मंगलवार, 27 सितंबर 2011

हिंदी की दयनीय स्थिति


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास को महात्मा गांधी ने हिंदी के प्रचार के लिए स्थापित किया था जिसे देश की संसद ने AN INSTITUTION OF NATIONAL IMPORTANCE BY ACT 14 OF 1964 का सम्मान दिया है। परंतु इस और इस जैसी कई हिंदी सेवी संस्थाओं के साथ सरकार जो दोयम दर्जे का बर्ताव कर रही है, उस पर क्षोभ प्रकट करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव व प्रसिद्ध भाषा विज्ञान शास्त्री प्रो. दिलीप सिंह ने सभा की हैदराबाद से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के सितम्बर २०११ अंक में जो लेख लिखा है, उसके कुछ मुख्य अंश  दे रहे हैं।  इन विचारोत्तेजक मुद्दों पर हर हिंदी प्रेमी को विचार करना चाहिए। ]

प्रो. दिलीप सिंह, कुल सचिव, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के विचार


ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झाँकते नजर आएँगे। 

समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता।  इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। 

इन संस्थाओं के प्रबुद्ध हिंदी सेवी तथा भारत-भर के हिंदीतर क्षेत्रों में कार्य करने वाले ‘रिसोर्स पर्सन्स’ के सहयोग से ये काम योजनाबद्ध और समयबद्ध ढंग से करके हिंदी भाषा के अद्यतन स्वरूप और पुरोधाओं के योगदान को हिंदी जगत के समक्ष रखा जा सकता है और पिछड़ा, पुराना-धुराना, रूढ़िवादी होने का जो आरोप तथाकथित प्रबुद्धजन हमारी संस्थाओं पर लगाते रहते हैं, उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर आगे के इतिहास में इन संस्थाओं का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया जा सकता है। संदेही मानसिकता वालों को यह लग सकता है कि स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बस का नहीं है कि वे इन कामों को अंजाम दे सकें। पर हम जैसे लोग जो दक्षिण भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित हिंदी संस्था में काम कर रहे हैं, इनकी क्षमता को पहचानते हैं। 

आँखों में खून के आँसू आ जाते हैं इन स्म्स्थाओं की विपन्नता देख कर।  आर्थिक सहायता के नाम पर सरकार कुछ ठीकरे इनके सामने फेंक देती है।  क्या आप विश्वास करेंगे कि जो हिंदी अध्यापक [प्रचारक] गाँव-गाँव में हिंदी शिक्षण की अलख जगाता है उसे एक हज़ार रुपए महावार दिए जाते हैं।  जो कार्यकर्ता रात दिन काम करते हैं, उनका वेतन भी कुछ हज़ार से ज़्यादा नहीं है।  विश्वविद्यालय विभाग[उच्च शिक्षा और शोध संस्थान] के प्राध्यापकों को आठ हज़ार, रीडर को बारह हज़ार और प्रोफ़ेसर को सोलह हज़ार रुपए का अनुदान भारत सरकार प्रदान करती है। [अन्य विश्वविद्यालयों में यह राशि लगभग पचास हज़ार से एक लाख रुपए प्रति माह है!]  इस प्रकार की विपन्नता में भी हिंदी भाषा के लिए विस्तीर्ण कार्य दक्षिण भारत में किया जा रहा है।

 ‘हम हिंदी जैसी दरिद्र भाषा की बेचारी संस्थाएँ हैं’ - यह हीन ग्रंथि हमारे कार्यकर्ताओं को भी ग्रसे हुए है। हिंदी को ‘मातृभाषा-अन्य भाषा’ के घेरे से बाहर खींच कर उसे ‘भारतीय भाषा’ कहने, मानने और बनाने की आवाज उठाने में हम संकोच करने लगे हैं। हमारी रगों में हिंदी है लेकिन हमारी आत्मा हिंदी में नहीं है। हिंदी या मातृभाषाओं को पीछे ढकेलने वाले रथों के चक्र को पीछे ढकेलने की जगह हम बस हाथ उठा-उठा कर चिल्ला रहे हैं कि देखो-देखो वे रथ को चढ़ाए आ रहे हैं - चाहे वह अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का रथ हो, चाहे हिंदी-विरोध का, चाहे प्रशासनिक स्तर पर भारतीय भाषाओं की अवहेलना का या चाहे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को येन केन प्रकारेण झुठलाने और चुनौती देने का। 
हाँ, अब वह भी कह देना चाहिए जिसकी वजह से मेरा मन उद्वेलित हुआ। मैं जानता हूँ कि मेरी लेखन-शैली इतनी आक्रामक पहले कभी नहीं हुई है। पर मजबूर हूँ। बहरों को सुनाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोलना पड़ा। संयम फिर भी बरता गया है। कुछ ही माह पहले हिंदी के एक स्वनामधन्य मठाधीश दक्षिण भारत की किसी हिंदी संस्था में अपने ‘पधारने’ का किस्सा सुनाते हुए मुँह बिचका कर कह रहे थे - ‘कैसी हैं ये संस्थाएँ। न ढंग की बिल्डिंग, न कैंपस। छोटे-छोटे कमरे, स्कूली बरामदे, हुँह।’ फिर मुझसे पूछा ‘क्या आपके यहाँ का भी यही हाल है?’ मेरे जवाब की परवाह किए बिना अपनी ही रौ में कटाक्ष-भाव से शातिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले - ‘चलते समय उस संस्था के अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि आपको कैसा लगा तो मैंने कह दिया कि मुझे तो यही लगा कि ऐसी हिंदी संस्थाओं को आग लगा देनी चाहिए। आज हिंदी कहाँ की कहाँ पहुँच गई है फिर जरूरत क्या है इस प्रचार-फ्रचार की।’   मैंने अब अपनी बात कही संक्षेप में, वही सब जो इस लेख में लिखा है। पर वे तो ठाने हुए थे और हिंदी का भाग्यविधाता होने के अहं में चूर थे। अपनी इस खामखयाली से भी वे पूरी तरह मुतमइन थे कि आज नहीं तो कल ये संस्थाएँ अपनी मौत आप मरेंगी। इन्हें तो खत्म होना ही है। बकने दीजिए उन्हें ....।


हमने बरसों-बरस हिंदीतर भाषी ज़मीन पर हिंदी का पौधा रोपा है। अपनी दीवानगी का खाद-पानी दे कर हमारे पूर्वजों ने इसे सींचा है। क्या इस लहलहा रहे पौधे को हम यों ही सेंत में मुर्झाने देंगे। कदापि नहीं।


12 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक हजार रुपये से कहीं अधिक तो एक माह में मजदूर को मिल जाते हैं।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

हिंदी की वर्तमान दशा का सटीक आकलन....

P.N. Subramanian ने कहा…

बड़ी तकलीफ हो रही है क्योंकि बाल काल से ही मैं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित विद्यालय में ही हिंदी सीखता आया था.

Renu Yadav ने कहा…

नहीं.. हिंदी को पौधा कभी नहीं मुरझाएगा. ये सत्य है कि सरकार दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही है, किन्तु जो विद्वान वहाँ शिक्षा प्रदान कर रहे हैं वे मात्र पैसों के लिए के लिए नहीं बल्कि हिन्दी की सेवा कर रहे है. उनकी सेवा ही इस संस्था को अबतक बचाए रखी है और बचाएगी

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Arvind Mishra ने कहा…

दुखद तो है मगर हिन्दी अब इन सरकारी टुकड़ों की मुहताज नहीं है पूरे भारत में जन जन की भाषा है ....कुछ लोग राजनीतिक कारणों से इसके विरोध में रहते हैं तो कुछ अपनी भाषायी असमर्थता के चलते इससे मुंह मोड़ते हैं...अब संचार -संवाद के साधनों के उत्तरोत्तर बढ़ते जाने से हिन्दी की अहिन्दी भाषी स्थानों पर भी हिन्दी की और रुझान बढ रही है !

ZEAL ने कहा…

समय ज़रूर लग सकता है , लेकिन हिंदी को समुचित मान मिलेगा और विश्वस्तरीय स्थान मिलेगा।

arun hota ने कहा…

jab minister log kai hazar karodon kha jayen tab BECHARI HINDI ke lie bhala kya bachega.

Hindi mein vote maangte vakt inhe sharm tak nahin aati.

Prof. Dillip Singh hi aisa likhne ki samarthya rakhte hain. Bilkul ek shochneey mudda hai.

Arun Hota

दिगम्बर नासवा ने कहा…

हिंदी की वर्तमान दशा के लिए अधिकतर सरकार और उनके बनाए नियम ही हैं ... प्रचार के माँ पर भी अपना वोट बेंक ढूंढते नेता और उनकी बनाई समितियां इससे ज्यादा कुछ नहीं करेंगी ...

डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल ने कहा…

यदि अनुमति हो तो इस टिप्पणी को मैं ज्यों का त्यों नूतनवाग्धारा में छापना चाहूँगा।

सञ्जय झा ने कहा…

Chachha ki chinta chintaniya hai.....

pranam.

Patali-The-Village ने कहा…

हिंदी की वर्तमान दशा का सटीक आकलन|
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं|