रविवार, 18 सितंबर 2011


ये हिंदी किस ‘भाषा’ का नाम है?
डॉ. राधेश्याम शुक्ल

[हैदराबाद से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘स्वतंत्र वार्ता’ के साप्ताहिकी में डॉ. राधेश्याम शुक्ल [संपादक] का एक विस्तृत लेख छपा है जिसे उन्होंने तीन भागों में लिखा है।  इन लेखों का सारसंक्षेप यहां साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।  इन विस्तृत लेखों को उनके ब्लाग ‘नव्यदृष्टि’ navyadrishti.blogspot.com पर देखा जा सकता है।] 

हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति व हिंदू जाति की तरह देशव्यापी [व देश के बाहर भी] उपस्थिति के बावजूद हिंदी की कोई सुस्पष्ट पहचान या परिभाषा नहीं बतायी जा सकती।  वास्तव में इस देश के लोगों को हिंदी नाम की भाषा व हिंदू नाम की जाति व धर्म की कोई जानकारी नहीं थी।  

पश्चिम से यानी यूनान, अरब, फ़ारस, मध्येशिया आदि से आये लोगों ने यहां के लोगों को बताया कि वे हिंदू हैं, उनकी भाषा हिंदी है और उनका देश हिंदुस्तान।  इस देश की धरती, यहां के निवासियों, उनकी भाषा व धर्म को यह नाम तो बहुत पहले मिल चुका था, किंतु यह स्थापित तब हुआ, जब यहां बहुत से मुस्लिम आ गए और मुस्लिम शासन स्थापित हुआ।  

इस शब्द की राष्ट्रीय  पहचान अब भी बनी हुई है, लेकिन भाषा के स्तर पर यह सिकुड़ कर केवल उत्तर के कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है और उत्तर में भी उसकी एक परजीवी की हालत बनी हुई है।  यद्यपि इसको बोलने-समझने वाले पूरे देश में क्या दुनिया भर में फैले हुए हैं, लेकिन इसे उत्तर के कुछ प्रांतों की ही स्वाभाविक भाषा माना जाता है और उसी को हिंदी क्षेत्र और वहां के निवासियों को ही हिंदीभाषी कहा जाता है।  बाकी क्षेत्र को गैर हिंदी क्षेत्र और गैर हिंदी भाषी माना जाता है।  वहां के हिंदी विद्वनों को गैर हिंदी भाषी हिंदी विद्वान की संज्ञा दी जाती है। तो भाषा के स्तर पर आकर हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की परिभाषा इस तरह सिकुड़ गयी कि उसकी ठीक-ठीक पहचान ही मुश्किल हो गयी।

देश के स्वतंत्र होने पर जब हम अपनी विविध प्रकार की पहचान समेटने की स्थिति में आए, तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की सारी संगति बिगड़ चुकी थी।  अब न यह देश हिन्दुस्तान रह गया था, न यहां के निवासी हिंदू थे और न यहां के निवासियों की भाषा हिंदी रह गयी थी।  जब राष्ट्र के रूप में अंग्रेज़ों का दिया देश हमने स्वीकार किया तो भाषा के रूप में उनकी दी हुई भाषा भी अपना ली और उनकी दी ‘बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुरंगी, बहुभाषी’ खिचड़ी [प्लूरल] पहचान भी स्वीकार कर ली।  अपनी इस नई पहचान में राष्ट्रीय एकता की भावना का कोई तत्व शेष नहीं रह गया- न भाषा, न संस्कृति, न जाति, न धर्म।

राजनीतिक स्वार्थ व अवसरवाद ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘भेदभाववाद’ को अधिक महत्व दिया और भाषा के संदर्भ में तो इतना भी परवाह करने की ज़रूरत नहीं समझी गई।  क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर प्रांतों का निर्माण करके क्षेत्रीयता को संतुष्ट कर दिया गया और राष्ट्र के स्तर पर तो ‘इंडिया’ और ‘इंग्लिश’ स्वीकार की ही जा चुकी थी।

वस्तुतः हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान परस्पर सम्बद्ध शब्द और भाव हैं।  प्रारंभ में इनका धर्म [मज़हब या रिलिजन] से कोई संबंध नहीं था, लेकिन अब हिंदू शब्द तो केवल धर्म [रिलिजन] की पहचान बन गया है, वह भी एक ऐसे धर्म की, जिसकी अब तक कोई सर्वमान्य परिभाषा ही नहीं बन सकी है।  न तो इस हिंदू का देश हिंदुस्तान रह गया और न इस हिंदू की भाषा हिंदी बन सकी।

इतना तो स्पष्ट है कि बाहर के लोगों ने सिंधु नदी के पूर्व के सारे लोगों को हिंदू, उनकी भाषा को हिंदी और पूरे समुद्र पर्वत क्षेत्र को हिंदुस्तान कहा।  उन्होंने यहां के मज़हब का कोई ज़िक्र नहीं किया।  अब उनकी मूल बात मानें, तो इस देश की सारी भाषाएं हिंदी हैं।  यहां पाली या अपभ्रंश के लिए ‘ज़बाने हिंदी’ शब्द का प्रयोग किया गया है।  आशय यह कि बाहर से आए मुसलमान चाहे जिस भाषा क्षेत्र- तुर्की, अफ़गानी [पश्तो], फ़ारसी, अरबी आदि से आए रहे हों, लेकिन वे यहां के बाज़ारों, कस्बों व शहरों की भाषा ही यहां इस्तेमाल करते थे।

ऊपरी स्तर पर विद्वानों के बीच व्यवहृत संपर्क भाषा संस्कृत थी और निचले स्तर पर व्यवहार के लिए इस्तेमाल होने वाली आम आदमी की भाषा को केवल ‘भाषा ही कहा जाता रहा है।  मुसलमानों के आने से यह हुआ कि इसमें फ़ारसी, तुर्की, पश्तो और अरबी के भी कुछ शब्द मिल गए।  मूलतः इसी भाषा को हिंदी या हिंदवी कहा गया है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों के इस देश में आने के कई सौ साल बाद तक भाषा में कोई मज़हबी भेद नहीं पैदा हुआ था।  आम बोलचाल और व्यवहार की भाषा बदल रही थी, लेकिन उसकी कोई हिंदू मुसलिम पहचान नहीं बन रही थी।  लिपि को लेकर भी कोई झगड़ा नहीं था।  इस देश में राजकाज की भाषा फ़ारसी बन जाने के बाद भी [जो मुगल बादशाह अकबर के ज़माने में हुई] उसकी पहचान मज़हब के साथ नहीं जुड़ी।
लाल किले में मुग़ल बादशाह   शाहजहां का दरबार
जहां हिंदुस्तानियों की ज़ुबान हिंदी या हिंदवी से अलग
‘ज़ुबाने उर्दुए मुअल्ला’ ने रूपाकार ग्रहण किया।

भारत में आने के बाद यहां की भाषा को ‘हिंदी’ नाम इन मुस्लिम हमलावरों द्वारा ही दिया गया था, लेकिन अब यह ‘हिंद’ यानी इस देश की भाषा बन गई थी और यहां के मूल निवासियों को हिंदी की संज्ञा मिल गई थी।  लाल किले के दरबार से ही ‘उर्दू’ [ज़बाने उर्दू-ए-मुअल्ला का संक्षिप्त रूप] ने अपना नया भाषाई और मज़हबी रंग रूप करना शुरू किया।  उसने पर्शियन लिपि की नश्तालिक लिखावट शैली [घसीटवाली] अख़्तियार की।  दक्षिण एशियायी ज़रूरत के अनुसार उसमें कुछ अक्षर [हर्फ़] बढ़ाए गए और इस रूप में उसे हिंदी या हिंदवी से एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हुई।  अभी तक हिंदी या हिंदवी की एक कोई लिपि नहीं तय थी।  वह पर्शियन व तुर्की लिपि में भी लिखी जाती थी, नागरी में भी और अन्य भारतीय लिपियों में भी।  लेकिन अब उर्दू का नश्तालिक फ़ारसी शैली में लिखना अनिवार्य हो गया।  उर्दू का छंद विधान व वर्ण्य विषय भी फ़ारसी शैली का हो गया।

भाषा के इस मज़हबीकरण की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी।  अब हिंदू के नाम से अभिहित भारतीयों ने अपनी अलग भाषाई पहचान के लिए ‘हिंदू’ शब्द से जुड़ी इस ‘हिंदी’ को अपनी भाषा के रूप में विकसित करना शुरू किया।  हिंदी में संस्कृत के शब्दों को अधिक संख्या में शामिल करना शुरू कर दिया।  भाषा के इस मज़हबी विभाजन को अंग्रेज़ी सत्ता ने आकर और पुष्ट किया, क्योंकि इसमें उसका दीर्घकलिक राजनीतिक हित था।


राबर्ट काल्डवेल : दक्षिण-उत्तर का भाषाई व
सांस्कृतिक विवाद खड़ा करने वाला पहला मिशनरी


भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा की नीति १८३५ में लागू हुई।  लगभग उसी समय दक्षिण में एक मिशनरी का पदार्पण हुआ, जिसका नाम राबर्ट काल्डवेल था।  यह इवेंजलिस्ट मिशनरी भाषा विज्ञान में भी रुचि रखता था।  उसने निम्न जातियों के धर्मांतरण का काम तेज़ी से चलाया।  काल्डवेल ने श्रमपूर्वक तमिल भाषा का अध्ययन किया।  उसने पहली बार दक्षिण भारत की भाषाओं को एक अलग भाषा परिवार घोषित किया। ‘द्रविडियन लैंग्वेज’ शब्द को पहली बार काल्डवेल ने प्रचलित किया।  उसकी इस अनूठे शोध के पहले दक्षिण भारत की भाषाएं भी संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं से संबद्ध मानी जाती थीं।  दक्षिण की प्राकृत भाषाएं निश्चय ही उत्तर की प्राकृत भाषाओं से भिन्न थीं, लेकिन हिमालय से समुद्र पर्यंत पूरे क्षेत्र के लिए विद्वानों की संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त संस्कृत से दक्षिण की ये भाषाएं भी समान रूप से प्रभावित थीं।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में गैरब्राह्मणवादी आंदोलन के ‘रेडिकलाइज़ेशन’ का श्रेय काल्डवेल को ही जाता है।  मज़हबी विस्तार का लक्ष्य पाने के लिए जो पृथकतावादी सिद्धांत गढ़ा, उससे देश आज तक आक्रांत है।  अंग्रेज़ शासकों को इससे दक्षिण में भी अंग्रेज़ी विस्तार को और मदद मिली।

फ़ारसी और अंग्रेज़ी के इस देश में आने के पूर्व संस्कृत के समानांतर एक जनभाषा भी देश में विद्यमान थी, जो समान्य जनों के स्तर पर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा थी।  इसकी पहचान जाने अनजाने भाषाई राजनीति के चक्कर में लुप्त हो गई।  राबर्ट काल्डवेल के पूर्व दक्षिण में भी कोई भाषाई या लिपि द्वेष के लिए स्थान नहीं था।  देश भर में प्रचलित लिपियों में से एक नागरी लिपि का चयन या विकास किया गया था।  इस देश की सारी लिपियां ब्राह्मी से विकसित हैं।  उनकी लेखनशैली भिन्न हो सकती है, किंतु उनकी वर्णमाला एक ही है।

अभी मात्र पाँच सौ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में [श्रीलंका पर्यंत] क्षेत्रीय भाषाओं और लिपियों के साथ संस्कृत भाषा और नागरी लिपि भी प्रचलित थी।  ९००ई. तक तो अपभ्रंश की देशव्यापी उपस्थिति की बाकायदे पहचान भी हो चुकी है।  लेकिन इस्लामिक आक्रमणों और उनके साम्राज्य विस्तार के कारण संस्कृत और अपभ्रंश दोनों का देशव्यापी या अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप छिन्न-भिन्न होने लगा और १३वीं शताब्दी के अंत तक अपभ्रंश और संस्कृत दोनों का अखिल भारती स्वरूप समाप्त हो गया।

वास्तव में देश में फैली राजनीतिक व संस्कृति अराजकता का सब से बड़ा कुप्रभाव भाषा पर पड़ा और राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता टूटने के कारण भाषाई एकता भी बिखर गई।  क्षेत्रीय सांस्कृतिक, भाषाई, राजनीतिक व मज़हबी इकाइयां बन जाने के कारण उनके बीच प्रतिस्पर्धा की भावना भी शुरू हो गई।  इस प्रतिस्पर्धा ने हर तरह की अराजकता को और बढ़ा दिया, जिसका बाद में आनेवाले ईसाइयों ने भरपूर फायद उठाया।

यह ध्यान देने की बात है कि अरबी, फ़ारसी, तुर्की मिश्रित इस उत्तरी भाषा [हिंदी] को दक्षिण के लोगों ने कभी दिल से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसे वे मुसलमानों की भाषा समझते थे।  इसकी प्रतिक्रिया में उनका अपनी क्षेत्रीय भाषाओं व लिपियों के प्रति आग्रह बढ़ता गया।  विड़म्बना देखिए कि बाद में मुस्लिम शासकों व विद्वानों ने भी इसी हिंदी भाषा और उसकी लिपि का परित्याग कर दिया, क्योंकि वे यहां के लोगों यानी हिंदुओं या भारतीयों से अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे।  इसलिए उन्होंने अपनी भाषा को ‘उर्दू’ नाम दिया और उसके लिए पर्शियन लिपि स्वीकार की।  

वास्तव में इस देश से यह गलतफ़हमी दूर होनी चाहिए कि हिंदी किसी क्षेत्र या मज़हब की भाषा है।  न संस्कृत किसी जाति, क्षेत्र या मज़हब की भाषा थी, न अपभ्रंश और न उसकी उत्तराधिकारिणी हिंदी।  इसे उत्तर भारत की कुछ भाषाओं का समूह भी नहीं कहा जाना चाहिए।  इस सामूहिकता की अवधारणा से उत्तर भारत की अपनी क्षेत्रीय भाषाओं का बहुत नुकसान हुआ है।



8 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हिन्दी के बारे में रोचक जानकारी, शीर्षक कुछ भी रख लें।

Sunil Kumar ने कहा…

हिंदी के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए आभार

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी देता विवेचन .... उम्दा पोस्ट साझा की आपने आभार

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

हिंदी सब भाषाओँ से समृद्ध हुई है .

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

डॉ. राधेश्याम शुक्ल जी के इस महत्वपूर्ण लेख को प्रस्तुत कर पढ़ने का सुअवसर प्रदान करने के लिए आभार.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ही विस्तृत और रोचक लख .. हिंदी के पतन के कारण और राजनीति का खेल जो सदियों से चल रहा है देश में ... जो आज तक चल रहा है ...

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

डॉ राधेश्याम शुक्ल जी के तीनों ही लेख बढ़िया हैं. ज्ञानवर्धक हैं. पाठक के मन में भारतीयता तथा 'हिंदी' शब्द और भाषा के प्रति जागरूकता को बढाते हैं. उनके तीनों लेखों को आपने सारसंक्षेप करके गागर में सागर भर दिया है. धन्यवाद.

यहीं पर मैं एक और बात आपसे बाँटना चाहता हूँ कि प्रो.ऋषभदेव शर्मा जी के हिंदी भाषा के सन्दर्भ में स्वतन्त्र वार्ता में प्रकाशित लेख भी हिंदी के प्रति पाठकों के मन में नई चेतना जगाने में सफल हैं.

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि ऐसे लेख या इन्ही लेखों को अनुवाद के माध्यम से अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध किया जा सके तो देश के अन्य भाषा-भाषी भी अपनी भाषाओं के प्रति चेतानायुक्त हो सकेंगे.

आपाकी क्या राय है?

संपत देवी मुरारका ने कहा…

डॉ. राधेश्याम शुक्ल जी के इस महत्वपूर्ण लेख को मैंने स्वतन्त्र वार्ता के साप्ताहिकी में पढ़ा था | दुबारा पढ़वाने के लिए आपको बधाई | धन्यवाद