शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

Meteorite on Indonesia

इंडोनेशिया के ऊपर फटा धूमकेतु

वाशिंगटन, २९ अक्तूबर-[भाषा]


अब तक अवलोकन किए गए धूमकेतु के सबसे बड़े विस्फोटों में से एक में हीरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम की तिगुनी शक्ति वाला एक धूमकेतु इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडल में फट गया।

नासा की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पांच से दस मीटर व्यास वाला धूमकेतु इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी के ऊपर वायुमंडल में फटा और उसने करीब ५० हज़ार टन टीएनटी की ऊर्जा छोड़ी। यह विस्फोट हिरोशिमा पर गिराए गए अमेरीकी परमाणु बम की तुलना में तिगुनी शक्तिवाला था। इसके विस्फोट की गूंज इतनी ज़ोरदार थी कि १० हज़ार किलोमीटर दूर निगरानी केंद्र में उसकी आवाज़ सुनाई दी।

इसने अंतरिक्ष के प्रभावों से धरती की सुरक्षा पर चिंताएँ खड़ी कर दी है!!!

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

STOP BLOGGER JEALOUSY PAIN

ब्लागर जेलेसी पेन बंद हो!

हिंदी ब्लाग जगत में यह कोई पहला अवसर नहीं था जब कोई संगोष्ठी हुई हो। पिछले वर्षों में इलाहाबाद, दिल्ली,.......आदि में ब्लागर मीट सम्पन्न हुए और सौहार्द बढ़ा।

अभी हाल ही में एक ब्लागर संगोष्ठी संगम की पावन धरती पर सम्पन्न हुई जिससे हिंदी ब्लाग जगत में एक खलबली सी मच गई। कारण? कई गिनाए जा रहे हैं:)

हिंदी साहित्य जगत के ‘ऐतिहासिक आलोचक’ नामवर सिंह इस संगोष्ठी के अध्यक्ष थे। यह तो सर्वविदित है कि नामवर जी भले ही रचनाधर्मिता कब के छोड़ चुके परंतु आज भी जहाँ वे पहुँचते हैं, वहाँ ख्याति अनायास ही पहुँच जाती है। इस ख्याति के पीछे उनके कुछ ऐसे चौंकानेवाले कथन होते हैं कि वही सब से बड़ा समाचार बन जाता है। जब वे इस ब्लागर संगोष्ठी में पहुँचे तो वही हुआ जो होना था!

इस संगोष्ठी का चर्चा में रहने का दूसरा मुख्य कारण था इसके ब्लाग जगत में तकनीकी खूबियों का सुंदर प्रस्तुतिकरण। ‘आँखों देखा हाल’ टाइप समाचार शायद हिंदी ब्लाग जगत में पहली बार देखने/पढ़ने को मिला। जिनके चित्र और नाम कई-कई ब्लागों पर दिखे, उनसे दूसरों को ‘ब्लाग जेलेस पेन’ होना स्वाभाविक था। इस तकनीकी सफ़लता के पीछे जो ब्लागर थे, उन्हें उनके आकार-प्रकार को लेकर भी व्यंग्य बाण चले!!!!

किसी भी बडे़ से बड़े कार्यक्रम में सभी को निमंत्रण देना असम्भव है। किसे निमंत्रण मिला- किसे नहीं, इसके कारण की तलाश होने लगी। इस पड़ताल में गुटबाज़ी के कयास लगाए गए। कानपुरिया बनाम जबलपुरिया, हिंदुत्त्ववादी बनाम सेक्युलरवादी, वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी, हिंदी बनाम अंग्रेज़ी....यहाँ तक कि स्त्री बनाम पुरुष .... न जाने क्या-क्या कारण उछाले गए और ब्लागर जेलेसी पेन बढ़ता गया।

एक मुद्दा यह भी उछला कि जनता के पैसे पर ब्लागर मौज-मस्ती कर रहे हैं। अब इन लोगों को कौन समझाएं कि सरकार राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए करोडो़-करोड़ों का खर्चा कर रही है। कई संस्थाएं और अकादमियां विभिन्न राज्यों में खोली गई हैं जिनका करोड़ों का बजट है और हर वर्ष लाखों के पुरस्कार वितरित किए जा रहे हैं। यहाँ भी वही ब्लागर जेलेसी पेन देखने को मिला!! उसकी किताब छपी, मेरी क्यों नहीं? किस आधार पर यह पुस्तक छपी............????

ब्लागरों को यह समझने की आवश्यकता है कि इन संस्थाओं से वे भी लाभ उठा सकते हैं। यह संगोष्ठी मार्गदर्शन की तरह देखी जा सकती है। विभिन्न राज्यों में ब्लागर एक जुट होकर इसका लाभ उठा सकते हैं। आवश्यकता है तो बस इतनी कि अपने ब्लाग के प्रति इमानदार रहें, ब्लागर भाइयों[और बहनों] के प्रति आदर और सौहार्द बनाए रखें - ब्लागर जेलेस पेन से दूर रहें:)

[ब्लाग जगत को इस नई बीमारी की ओर ध्यान दिलाने के लिए भाई शिव कुमार मिश्र जी का आभार]

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

BIRTH-CENTENARY OF HOMI J.BHABHA


होमी जेहांगीर भाभा की जन्म-शताब्दी [१९०९-१९६६]




भारत के महान सपूत, युगदृष्टा, वैज्ञानिक एवं पथप्रदर्शक होमी जेहांगीर भाभा को देश की परमाणु-शक्ति का पितामह कहा जा सकता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एक आधुनिक देश का सपना देखा था जहाँ तकनीक और विज्ञान के आधार पर उन्नति की जा सकेगी। देश के महान वैज्ञानिक होमी जे. भाभा ने भी ऐसा ही सपना संजोया था कि भारत एक शक्तिसम्पन्न देश हो। राजनीति और विज्ञान का यह संगम हुआ और देश ने परमाणु विज्ञान की दिशा में पहला कदम उठाया।

सन्‌ १९०९ई. में होमी जे. भाभा का जन्म मुम्बई के एक अमीर पारसी घराने में हुआ। सन्‌ १९३५ई. में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। सन्‌ १९४४ई. में बेंगलूर के इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस में रीडर की पोस्ट पर कार्यरत रहे। परंतु युवा वैज्ञानिक में कुछ बडा़ करने की ललक थी। उन्होंने उस समय के बडे़ उद्योगपति सर जमशेदजी टाटा को पत्र लिख कर कहा कि भारत की प्रगति के लिए एक विज्ञान और तकनीक अनुसंधान कार्यशाला की आवश्यकता है। सर जमशेदजी टाटा ने इस युवा वैज्ञानिक की इच्छाओं का सम्मान करते हुए ‘टाटा इस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ंडमेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और भाभा को इसका अध्यक्ष बनाया। इस इंस्टिट्यूट का सालाना बजट था केवल अस्सी हज़ार रुपये!!

पं. जवाहरलाल नेहरू ने इस ऊर्जावान युवा वैज्ञानिक की क्षमता को पहचान कर उन्हें भारत की ‘एटामिक एनर्जी रिसर्च कमिटी’ का अध्यक्ष बनाया। उन्हें अपना कार्य करने की खुली छूट दी गई ताकि सत्ता में बैठे अधिकारी उनके कार्य में अडंगा न डाल सके। भाभा का मानना था कि यदि भारत को परमाणु मामले में चीन की शक्ति के आगे समर्पण नहीं करना है तो उसे भी आत्मनिर्भर होना होगा। उन्होंने इस दिशा में पहल की और इसीलिए उन्हें भारत के परमाणु विज्ञान का पितामह कहते हैं।

इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा कि २३ जनवरी १९६६ को जब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने पद की शपथ ले रही थी, तब देश से दूर जेनेवा की एटामिक एनर्जी कॉन्फ़रेंस के लिए जाते हुए इस होनहार वैज्ञानिक की मृत्यु मोंट ब्लांक हवाई दुर्घटना मे हो गई। यह हादसा था या कोई साजिश? इसका उत्तर तो शायद सरकारी फ़ाइलों में दफ़न हो!!!

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

LAST DAY OF JINNAH

जिन्ना का अंतिम दिन

क़ायदेआज़म के निजी डॉक्टर रहे डॉ. इलाही बख़्श ने जिन्ना के अंतिम दिन का संस्मरण कुछ इस प्रकार दिया था:-

ज़ियारत से लौटने के बाद क़ायदेआज़म मुहम्मद अली जिन्ना की नाज़ुक काया को टी.बी. की बीमारी खाए जा रही थी। ११ सितम्बर १९४८ का वह दिन था जब उनसे पूछा गया कि क्या वे कराची चलने के लिए तैयार है तो उन्होंने हामी भर दी। आश्चर्य की बात यह थी कि उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही कराची जाने से मना कर दिया था। शायद उन्हें भी अब यह अहसास होने लगा था कि उनका अंतिम समय करीब है!

पूरी मेडिकल तैयारी के साथ उनके स्ट्रेचर को एम्बुलेंस से हवाई अड्डे पहुँचाया गया। गवर्नर-जनरल का हवाई जहाज़ धूप में दुर से ही चमक रहा था। जहाज़ ने उड़ान भरी। जिन्ना को साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी। आक्सीजन का मास्क लगाया गया जिसे वे बार-बार हटाने का प्रयास कर रहे थे; पर जब उन्हें उसकी ज़रूरत समझाई गई तो वे मुस्करा कर शांत हो गए।

मौरीपुर हवाई अड्डे पर जैसे ही जहाज़ पहुँचा, मिलिटरी सचिव कर्नल नोल्स एम्बुलेंस के साथ दिखाई दिए। जिन्ना को एम्बुलेंस में चढा़ने के बाद हम लोग दूसरी गाड़ी में बैठ गए। हमारा काफ़िला अभी चार मील भी नहीं तय कर पाया था कि एम्बुलेंस के इंजिन में खराबी आ गई और वह रुक गई। ड्राइवर ने २०-२५ मिनिट तक मश्शकत की पर गाड़ी ठीक नहीं हो सकी। दूसरे एम्बुलेंस को तलब किया गया। तब तक जिन्ना को इसी एम्बुलेंस में लेटे-लेटे पसीना आने लगा। नर्स हवा करती रही पर उनकी बेचैनी बढ़ती रही। पसीने से सारे कपडे़ तरबतर हो गए.... पल्स कमज़ोर और धीमी होने लगी। मैंने फ़ौरन थर्मास से चाय निकाल कर पीने को दी। मन ही मन प्रार्थना करता रहा कि किसी तरह सही सलामत घर तक पहुँच जाय। ऐसा न हो कि इस देश के क़ायदेआज़म का अंत इस तरह सड़क के किनारे हो!

यह भी एक विड़म्बना ही थी कि इस देश का राष्ट्रनायक इस तरह असहाय सड़क के किनारे अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था और इससे अनभिज्ञ उसके अगल-बगल से कई गाड़ियाँ गुज़र रही थी। जैसे ही दूसरा एम्बुलेंस पहुँचा, हमने उनके स्ट्रेचर को उस में चढ़ाया और आगे की यात्रा तय की। मौरीपुर हवाई अड्डे से गवर्नर-जनरल की कोठी की दूरी केवल ९-१० मील है पर इस यात्रा को तय करने में हमें दो घंटे लगे।

११ सितम्बर १९४८ की शाम के ६-०० बजे हम जब कोठी पहुँचे तो मैने राहत की साँस ली परंतु जिन्ना अपनी साँसों से जूझते रहे। अंततः रात के करीब १०-०० बजे उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली॥


Based on the account given by Dr. Ilahi Baksh - Source: Jinnah-India-Partition-Independence; By Jaswant Singh.

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

After interval!

एक अंतराल के बाद

पिछले ८-१० दिन से वायरल फ़ीवर का शिकार होने के कारण ब्लाग बिरादरी से दूर रहा। कमज़ोरी ऐसे घेरे हुए है कि कीबोर्ड पर उंगलियां थरथरा रही है । परंतु यही तो एक साधन है जो घर बैठे समस्त लेखक बिरादरी से जोडे़ रखता है, सो इसका मोह कम्प्यूटर तक खींच ही लाया। आशा है कि धीरे-धीरे ही सही, पुनः सक्रिय होने का प्रयास रहेगा।


दीपावली की समस्त ब्लाग बिरादरी को शुभकामनाएँ॥

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

JNANAPEETH AWARDEE DR.SATYAVRAT SHASTRI

संस्कृत के प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता- डॉ. सत्यव्रत शास्त्री

सन १९३० ई. में जन्मे, वर्ष २००७ के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत लेखक और विद्वान डॉ. सत्यव्रत शास्त्री पंजाब विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से भर्तृहरि कृत वाक्यपदीय में दिक्काल मीमांसा विषय पर पीएच.डी. हैं।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री ने १९५५ में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया। अपने चालीस वर्ष के कार्यकाल में वे विभागाध्यक्ष तथा कलासंकायध्यक्ष का पदभार सम्भाला। वे जगन्नाथ विश्वविद्यालय, पुरी के भी कुलपति रहे। उन्होंने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी संस्कृत के प्रचार-प्रसार का कार्य किया। इन्हीं के प्रयासों से सिल्पाकोर्न विश्वविद्यालय, थाईलैंड में संस्कृत अध्ययन केंद्र की स्थापना हुई।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री ने अब तक तीन महाकाव्य, तीन खण्ड काव्य, एक प्रबंध काव्य और दो खंडों के पत्र काव्य की रचना की है। उनकी समीक्षात्मक कृतियों में ‘द रामायणः ए लिंग्विस्टिक स्टडी’, ‘ कालिदास इन माडर्न संस्कृत लिटरेचर’ तथा ‘न्यू एक्स्पेरिमेंट्स इन कालिदास’ चर्चित रहीं। ‘डिस्कवरी ऑफ़ संस्कृत ट्रेज़र्स के सात खंडों में उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला है। ‘थाइदेशविलासम्‌’ के बाद ‘श्रीरामकीर्तिमहाकाव्यम्‌’ की रचना की। साहित्य अकादमी ने ‘गुरुगोविंदचरितम्‌’ पर पुरस्कृत किया।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री अपनी कृति ‘थाईदेशविलासम्‌’ के सृजन के बारे में एक रोचक संस्मरण सुनाते हैं। वे बताते हैं कि "पहली बार जब मैं थाईलैंड गया, मैंने एक बार नेशनल लाइब्रेरी में जाकर पूछा कि यहाँ संस्कृत भाषा में थाईलैंड पर कोई पुस्तक है, तो वहाँ के अध्यक्ष ने कहा- "प्रोफ़ेसर, ह्वाइ डोंट यू राइट वन?" तो यह प्रेरणा थी। ..." इस कृति का थाई अनुवाद वहाँ की राजकुमारी ने किया जो उनकी शिष्या थी।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री की विशेषज्ञता के बारे में जब एक अंग्रेज़ी महिला पत्रकार ने पूछा तो उनका उत्तर था,"आई एम पोएट बाय इंस्टिंक्ट, लिंग्विस्ट एंड इंडोलोजिस्ट बाय ट्रेड।" शास्त्रीजी की पहली संस्कृत कविता ११ वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। जयपुर से निकलनेवाली संस्कृत पत्रिका ‘संस्कृतरत्नाकर’ के यशस्वी संपादक महामहोपाध्याय भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने यह कविता प्रकाशित करते हुए उसके शीर्षक ‘षडऋतुवर्णनम्‌’ के नीचे कवि की आयु पर भी टिप्पणी दी थी। डॉ. सत्यव्रत शास्त्री के मन में कविता स्वतः फूट पड़ती थी जबकि उनके पिताजी जो व्याकरण के विद्वान थे, का मानना था कि बच्चों को साहित्य से दूर रहना चाहिए। उसका कारण यह था कि संस्कृत साहित्य में श्रृंगार रस बहुत होता है।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री ने अपनी शिक्षा काशी के पं. शुकदेव झा से प्राप्त की और नव्य व्याकरण के दुरूह- से- दुरूह ग्रंथों का अध्ययन किया। उन्होंने संपूर्ण महाभाष्य कंठस्थ किया। ब्रह्मसूत्र का अध्ययन अदासीन मठ के निवासी स्वामी सुरेश्वराचार्य से लिया और पं महादेव उपाध्याय से साहित्यशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया।

विदेशी यात्रा के बारे में डॉ. सत्यव्रत शास्त्री बताते हैं कि उन्हें भारत सरकार द्वारा थाईलैंड भेजा गया जहाँ उनकी नियुक्ति वहाँ के सबसे पुराने चुल्लंकोर्ण विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए हुई। कारण यह था कि वहाँ की राजकुमारी संस्कृत पढ़ने की इच्छुक थी। उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब यह पता चला कि यहाँ थाई भाषा को समझने के लिए संस्कृत पढ़ी-पढ़ाई जाती है क्योंकि इस भाषा में संस्कृत के बहुत से शब्द हैं। वहाँ एक विश्वविध्यालय है- शिल्पाकोर्न[शिल्पकार] विश्वविद्यालय जिसमें शिल्प शास्त्र का उच्च अध्ययन होता है; धम्मसात विश्वविद्यालय में धर्म शास्त्र और कसेरसात विश्वविद्यालय में कृषिशास्त्र का अध्ययन एवं अनुसंधान होता है। इन शब्दों से थाई और संस्कृत की निकटता का आभास होता ही है। इसलिए शास्त्रीजी का मानना है कि दक्षिणपूर्व एशिया की भाषाओं का हमें पठन-पाठन करना होगा क्योंकि ये अधिकांश भाषाएँ संस्कृत के बहुत निकट है।

डॉ. सत्यव्रत शास्त्री को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, इटली सरकार का सम्मान, सहित्य अकादमी पुरस्कार, पंजाब और महाराष्ट्र सरकारों द्वारा पुरस्कार तथा विभिन्न संस्कृत अकादमियों के अनेक पुरस्कार शामिल हैं। अब उन्हें सन्‌ २००७ई. के ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है।

भारत में संस्कृत भाषा की उदासीनता का उदाहरण देते हुए डॉ. सत्यव्रत शास्त्री कहते हैं कि वे अब डेक्कन कालेज, पूणे में संस्कृत डिक्शनरी ऑफ़ हिस्टॉरिकल प्रिन्सिपल्स प्राजेक्ट के अध्यक्ष हैं जो भारत सरकार चला रही है। परंतु दयनीय स्थिति यह है कि वहाँ सत्ताईस पदों के स्थान पर केवल चार की ही नियुक्ति हुई है! ऐसे में प्रगति क्या होगी? वे यह मानते हैं कि यह एक उदाहरण है संस्कृत के प्रति उदासीन रवैये का!! इस स्थिति पर साहित्य जगत का ध्यान जाना चाहिए। सम्भव है कि संस्कृत के विस्तृत अध्ययन से भारत की समस्त भाषाएँ और निकट आ सकती हैं क्योंकि सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत ही है।

संदर्भ एवं साभार- ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के जुलाई-अगस्त २००९ में भारतेंदु मिश्र द्वारा लिया गया साक्षात्कार-‘सत्यव्रत शास्त्री से मुलाकात’॥

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

FIRST STEP OF CHRISTIANITY

भारत में ईसाइयत का पहला कदम



भारत के आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के पुत्र जवाँ बख़्श की शादी बडे़ धूमधाम से की गई। उस समय तक अंग्रेज़ी वर्चस्त बढ़ चुका था। बादशाह की आय में कटौती की जा चुकी थी पर मुग़लिया वैभव दिखाने का यही तो मौक़ा था जब एक शहज़ादे की शादी हो रही हो। तब तक ईसाई पादरी जॉन जेन्निंग्स को दिल्ली आए तीन माह हो चुके थे। उसे अहसास होने लगा था कि मुग़लिया सल्तनत किले की चार दीवारों तक ही सीमित रह गई है और मुसलमानों को ईसाइयत की ओर मोड़ने का सही समय आ गया है। उसका मानना था कि जिस सल्तनत ने ब्रिटिश राज को कोहेनूर जैसा हीरा दिया है तो बदले में ‘राज’ को भी ईसाई धर्म जैसा बेशकीमती मोती देना चाहिए!



जेन्निंग्स ईसाइयत फैलाने के लिए सभी जगह प्रचार-प्रसार करने में लग गया। जब वह कुम्भ मेले में गया और वहाँ पर लोगों को इकट्ठा करके ईसाई धर्म के गुण गिनाने लगा तो नागा साधुओं ने उसे वहाँ से भगा दिया।



मुगलिया सल्तनत दम तोड़ रही थी और अंग्रेज़ों के वर्चस्व को देखते हुए जहाँ दिल्ली में जेन्निंग्स सक्रिय था, वहीं कलकत्ते में एडमंड्स भी यही कह रहा था कि बंगाल में अब हिन्दुत्व का पतन हो रहा है और ईसाई धर्म के प्रचार का सही समय आ गया है। उधर पेशावर के कमिश्नर, हेवर्ट एड्वर्ड का भी यही विचार था कि ब्रिटेन को ईश्वर ने यह एक मौका दिया है कि ईसाइयत का प्रचार-प्रसार हो और इसके माध्यम से अंग्रेज़ों का प्रभाव बढे़। फतेहपुर के डिस्ट्रिक्ट जज राबर्ट टक्कर ने पत्थर की शिलाओं पर फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में ‘टेन कमान्डमेंट्स’ तराश कर लगवाए और सप्ताह में तीन दिन हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा कर के बाइबल का पाठ करते रहे।



जेन्निंग्स से पूर्व आए पादरियों ने सौहार्दपूर्वक ईसाइयत फैलाने का कार्य किया था। ईसाई साहित्य के पर्चे बाँटते, जिसे उलेमाओं ने इसलिए नज़रअंदाज़ किया था कि आम आदमी इससे प्रभावित नहीं हो रहा है। जेन्निंग्स का मानना था कि जब तक प्रचार में आक्रमकता नहीं आती तब तक ईसाइयत की पैठ कठिन है। उसका मानना था कि दिल्ली की २६१ मिस्जिदों और २०० मंदिरों को हाथ में ले लेना चाहिए। वह खुल कर इस्लाम और पैग़म्बर पर आक्रमण करने लगा।



ब्रिटिश कानून में फेर-बदल करके कई मंदिरों, मस्जिदों, मदरसों और सूफ़ी दरगाहों की ज़मीन को ब्रिटिश राज के अंतर्गत कर लिया गया। सड़क विस्तारीकरण के नाम पर मंदिरों और मस्जिदों को ढहाया गया। कुछ प्रार्थना घरों को पादरियों के हवाले कर दिया गया ताकि गिरजाघर खोले जा सके। सरकार के इन कदमों से हिंदू और मुसलमान खिन्न हो गए। शायद यहीं पड़ी थी १८५७ के ‘गदर’ की पहली नींव!!!!


[विलियम डालरिम्पल की पुस्तक ‘द लास्ट मुग़ल’ में दिए गए तथ्यों पर आधारित]

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

STOP BLOG-INFIGHING

ब्लाग-घमासान बंद हो



कुछ दिन से हिंदी ब्लाग जगत में हलचल हो रही है। एक नवब्लागर होने के नाते मैं नहीं जानता कि इसका क्या कारण है। जैसा कि कुछ रोज़ पहले संगीताजी बता रही थीं कि ये सितारों की गर्दिश का खेल है:)। कारण जो भी हो, सौहार्द तो बना रहना चाहिए।


अभी डॉ. बाबूलाल ‘वत्स’ कि एक छोटी सी पुस्तिका हाथ लगी तो उसी में से कुछ वाक्य यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। ऋग्वेद का उद्‌घोष है -


सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम्‌।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानानां उपासते॥ [ऋक्‌ १०/१९१/२]

अर्थात हे श्रेष्ठ वीर मनुष्यो! तुम सब संगठित होकर एक साथ मिलकर प्रगति करो, उन्नति की ओर बढ़ो। राग-द्वेष तथा बैर भाव आदि से रहित होकर प्रेमपूर्वक परस्पर संवाद करो। तुम सबके मन पवित्र एवं उत्तम संस्कारों से युक्त हों और पूर्व काल के बडे़-बड़े ज्ञानी लोग अपने-अपने कर्तव्य का विभाग करते आए हैं ठीक उसी प्रकार तुम लोग भी अपने-अपने कर्तव्यों का विभाग उत्तम रीति से करो।


इस संदेश से कहीं भी किसी की भावना आहत होती हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ और ‘छोटा मुँह बड़ी बात’ समझ कर क्षमा करें।

हम जैसी कल्पना करेंगे, वैसा संसार रचेंगे।
लिए हमारी कान्त कल्पना, निमिष बरस, युग, कल्प चलेंगे॥