सोमवार, 22 नवंबर 2010

बुढ़ापा : ‘ओल्ड एज’ - सिमोन द बउवा [७] `Old age' - simone de Beauvoir


बुढ़ापा : ‘ओल्ड एज’ - सिमोन द बउवा [7]


Old age - Simone de Beauvoir - बुढ़ापा [7] - सिमोन द बउवा 

बुढ़ापा - समय, क्रियाशीलता, इतिहास

एक पुरानी कहावत है कि मनुष्य नहीं समय बलवान होता है। समय के साथ मनुष्य के सम्बंध, सोच और सक्रियता- सभी में बदलाव आता है। बचपन के सम्बंध किशोरावस्था में छूट जाते हैं और साथी बदल जाते हैं।  समय के साथ साथी बिछुड जाते हैं - कोई स्वास्थ्य   के कारण तो कोई काल के गाल में समाने के कारण।  कारण चाहे जो भी हो, समय के साथ सक्रियता शिथिल पड़ जाती है और यह शिथिलता अंततः इतिहास में बदल जाती है।  इन बदलावों पर प्रकाश डालते हुए सिमोन द बुउवा अपनी पुस्तक ‘ओल्ड एज’ में बताती हैं -

"जैसे-जैसे समय बीतता है, हमारा अतीत लम्बा होता जाता है और भविष्य छोटा।  सार्त्र  ने कहा था कि अतीत ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम हाथ में पकड़ कर रख सकें और घुमा-फिरा कर इसको चारों ओर से देख सकें।  जीवन में कुछ फेर-बदल करना है तो उसे अतीत में नहीं, वर्तमान में करना होता है अपने अतीत को याद रखते हुए।  अतीत हमें केवल दर्पण दिखाता है कि हम क्या थे।  तभी तो अरस्तु ने वृद्धों के बारे में कहा था- वे  उम्मीद से अधिक यादों के सहारे जीते हैं।

"मॉरियाक ने अपने बचपन का स्मरण  करते हुए कहा था- ‘यद्यपि कोई बूढ़ा बचपना नहीं करता परंतु वह गोपनीय तौर पर बचपन में लौटना चाहता है और अपने सम्बोधन में माँ का प्रयोग करने लगता है। बूढ़े अक्सर समय को नकारते हैं और यह समझते हैं कि वे अभी जवान हैं।  ऐसी सोच कई वृद्धों में देखी गई है- चाहे वह  प्यारी नानी हो या अवकाशप्राप्त नाना या कोई वृद्ध रचनाकार।  सभी यह भ्रम पाले रहते हैं कि वे अभी युवा हैं और उन्होंने आयु को मात दे दी है।"

स्वास्थ्य  और स्मरणशक्ति की भी एक सीमा होती है। प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति अपने अतीत को कहाँ तक याद रख सकता है और समय-समय पर उसका कितना स्मरण करता है?  ऐसे ही कुछ प्रश्नों पर विचार व्यक्त करते हुए सिमोन कहती हैं-  

"हमारे मस्तिष्क में कुछ चित्र और कुछ यादें रह जाती हैं परंतु ये यादें टुकड़ों-टुकड़ों में बसी रहती हैं। इन्हें एक सूत्र में बांधना उसी समय सम्भव होता है जब ये लिखित रूप में सुरक्षित हों - जैसे किसी डायरी में।  जब मैं सार्त्र  या अपनी बहन से बात करती हूँ तो लगता है कि पिछली कुछ ऐसी बातें थीं जो मुझे याद नहीं रहीं।  ऐसी विस्मरणशीलता के कुछ कारण होते हैं जैसे जराग्रस्त स्मृति और सेरेब्रेल आर्थोस्क्लेरोसिस जो वृद्धावस्था की बीमारियां हैं।  इसलिए जब हम अपने अतीत की घटनाओं  का स्मरण करते हैं तो पूरा चित्र नहीं देख पाते, उसकी परछाईं मात्र दिखाई देती है; जिसे सार्त्र के शब्दों में ‘एक प्रकार का आवश्यक अभाव’ कहा जा सकता है। अतीत का चित्र जो हमें याद आता है वह व्यापक भले ही हो पर उसमें समय और स्थान का अभाव रहता है।  जब मैं अपने संस्मरण लिखने की सोच रही थी तो मैंने महसूस किया कि जो चित्र मस्तिष्क में उभर रहे हैं, वे टुकड़ों-टुकड़ों में थे, इसलिए मैंने संस्मरण लिखने का ख्याल त्याग दिया।"

भूली-बिसरी यादें जो मन-मस्तिष्क में रह जाती हैं, किसी भी समय व्यक्ति दोहरा लेता है परंतु कई ऐसी घटनाएं जीवन में होती हैं जिनको मस्तिष्क याद नहीं रखता। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वे मानस पटल से मिट जाती हैं और ऐसा लगता है जैसे वे घटी ही न हों।  तभी तो मॉरियाक ने कहा था- ‘वृद्ध व्यक्ति के संस्मरण उन चींटियों की तरह हैं जिनकी बाम्बी टूट गई है और इन चींटियों पर लम्बे समय तक दृष्टि टिकाई नहीं जा सकती।’ सिमोन ने कई साहित्यकारों के कथन उद्धृत करते हुए निष्कर्ष निकाले हैं-    

"जैसे-जैसे वर्ष बीतते जाते हैं हमें अपना वर्तमान ही सच लगता है, अतीत तो सच था ही; पर उसकी यादों की  आज के वातावरण में कल्पना लगते हैं। उस जीवन की ताज़गी, नयापन और प्रफुल्लता -सभी अतीत की कोख में समा गए, रह गई केवल परछाईं।  जीवन का सारा अतीत भी वृद्ध के साथ नहीं रहता, बस कुछ यादें रह जाती हैं।  हम वर्तमान में  जीते हैं जिसमें सुनहरे भविष्य की आशा है और अतीत का कंकाल पीछे छूट गया है। वर्तमान- जब स्थान समय का स्थान ले लेता है, वही स्थान जो समय के साथ बदल जाता है।  उसी शहर की गलियां आज बदली हुई दिखाई देती हैं, समय के साथ उसी स्थान का कितना परिवर्तन हो जाता है।  इस प्रकार, अतीत का भविष्य जो आज वर्तमान है, कितना भिन्न होता है उस अतीत से और यही स्थान भविष्य में और बदलाव लाएगा।  

"आपसी सम्बंधों में भी बदलाव देखे जा सकते हैं। कल के मित्र समय के साथ आज अजनबी हो जाते हैं या परिस्थितियों के कारण दूर हो जाते  हैं या शत्रु बन जाते हैं।  किसी प्रिय की मृत्यु से अचानक अतीत छूट जाता है।  हम आयु में जितना आगे बढ़ते जाएंगे, उतने ही हमारे प्रियजन हमसे छूटते-बिछुड़ते जाएँगे।  तभी तो, छॉटोब्रैंड ने कहा था- ‘मेरा लम्बा जीवन रोम की उस सड़क की तरह है जहाँ मृत व्यक्तियों की प्रतिमाएँ खड़ी दिखाई देती हैं।’  जब हमारा कोई साथी मरता है तो हमारे बचपन की वे  सारी यादें भी गुम हो जाती हैं जो उसके साथ सम्बंधित थीं।  उन वृद्धों की तो और दयनीय स्थिति होती है जिनके प्रिय युवावस्था में मृत्यु के कारण बिछुड़ जाते हैं।  जिसके पुत्र का निधन हो जाता है, उसका जीवन ही खण्डहर बन जाता है, जब उसकी सारी आशाएँ और अभिलाषाएँ  मटियामेट हो जाती हैं। हमउम्र मित्र की मृत्यु का आघात कदाचित उतना तीव्र  नहीं होता।

"जीवन में कभी ऐसा भी समय आता है जब अनायास ही हमें अपने पूर्वज याद आ जाते हैं।  जब नगरवासियों ने एण्डरसन का स्वागत समारोह मनाया तो उनकी आँखें छलक पड़ीं और मुख से अनायास ही निकला- ‘कितने प्रसन्न होते यदि मेरे माता-पिता इस सम्मान को देखते!’  अपने अतीत में झाँक कर व्यक्ति को गर्व का अहसास उस समय होता है जब उसे अपना वर्तमान और भविष्य उतना उज्जवल नहीं दिखाई देता।  ऐसे में वह अपने अतीत को याद करते हुए भविष्य को बचाने का प्रयास करता है।  ५ अप्रैल १७२९ को स्विफ़्ट ने एक पत्र में लिखा था- ‘मुझे बहुत  दुख होता है जब मैं आज से बीस वर्ष पूर्व के जीवन और आज को देखता हूँ।  जब मैं सुबह उठता हूँ तो पहले की तरह जीवन में कोई सार दिखाई नहीं देता; रोज़ का वही जीवन; जो कल था वही आज!"

इस उदासी का कारण खोजना उतना दुष्कर नहीं है। व्यक्ति वही बनता है जो उसे उसका बचपन देता है। बचपन के जीवन का प्रभाव उसके जीवन के अंत तक उसका साथ नहीं छोड़ता। चरित्र का निर्माण भी बाल्यकाल से होता है। व्यक्ति की सोच और मानसिकता भी बचपन से ही विकसित होने लगती है। इसलिए किसी भी व्यक्ति का बचपन उसके भविष्य की नींव कहा जाता है। व्यक्ति के जीवन और उसके बचपन के प्रभाव पर चिंतन करते हुए सिमोन बताती हैं -

"यह बचपन ही है जो वृद्ध का पीछा नहीं छोड़ता। बचपन की छाप इतनी गहरी होती है कि वह जीवन के अंत तक साथ रहती है। इस बात को फ़ॉयड और मोन्टेन ने अपने तर्कों से प्रमाणित भी किया है। युवावस्था में व्यक्ति को इतना समय नहीं होता कि वह अपने बचपन की इस छाप के बारे में सोचे पर जैसा कि नोडियर ने कहा- ‘प्रकृति की यह सबसे बड़ी कृपा है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति अपने बचपन की स्मृति में आसानी से लौट सकता है।’

"१० मई १९०६ को अपनी डायरी में ७८वर्षीय टॉल्सटाय ने लिखा था- ‘सारा दिन उदासी में बीत जाता है। शाम ढलते मन में एक हूक उठती है कि कोई मुझे सहलाए, प्यार करे, वही स्नेह दे जो मुझे बचपन में माँ की गोद में मिला और मैं उसकी बाँह से चिपक कर रोऊँ उसी तरह जैसे बचपन में रोता था...माँ ... उठा लो मुझे...! जानता हूँ कि यह सब दीवानगी है लेकिन यह सच भी है।’ वे अपनी माँ को याद करते हैं जो उन्हें दो वर्ष की आयु में छोड़कर  ईश्वर को प्यारी हो गई थी।

"एण्डरसन भी वृद्धावस्था में अपने बचपन के मित्रों को याद किया करते थे।  नींद से उठकर उन छोटी-छोटी घटनाओं को अपनी डायरी में उतारते थे जो उनके बचपन से जुड़ी हुई थी।  दोस्तों से लड़ना, बिछड़ना ... मानो वे बचपन को फिर से जी रहे हों। एक स्वप्न में उन्होंने अपने मित्र मीस्लिंग से बात की जो सदा उनका मखौल उड़ाया करता और लड़ता रहता था। उस स्वप्न में उनकी सौहार्दपूर्ण बातचीत के बाद उन्होंने डायरी में लिखा- 'अब और नहीं ठहर सकता, मैं इस सूखे पत्ते से जीवन से छुटकारा पाना चाहता हूँ।’ और कुछ ही समय बाद उनका देहांत हो गया।"

ऐसे कई उदाहरण देकर सिमोन ने यह स्थापित किया कि वृद्धावस्था में व्यक्ति फिर बचपन में लौट आता है।  उनका मानना है कि इसका कारण यह है कि व्यक्ति की मानसिकता पर बचपन सदा हावी रहता है परंतु युवावस्था की व्यस्तता  के कारण वह उस पर ध्यान नहीं देता और वृद्धावस्था में बचपन की यादें पुनः लौट आती हैं। वे बताती हैं-

"अतीत ही मेरी वर्तमान स्थिति का कारण है और वर्तमान ही मेरे भविष्य का कारण बनेगा - अच्छा या बुरा!  गॉर्ज़ का मानना है कि जब व्यक्ति बचपन को छोड़ता है और किशोरावस्था में पदार्पण करता है तबसे उसके जीवन में जो परिवर्तन आता है वह एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण करता है। तब से वृद्धावस्था तक एक लम्बा जीवन उसके पीछे अतीत के रूप में रहता है और वह इस अतीत का बंधक बन जाता है। वह जानता है कि अब उसके भविष्य में गिने-चुने वर्ष बचे हैं। लगता है कि समय की रेत तेज़ी से फिसलती जा रही हैं। बचपन में एक घंटा भी लम्बा समय लगता था और युवावस्था में जैसे समय उड़ रहा है।"

समय के इस अंतर का एक अच्छा उदाहरण यह है कि विद्यार्थी कक्षा का एक सत्र भी बेचैनी से काटता है जबकि युवावस्था में दिन और महीने ऐसे उड़ जाते हैं कि पता ही नहीं चलता; जैसे वर्ष अभी प्रारम्भ हुआ नहीं कि वर्षांत इतनी जल्दी आ गया! सिमोन ने इस विषय पर कुछ विद्वानों को उद्धृत किया है-

"शॉपेनहावर कहते हैं- ‘बचपन में दिन इतना लम्बा लगता है कि बिताए नहीं बीतता, एक घंटे का पाठ भी थकान दे जाता है।  यही अनुभूति सफर के समय होती है जब एक महीने का सफ़र इतना लम्बा लगता है जो घर में चार माह के समान हो।’ इस बारे में आचारशास्त्री जॉर्ज कॉन्डामिनास बतलाते हैं- ‘हमें यह समझना चाहिए कि घर में बिताए दिन की तुलना में यात्रा में बिताए दिन का स्मरण हमारे मस्तिष्क के एक बड़े भाग को घेर लेता है।’  अयोनेस्को अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं कि ‘प्राइमरी स्कूल के दिनों में पंद्रह मिनट का समय भी इतना लम्बा होता कि हम खेल भी लेते और दूसरे खेल के लिए कुछ समय भी बचा रहता।’

"जब बचपन छूट जाता है और हम बढ़ने लगते हैं तो वस्तुएँ छोटी लगने लगती हैं, हमारे शरीर में शक्ति का संचार होने लगता है और समय की सही पहचान बनने लगती है। दूसरी ओर, बुढ़ापे में बहुत कम चीज़ें हमें प्रभावित करती हैं, कुछ भी नया नहीं दिखाई देता और हम अधिक समय किसी विषय या वस्तु पर गौर नहीं कर पाते।

"वृद्धावस्था में व्यक्ति समझ चुका होता है कि उसने जीवन को पा लिया है और अब उसके लिए कुछ शेष बचा नहीं है।  भविष्य में कोई और बड़ी उपलब्धि उसके लिए नहीं है।  जैसाकि सार्त्र ने कहा है- ‘मानव-सच्चाई सदा ही सीमित रही है भले ही वह अमर हो क्योंकि मनुष्य होना ही अपनेआप में सीमित है।’ छॉटोब्रैंड ने कहा था- ‘मेरी किशोरावस्था में सम्भावनाएँ क्षितिज तक फैली हुई थीं; पर अब मैं अपनी लक्ष्मण-रेखा से  एक कदम आगे बढ़ाने में भी अक्षम हूँ।’  हमारे सीमित भविष्य और जड़ीभूत अतीत के बीच झूलती यह वृद्धावस्था गतिहीन हो जाती है जिसमें न जाने कितनी योजनाएँ कार्यान्वित हुईं और कितनी छूट गईं।"

जीवन के इस मोड़ पर भी व्यक्ति निराश नहीं होता। वह अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने का काम अपनी भावी पीढ़ी को सौंप देता है। इस प्रकार वह अपने नाम और काम की मशाल को जलाए रखने की आशा को जीवित रखता है। अंततः वृद्ध अपना सारा जीवन समेटता है और उसे सभी कुछ लौटाना पड़ता है। तभी तो एक शायर ने कहा है-
'इक हाथ से देती है दुनिया
दो हाथों से ले लेती है'  [साहिर लुधियानवी]
कुछ इन्हीं भावों को लेकर सिमोन कहती हैं-

"बुढ़ापा सारे जीवन का निचोड़ नहीं होता।  समय हमें दुनिया भर की चीज़ें देता है पर उसी तेज़ी से हमसे छीन भी लेता है।  हम सीखते हैं और फिर भूल जाते हैं; हम कमाते हैं और उसी धन को लुटा भी देते हैं। मॉरियाक ने कहा था- ‘न कमी, न गिरावट और न अमीरी- एक समान : ऐसा होता है बुढ़ापा। जितना जीवन भर संजोया, उसमें से बहुत कम रह जाता है। कितना पढ़ा था इन पचास वर्षों में, अब कितना बचा है?’  हेरियट कहा करते थे- ‘संस्कृति ही बची है, बाकी सब बिसर गया है।’

"वृद्धावस्था का एक लाभ है- अनुभव, और इसी अनुभव के कारण वृद्धों के हाथ में राज्य की बागडोर रही है। राजनीति का लाभ बूढ़ों को उस समय ही मिल सका जब विश्व में कोई परिवर्तन नहीं हुए। परिवर्तनशील विश्व में वृद्ध मानसिकता यथास्थिति बनाए रखती है जो राजनीति में हानिकारक हो सकती है। ६९वर्षीय साम्यवादी अंतोल फ़्रांस का उदाहरण सामने है, जिसने १९१३ में यह कहा था कि विश्व के सभी देश शांति चाहते हैं और जर्मनी से लौटने के बाद बताया था कि वह देश भी युद्ध नहीं चाहता। अगस्त १९१४ की घटनाओं पर वे अवाक रह गए।  जनवरी १९१६ में उन्होंने लिखा- ‘जीना दूभर हो गया है।  मैं अपनी मानसिकता खो रहाहूँ - मुझे लोगों की क्रूरता से अधिक उनकी मूर्खता पर दुख हो रहा है।’

"वृद्ध की राजनैतिक गतिविधि भी उसके काम की तरह अतीत से लदी रहती है। इसीलिए अक्सर वह आज की युवा सोच को समझने में नाकाम रहता है। गुहेन्नो ने १९४० में लिखा था- ‘हमारी आयु के लोगों में कुछ सिहरन भरी यादें हैं।’ यही कारण है १९१४ और १९४० में ‘युद्ध’ और ‘शांति’ के वही अर्थ नहीं रहे। समय के साथ नहीं चलनेवाले पिछड़ जाते हैं। फ़्रांस कम्यूनिस्ट पार्टी की जीनेट वर्मोश इसका उदाहरण हैं। स्टालिन की मृत्यु के बाद फ़्रांस की पार्टी की सोच में बदलाव आ रहे थे पर जीनेट रूस के समर्थन में ही लगी रहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी सोच पिछड़ गई और अंततः उन्हें  पार्टी से त्यागपत्र देना पड़ा।

"जब भविष्य का द्वार बंद दिखाई देता है तो वृद्ध अतीत पर अपना सर्वस्व दाँव पर लगा देता है जिसका फल उसे निराशा के रूप में मिलता है। प्रायः यह देखा गया है कि क्रांति युवा पीढ़ी के हाथों होती है और जब वे वृद्ध हो जाते हैं तो उन्हें हटा दिया जाता है या वे खुद हट जाते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण चर्चिल हैं। युद्ध के समय ६६वर्षीय चर्चिल को प्रधानमंत्री बनाया गया था। तब उन्होंने जनता से कहा था- ‘तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है सिवाय रक्त, स्वेद और आँसू के।’ उन्होंने अपनी सोच और प्रेरणा से सफलता प्राप्त की। लेकिन विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब शांति स्थापित हो गई तो वे एक नाकाम प्रधानमंत्री साबित हुए और उन्हें पदच्युत होना पड़ा। तब उन्होंने कहा था- ‘जब तुम बूढ़े हो जाते हो तो तुम अधिकतर अतीत में जीते हो।’

"जीवन के अंत तक गांधी स्वस्थ थे और वे अपने देश को स्वतंत्र कराने के आंदोलन में सफल रहे। उन्होंने राजनीति में धर्म को जोड़ कर देश को स्वतंत्रता दिलाने में सफलता तो प्राप्त कर ली पर जीवन के अंतिम दिनों में लोगों की धर्मांधता के कारण दुख झेले। अहिंसा का पुजारी अपने चारों ओर हिंसा का ताण्डव देखता रहा। तब उन्होंने कहा था- ‘मेरा हृदय दुख से भरा है। मुझे जीने की इच्छा नहीं है।  मैं अपने मित्रों की सोच से सहमत नहीं हूँ। अब मेरे लिए भारत में स्थान नहीं है जहाँ हिंसा का सैलाब आया हुआ है।’

"राजनीतिज्ञ इतिहास बनाता है तो इतिहास उसे मिटाता है। चर्चिल और गांधी इसके प्रमाण हैं। वे अपने अतीत में जीते रहे और वर्तमान के परिवर्तन को नहीं समझ पाए।  वृद्धों में प्रचलित मुहावरा है- ‘हमारे समय में..’। वे अपने अतीत में जीते हैं और समय के साथ नहीं चलते।  वर्तमान को देने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचता; वे असहाय और शक्तिहीन हो जाते हैं।"

प्रायः लोग लम्बी आयु का आशीर्वाद देते हैं। यह आशीर्वाद सिद्ध होता है या अभिशाप, यह उनका भविष्य ही बताएगा। अकसर यह देखा गया है कि लम्बी उम्र पानेवाला ज़माने के थपेडे खाते हुए अधिक दुख झेलता है। लम्बी आयु और दुख का विश्लेषण करते हुए सिमोन बताती है-  

"व्यक्ति की आयु जितनी लम्बी होती है, उसे उतना ही एकाकीपन झेलना पड़ता है।  सभी प्रियजन एक के बाद एक छूटते जाते हैं- माता, पिता, चाचा, मामा, भाई, बहन, मित्र और कभी-कभी पत्नी भी; तब उसे लगता है कि जीवन अंत्येष्टियों का एक सिलसिला है। उसके इर्दगिर्द वह युवा पीढ़ी घूमती रहती है जिसे उसने गोद में खिलाया था और वह अब एक ‘उपेक्षित वस्तु’ की तरह एक कोने में पड़ा है मृत्यु की प्रतीक्षा में।"

आयु के अनुसार मृत्यु को देखने का अलग-अलग दृष्टिकोण होता है।  बच्चे के लिए मृत्यु एक कौतूहल है तो युवक के लिए एक ऐसा सत्य जिस पर सोचने के लिए उसके पास अभी समय नहीं है और वृद्ध के लिए यह उसकी कामना होती है! विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए सिमोन बताती है-

"हर वृद्ध जानता है कि मृत्यु एक सत्य है परंतु यह ‘जानना’ कितना अर्थ रखता है? कोई भी अमर नहीं है। मृत्यु एक बाह्य तत्व है जो किसी के बस में नहीं है। कोई मृत्यु की कामना करे भी तो ‘समय’ आने तक वह नहीं मर सकता। मृत्यु का पूर्वानुमान भले ही लगा ले पर निश्चित तौर पर कोई नहीं कह सकता कि कब मौत आएगी। सत्तर वर्षीय वेल्स ने कहा था- ‘मुझे लगता है कि मैं ऐसा बालक हूँ जिसे ढेर सारे सुंदर खिलौने देकर बिस्तर पर सोने के लिए भेज दिया गया है। परंतु मैं अपने खिलौने छोड़ कर सोना नहीं चाहता।’

"जब परिस्थितियां बदल जाती हैं और जीना दूभर हो जाता है तो युवक अपने को बदल लेता है परंतु वृद्ध में इन बदलावों का सामना करने की शक्ति नहीं  रहती, तब वह मरने की कामना करता है। अंतोल फ़्रांस, वेल्स और गांधी इसके उदाहरण हैं। बचपन में हमारी आशाओं और आकांक्षाओं की सीमा छोटी होती है जो युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते विस्तार पाती है और वृद्धावस्था में पुनः संकुचित हो जाती है।  इन संकुचित आकांक्षाओं की प्राप्ति के बाद व्यक्ति को कुछ करना शेष नहीं रहता।  तब उसे लगता है कि ‘अब बस हो गया’।

"मेरे विचार से वृद्धावस्था में मृत्यु का भय उतना नहीं रहता क्योंकि यह देखा गया है कि अस्वस्थ रहने के बावजूद वृद्ध डॉक्टर के पास नहीं जाते। वृद्धावस्था और अस्वस्थता के बीच की बारीक रेखा का लाभ उठाकर वे ऐसा करते हैं। कुछ शोधार्थियों  को एक वृद्धाश्रम में मृत्यु के प्रश्न पर जो उत्तर मिले वे इस प्रकार थे- किसी दिन तो आना ही है, हां सोचते हैं... अक्सर सोचते हैं, जब मैं सांस लेना भूल जाऊँगा उस दिन...,जब मैं उदास रहता हूँ तो इस पर सोचता हूँ, दुख-दर्द झेलने से अच्छी है मृत्यु, यह तो प्राकृतिक प्रक्रिया है, कुछ लोग सोचते हैं पर मैं नहीं, मैंने कब्रिस्तान में अपने लिए स्थान सुरक्षित करा लिया है, मेरे लिए सुखद मुक्ति होगी, हाँ सोचता हूँ.. आखिर दूसरों के लिए हमें स्थान जो बनाना है, क्या सोचें..लोग तो मर ही रहे हैं, मृत्यु तो जीवन की अगली कड़ी है, राजा हो या रंक सभी को जाना है, जबसे मैं यहाँ आया हूँ तबसे सोचने लगा हूँ।

"इन उत्तरों से एक बात सामने आती है कि कोई भी व्यक्ति दुख-दर्द झेलने से मौत को अधिक पसंद करता है।  ऐसा नहीं है कि मृत्यु की चिंता से वृद्ध उदास रहता है बल्कि उसकी चिंता के कारण होते हैं उसका स्वास्थ्य, धन और भविष्य।  जब सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं तो जीने की इच्छा शेष नहीं रहती, तब एकाकीपन घेर लेता है और मनुष्य कभी न अंत होनेवाली निद्रा में चला जाना चाहता है।"

कभी गालिब ने कहा था- 'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले', और जब हर ख्वाहिश पूरी हो जाती है तो मानव के पास एक ही ख्वाहिश शेष रह जाती है - बस, अब तो दम निकले!!!   


 

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बचपन में लौट चलना सबको ही भाता है, जितनी अधिक दूरी हो बचपन से उतना ही अधिक प्रेम उमड़ता है। निश्छलता सर चढ़कर बोलती है, बहुधा।

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bahut hi badiya post . vichaaro ko ek naya aayaam deti hui post.

bahut sundar rachna

badhayi

vijay
kavitao ke man se ...
pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com