए भी जनसंख्या वृद्धि के मामले में आगे हैं।


इस बढ़ती वृद्धि के कारणों के शोध से पता चला कि मुख्यतः महिलाओं का अशिक्षित होना तथा परिवार नियोजन की अज्ञानता कारण हैं। अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान तथा अन्य मुस्लिम देशों में महिलाओं का दमन भी एक कारण बताया गया है। शिक्षा के लिए वैसे तो इन देशों में मदरसे खोले गए हैं पर इनमें परिवार नियोजन जैसी बातें तो नहीं सिखाई जातीं। दूसरे, इन देशों की महिलाओं के लिए शिक्षा लगभग वर्जित ही है। हाल ही में अफ़गानिस्तान का एक विधेयक महिला दमन का एक सटीक उदाहरण है जिसमें कहा गया है कि जो कोई स्त्री अपने पति को सम्भोग से मना करती है या अपने पति की आज्ञा के बिना घर से निकलती है, उसका खान-पान बंद कर दिया जा सकता है।


अमेरिका की अरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. लॉरेंस एम. क्रॉस का मानना है कि जब तक विश्व की महिलाओं को गरीबी, मज़हबी आतंक और अशिक्षा के चुंगुल से नहीं निकाला जाएगा, तब तक जनसंख्या की समस्या विश्व के सामने मुँह बाए खड़ी रहेगी।

बुधवार, ९ दिसम्बर २००९

कूर्ग की वादियां




मेरे एक मित्र हैं - सुरेश मार्तण्ड बिदरकर, जो अब बेंगलुरु में बस गए हैं। उन्होंने अपना एक छोटा सा यात्रावृत्त भेजा है, जिसे मैं आप लोगों से बांटना चाहता हूँ।


कर्नाटक का एक जनपद है कूर्ग, जिसे स्वतंत्र भारजनीतित की ‘राक प्रथा’:) के अनुसार नाम बदल कर अब कोडुगु कर दिया गया है। यहाँ पर एक पहाडी इलाका है जिसे अंग्रेज़ों के समय में मरकारा कहा करते थे और अब मडिकेरी कहा जाता है। यह इलाका पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है



मडिकेरी के ब्रह्मगिरी की ऊंचाई पर एक मधुबन है जहां ‘राजा का सिंहासन’ स्थित है। बताया जाता है कि आदिवासी राजा यहाँ से राजकीय कार्य करता था। यह सिंहासन आज भी सुरक्षित है और सरकार के संरक्षण में इसकी देखभाल होती है।



कोडुगु की इन पहाडी वादियों ने तिब्बती विस्थापितों को भी आकर्षित किया है। उनके लिए यहाँ के कुशलनगर में एक मंदिर बनाया गया है जिसे ‘स्वर्ण मंदिर’ कहते हैं।


कोडुगु जनपद का इतिहास भव्यशाली रहा है। यहाँ पर गंग, कोंगल्व, चेंगथाल्व, होयसाला, विजयनगर और बेलूरु के राजाओं का राज रहा। अंग्रेज़ों के आधिपत्य के पूर्व यहाँ कोडुगु राजाओं का राज्य था।





सन्‌ १९७१ में इस जनपद के मडिकेरा किले के गिरजाघर में एक संग्रहालय की स्थापना की गई। फ़ील्ड मार्शल के.एम.करियप्पा ने अपने संग्रहित किए गए कई प्राचीन व बेशकीमती वस्तुओं को इस संग्रहालय को दान में दे दिया। आज भी यह संग्रहालय पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

सोमवार, ३० नवम्बर २००९

चुगलची का मकबरा



चुगली से सब में ये लगाए आँच
मिलकर इसको मारो जूते पाँच॥



चुगली करने वाले को कोई पसंद नहीं करता। चुगलीखोर तो इतना खतरनाक भी हो सकता कि वह अच्छे खासे दोस्तों में लडाई करा दे, राजाओं के बीच जंग छिडा दे। एक ऐसे ही चुगलची का मकबरा एटावा नगर के बाहरी क्षेत्र में फ़रूखाबाद-कन्नौज राजमार्ग पर है जिस पर जाकर आज भी लोग पांच जूते मार कर पुण्य कमाते हैं। अभी हाल ही में समाजवादी पार्टी के मोहम्मद मन्सूर ने अपने साथियों के साथ इस मकबरे पर जाकर पाँच जूते मारे और अखबार की सुर्ख़ियों में आए!



कहा जाता है कि यह एक दरबारी विदूषक भोला सैयद का मकबरा है जो राजा सुमेर सिंह चौहान के दरबार में रहा करता था। अपनी चुगली की आदत से मजबूर और धन की लालच में उसने एक बार पडोसी अतेर के राजा [भिंड] के दरबार में जाकर यह कहा कि राजा सुमेर सिंह चौहान की सेना उनके राज्य पर हमला करने वाली है। उधर राजा सुमेर सिंह चौहान को बताया कि अतेर के राजा उन पर हल्ला बोलने की तैयारी में है। दोनों के बीच लडाई होना ही था कि उन्हें भोला सैयद की चुगली का पता चल गया। सैयद को यह सज़ा दी गई कि उसे जूतों से तब तक मारा जाय जब तक वह मर नहीं जाता।


भोला सैयद के मरने के बाद उसे जहाँ दफ़नाया गया वहाँ एक गुम्बद भी बनाया गया और यह फ़रमान जारी हुआ कि वहाँ आनेवाला हर राहगीर उसके मकबरे पर पाँच जूते मारेगा और पुण्य का भागीदार होगा। वैसे तो, अब इस मकबरे के गुम्बद की खस्ता हालत है और वहाँ कोई चौकीदार भी नहीं रहता परंतु अब भी लोग वहाँ जाकर पांच जूते मारते है और अपनी मुराद पूरी करते हैं।


[इंडिया टुडे के ७ दिसम्बर अंक से साभार]