रविवार, 25 सितंबर 2011

धरोहर



संविधान के सम्मान हेतु मैं इस विधेयक का विरोध करता हूँ!
 - डॉ. रामकुमार वर्मा

भारत जैसे विराट जनतंत्र के लिए यह वास्तव में आश्चर्य का विषय है कि स्वतंत्र होने के बीस वर्ष बाद भी उसकी राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में वाद-विवाद और संघर्ष हो।

सम्भवतः इसका कारण यह हो कि भाषा, जो राष्ट्र की आत्मा है, उसे अन्य समस्याओं के समक्ष गौण स्थान देकर उसकी मर्यादापूर्ण प्रतिष्ठा को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया और जब राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में प्रश्न उठा, तो उसे राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक दृष्टि से न देख कर राजनैतिक दृष्टि से देखा गया। जिस भांति आज की राजनीति दल-गत संघर्षों में उलझ कर सम्पूर्ण भारत की अखण्डता के सम्बन्ध में प्रश्न-चिह्न लगा रही है, उसी प्रकार भाषा को भी राज्य में बांट कर उसे प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वन्द्विता के क्षेत्र में लाकर दयनीय बना दिया गया है। इसका समाधान यदि खोजा जाता है, तो बडी़ सरलता से अंग्रेज़ी की समृद्धिता और उसकी अन्तरराष्ट्रीय उपयोगिता का हल सामने रख दिया जाता है।

अंग्रेज़ी से हमारा कोई विद्वेष नहीं है, वह संसार की समुन्नत भाषाओं में एक है, किन्तु किसी भी सुन्दरी स्त्री को हम अपनी माता नहीं कह सकते और गति लाने के लिए हम अपने शरीर में घोडॆ के पैर नहीं जोड़ सकते।

हमें आत्म-विश्वास होना चाहिए और जो शक्तियां हमारे व्यक्तित्व और विशाल देश के नागरिक होने की हैसियत से हैं, उनका ही विकास कर परमुखापेक्षी बनने की विवशता में न पडें। संसार की अन्य भाषाओं से हम सहायता तो अवश्य ले सकते हैं, किन्तु हम अपनी असमर्थता में उनके प्रति आत्म समर्पण कर दें, यह किसी प्रकार भी इस प्रगतिशील युग में वांछनीय नहीं है।

कौन कहता है कि हिन्दी साहित्य समृद्ध नहीं है? किसका वह स्वर है कि उच्च शिक्षा के माध्यम के लिए हिन्दी असमर्थ है? आज बीस वर्ष पहले की बात दोहराई जाती है, किन्तु संविधान में हिन्दी को राजभाषा का पद देने के उपरान्त हिन्दी की जो बहुमुखी प्रगति नेपथ्य में होती रही है, उसे सही ढंग से आंकने का प्रयत्न किसने किया है? विज्ञान, वाणिज्य, अर्थशास्त्र एवं कृषि आदि के सम्बन्ध में दर्जनों प्रामाणिक पुस्तकें देखी जा सकती हैं, किन्तु एक वाक्य में यह कह देना कि हिन्दी असमर्थ है, अपनी अज्ञानता की सूचना देना है।

प्रायः यह सुना जाता है कि हमें धीरे-धिरे चलना है और राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में जल्दी नहीं करना है, किन्तु बीस वर्ष बीत जाने के बाद भी धीरे-धीरे चलने का क्या अर्थ हो सकता है?

ऐसा लगता है कि प्रश्न को टालने की कोशिश की जा रही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति हमारा सद्भाव है और उनकी उन्नति तथा विकास के हम समर्थक हैं, किन्तु हिन्दी की भारतीय भाषाओं के समानान्तर रखने से न तो हिन्दी ही बढ सकेगी न अन्य भाषाएं ही। हिन्दी को पूर्ण रूप से अंग्रेज़ी का स्थान लेने के लिए किसी विशिष्ट अवधि की स्वीकृति में भी निश्चित नहीं है? ऐसी स्थिति मे भाषा विधेयक प्रकारान्तर से संविधान का समर्थन नहीं करता और इस प्रकार वह हमारे संविधान के विपरीत है। संविधान की अवज्ञा और उसका अपमान किसी भी स्वतन्त्र देश के नागरिक के लिए मान्य नहीं है, इसलिए संविधान की सम्मान रक्षा हेतु मैं इस राजकीय अलंकरण को सधन्यवाद वापस करता हूं।

[साभार-‘धर्मयुग’ के ७ जनवरी १९६८ अंक में शंकर सुलतानपुरी द्वारा प्रस्तुत वक्तव्य जो आज भी प्रासंगिक है!]

6 टिप्‍पणियां:

डॉ टी एस दराल ने कहा…

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा , राजभाषा और अधिकांश की मात्रभाषा भी है ।
हिंदी के प्रयोग में शर्म नहीं गर्व करना चाहिए ।
ख़ुशी हुई यह जानकर कि प्रधान मंत्री जी ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण दिया ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विचारोत्तेजक।

ऋषभ Rishabha ने कहा…

आदरणीय चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी,
निस्संदेह डॉ. राम कुमार वर्मा जी का यह वक्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण और सर्वथा प्रासंगिक है. सरकारी अलंकरण को त्यागने की ऐसी तेजस्विता के कम होते जाने के कारण भी आज हिंदी दीन-हीन प्रतीत होने लगी है. कभी-कभी तो लगता है मानो अलंकारों और पुरस्कारों के लिए स्वाभिमान से हाथ धोने की होड़ चल रही है इस देश के बुद्धिजीवियों में!

सरकारें अब इस तरह का व्यवहार करने लगी हैं जैसे भाषा उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

गहन विश्लेषण...

Suman ने कहा…

अच्छी प्रस्तुती आभार !

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

आदरणीय चंद्रमौलेश्वर जी 'संविधान के सम्मान हेतु मैं इस विधेयक का विरोध करता हूँ!' - डॉ. रामकुमार वर्मा के इस वक्तव्य से अवगत कराने के लिए धन्यवाद. विचारोत्तेजक वक्तव्य.
भाषा के संबंध में सरकार की नीति टालने की ही दिखाई देती है. अन्यथा आज ६१ वर्ष बाद भी वही स्थिति बनी हुई है. किन्तु हिंदी को वह दर्जा नहीं मिल सका जिसकी वह अधिकारिणी है. शब्दकोशों का निर्माण हो चुका है किन्तु वे केवल अलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं. विभन्न विषयों में हिंदी में पुस्तकें उपलब्ध हैं किन्तु उन्हें पुरस्कार देकर दबा दिया जाता है.
विभिन्न संसाथाओं में हिंदी अधिकारी, अनुवादक, आशुलिपिकों और सहायकों की बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ तो हो रही हैं और विभिन्न संघटनों में कर्मचारियों को हिंदी सिखाई भी जा रही है. किन्तु वह भी एक वर्ष की वेतन वृद्धि तक सीमित है. कर्मचारी, यहाँ मतदान की नीति अपनाते हैं. 'पैसा दे वोट लें'.
अब तो धीरे-धीरे चलने का परिणाम यह होता जा रहा है कि लोगों के मन में यह बात धीरे-धीरे बलवती होती जा रही है कि अब जब अंग्रजी से काम चल रहा है तो हिंदी की क्या आवश्यकता है? और सरकारी नीतियों से ऐसा लगता है कि वह यही चाहती है.
मान लेते हैं कि देश प्रजातांत्रिक है. लेकिन इसकी ओट में देश की जनता को 'भाषाई अफीम' की गोलियाँ खिलाकर सुलाना अन्याय है. किसी एक राज्य को खुश करने के लिए अन्य राज्य के लोगों को भाषाई गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना निर्रथक. निंदनीय है.
लगता है अब समय आ गया है, भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रही लड़ाई जैसी ही लड़ाई 'हिंदी' को उसका अधिकार और लोगों को अपनी भाषाओं के प्रति जागरूक करने के लिए करनी होगी.