शनिवार, 18 जून 2011

.....चारी?.


आपत्तिकाल परखिए चारी...


हमारे देश के सबसे वरिष्ठ हिंदी कवि गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था- आपत्तिकाल परखिए चारी... तो हमें समझ में नहीं आया कि वे किस चारी की बात कर रहे हैं! वैसे, देश में कई चारी रहते हैं जैसे ब्रह्मचारी, शिष्टाचारी, व्यभिचारी,  भ्रष्टाचारी आदि।  अब यदि हम इन्हें आपत्ति  की कसौटी पर परखना चाहें तो कौन कितना सहायक होगा, यह तो गोस्वामी जी ने इसलिए नहीं बताया कि वे भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाये।  आधुनिक समय में प्रसिद्ध टीवी चैनल ‘टाइम्स नाउ’ के अरनब गोस्वामी भी शायद इसी प्रयास में हर रात टीवी पर यही प्रयास कर रहे हैं कि कौन सा चारी देश के आपातकाल से लेकर आज तक प्रमुख भूमिका में रहा है। अरनब गोस्वामी के विश्लेषण प्रयास को ताक पर रख कर हम अपनी तईं देखें कि कौन सा चारी असली आपत्तिकाल निवारक होता है।

शिष्टाचारी हमेशा अपने शिष्टाचार का आचरण करता है।  जब सड़क पर कोई दो लोग लड़ रहे हॊं और अपना गुस्सा एक-दूसरे पर निकालने के लिए गाली-गलौज़ का प्रयोग ठीक उसी तरह कर रहे हों जैसे गली के दो कुत्ते आपस में एक दूसरे पर गुर्राते हैं, तो शिष्टाचारी शिष्टाचारवश वहाँ से कन्नीकाट कर निकल जाता है। उस आपात स्थिति से उलझना उसे शिष्टाचार के विरुद्ध लगता है।  इसका अर्थ तो यही हुआ कि शिष्टाचारी आपत्ति काल में काम आनेवाला नहीं है।

फ़िल्मी दुनिया में अक्सर अफ़ेयर की बातें होती हैं और जैसा कि जॉन इब्राहिम की लम्बे काल से चल रही प्रेमिका बिपाशा बसु कहती हैं कि समाचार में रहने का यह भी एक तरीका है कि हम अपने प्रेमियों के बारे में बातें करते रहें, प्रेमी बदलते रहें और हमारे समाचार लोग चटखारे लेकर पढ़ते रहें।  यदि ऐसे माहौल में कोई ब्रह्मचारी आ जाय तो वो किस काम का रहेगा।  वहाँ तो सलमान खान जैसे ही समाचारों में रहेंगे और ताज़ा समाचार मिलने तक अपनी लेटेस्ट प्रेमिका के साथ  ब्रेकिंग न्यूज़ बनाते दिखाई देंगे।

आज दिल्ली की सड़कें महिलाओं के लिए एक समस्या बन गई है।  गुज़रे ज़माने में दिल्ली की गलियां भी प्रसिद्ध हुआ करती थीं जहाँ महिलाएँ बेधडक अपनी ज़रूरत के सामान लिया करते थे पर आज गली तो गली, सड़कों पर भी आपत्ति छाई हुई हैं इन महिलाओं के लिए।  यहाँ हर तरह के व्याभिचारी हर भेस में पाये जाएँगे।  कहीं धनपति के पुत्र के रूप में, कभी पुलिस के रूप में तो कभी किसी बडे नेता या अधिकारी की संतान के रूप में। ये व्यभिचारी सभी पर भारी पड़ रहे हैं। पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकती, महिलाएं अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं और व्याभिचारी खुले आम मर्यादा का उल्लंघन करते जा रहे हैं।  ये लोग तो आपत्ति ला रहे हैं तो उन्हें आपत्ति काल में परखने का प्रश्न ही कहाँ उठता है।

भ्रष्टाचारी सब से बदनाम व्यक्ति होता है।  उसका मानना है कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।’  राजा रहकर भी कभी उसे रंक की तरह जेल की हवा खाना पड़ता है पर रहता तो है वह सुरखियों में! अब रही बात उसकी आपत्ति में परखने की तो यह कहा जा सकता है कि वह बहुत हेल्पफ़ुल होता है।  वह दूसरों की मदद करता है और उनका आर्थिक स्तर बढाने में मदद करता है।  यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब उसकी पोल खुलती है तो उसके साथी ठीक उसी तरह साथ छोड़ देते हैं जैसे नाविक डूबती नैय्या को।  फिर भी, यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचारी आपत्ति काल में सब से अच्छा मददगार होता है।  उसका कर्मवाक्य होता है- माले मुफ़त, दिले-बेरहम।  वह बेरहम नहीं होता बल्कि माल से उसका मोह नहीं होता। इसलिए वह माल बाँटने में संकोच भी नहीं करता।  

आपत्तिकाल  में चारी को परखने का सिलसिला गोस्वामी तुलसीदास के काल से लेकर अरनब गोस्वामी तक के आधुनिक कल तक चला आ रहा है। फिर भी, ‘आज तक’ जैसा सबसे तेज़ चैनल भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाया है।

  

20 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहसें राजनैतिक मार्ग चुन लें तो निष्कर्ष भी रूठकर चला जाता है।

ajit gupta ने कहा…

यह सत्‍य है कि शिष्‍ट व्‍यक्ति किसी के झगड़े में नहीं पड़ता। इसी कारण वह शिष्‍ट बना रहता है।

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

चारी को परखने का सिलसिला जारी है,आपत काल में परख हो ही जाती है।

डा० अमर कुमार ने कहा…

.बहुत ही अच्छा आलेख... ढील देकर क्या खूब लपेटा है ।
लेकिन महाराज, यह तो बताया ही नहीं कि आपतिकाल में ब्रह्मचारी किस करवट बैठता है ... कहीं वैसे तो नहीं जैसे विश्वामित्र मेनकाचारी हो गये थे ।

Arvind Mishra ने कहा…

बढियां जी ..
धीरज धरम मित्र अरु नारी के बाद की दुनिया भी दिखा दी आपने ..
नजरें बड़ी समकालीन है -रहने दो सागरों मीना हमारे सामने ...:)
मगर ई बतायें गाली गलौच है या गलौज ?

Arvind Mishra ने कहा…

धन्यभाग आपने तो कम से कम नुमायन्दगी कर दी ---नपुंसकों की :) (आप नहीं .आप तो खड़े पाए गए -उत्थित! )

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

धन्यवाद भाई अरविंद मिश्र जी, वर्तनी की चूक बताने के लिए... संशोधित कर दिया है :)

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

डॉ. अमर कुमार जी, विश्वमित्र तो मेनकाचारी हो गए तो ब्रह्मचारी कहाँ रहे :)

Suman ने कहा…

बहुत बढ़िया आलेख बधाई !

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर विश्लेषण।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

प्रेरक सटीक विचारणीय आलेख.... जो सच का खुलासा कर रहा है .... आभार

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

A beautiful creation in all respects; for reading, laughing, thinking and considering.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यह चारी काफी विवेक चारी लगा ...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत सुन्दर आलेख ।
सभी चारियों की अपनी मजबूरियां हैं , विशेषकर शिष्टाचारी की ।
लेकिन भ्रष्टाचारी और व्यभिचारी की मजबूरी दूसरों के लिए घातक सिद्ध होती है ।

Kajal Kumar ने कहा…

अच्छा भिगो भिगो कर दिया है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वह आपने तो चारों चारी के चरित्र को चीर फाँक के रख दिया ... वैसे अंत में भ्रष्टाचारी सबसे उत्तम है ... लाजवाब व्यंग है ...

Neelam ने कहा…

यह सत्‍य है कि शिष्‍ट व्‍यक्ति किसी के झगड़े में नहीं पड़ता। इसी कारण वह शिष्‍ट बना रहता है।
बहुत बढ़िया आलेख बधाई !

Neelam ने कहा…

http://neelamkashaas.blogspot.com
waqt mile to thodi housla afzaai chaahungi aapse.

Sunil Kumar ने कहा…

चारियों के बारे में ज्ञान बढ़ाने के लिए आभार व्यंग्य की तलवार का इससे अच्छा प्रयोग मुश्किल ही है |

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

ज़बरदस्त व्यंग .....समय और परिस्थितियाँ सबकी पहचान करवा देती हैं....