सोमवार, 3 अक्तूबर 2011


शायरे-इन्क़िलाब- जोश मलीहाबादी

लोग कहते हैं कि मैं हूँ शायरे-जादूबयाँ
सदरे-माना, दावरे-अलफ़ाज़, अमीरे-शायरी॥
फ़िक्र में कामिल न फ़न्ने-शेर में यक्ता हूँ मैं
कुछ अगर हूँ तो नक़ीबे-शायरे-फ़र्दा हूँ मैं॥

यह इन्केसारी जतानेवाले शायर हैं शबीर हसन खाँ ‘जोश’ जिनका जन्म १८९४ ई. में लखनऊ के ज़िला मलीहाबाद के एक जागीरदार घराने में हुआ था।  शायरी उनकी जनम-घुट्टी में पिलाई गई थी।  उनके परदादा फकीर मोहम्मद ‘गोया’ अपने ज़माने के अच्छे शायर होने के साथ-साथ अमीरुद्दौला की सेना के रिसालेदार भी थे।  उनके दादा मोहम्मद अहमद खाँ ‘अहमद’ और पिता बशीर अहमद खाँ ‘बशीर’ शायरी के शोबे में अपना विशेष स्थान रखते थे।  यही शबीर हसन खाँ ‘जोश’ ने आगे चलकर ‘जोश’ मलीहाबादी के नाम से उर्दू अदब में अपनी जगह बनाई।

‘जोश’ को उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा घर पर ही मिली।  बाद में उन्होंने सीतापुर स्कूल और जुबली स्कूल, लखनऊ में इब्तेदाई शिक्षा तथा सेंट पीटर कालेज व अलीगढ़ में उच्च शिक्षा हासिल की।  

सामन्ती वातावरण में पले-बड़े तो ज़ाहिर है कि घमण्ड, स्वेच्छाचार और अहंभाव स्वभाव में आएगा ही, पर ऐसा नहीं था कि ‘जोश’ में भावुकता नहीं थी।

गुंचे! तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है
बस एक तबस्सुम के लिए खिलता है
गुंचे ने कहा कि ‘इस चमन में बाबा
ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है?’

ऐ दोस्त! दिल में गर्दे-कदूरत न चाहिए
अच्छे तो क्या बुरों से भी नफ़रत न चाहिए
कहता है कौन, फूल से रग़बत न चाहिए
काँटे से भी मगर तुझे वहशत न चाहिए...

काँटे के रग में भी है लहू सब्ज़ाज़ार का
पाला हुआ है वो भी नसीमे-बहार का॥

जोश नौ बरस की उम्र से ही शायरी करने लगे थे पर तेईस-चौबीस वर्ष की आयु तक आते-आते ‘उमर खैयाम’ और ‘हाफ़िज़’ की शायरी का अध्ययन करने के बाद उनकी शायरी परवान चढ़ी।  शायद इसीलिए सुरा और साक़ी के बारे में वे इतना सुंदर लिख पाते थे।

मुस्कुराते हुए यूँ आये वो मैखाने में
रुक गई साँसे छलकते हुए पैमाने में॥

हम दोनों हैं ऐ फ़क़ीर! दीवाने से
मतलब है फ़क़त दिल के बहलाने से
हर शामो-सहर करते हैं ऐयाशी हम
तू ज़र्फ़े-वज़ू से और मैं पैमाने से।

जिस दौर में ‘जोश’ ने जन्म लिया था वह सुरा और अप्सरा से अधिक राजनीतिक उथलपुथल का दौर था और देश की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि कोई भी शायर क्रांति की भावना से अछूता नहीं रह सकता था।

क्या उनको ख़बर थी सीनों से जो खून चुराया करते थे
इक रोज़ इसी खामोशी से टपकेंगी दहकती तक़रीरें ।...
संभलो कि वो ज़िंदां गूँज उठा, झपटो कि वो कैदी छूट गए
उट्ठो कि वो बैठी दीवारें, दौड़ो कि वो टूटी ज़ंजीरें॥

बहादुरो वो ख़म हुई बुलंदियां बढ़े चलो
पए-सलाम झुक चला वो आस्माँ बढ़े चलो
फ़लक के उठ खड़े हुए वो पासबां बढ़े चलो
ये माह है वो मेहर है ये कहकशां बढ़े चलो
लिए हुए ज़मीन को कशां-कशां बढ़े चलो
रवां-दवां बढ़े चलो, रवां-दवां बढ़े चलो

‘जोश’ ने देशवासियों को अपनी शायरी से इस तरह बेदार किया कि उन्हें ‘शायरे इन्क़िलाब’ की उपाधि दी गई।  अंग्रेज़ सम्राट जार्ज पंचम की ताजपोशी पर उन्होंने हिन्दोस्तान की दशा इस तरह बयान की थी-

ताजपोशी का मुबारक दिन है ऐ आलमपनाह
ऐ ग़रीबों के अमीर ऐ मुफ़लिसों के बादशाह!
दिल के दरिया नुत्क़ की वादी में बह सकते नहीं
आप की हैबत से हम कुछ खुलकर कह सकते नहीं।
लेकिन इतना डरते-डरते अर्ज़ करते हैं ज़रूर
हिन्द से वाक़िफ़ किए जाते नहीं शायद हुज़ूर!
आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं
तन पे इक धज्जी नहीं है, पेट को रोटी नहीं।
गर्म है सोज़े-बग़ावत से जवानों का दिमाग़
आंधियाँ आने को है ऐ बादशाही के चिराग़!
तुंद-रौ दरिया के धारे को हटा सकते नहीं
नौजवानों की उमंगों को दबा सकते नहीं।
चौंकिए जल्दी, हवा-ए-तुंदो-गर्म आने को है
ज़र्रा ज़र्रा आग में तब्दील हो जाने को है॥

देश की आज़ादी के लिए सब से ज़रूरी है देश के सभी कौमों की यकजहती और ‘जोश’ को हिन्दोस्तान की विभिन्न कौमों में एकता की कमी का एहसास था।

सिख ने गुरु के नाम को बट्टा लगा दिया
मंदिर को बरहमन के चलन ने गिरा दिया
मस्जिद को शेखजी की करामत ने ढा दिया
मजनूं ने बढ़के पर्दाए-महमिल गिरा दिया
एक सूए-ज़न को ग़ुलग़ुलए-आम कर दिया
मरियम को खुद मसीह ने बदनाम कर दिया ...
ये मुसलमां है, वो हिंदू, ये मसीह, वो यहूद
इसपे ये पाबंदियां हैं और उस पर ये क़यूद
शैख़ो-पण्डित ने भी क्या अहमक बनाया है हमें
छोटे-छोटे तंग ख़ानों में बिठाया है हमें॥
फ़र्ज़ भी कर लूँ कि हिंदू हिंद की रुसवाई है
लेकिन इसका क्या करूँ फिर भी वो मेरा भाई है॥

बाज़ आया मैं तो ऐसे मज़हबी ताउन से
भाइयों का हाथ तर है भाइयों के खून से॥

सब से पहले मर्द बन हिन्दोस्तां के वास्ते
हिंद जाग उठे तो फिर सारे जहां के वास्ते॥
फिर लुत्फ़ की चादर सरों पर तन जायें
फिर ख़ैर से यक-जान-ओ-दो क़ालिब बन जायें...
हम तुम रूठे रहेंगे आखिर कब तक?
क्या उम्र का एतबार, आओ मन जायें॥

‘जोश’जानते थे कि कौमी एकता होगी तो आज़ादी के दरवाज़े खुद-ब-खुद खुल जाएँगे।

शबनम से न गुल धुलें तो मेरा ज़िम्मा
मोती न अगर रुलें तो मेरा ज़िम्मा
इक दर जो हुआ बंद तो आइ ये सदा
सौ दर न अगर खुलें तो मेरा ज़िम्मा॥

‘जोश’ नास्तिक थे ऐसी बात नहीं थी पर उन्हें मुल्लाओं के अंधविश्वास और कट्टरता से चिढ़ थी।  उनके दोहरेपन को वे अपनी शायरी में इस तरह जताते हैं-

नेकी की हमें राह बताते रहिए
अल्लाह से हर आन डराते रहिए
पीनेवालों को कहते रहिए बेदीन
और शौक़ से माले-ग़ैर खाते रहिए॥

जन्नत के मज़ों पे जान देने वालो
गंदे पानी में नाव खेने वालो
हर खैर पे चाहते हो सत्तर हूरें
ऐ अपने ख़ुदा से सूद लेने वालो॥

हर रंग में इब्लीस सज़ा देता है
इन्सान को ब-हर-तौर दग़ा देता है
कर सकते नहीं गुनाह जो अहमक़ उनको
बेरूह नमाज़ों में लगा देता है।

क्या शैख़ की ख़ुश्क ज़िन्दगानी गुज़री
बेचारे की इक शब न सुहानी गुज़री
दोज़ख के तख़य्युल में बुढ़ापा बीता
जन्नत की दुआओं में जवानी गुज़री॥

देश की जंगे-आज़ादी में आम जनता अपनी जान पर खेल गई पर कल तक जो फ़िरंगियों की गुलामी कर रहे थे वही लोग आज़ादी के बाद फिर से राज कर रहे हैं और रिश्वत का बाज़ार गर्म है।

बर्तानिया के खास गुलामाने-खानाज़ाद
देते थे लाठियों से जो हुब्बे-वतन की दाद
एक एक ज़र्ब जिनकी है अब तक सिरों की याद
वो आई.सी.एस. अब भी है खुशबख़्तो-बामुराद
शैतान एक रात में इन्सान बन गए
जितने नमक हराम थे कप्तान बन गए॥
भूल कर भी जो लेता है रिश्वत, चोर है
आज क़ौमी पागलों में रात दिन ये शोर है...
किसको समझाएँ इसे खो दें तो फिर पाएँगे क्या?
हम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खाएँगे क्या?
कैद भी कर दें तो हम को राह पर लाएँगे क्या?
ये जुनूने-इश्क के अंदाज़ छूट जाएँगे क्या?...
मुल्क भर को क़ैद कर दें किस के बस की बात है
खैर से सब हैं, कोई दो-चार-दस की बात है?

जब गांधीजी की हत्या हुई तो उनका कवि हृदय रो उठा था--

जब कि बच्चे ख़्वाब के हंगामे थे गर्मे-ख़रोश
बाप की सिर्फ़ एक ‘हूं’ ने कर दिया सब को खामोश
जब हुए थे आख़री अवतार गांधी जी हलाक
आई थी उस वक़्त क्या कोई सदा-ए-हौलनाक
इतनी चुप सधे हुए है किसलिए अर्शे-बरीं
क्यों हमारा आसमानी बाप ‘हूं’ करता नहीं?

‘जोश’ केंद्रीय प्रकाशन विभाग की मासिक पत्रिका ‘आजकल’ के उर्दू संस्करण का सम्पादन  कर रहे थे।  उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मविभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया था।  भारत में इतना सम्मान मिलने पर भी न जाने ‘जोश’ को कौन सा ऐसा डर खाए जा रहा था कि उन्होंने भारत छोड़ कर पाकिस्तान में रहने का फैसला किया, लेकिन वहाँ पर भी उन्हें सुख-चैन हासिल नहीं हो सका।

आगाही-ए-इल्मो-फ़न नहीं है ऐ दोस्त
अस्तबल है अंजुमन नहीं है ऐ दोस्त
होता है वतन हर इक बशर का लेकिन
मेरा कोई वतन नहीं है ऐ दोस्त॥...

इक उम्र से ज़हर पी रहा हूँ ऐ दोस्त
सीने के शिगाफ़ सी रहा हूँ ऐ दोस्त
गोया सरे-कोहसार तन्हा पौधा
यूँ अपने वतन में जी रहा हूँ ऐ दोस्त॥

‘जोश’ जब अपनी पुरानी यादें ताज़ा करने भारत आए तो यहाँ पर उनका ख़ैरमक़्दम इस जोश से हुआ कि उन्हें अपने बीते हुए सुनहरे पल याद आए।

ये सदाएं बराबर आती है
दिल का दरवाज़ा खटखटाती है...
भूल जाओ कही सुनी बातें
न तो वो दिन है अब न वो रातें॥...

हाँ यही है वो मकाँ, जन्नते-दौरे-कुहन
कल था जिसकी अंजुमन में हुस्ने-सदरे-अंजुमन
चुभ रही है दिल में मिस्ले-नश्तर कम्बख़्त सांस
ये मकाँ है या कोई चुभती हुई सीने की फाँस॥

जब वे वापिस पकिस्तान गए तो ‘जोश’ का दिल टूट चुका था।  उनके अहसासात एक प्रकार थे :-
"बस ले देकर मेरा एक ही जुर्म है कि उसे मुआफ़ नहीं किया जा सकता।  काश! मैं साहिबे-अहलो-अयाल [बाल-बच्चे वाला] न होता।  मुझ नामुराद को क्या मालूम था कि ये मेरे सर पर सेहरा नहीं बाँधा जा रहा है, मेरी शख़्सियत की कब्र पर चादर चढ़ाई जा रही है।"  वे एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह पुकार उठे-

देता नहीं बोस्तां भी सहारा मुझको
करती नहीं बुलबुल भी इशारा मुझको
मुरझाए हुए फूल ने हसरत से कहा
अब तोड़ के फेंक दो ख़ुदारा मुझको॥

सर घूम रहा है नाव खेते खेते
अपने को फ़रेबे-ऐश देते देते
उफ़ जहदे-हयात! थक गया हूँ माबूद
दम टूट चुका है साँस लेते लेते॥

आखिरकार ‘जोश’ ने कराची में यह बयान दिया कि वे तन्हाई की ज़िंदगी बसर करना चाहते हैं।

मसर्रत की ताने उड़ाता गुज़र जा
तरब के तराने सुनाता गुज़र जा
बशाशत के दरिया बहाता गुज़र जा
ज़माने से गाता बजाता गुज़र जा
गुज़र जा ज़मीं को नचाता गुज़र जा॥


11 टिप्‍पणियां:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

जोश मलीहाबादी को पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार...

Arvind Mishra ने कहा…

जोश की सबसे बड़ी गलती थी वे पाकिस्तान जा बसे और इस भूल पर पश्चाताप करते रहे ....
इस लेख को मैंने फेसबुक पर डाला है

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

'जोश' की सबसे बड़ी गलती थी वे पाकिस्तान जा बसे और इस भूल पर पश्चाताप करते रहे ....

एक जोश मलीहाबादी ही क्या जो भी विचारशील आदमी था वही पछताया पाकिस्तान जाकर लेकिन यह भी विचारणीय है कि तंग आकर आत्महत्याएं यहां भी कर रहे हैं लोग।
सुख शांति का सपना अगर पाकिस्तान में पूरा न हुआ तो उसे भारत में भी साकार न किया जा सका।
हालात का पाकिस्तान से अपेक्षाकृत बेहतर होना संतोष की बात है लेकिन यह लक्ष्य की प्राप्ति नहीं है।

आपके लेख उपयोगी और सकारात्मक हैं।
आभार !!!

http://commentsgarden.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नाम तो सुन रखा था, पढ़वाने का सौभाग्य आपने दे दिया।

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

हाँ ..मर कर भी चैन न आये तो कहाँ जायेंगे...सुन्दर पोस्ट.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जोश को पूरे जोश के साथ पढवाने का शुक्रिया .

Sunil Kumar ने कहा…

सर जी, जोश साहेब का संबंध हैदराबाद से भी था अपनी अगली पोस्ट में उसका भी जिक्र कीजिये बहुत अच्छा लगा पढ़ कर आपका यह आलेख धन्यवाद ....

Suman ने कहा…

बहुत सुंदर पोस्ट भाई जी,
आभार आपका !

ऋषभ Rishabha ने कहा…

लेख तो आपका यह पहले भी पढ़ा था, जब अखबार में छपा था काफी अरसे पहले. पर इन दिनों आप हास्य-व्यंग्य काफी लिख रहे हैं न, इसलिए जोश छूट गया और मलीहाबादी के नाम से मलीहाबाद के विख्यात दशहरी आमों की याद आ गई! ....खैर, जाने दीजिए.
फिर कभी सही.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

एक महान शायर के बारे में जाना उन्हें पढ़ा ...आभार आपका

Amrita Tanmay ने कहा…

उम्दा पोस्ट.