सोमवार, 20 जून 2011

लड़कियां दस्तक देती हैं



‘नीलकंठ’ की कृति ‘लड़कियाँ दस्तक देती हैं’

मार्ग दो इन्हें, हटो
इन्हें न रोक पाओगे
स्फीत नदी धारा-सी
आ रही हैं लड़कियाँ।

यह आह्वान देनेवाले कवि हैं किशोरी लाल व्यास ‘नीलकंठ’ जिन्होंने अपना नवीनतम काव्य संग्रह ‘लड़कियाँ दस्तक दे रही हैं’ अपनी पुत्रियों को समर्पित किया है।  कवि ने अपनी उन तमाम कविताओं को संग्रहित करके इस पुस्तक में संकलित किया है जो उन्होंने समय-समय पर इस विषय पर लिखा है।  उन्होंने सभी लड़कियों को अपनी पुत्रियों के रूप में देखा है, भले ही वह बंद कमरे में जीवन बिता रही हों या स्वच्छंद आकाश में उड़ रही हों।

बैठी रहोगी  
तो रेशम के कीड़े-सी
बंद हो जाओगी
अपने ही कोकून में।
****

उसे तुम्हारी सुरक्षा की बैसाखियां
नहीं चाहिए
तुम्हारी वह वृक्ष-सी छाया
छतरी सी माया....

एक सम्प्रदाय ऐसा भी है जो लड़कियों को आज भी पर्दे में रखना चाहता है।  कवि ने उस मिस्लिम समाज की लड़कियों से पूछते हैं-

जिन बुर्कों ने, परदों ने
तुम्हारी अस्मिता का उन्मुक्त आकाश
छीन लिया है तुमसे
उन्हीं को तुम पूजने लगी हो?

परंतु उनकी भी अपनी मजबूरियां हैं जिन्हें कवि ने इस तरह उजागर किया है-

एसिड की बोतलें
लिए घूमते हैं,
ढूँढते फिरते हैं वे चेहरे
जो फूल से खिले हैं
पर बुर्कों से नहीं ढके हैं।

ऐसे में बड़ी होती लड़कियों के माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक भी है।
असुरक्षित होते जा रहे हैं
माँ-बात के
नींद रहित आँखों के
चुभते हुए सपने होती हुई लड़कियाँ।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लड़की किसी कमज़ोर क्षण में कुछ गलती कर बैठती है।  आजकल ऑनर-किलिंग के नाम पर लड़कियों को मार दिया जा रहा है।  कवि ‘नीलकंठ’ ने इस विषय को ध्यान में रखकर कहा है कि-

किन्हीं कमज़ोर क्षणों में
पिंजरे की मैना
खुले पिंजरे के द्वार से
यकायक उड़ गई....
इतने कठोर मत बनो
एक गलती की कीमत
ज़िंदगी तो नहीं हो सकती।

कवि ने लड़कियों को विभिन्न प्रतीकों के माधयम से अपनी कविताओं को संवारा है।  गेहूँ की बालियाँ, कुकुरमुत्ता, कुम्हार की माटी, पंखहीन, रोटी सी बढ़ती-सिंकती, लकड़ियां, बोन्साई जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग इन कविताओं में मिलेगा।  जहाँ लडकियों को इन प्रतीकों के माध्यम से सम्बोधित किया गया है, वहीं उनके बंधन को भी खूँटे की रस्सी, बेड़ियाँ, पट्टी बंधी, पिंजरे की मैना आदि प्रतीकों से उनकी मजबूरी को उजागर किया है।  इन जजीरों और बेड़ियों को काट कर आगे बढ़ने का आह्वान करते हुए कवि कहते हैं-
देखो-  

व्यवधानों के विंध्याचल
पार करो
साहस से, विवेक से, धैर्य से
डिगने न पाए
विश्वास के चरण युगल

डॉ.किशोरी लाल व्यास ‘नीलकंठ’ मुख्यतः पर्यावरण व प्रकृति के कवि हैं।  इस कविता-संग्रह में भी उन्होंने लड़कियों के बहाने प्रकृति और पर्यावरण जैसे विषयों को छुआ है।

पेड़ है, फूल है, सुगंध है
पंछियों के मधुर गीत हैं
मौसम के बदलते रंग हैं...
उठो बेटी, उठो
खोल दो बंद दरवाज़े।

लड़की कही बंद दरवाज़े के पीछे गिरफ़्तार है तो कहीं गरीब है पर उन्मुक्त भी है-

छोटे-छोटे 
नंगे पैरों से
लम्बी-लम्बी दूरियाँ नापती
स्कूल जाती, स्कूल से लौटती
बंजारों की गायों-सी लड़कियाँ।

कवि ‘नीलकंठ’ ने इस स्त्री-विमर्श में स्त्री के केवल लड़कपन को केंद्र में रखा है।  लड़की का जीवनकाल ऐसा दौर होता है जिससे हर स्त्री किसी न किसी अनुभव व अनुभूति से गुज़र चुकी होती है, जिसका वर्णन इस कविता-संग्रह में मौजूद है।  इतने व्यापक ढंग से लड़की के जीवन के हर पहलू पर कवि ने गम्भीरता से प्रकाश डाला है।  मन को छूनेवाली इन कविताओं के बारे में कवि खुद कहते हैं- "मेरी यह कविताएँ हृदय के गहन संलग्नता की उद्गार हैं।  इसमें अभिव्यक्ति कौशल और कलात्मकता ढूँढ़नेवाले हिंदी आलोचकों को निराशा ही हाथ लगेगी।"  वे युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करते हुए कहते हैं-

न हार, न पलायन
सतत आगे बढ़ो
मेरी बच्चियो
नया युग तुम्हें बुलाता है॥

पुस्तक परिचय

पुस्तक  का नाम : लड़कियाँ दस्तक देती हैं
कवि : किशोरी लाल व्यास ‘नीलकंठ’
प्रथम संस्करण : २०११ ई.
मूल्य: २०० रुपये
प्रकाशक: डॉ. किशोरी लाल व्यास
एफ़-१, रत्ना रेसिडेंसी
               हब्शीगुड़ा, हैदराबाद- ५०० ००७   


11 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

good post and very true poems

ऋषभ Rishabha ने कहा…

''बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं

ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं

बेटियाँ-
पावन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं

हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की

बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं''
[ डॉ० कुअँर बेचैन ]

Suman ने कहा…

पुस्तक परिचय के साथ बहुत सुंदर
समीक्षा की है ! बधाई !

Sunil Kumar ने कहा…

लड़कियों पर लिखी गयी रचनाएँ आज के परिवेश में सार्थक है | किशोरी लाल जी को बधाई और आपका आभार .....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच में नया युग बच्चियों को बुलाता है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जिन बुर्कों ने, परदों ने
तुम्हारी अस्मिता का उन्मुक्त आकाश
छीन लिया है तुमसे
उन्हीं को तुम पूजने लगी हो?

सच्ची और अच्छी अभिव्यक्ति लिए कवितायेँ...... सुंदर पुस्तक परिचय आभार ..

Patali-The-Village ने कहा…

सुंदर पुस्तक परिचय आभार|

विशाल ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रचनाएँ.
आप के चयन का जवाब नहीं.

Arvind Mishra ने कहा…

यशस्वी कृति !

ZEAL ने कहा…

एसिड की बोतलें
लिए घूमते हैं,
ढूँढते फिरते हैं वे चेहरे
जो फूल से खिले हैं
पर बुर्कों से नहीं ढके हैं।..

Beautiful satire ...

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Amrita Tanmay ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद पुस्तक-शमिक्षा पढवाने के लिए.जड़-विहीन पौधों को ज्यादा देखभाल की जरुरत होती है.