गुरुवार, 6 अगस्त 2009

कोट
मूल:निकोलय गोगोल
अनुवाद: चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


[निकोलय चेर्निशवस्की, इवान तुर्गनेव, अलेक्ज़ेन्डर पुश्किन, मेक्ज़िम गोर्की जैसे प्रसिद्ध रूसी साहित्यकारों की श्रेणी में एक और नाम है- निकोलय गोगोल(१८०९-५२) जिन्होंने मानवीय मूल्यों एवं सामजिक न्याय के लिए अपनी कलम उठाई। गोगोल की पैनी कलम जहाँ समजिक असमानता पर प्रहार करती है, वहीं उनके व्यंग्य में तिखा हास-परिहास भी छिपा होता है। यहाँ उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘द ग्रेट कोट’ का सार-संक्षेप स्वच्छंद अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत है।]


वह एक सरकारी विभाग का कर्मचारी था। कौन सा विभाग?...क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि सभी विभाग एक जैसे होते हैं और उनकी कार्यक्षमता भी! अब किसी एक विभाग का नाम लूँगा तो निश्चित जानिए कि वे मेरी जान के दुश्मन हो जाएँगे। हाँ, तो यह किस्सा सेंट पीटर्सबर्ग में स्थित कई विभागों में से एक विभाग के एक कर्मचारी का है। आम कर्मचारी की तरह वह भी साधारण नाक-नक्श का, दुबली-पतली काया का व्यक्ति था। सिर के बाल तो अपनी अनुपस्थिति कभी के दर्ज करा चुके थे, जिसके चलते माथे और सिर की विभाजन रेखा को रेखांकित करना कठिन था। इस वर्णन से पाठक को उसकी आर्थिक स्थिति का भी आभास हो ही गया होगा।



अरे...मैं तो उसका नाम बताना ही भूल गया! उसके नाम के पीछे भी एक लम्बी कहानी छुपी हुई है; पर किस्सा कोतह यह कि उसके पैदा होते ही माँ को सुझाए गए नामों में से कोई भी नाम पसंद नहीं आया तो हार कर उसके कहा,"इसके पिता का नाम अकाकी था, इसलिए इसका नाम अकाकी अकाकीविच रखते हैं।"



पता नहीं अकाकी अकाकीविच उस विभाग में कब से है, किसने उसे नौकरी दी.....पर वह जहाँ बैठा है, लोगों ने उसे सदा वहीं बैठे देखा है। न जाने कितने कर्मचारी आए, पदोन्नति पाकर चले गए; कितने स्थानान्तरित हुए; कितनों ने अवकाश प्राप्त किया; पर अकाकी अकाकीविच न तो स्थान बदला और न ही काम। उसका काम था विभाग के किसी भी मसौदे का सुलेखन करके लौटाना।



अकाकी अकाकीविच बड़ी निष्ठा से अपना काम करता था। रंग-बिरंगी स्याही से अपने सुलेखन को सजाता और कागज़ पर बिखरे मोती जैसे अक्षरों को देखकर कभी मुस्कुराता, कभी प्रसन्नता से सीटी बजाता तो कभी हँस देता। अक्सर सहकर्मी उसकी इस कर्तव्यनिष्ठता और सादगी को लेकर उसका मज़ाक उडा़ते, बात कभी खिल्ली तक पहुँच जाती पर उसका कोई असर अकाकी अकाकीविच पर नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता मानों उसने कुछ सुना ही नहीं। उसको छेडने का एक कारण यह भी था कि अकाकी अकाकीविच को देखकर किसी को भी गुदगुदी होती। उसके रूखे सिर पर कभी घास-फूस पड़ी रहती तो कभी कपड़ों पर धागे या कूडा़ चिपका रहता जिसका उसे आभास तक नहीं रहता। दरअसल, रास्ता चलते उसे यह भी पता नहीं रहता कि वह फुटपाथ पर चल रहा है या सड़क पर; वह किसी घर की बालकनी के नीचे से गुज़र रहा है या किसी पेड़ के नीचे से; ऊपर से कूड़ा गिर रहा है या पक्षी-मल; और यदि कुछ गिरा भी तो उसे झटकने या साफ करने की चिंता नहीं रहती।



बरसों-बरस से पहना कोट न केवल बदरंग हो गया था, बल्कि उसके रंग की पहचान भी गुम हो गई थी। मटमैला, जहाँ-तहाँ सीवन खुलने और पुनः सिलने से कोट का आकार भी छोटा हो चला था और इतना झुन्ना कि अब तो अस्तर भी भीतर से झाँकने लगा था।

सरदी का मौसम दस्तक दे रहा था तो अकाकी अकाकीविच ने सोचा कि कोट की मरम्मत जरूरी है। इसके लिए समय निकाल कर उस बदमिजाज़ दर्जी पेट्रोविच के पास जाना ही होगा।



पेट्रोविच बदमिजाज़ ही तो था। पत्नी से जब उसकी लड़ाई होती तो वह अपना सारा नज़ला ग्राहक पर उतारता था। जब वह पीकर नशे में होता तो इतनी नम्रता बरतता जिसका लाभ ग्राहक कम पैसे चुकाकर लेते और इसी पर उसकी पत्नी की डाँट पड़ती। अकाकी अकाकीविच जब पेट्रोविच के घर (इसे दुकान भी कह सकते हैं, क्योंकि वह एक कमरा घर और दुकान-दोनों का काम देता है) पहुँचा तो उसने देखा कि पेट्रोविच की पत्नी उसे फटकार रही थी। अकाकी अकाकीविच समझ गया कि वह गलत समय पर आ गया है। वह लौटने को हुआ पर देर हो चुकी थी। पेट्रोविच की नज़र उस पर पड़ गई थी और अब उसके पास कोई चारा नहीं रह गया था। उसने भीतर पहुँच कर पेट्रोविच को विनम्रतापूर्वक अपना कोट दिखा कर झिझकते हुए कहा,"बहुत अधिक नहीं...कुछ यहाँ कंधे के पास... और वो वहाँ कालर के पास...और ये थोड़ा पीछे अस्तर..."



पेट्रोविच ने कोट को उलटा-पलटा, फिर सिर हिलाया; फिर इधर-उधर देखा और सिर हिलाया। हाथ बढा़कर मेज़ से नास की डिबिया उठाई, ढक्कन खोला और एक चुटकी नास अपने नथुने के पास ले जाकर लम्बी साँस खींची- "इसकी सर्विस हो गई है।"



अकाकी अकाकीविच का दिल बैठ गया। मिन्नत के लहजे में कुछ करने के लिए कह ही रहा था कि पेट्रोविच ने अपना फैसला सुना दिया-"नया कोट ही बनाना पड़ेगा।" अकाकी अकाकीविच ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि कुछ पेबंद तो डाल ही दें ताकि यह मौसम बीत जाए; परंतु पेट्रोविच का फैसला अटल था। हार कर अकाकी अकाकीविच ने पूछा कि नया कोट कितने में बनेगा?

"डेढ़ सौ रूबल।"

"डेढ़ सौ रूबल!" चौंक गया अकाकी अकाकीविच, जिसे देखकर पेट्रोविच को भीतर ही भीतर आत्मसंतोष हुआ - वैसा ही जो किसी को चौंकाने पर किसी को भी मिलता है। अकाकी अकाकीविच मायूस होकर लौट चला। उसकी आज तक की सारी जमापूँजी केवल सौ रूबल थी। और पचास रूबल वो कहाँ से लाए!



बिल्ली के भाग से छींका टूटा! विभाग के डायरेक्टर ने बोनस की घोषणा की। अकाकी अकाकीविच को साठ रूबल बोनस के तौर पर मिलेगा। अकाकी अकाकीविच ने सोचा कि अब तो कोट बन ही गया। वह पेट्रोविच के पास दौड़ा और उसे साथ लेकर कपडे़ का रंग व डिज़ाइन पसंद किया।

वह दिन भी आया जब पेट्रोविच ने अकाकी अकाकीविच को कोट पहना कर दिखा दिया। नया कोट पहनकर वह सीधे दफ़्तर पहुँचा। साथियों ने नये कोट की खूब तारीफ़ की। पहले तो वह धन्यवाद देता रहा पर बाद में सकुचाता भी रहा। इतने में एक साथी ने पार्टी की माँग रख दी। फिर क्या था, सभी ने इस माँग का समर्थन किया...पर बेचारा अकाकी अकाकीविच ...। उसकी इस दयनीय स्थिति को देखते हुए उसके ऊपर वाले अधिकारी ने कहा, "चलो आज शाम मेरे पास पार्टी होगी क्योंकि आज मेरी साल गिरह है"। सब ने ताली बजाई और शाम का इंतेज़ार करने लगे।



अकाकी अकाकीविच घर पहुँचा। बड़ी सावधानी से कोट उतारा और खूंटी पर टंगा दिया। पुराना कोट अब सच में उसे कचरा लग रहा था। उसे शाम की पार्टी की प्रतीक्षा थी।

अधिकारी का घर ओबुकोव पुल के उस पार एक समपन्न बस्ती में था। अकाकी अकाकीविच अंधेरी गलियों को लांघता हुआ ओबुकोव पुल पार करके जब उस बस्ती में पहुँचा तो वहाँ की चमक-दमक देखता ही रह गया। शाम अपने पूरे शबाब पर थी। अधिकारी के घर पहुँचा तो लोगों का शोर-शराबा और वोदका की गंध माहौल में फैल रही थी। वह भी जाकर चुपचाप अपने एक साथी कि बगल में बैठ गया और सलाद, पेस्त्री, वील के साथ वोदका का मज़ा लेने लगा। जीवन में पहली बार उसने महफिल का मज़ा जाना।



रात बहुत हो गई। एक-एक करके लोग विदा लेने लगे। अकाकी अकाकीविच भी अपने घर की ओर चल पड़ा। अब सड़कों पर रौशनी कम हो गई थी। किसी-किसी घर से छन कर प्रकाश फैल रहा था। जैसे-जैसे वह बस्ती से दूर हुआ, वैसे-वैसे अंधेरा भी उसके साथ हो लिया। इसी अंधेरे में वह ओबुकोव पुल पर पहुँचा तो ठिठक गया। एक साया उसके सामने खड़ा था। जैसे ही वह हटना चाहा, दो और लोग उसके आज़ू-बाज़ू खडे़ हो गए। उन्होंने चुपके से उसका कोट उतार लिया और अंधेरे में गायब हो गए। अकाकी अकाकीविच आवाक रह गया, मुँह से चीख तो दूर, बोल भी नहीं निकल रहे थे।



दूसरे दिन अकाकी अकाकीविच अपना वही पुराना कोट पहने दफ़्तर पहुँचा। साथियों से कल की घटना कह सुनाई। उन्होंने सांत्वना जताते हुए सलाह दी कि जमादार, इन्स्पेक्टर से काम नहीं चलेगा, सीधे बड़े अधिकारी के पास फरियाद करना होगा। अकाकी अकाकीविच तो पहले झिझका कि वह बडे़ अधिकारी के पास कैसे जाएँ पर जब साथियों ने ढाढ़स बंधाया तो वह बडे़ अधिकारी के दफ़्तर पहुँचा। बड़ा अधिकारी तो बड़ा होता ही है, भले ही उसके पास बडे़ अधिकार न हों! वह किसी अदने विभाग के अदने कारिंदे से झट कैसे मिलता। कुछ घंटे इन्तेज़ार के बाद अकाकी अकाकीविच को भीतर बुलाया और उसकी बात सुनते ही उसे डाँट पिलाई - "जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो...किसके पास आए हो...तुम्हें यहाँ किसने भेजा है.....यहाँ आने किस ने दिया....तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ सीधे आने की..???"



बेचारे अकाकी अकाकीविच की घिघी बंध गई। वो बेहोश होकर गिर ही जाता यदि इस शोर को सुनकर भीतर आए दो सहायक उसे पकड़ नहीं लेते और बाहर ले जाते। उसे खुद पता नहीं कि वह किस तरह घर पहुँचा और खटिया पर लुढ़क गया। दो दिन तक ज्वर में बड़बड़ाता रहा। भला हो उस मकान मालकिन का, जिसने उसके कराहने की आवाज़ सुनकर भीतर झाँका और डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने उसकी दयनीय स्थिति देखकर कहा कि "इसे दवाई की नहीं ताबुत की ज़रूरत है। अब तो वह कुछ समय का मेहमान है।"

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आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अकाकी अकाकीविच की कहानी यहाँ खतम नहीं हुई। पता चला है कि जिस ओबुकाव पुल के पास अकाकी अकाकीविच को लूटा गया था वहाँ एक प्रेत रात के समय राहगीरों की कोट काटता फिरता है। लोगों का कहना है कि वह प्रेत अकाकी अकाकीविच का है जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा है।


एक रात वही अधिकारी उस पुल से गुज़र रहा था जिसने अकाकी अकाकीविच को डाँटा-फटकारा था। अचानक उसकी गर्दन पर एक हाथ पड़ा जो उसके कालर को भींचे था। पीछे मुड़कर देखा तो उसका मुँह खुला का खुला ही रह गया। उसने देखा कि वही छोटे से आकार का दुबला-पतला आदमी...वही फटा-पुराना कोट...! उसके शरीर से पुराने कब्र की दुर्गंध आ रही थी। वह जलती लाल आँखों से घूर रहा था। उसके मुख से बडी़ दुर्गंध आ रही थी जब उसने मुँह खोला और यह कहा,"आह! आखिर तुम आ ही गए। मुझे इसी कोट का इंतेज़ार था। तुमने मुझे दुत्कार दिया था, पर अब मुझे तुम्हारा यह कोट चाहिए।" अधिकारी ने अपना कोट झट से उतार फेंका और घर का रुख किया। कहते हैं कि उसके बाद पुल का वह प्रेत किसी को दिखाई नहीं दिया। यह भी पता चला कि वह अधिकारी अब कभी किसी से डाँट-डपट कर बात नहीं करता है।
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6 टिप्‍पणियां:

rishabhuvach ने कहा…

आप तो सचमुच के अनुवादक निकले!

अफज़लगंज लाइब्रेरी में जिस दिन मैंने पहली बार यह सुझाव दिया था, निश्चय ही वह सरस्वती के जागरण का दिन रहा होगा!!

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत बढिया रचना है.

cmpershad ने कहा…

डॊ. सा’ब, आप जो कहते हैं उसे हम गांठ में बांध लेते है...आखिर हम कालेज के विधार्थी नहीं जो केवल डिग्री के लिए साथ हैं:) आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा, यही आशा है।

rishabhuvach ने कहा…

बात तो पते की कही है आपने. पर मैं उन भाग्यशाली मास्टरों में से हूँ जिनके कुछ विद्यार्थी सदा आत्मीयता बनाए रखते हैं.

और आपको मार्गदर्शन भला मैं क्या दूँगा.मैं तो आपकी साहित्य के प्रति दीवानगी का प्रशंसक हूँ और इसी नाते सोचता रहता हूँ कि आप किसी न किसी रूप में लेखन में सक्रिय रहें.

बेरोजगार ने कहा…

आप ने मेरे ब्लोग पर आक्रर मुझे इज्जत बख्शी. धन्यवाद

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

NICE ONE.