शनिवार, 22 अगस्त 2009

BANARASI SAARI


फीकी पड़ती बनारसी साड़ी की शान!

एक समय था जब दुल्हा घोड़ी पर चढ़कर बारात की शान बना रहता था। अब तो शानदार सजी गाड़ियाँ / बग्गियां घोड़ी की जगह ले चुके हैं और बेचारा दुल्हा उस गाड़ी में कहीं कोने में दुबका रहता है।

दुल्हन भी भारी गहनों से लदी हुई, बनारसी साड़ी पहने - सकुचाई-सी मण्डवे में बैठी दिखाई देती थी। अब न वो बनारसी साड़ी रही न वो लजीली दुल्हन।

बदलते समय के साथ विवाह का कभी अनिवार्य अंग मानी जानेवाली बनारसी साड़ी भी अब लुप्त हो रही है। सालों से यह रिवाज़ चला आ रहा था कि दुल्हन- चाहे वो हिंदू हो या मुस्लिम, बनारसी साड़ी पहन कर ही फेरे लेती थी या निकाह कुबूल करती थी। लेकिन समय और फ़ैशन के साथ बनारसी साड़ी का स्थान तड़क-भड़क वाले साड़ी,लहंगा या शरारा ले चुके हैं।


इस बदलाव का सब से अधिक विपरीत असर बनारसी साड़ी के बुनकरों और कारीगरों पर पड़ा है। दस वर्ष पूर्व जहाँ पांच लाख बनारसी साड़ी बुनकर काम करते थे, अब वे घट कर डेढ़ से दो लाख रह गए हैं। हाथ से बुनाई करके इन पर ज़री के काम करने वाले कारीगरों को अब काम नहीं मिल रहा है। उनके बनाये गये ‘कढुआं’ साड़ियों की मांग की कमी के साथ-साथ पावरलूम से भी उन्हें भारी धक्का लगा है। कढुआं साडी़ जहाँ छः-छः माह में दस-बारह हज़ार रुपये की मज़दूरी देकर बनवाई जाती थी, वहीं पावरलूम से चंद घंटों में तैयार की जाती है। इसके कारण जब कम दाम में उसी प्रकार की साड़ी मिल जाती है, तो लोग हाथ के कारीगर की महंगी साड़ी क्यों लेंगे! और फिर, बनारसी साड़ी ही पहने, यह भी अनिवार्य नहीं रहा। तो लगता है बनारसी साड़ी और उसको बनाने वाले कारीगर लुप्त होते जा रहे हैं



शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

Indian but not an Indian!

इंडियन’ जो भारतीय नहीं हैं


पृथ्वी के पश्चिम गोलार्ध के उत्तरी ध्रुव के पास का क्षेत्र जो अब कनाडा कहलाता है, वहाँ के मूल निवासी लगभग बीस हज़ार वर्ष पूर्व एशिया महाद्वीप से गए थे। तब एशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच अस्सी किलोमीटर चौडी भूमि एक सेतु का काम कर रही थी। समय के साथ यह भूमि जलमग्न हो गई और अब अलास्का के इस क्षेत्र को बेयरिंग स्ट्रेट के नाम से जाना जाता है।



सन्‌ १४९२ ई. में जब स्पेन से भारत पहुंचने का करीबी समुद्री रास्ता तलाशते हुए क्रिस्टोफ़र कोलम्बस अटलांटिक महासागर के रास्ते इंडीज़ के पश्चिमी छोर पर पहुँचा तो यह समझ बैठा कि वह भारत पहुँच गया है। तब कोलम्बस ने वहाँ के निवसियों को इंडियन कहा।


हज़ारों वर्ष पूर्व से यहाँ निवास कर रहे लोगों को पश्चिम के लोग उन्हें ‘रेड इंडियन’ या नेटीव अमेरिकन के नाम से पुकारने लगे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब तीस-पैंतीस हज़ार वर्ष पूर्व जब पृथवी के उत्तरी गोलार्ध में एशियाई एवं अमरीकी भूमि जुड़ी हुई थी, तब एशिया के निवासी जानवरों का शिकार करते-करते अमरीकी धरती पर पहुँचे थे। उस समय यह धरती बर्फ़ से ढकी हुई थी। भूगोल ने करवट ली, ज़मीन पानी के भीतर चली गई और एशिया व अमेरिका बिछड़ कर अलग-अलग महाद्वीप बन गए। तब से लेकर कोलम्बस के उस धरती पर पैर रखने तक यूरोपीय लोग यहाँ के भूगोल से अनभिज्ञ थे।


उत्तर और दक्षिण अमरीका में फैले ये मूल निवासी सैकड़ों अलग-अलग भाषाओं में बात करते थे और उनके संस्कार भी भिन्न-भिन्न थे। अजटेक, इन्का, मय जैसी विकसित जातियाँ यहाँ फल-फूल रही थी। इस धरती की सभ्यता से यूरोपियों ने बहुत कुछ सीखा क्योंकि यहाँ के मूल निवासी अधिक सभ्य थे। यहाँ के निवासी खेती में भी निपुण थे। फली, अनानस, आलू, जवार, बाजरा, टमाटर आदि की खेती की जाती थी तथा वे विभिन्न मसालों का प्रयोग भी करते थे। अतिथियों का सद्भावनापूर्वक स्वागत करना उनकी संस्कृति में था।


इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब से अमरीकी धरती पर यूरोपियों के कदम पड़े, तब से मूल निवासियों का शोषण तो होता ही रहा, साथ ही उन्हें लाखों की संख्या में जान से हाथ धोना पड़ा है।


अमेरिका के रेड इंडियन ही नहीं भारत के इंडियन भी इस शोषण के भुक्तभोगी रहे हैं।



गुरुवार, 13 अगस्त 2009

संसद में नोक-झोंक

मैं जयपाल रेड्डी का सेक्सी दोस्त नहीं हूँ- लालू


हाल ही सम्पन्न लोकसभा के अधिवेशन में राजदा प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने शहरी विकास मंत्री एस. जयपाल रेड्डी को अपना ‘सेक्सी दोस्त’ मानने से इन्कार कर दिया। इस ‘राज़’ के खुलने पर संसद में ठहाका लगा।


सदन में मेट्रो रेलवे सम्बन्धी चर्चा पर जब लालू प्रसाद ने दिल्ली मेट्रो को शहरी विकास मंत्रालय के आधीन लाने का विरोध किया तो जवाब में मंत्री ने कहा कि पूर्व रेल मंत्री दशकों से उनके करीबी हैं और वह उनके ‘शख़्सी’दोस्त [personal friend] हैं। परंतु रेड्डीजी हिंदीतर भाषी होने के कारण उनके हिन्दी उच्चारण से वह शब्द सेक्सी सुनाई पडा। इस पर तुरंत चुटकी लेते हुए लालूजी ने प्रतिवाद करते हुए कहा-"मैं जयपालजी का सेक्सी दोस्त नहीं हूँ।"


इस पर सदन में ज़ोरदार ठहाका लगा जिसमें लालूजी और रेड्डीजी की हसी भी शामिल थी।

बुधवार, 12 अगस्त 2009

लालच
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यक्ष : धनी की सबसे बडी़ कमज़ोरी?
धर्मराज: लालच!
यक्ष : संसार का सब से बडा़ आश्चर्य?
धर्मराज: मनुष्य के सिर पर सदा मृत्यु मंडराती रहती है पर वह इस सत्य को भूलकर ऐसा जीवन व्यतित करता है जैसे वह चिरंजीवी हो!

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प्रसिद्ध उद्योगपति बंधु घनश्याम और राधेश्याम का नाम शहर का बच्चा-बच्चा जानता है। इनका कारोबार घनश्याम राधेश्याम ब्रदर्सके नाम से देश के चारों ओर फैला हुआ है। इस विस्तत कारोबार का आरम्भ एक छोटी सी दुकान से हुआ था। उनके श्रम एवं भाग्य का परिणाम है कि आज उनका नाम देश के जाने-माने धनाड्यों में गिना जाता है।



पैसा हर बुराई की जड़ होता है - यह कहावत शायद उस समय से चली आ रही है जब से पैसे का चलन शुरू हुआ होगा। फिर भी, बहते पानी की तरह, हर आदमी उसी ढलान की ओर दौड़ता है जिधर पैसा होता है। उसी पैसे की खातिर आजकल दोनों भाइयों - घनश्याम और राधेश्याम, में मनमुटाव चल रहा है। दोनों भाई सम्पत्ति का बँटवारा करके अपने-अपने बलबूते पर कारोबार का विस्तार करना चाहते हैं।



महत्वकांक्षा जब किसी को घेर लेती है तो उसकी परछाईं लालच भला कैसे पीछे रहेगी। जब अलग होने की बात हुई तो घनश्याम ने अपने हिस्से में मार्के की सारी जायदाद चुनी। राधेश्याम को यह बात मंज़ूर नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि बँटवारे में देर होने लगी। राधेश्याम ने कानून का दरवाज़ा खटखटाने की धमकी दी। इसका अर्थ यह था कि बँटवारे का मामला बीच बाज़ार में आ जाता और ख्याति को भी क्षति पहुँचती। घनश्याम नहीं चाहता था कि उसकी योजना में कोई ऐसी बाधा आए। वह किसी भी हालत में, किसी भी युक्ति से शीध्र फ़ैसला उसके इच्छानुसार चाहता था।



बडे़ उद्योगों को चलाने और रोकने के लिए पैसा और बाहुबल में चोली-दामन का साथ होता है। इन दोनों के योग से न जाने कितने मज़दूरों को रोज़ी-रोटी मिलती है और न जाने कितने मज़दूर घर से बेघर हो जाते हैं। घनश्याम ने सोचा कि अगर उसे अपने उद्योग का शीघ्र विस्तार करना है तो आनेवाले हर रोडे़ को रास्ते से हटाना ही होगा।



घनश्याम ने अपने विश्वस्त आदमी शंकर दादा को बुलाया और उससे मंत्रणा की। तय हुआ कि अब राधेश्याम अपने जूतों से बडा़ हो गया है और उसे रास्ते से हटाने में ही भलाई है। शंकर दादा राधेश्याम की दिनचर्या का पता लगाने में लग गया। रात के ग्यारह बजे तक राधेश्याम अपने घर की बैठक में पढ़ता रहता है। यह उसकी दिनचर्या का अभिन्न अंग है। घनश्याम ने जब यह बात शंकर दादा को यह बात बताई तो उसने सुझाया कि यही एक अच्छा समय होगा जब राधेश्याम को आराम से हमेशा के लिए आराम करने दिया जाय। मौका देख कर वह अपने एक विश्वस्त आदमी को इस काम के लिए लगा देगा, जो इतनी सफाई से इसे अंजाम देगा कि किसी को भी कोई सुराग नहीं मिलेगा।

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समाचार पत्रों मे एक सनसनीखेज़ समाचार मुख पृष्ठ की सुर्खी बना:
घनश्याम-राधेश्याम ब्रदर्सके सीनियर पार्टनर श्री घनश्याम की कल रात कुछ अज्ञात व्यक्तियों द्वारा हत्या कर दी गई। जिस समय हत्या हुई, वे अपना कार्य समाप्त करके घर लौट रहे थे। उनकी कार को एक सुनसान जगह रोक कर हत्यारों ने उन पर जानलेवा हमला किया। श्री घनश्याम के पार्टनर और छोटे भाई श्री राधेश्याम कारोबार के सिलसिले में विदेश गये हुए थे। जैसे ही उन्हें यह दुखद समाचार मिला, वे वापस आ रहे है और उनके आज रात तक यहाँ पहुँचने की सम्भावना है। पुलिस इस हत्या की जांच में लगी हुई है परंतु अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। पूछताछ जारी है और पुलिस को आशा है कि हत्यारे शीघ्र पकडे़ जाएँगे।

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सोमवार, 10 अगस्त 2009

Nature's fury

प्रकृति का प्रकोप

प्रकृति ने फिर यह प्रमाणित कर दिया कि वह मनुष्य से अधिक बलवान है। जब मानव प्रकृति का आदर नहीं करता तो उसे इसका फल भोगना ही पडे़गा।

अभी हाल ही में ताइवान में आया तूफ़ान यह जतला गया कि पर्यावरण को ताक पर रख कर नदी के तट पर कई मंज़िला इमारत खडी़ करना मानव को कितना भारी पड़ सकता है। यह तो गनीमत हुआ कि केवल माल का नुकसान हुआ, जान का नहीं। इस इमारत के ढहने से पहले ही इमारत में रह रहे तीन सौ लोगों को खाली कर दिया गया था।

शायद प्रकृति इतने प्रतिशोध से शांत नहीं हुई। उसने चीन में विनाशकारी तूफ़ान मचा दिया , जिसे अब मोराकोत नाम दिया गया है। इस तूफ़ान में कई जानें गई और दस लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया है।

क्या हम इस प्रकृति के प्रकोप से कोई सबक लेंगे???



गुरुवार, 6 अगस्त 2009

कोट
मूल:निकोलय गोगोल
अनुवाद: चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


[निकोलय चेर्निशवस्की, इवान तुर्गनेव, अलेक्ज़ेन्डर पुश्किन, मेक्ज़िम गोर्की जैसे प्रसिद्ध रूसी साहित्यकारों की श्रेणी में एक और नाम है- निकोलय गोगोल(१८०९-५२) जिन्होंने मानवीय मूल्यों एवं सामजिक न्याय के लिए अपनी कलम उठाई। गोगोल की पैनी कलम जहाँ समजिक असमानता पर प्रहार करती है, वहीं उनके व्यंग्य में तिखा हास-परिहास भी छिपा होता है। यहाँ उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘द ग्रेट कोट’ का सार-संक्षेप स्वच्छंद अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत है।]


वह एक सरकारी विभाग का कर्मचारी था। कौन सा विभाग?...क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि सभी विभाग एक जैसे होते हैं और उनकी कार्यक्षमता भी! अब किसी एक विभाग का नाम लूँगा तो निश्चित जानिए कि वे मेरी जान के दुश्मन हो जाएँगे। हाँ, तो यह किस्सा सेंट पीटर्सबर्ग में स्थित कई विभागों में से एक विभाग के एक कर्मचारी का है। आम कर्मचारी की तरह वह भी साधारण नाक-नक्श का, दुबली-पतली काया का व्यक्ति था। सिर के बाल तो अपनी अनुपस्थिति कभी के दर्ज करा चुके थे, जिसके चलते माथे और सिर की विभाजन रेखा को रेखांकित करना कठिन था। इस वर्णन से पाठक को उसकी आर्थिक स्थिति का भी आभास हो ही गया होगा।



अरे...मैं तो उसका नाम बताना ही भूल गया! उसके नाम के पीछे भी एक लम्बी कहानी छुपी हुई है; पर किस्सा कोतह यह कि उसके पैदा होते ही माँ को सुझाए गए नामों में से कोई भी नाम पसंद नहीं आया तो हार कर उसके कहा,"इसके पिता का नाम अकाकी था, इसलिए इसका नाम अकाकी अकाकीविच रखते हैं।"



पता नहीं अकाकी अकाकीविच उस विभाग में कब से है, किसने उसे नौकरी दी.....पर वह जहाँ बैठा है, लोगों ने उसे सदा वहीं बैठे देखा है। न जाने कितने कर्मचारी आए, पदोन्नति पाकर चले गए; कितने स्थानान्तरित हुए; कितनों ने अवकाश प्राप्त किया; पर अकाकी अकाकीविच न तो स्थान बदला और न ही काम। उसका काम था विभाग के किसी भी मसौदे का सुलेखन करके लौटाना।



अकाकी अकाकीविच बड़ी निष्ठा से अपना काम करता था। रंग-बिरंगी स्याही से अपने सुलेखन को सजाता और कागज़ पर बिखरे मोती जैसे अक्षरों को देखकर कभी मुस्कुराता, कभी प्रसन्नता से सीटी बजाता तो कभी हँस देता। अक्सर सहकर्मी उसकी इस कर्तव्यनिष्ठता और सादगी को लेकर उसका मज़ाक उडा़ते, बात कभी खिल्ली तक पहुँच जाती पर उसका कोई असर अकाकी अकाकीविच पर नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता मानों उसने कुछ सुना ही नहीं। उसको छेडने का एक कारण यह भी था कि अकाकी अकाकीविच को देखकर किसी को भी गुदगुदी होती। उसके रूखे सिर पर कभी घास-फूस पड़ी रहती तो कभी कपड़ों पर धागे या कूडा़ चिपका रहता जिसका उसे आभास तक नहीं रहता। दरअसल, रास्ता चलते उसे यह भी पता नहीं रहता कि वह फुटपाथ पर चल रहा है या सड़क पर; वह किसी घर की बालकनी के नीचे से गुज़र रहा है या किसी पेड़ के नीचे से; ऊपर से कूड़ा गिर रहा है या पक्षी-मल; और यदि कुछ गिरा भी तो उसे झटकने या साफ करने की चिंता नहीं रहती।



बरसों-बरस से पहना कोट न केवल बदरंग हो गया था, बल्कि उसके रंग की पहचान भी गुम हो गई थी। मटमैला, जहाँ-तहाँ सीवन खुलने और पुनः सिलने से कोट का आकार भी छोटा हो चला था और इतना झुन्ना कि अब तो अस्तर भी भीतर से झाँकने लगा था।

सरदी का मौसम दस्तक दे रहा था तो अकाकी अकाकीविच ने सोचा कि कोट की मरम्मत जरूरी है। इसके लिए समय निकाल कर उस बदमिजाज़ दर्जी पेट्रोविच के पास जाना ही होगा।



पेट्रोविच बदमिजाज़ ही तो था। पत्नी से जब उसकी लड़ाई होती तो वह अपना सारा नज़ला ग्राहक पर उतारता था। जब वह पीकर नशे में होता तो इतनी नम्रता बरतता जिसका लाभ ग्राहक कम पैसे चुकाकर लेते और इसी पर उसकी पत्नी की डाँट पड़ती। अकाकी अकाकीविच जब पेट्रोविच के घर (इसे दुकान भी कह सकते हैं, क्योंकि वह एक कमरा घर और दुकान-दोनों का काम देता है) पहुँचा तो उसने देखा कि पेट्रोविच की पत्नी उसे फटकार रही थी। अकाकी अकाकीविच समझ गया कि वह गलत समय पर आ गया है। वह लौटने को हुआ पर देर हो चुकी थी। पेट्रोविच की नज़र उस पर पड़ गई थी और अब उसके पास कोई चारा नहीं रह गया था। उसने भीतर पहुँच कर पेट्रोविच को विनम्रतापूर्वक अपना कोट दिखा कर झिझकते हुए कहा,"बहुत अधिक नहीं...कुछ यहाँ कंधे के पास... और वो वहाँ कालर के पास...और ये थोड़ा पीछे अस्तर..."



पेट्रोविच ने कोट को उलटा-पलटा, फिर सिर हिलाया; फिर इधर-उधर देखा और सिर हिलाया। हाथ बढा़कर मेज़ से नास की डिबिया उठाई, ढक्कन खोला और एक चुटकी नास अपने नथुने के पास ले जाकर लम्बी साँस खींची- "इसकी सर्विस हो गई है।"



अकाकी अकाकीविच का दिल बैठ गया। मिन्नत के लहजे में कुछ करने के लिए कह ही रहा था कि पेट्रोविच ने अपना फैसला सुना दिया-"नया कोट ही बनाना पड़ेगा।" अकाकी अकाकीविच ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि कुछ पेबंद तो डाल ही दें ताकि यह मौसम बीत जाए; परंतु पेट्रोविच का फैसला अटल था। हार कर अकाकी अकाकीविच ने पूछा कि नया कोट कितने में बनेगा?

"डेढ़ सौ रूबल।"

"डेढ़ सौ रूबल!" चौंक गया अकाकी अकाकीविच, जिसे देखकर पेट्रोविच को भीतर ही भीतर आत्मसंतोष हुआ - वैसा ही जो किसी को चौंकाने पर किसी को भी मिलता है। अकाकी अकाकीविच मायूस होकर लौट चला। उसकी आज तक की सारी जमापूँजी केवल सौ रूबल थी। और पचास रूबल वो कहाँ से लाए!



बिल्ली के भाग से छींका टूटा! विभाग के डायरेक्टर ने बोनस की घोषणा की। अकाकी अकाकीविच को साठ रूबल बोनस के तौर पर मिलेगा। अकाकी अकाकीविच ने सोचा कि अब तो कोट बन ही गया। वह पेट्रोविच के पास दौड़ा और उसे साथ लेकर कपडे़ का रंग व डिज़ाइन पसंद किया।

वह दिन भी आया जब पेट्रोविच ने अकाकी अकाकीविच को कोट पहना कर दिखा दिया। नया कोट पहनकर वह सीधे दफ़्तर पहुँचा। साथियों ने नये कोट की खूब तारीफ़ की। पहले तो वह धन्यवाद देता रहा पर बाद में सकुचाता भी रहा। इतने में एक साथी ने पार्टी की माँग रख दी। फिर क्या था, सभी ने इस माँग का समर्थन किया...पर बेचारा अकाकी अकाकीविच ...। उसकी इस दयनीय स्थिति को देखते हुए उसके ऊपर वाले अधिकारी ने कहा, "चलो आज शाम मेरे पास पार्टी होगी क्योंकि आज मेरी साल गिरह है"। सब ने ताली बजाई और शाम का इंतेज़ार करने लगे।



अकाकी अकाकीविच घर पहुँचा। बड़ी सावधानी से कोट उतारा और खूंटी पर टंगा दिया। पुराना कोट अब सच में उसे कचरा लग रहा था। उसे शाम की पार्टी की प्रतीक्षा थी।

अधिकारी का घर ओबुकोव पुल के उस पार एक समपन्न बस्ती में था। अकाकी अकाकीविच अंधेरी गलियों को लांघता हुआ ओबुकोव पुल पार करके जब उस बस्ती में पहुँचा तो वहाँ की चमक-दमक देखता ही रह गया। शाम अपने पूरे शबाब पर थी। अधिकारी के घर पहुँचा तो लोगों का शोर-शराबा और वोदका की गंध माहौल में फैल रही थी। वह भी जाकर चुपचाप अपने एक साथी कि बगल में बैठ गया और सलाद, पेस्त्री, वील के साथ वोदका का मज़ा लेने लगा। जीवन में पहली बार उसने महफिल का मज़ा जाना।



रात बहुत हो गई। एक-एक करके लोग विदा लेने लगे। अकाकी अकाकीविच भी अपने घर की ओर चल पड़ा। अब सड़कों पर रौशनी कम हो गई थी। किसी-किसी घर से छन कर प्रकाश फैल रहा था। जैसे-जैसे वह बस्ती से दूर हुआ, वैसे-वैसे अंधेरा भी उसके साथ हो लिया। इसी अंधेरे में वह ओबुकोव पुल पर पहुँचा तो ठिठक गया। एक साया उसके सामने खड़ा था। जैसे ही वह हटना चाहा, दो और लोग उसके आज़ू-बाज़ू खडे़ हो गए। उन्होंने चुपके से उसका कोट उतार लिया और अंधेरे में गायब हो गए। अकाकी अकाकीविच आवाक रह गया, मुँह से चीख तो दूर, बोल भी नहीं निकल रहे थे।



दूसरे दिन अकाकी अकाकीविच अपना वही पुराना कोट पहने दफ़्तर पहुँचा। साथियों से कल की घटना कह सुनाई। उन्होंने सांत्वना जताते हुए सलाह दी कि जमादार, इन्स्पेक्टर से काम नहीं चलेगा, सीधे बड़े अधिकारी के पास फरियाद करना होगा। अकाकी अकाकीविच तो पहले झिझका कि वह बडे़ अधिकारी के पास कैसे जाएँ पर जब साथियों ने ढाढ़स बंधाया तो वह बडे़ अधिकारी के दफ़्तर पहुँचा। बड़ा अधिकारी तो बड़ा होता ही है, भले ही उसके पास बडे़ अधिकार न हों! वह किसी अदने विभाग के अदने कारिंदे से झट कैसे मिलता। कुछ घंटे इन्तेज़ार के बाद अकाकी अकाकीविच को भीतर बुलाया और उसकी बात सुनते ही उसे डाँट पिलाई - "जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो...किसके पास आए हो...तुम्हें यहाँ किसने भेजा है.....यहाँ आने किस ने दिया....तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ सीधे आने की..???"



बेचारे अकाकी अकाकीविच की घिघी बंध गई। वो बेहोश होकर गिर ही जाता यदि इस शोर को सुनकर भीतर आए दो सहायक उसे पकड़ नहीं लेते और बाहर ले जाते। उसे खुद पता नहीं कि वह किस तरह घर पहुँचा और खटिया पर लुढ़क गया। दो दिन तक ज्वर में बड़बड़ाता रहा। भला हो उस मकान मालकिन का, जिसने उसके कराहने की आवाज़ सुनकर भीतर झाँका और डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने उसकी दयनीय स्थिति देखकर कहा कि "इसे दवाई की नहीं ताबुत की ज़रूरत है। अब तो वह कुछ समय का मेहमान है।"

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आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अकाकी अकाकीविच की कहानी यहाँ खतम नहीं हुई। पता चला है कि जिस ओबुकाव पुल के पास अकाकी अकाकीविच को लूटा गया था वहाँ एक प्रेत रात के समय राहगीरों की कोट काटता फिरता है। लोगों का कहना है कि वह प्रेत अकाकी अकाकीविच का है जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा है।


एक रात वही अधिकारी उस पुल से गुज़र रहा था जिसने अकाकी अकाकीविच को डाँटा-फटकारा था। अचानक उसकी गर्दन पर एक हाथ पड़ा जो उसके कालर को भींचे था। पीछे मुड़कर देखा तो उसका मुँह खुला का खुला ही रह गया। उसने देखा कि वही छोटे से आकार का दुबला-पतला आदमी...वही फटा-पुराना कोट...! उसके शरीर से पुराने कब्र की दुर्गंध आ रही थी। वह जलती लाल आँखों से घूर रहा था। उसके मुख से बडी़ दुर्गंध आ रही थी जब उसने मुँह खोला और यह कहा,"आह! आखिर तुम आ ही गए। मुझे इसी कोट का इंतेज़ार था। तुमने मुझे दुत्कार दिया था, पर अब मुझे तुम्हारा यह कोट चाहिए।" अधिकारी ने अपना कोट झट से उतार फेंका और घर का रुख किया। कहते हैं कि उसके बाद पुल का वह प्रेत किसी को दिखाई नहीं दिया। यह भी पता चला कि वह अधिकारी अब कभी किसी से डाँट-डपट कर बात नहीं करता है।
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मंगलवार, 4 अगस्त 2009

Magasaysay award

दीप जोशी को रेमन मैगसेसे पुरस्कार

नोबेल पुरस्कार के समकक्ष एशिया का रेमन मैगसेसे पुरस्कार माना जाता है जो प्रतिवर्ष दिया जाता है। यह पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। २००९ का यह पुरस्कार पाँच विशेषज्ञों को दिया गया है जो अपन-अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया है। इनमें भारत के श्री दीप जोशी हैं जिन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के उत्थान के लिए कार्य किया है।



श्री जोशी मासुशेट्स इन्स्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी [MIT] से इंजनीयरिंग की मास्टर डिग्री प्राप्त करने के बाद भारत में ग्रामीण आबादी के विकार और जनता को बेहतर जीवन देने के इरादे से सेवारत रहे। उन्होंने १९ वर्षों से उत्तरांचल के पिथौरागढ़ के ग्रामीण जीवन के सुधारों में योगदान दिया।



तीस वर्ष के अपने अनुभव बाँटते हुए वे बताते हैं कि हमेशा से यह महसूस करते रहे हैं कि समाज को उसका दिया वापस लौटाने की ज़रूरत है। इसलिए वे गैर-सरकारी संगठन ‘प्रदान’ के सहसंस्थापक बने। यह संगठन स्थानीय तौर पर उपयुक्त आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा कई राज्यों में ग्रामीण जनता के जीवन स्तर को सुधारने की प्रणालियाँ लाहू करने के क्षेत्र में कार्य करते रहे। उनका मानना है कि "हमें ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करने और वहां काम करने की ज़रूरत है। हमें वहाँ के उन लोगों की देखभाल करने की भी ज़रूरत है जो बदलाव लाना चाहते हैं।"



श्री दीप जोशी अब ‘प्रदान’ से सेवानिवृत्त हो चुके हैं और इस संगठन के लिए बतौर परामर्शदाता काम कर रहे हैं। मनिला में इस पुरस्कार की घोषणा की प्रतिक्रिया करते हुए वे कहते हैं कि "यह किसी व्यक्ति के लिए नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण आबादी के विकास के विचार यानी भारत की ग्रामीण जनता को बेहत्तर जीवन देने के दृष्टिकोण के लिए है।"




रविवार, 2 अगस्त 2009

samovar

समरकंद का समोवर



जो हुक्का कभी चौपाल की शान हुआ करता था, वही स्थान कश्मीर में समोवर का था। समरकंद से लाया गया समोवर आज भी मुग़लकालीन शानो-शौकत का प्रतीक है।



सुबह सवेरे फू-फू करके समोवर के भीतर भरे कोयले को फूँकती महिलाएँ कभी एक आम नज़ारा हुआ करता था। पीतल या ताम्बे के समोवर दुल्हन के दहेज का अभिन्न अंग हुआ करता था। चाय, नन चाय और कहवा गरम रखने के लिए समोवर का प्रयोग किया जाता है- खास कर कश्मीर जैसे सर्द मुकाम में।



समोवर की बनावट एक खास किस्म की होती है। एक जग के आकार के बर्तन के नीचे जालीदार पेंदा लगा होता है जिसमें आग के लिए कोयला डाला जाता है। इस आग का धुआँ जाने के लिए जग के बीचों-बीच एक पाइप [उसी धातु का] लगा होता है। इस आग के कारण समोवर मे डाली गई चाय बहुत देर तक गर्म रहती है और उसका ज़ायका़ भी बना रहता है। समोवर की चाय बनाना भी एक कला है। एक समय था जब माँएं अपनी बेटियों को इस कला में दक्षता के लिए सीख देती थीं।



विभिन्न आकृति और डिज़ाइन के समोवर बनाना भी एक कला है परंतु आज यह कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। अब समोवर की चाय के लिए न उतना समय लोगों के पास बचा है और न वैसे शौकीन ही रह गए हैं। आज के विद्युत युग में बिजली की केतली, थरमस आदि के प्रवेश से समोवर की माँग ही नहीं घटी अपितु उसको बनानेवाले कलाकार भी दूसरे व्यवसायों की ओर रुख़ करने को मजबूर हो गए।



अब न वो हरी पत्ती की चाय के शौकीन रहे न वो नन चाय के [जो दूध, नमक और सोड़ा डाल कर बनाई जाती है] और न वो ज़ायकेवाले कद्रदाँ जो शक्कर, बादाम, दालचीनी व इलाइची से बने कहवा का मज़ा लें। आज समोवर एक ऐसी पुरावस्तु है जो ड्राइंग रूम की रौनक बन कर रह गई है।


चित्र- वीक[साप्ताहिक] से साभार