गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

बुढापा : ‘ओल्ड एज’-[10] सिमोन द बउवा- Simone de Beauvoir

बुढ़ापा : ‘ओल्ड एज’ - सिमोन द बउवा [10] `Old age' - Simone de Beauvoir



Old age - Simone de Beauvoir - बुढ़ापा [10] - सिमोन द बुवा



उपसंहार  

जीवन का यह नियम है कि जो पैदा होता है वह मरता भी है।  कीट-पतंगों से लेकर मानव तक सभी प्राणी इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं परंतु एक अंतर के साथ।  कीट-पतंगे उन अवस्थाओं से नहीं गुज़रते जिनसे पशु गुज़रते हैं।  मनुष्य भी एक पशु है जो बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था से गुज़रते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है। इन अवस्थाओं से गुज़रते हुए वह अपने पीछे भावी पीढ़ी के लिए अपनी यादें भी छोड़ जाता है।  इन्हीं यादों को उकेरते हुए सिमोन ने अपनी  पुस्तक  ‘ओल्ड एज’ में मानव की इस अवस्था के बारे में बताया है जिसमें वह अपनेआप को कमज़ोर, असहाय और जरा से जूझते हुए पाता है। वृद्धावस्था में किसी का जीवन सुखमय होता है तो कोई समस्याओं से घिरा रहता है। अपनी पुस्तक के अंत में सिमोन निष्कर्ष निकालते हुए बताती हैं-

"जीवन में वृद्धावस्था के कष्ट झेलना मनुष्य की नियति है।  राजनीतिक व सामाजिक कारणों से  वृद्धावस्था की अलग पहचान बनी है।  यह एक वास्तविकता है कि वृद्धावस्था को कष्टदायी और दुखद माना जाता है।  इसे मृत्यु से अधिक भीतिकर  दृष्टि से देखा जाता है। जीवन के संग्राम में धन, वैभव, ख्याति- सब कुछ पाने के बाद भी कई बार यह सोच वृद्धावस्था में उभरते देखी गई है कि ‘यह सब कुछ किस लिए किया?’

"रोसो ने अपने लिखे का परिणाम अंत में शून्य बताया।  माइकलेंजिलो ने अपनी कलाकृतियों को कठपुतलियां समझा और उदास हो गए।  अपने पिछले अनुभवों से ज्ञान में वृद्धि होती है जो अपनी जगह सत्य भी है परंतु उस वृद्ध के लिए इस  ज्ञान का क्या मूल्य रह जाता है जिसके जीवन की ज्योति अंतिम प्रकाश लिए भड़क रही है!

"दर्द, बीमारी और वृद्धावस्था के अहसास को लेकर विज्ञान और टेक्नालोजी जो नहीं कर सके, वह सामाजिक नैतिकता कर सकती है अपनी सहानुभूति से।  बढ़ना, विकसित होना, बूढ़े होना और मर जाना- यही तो जीवन की प्रक्रिया है, पूर्वनियत और अपरिहार्य।  इस विषमता को भुलाने का जो एक ही रास्ता है वह है अपनी मंज़िल तय करो और उस पर आगे बढ़ते जाओ, मानवता के लिए समर्पित हो; सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक रचनात्मकता में सहभागी बनो।  किसी का जीवन उसी समय तक अर्थ रखता है जब तक वह अन्य के जीवन से प्रेम, भाईचारा, रोष और करुणा के माध्यम से जुड़ता है। परंतु ऐसा सौभाग्य  कुछ ही वृद्धों को मिलता है।

"वृद्धावस्था सब के लिए समान साधन व सुविधाएँ लेकर नहीं आती।  एक मज़दूर पचास वर्ष में बूढ़ा हो जाता है तो एक सम्पन्न व्यक्ति अस्सी वर्ष तक भी अपने आप को चंगा और जवान महसूस करता है। वृद्धावस्था में एक को उपेक्षित कर दिया जाता है तो दूसरे को आदर और सम्मान मिलता है।  एक के पास साधन नहीं है तो दूसरे के पास संसाधनों की कमी नहीं है।  यहीं पर आवश्यकता होती है एक अच्छी राजनीतिक ‘वृद्धावस्था नीति’ की। उस शोषित वर्ग को आसरा देने की आवश्यकता होती है जिसे समाज ने शोषण करके जल्दी बूढ़ा बना दिया है।

"इस प्रश्न  पर चिंतन  बेहद ज़रूरी है कि 'इस शोषित वर्ग के जीवन में सुधार लाने के लिए समाज को क्या कदम उठाने  चाहिए, जिससे इस वर्ग के सदस्य  भी मनुष्य कहलाएँ ?'  उत्तर सरल है- उसे मनुष्य समझा जाय; समाज उसे ऐसी ‘वस्तु’ न समझे जो बेकार हो गई है।  समाज सदा ही लाभ-हानि की तराज़ू में मनुष्य को तोलता रहा है, मानवता तो मात्र एक दिखावा है। उन्नीसवीं शताब्दी की मानवता दो हिस्सों में बँटी हुई थी - शोषक और शोषित।  वहाँ मानवता का प्रश्न नहीं था - बस, काम करो और पैसा लो। जो काम के लायक नहीं रहा, उसके प्रति किसी का कोई दायित्व नहीं था, उसके लिए कोई संवेदना नहीं थी।

"वृद्धावस्था की यह दयनीय स्थिति सारी सभ्यता की असफलता है।  मनुष्य और मनुष्य के बीच परस्पर संबंध  की आवश्यकता है ताकि वृद्ध अपने को एक अलग प्रजाति का प्राणी न समझें।  वृद्धावस्था की तैयारी वृद्ध होने के बाद नहीं बल्कि बचपन और युवावस्था से शुरू करनी होगी।  यदि मनुष्य को  बचपन से ही समाज का अणु बनाया जाय तो वह समाज से अपने को कभी अलग नहीं समझेगा और सबके साथ हिलमिल कर रहेगा। परंतु ऐसी प्रथा तो किसी समाज या किसी देश में दिखाई नहीं देती।  समाजवादी देश भले ही यह कह लें पर उन्हें समानता लाने के लिए अभी एक लम्बा सफर तय करना है।  हम भले ही इसका सुनहरा ख्वाब देखते रहें पर यह एक दिवास्वप्न ही रहेगा क्योंकि वृद्धावस्था युवावस्था से अलग स्थिति है और इसे हर कोई अपने-अपने उपाय से जीवन के साथ  संतुलित करता है।  समाज व्यक्तियों का ध्यान उस समय तक रखता है जब तक वे लाभ देते हैं। इसका लाभ युवा पीढ़ी उठा लेती है क्योंकि उनमें क्षमता और शक्ति होती है जबकि वृद्ध के पास न क्षमता बच रहती है न शक्ति, उसके पास केवल आँखें होती हैं आँसू टपकाने के लिए।  जब तक हमारे पास ऐसी नीति नहीं है जो इन वृद्धों के आँसू पोंछ सकें, तब तक समय का यह चक्र वृद्धावस्था की दुर्गति को रोक नहीं पाएगा।"

सिमोन द बुवा ने इस पुस्तक में वृद्धावस्था पर विस्तृत चर्चा की है जिसमें उन विषम परिस्थितियों की जानकारी दी गई जिनसे विश्व के वृद्ध दो-चार होते हैं।  उन परिस्थितियों  के निवारण के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं।  अब यह सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिज्ञों का काम है कि किस प्रकार वे समाज के इस हताश वर्ग के लिए काम करें और उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में ढाढ़स बंधाएँ।  क्या हमारे समाजसेवी और नेता इसके लिए तैयार हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है!!!!     

और अंत में 
मैं आभारी हूँ प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी का कि उन्होंने इतनी उत्तम कृति उपलब्ध कराकर  मुझे उसका सारसंक्षेप लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। इसमें कितना सफल हो पाया, यह तो पाठक निर्णय करेंगे। किसी भी त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ :-)॥  



10 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत सफल हुए हैं -कोई बुजुर्ग (वृद्ध नहीं ) ही विदेशी कृति का इतना सुन्दर प्रांजल और पठनीय सार संक्षेप कर सकता है -एक एक लाईने पढ़ा -आश्चर्य कि सीमेन बोउआर ने इस विषय पर भी लेखनी चलाई है ....
इस वर्ष के सबसे अच्छे पठनीय अनुभवों में रहा इस पोस्ट को पढना .....सही है विज्ञान और तकनीकी नहीं मानव संवेदना का ही रोल मानवता के लिए कहीं कहीं निर्णायक है .....
आपको नया वर्ष बहुत मंगलमय हो ,नयी ऊर्जा और स्फूर्ति आपको ऐसे ही श्रेष्ठ सृजनात्मक कर्मों में लगाए रखे !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पर्वतारोहण में कहते हैं कि चढ़ना सरल है, उतरना कठिन। जीवन में भी ढलान पर आने के बाद आत्मसम्मान के साथ जीना सब चाहते हैं और सबको उस ढलान में पहुँचना है एक दिन।

राज भाटिय़ा ने कहा…

वृद्धावस्था के ऊपर लिखा यह लेख बहुत पसंद आया, लेकिन यह वृद्धावस्था सब पर आनी हे लेकिन कई इस बारे सोचते नही ओर एक वृद्धा को साधन समपंन होते भी दुखी रहना पडता हे, ओर दुसरी तरफ़ एक गरीब इस वृद्धावस्था मै भी इज्जत से मरता हे, कुछ कह नही सकते इस बारे, वेसे युरोप मै भी इस आवस्था मे ज्यादा तर बुजुर्ग दुख ही भोगते हे. धन्यवाद

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

चूँकि अब धीरे-धीरे हम सब एक बिलकुल नए-नवेले साल २०११ में पदार्पण करने जा रहे है,
अत: आपको और आपके परिवार को मेरी और मेरे परिवार की और से एक सुन्दर, सुखमय और समृद्ध नए साल की शुभकामनाये प्रेषित करता हूँ ! भगवान् करे आगामी साल सबके लिए अच्छे स्वास्थ्य, खुशी और शान्ति से परिपूर्ण हो !!

नोट: धडाधड महाराज की बेरुखी की वजह से ब्लोगों पर नजर रखने हेतु आपके ब्लॉग को मै आपकी बिना इजाजत अपने अग्रीगेटर http://deshivani.feedcluster.com/से जोड़ रहा हूँ, अगर कोई ऐतराज हो तो कृपया बताने का कष्ट करे !

राज भाटिय़ा ने कहा…

नया वर्ष आप के ओर आप के परिवार के लिये सुख मय हो ओर देश भर मे खुशियां के कर, सुख ले कर आये, मेरी शुभकामनाऎं आप सब के संग हे!! मेरा यह नये साल का उपहार आप सब के लिये हे..
http://blogparivaar.blogspot.com/

Kajal Kumar ने कहा…

वृद्धावस्था जब आनी ही है तो परेशानी क्यों, स्वयं को इसके लिए तैयार करने का समय भी निकाला ही जाना चाहिये.

shiva ने कहा…

चंद्रमौलेश्वर जी आप ने इस पुस्तकबुढापा : ‘ओल्ड एज’-[10] सिमोन द बउवा- Simone de Beauvoir का हिंदी अनुवाद किया इस के लिये आप का बहुत -बहुत धन्यवाद्

ZEAL ने कहा…

प्रो ऋषभ शर्मा एवं आपका आभार।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपका विश्लेषण ... अब जैसे जैसे उम्र हो रही है लगता है एक प्रति सुरक्षित रख लेनी चाहिए इस पुस्तक की ...
आपको और परिवार में सबको नव वर्ष मंगलमय ...

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

Chandramouleshwar ji,
Jivan ke is padaaw ka dard sabhi ko bhugatana padata hai.haan agar ham isake liye maansik rup se taiyaar rahen to shayad dukh Kuch had tak kam ho sake.
Pustak ka saar hamare bich laane ke liye aapka dhanyawaad.
-Gyanchand marmagya