मंगलवार, 14 जून 2011

प्रिंसिपल परशुराम



रूढ़ियों में जकड़ा- ‘प्रिंसिपल परशुराम’

रूढोयों के पालन को अपना ध्येय समझकर व्यक्ति उनका अंधानुसरण करने लगता है, भले ही वे असामयिक हो गए हों।  वह यह समझता है कि ऐसा करने से वह परम्परा का पालन कर रहा है जबकि उसे यह भी पता नहीं है कि उसकी परम्परा क्या है! इन्हीं गाँठों को खोलता है नाटक ‘प्रिंसिपल परशुराम’ जिसके रचयिता हैं कर्नाटक के प्रसिद्ध नाटककार डॉ.जी.जे.‘हरिजीत’।

नाटक का प्रारम्भ शुरू होता है रामायण की उस कथा से जिसमें शम्बूक-वध का वर्णन है।  शम्बूक ने प्रसन्नतापूर्वक अपने प्राण इसलिए त्यागे थे कि उसे राम ने अगले जन्म में ब्राह्मण का जन्म मिलने का आश्वासन दिया था।  आज के रूढ़ियों में जकड़े पढ़े-लिखे लोग भी जातिवाद के जाल में फ़ँसे हुए हैं।  इसी पहलू को उजागर करता है यह नाटक का दूसरा भाग, जो कलेज की पृष्ठभूमि में रचा गया है।

कालेज के आचार्य[चेयरमैन] अपने को श्रेष्ठवर्ग का समझते हैं और वे चाहते हैं कि इस संस्था में उसी वर्ग के लोगों को प्राथमिकता दी जाय।  परंतु आरक्षण की नीति के कारण उनके कालेज में हर वर्ग के शिक्षक मौजूद हैं।  फिर भी, वे ब्राह्मणों को वरीयता देना चाहते हैं और इसके लिए वे एक ऐसे कुंठित व्यक्ति को प्रिंसिपल बनाते हैं जो शिक्षा विभाग में अपने जातिवाद के कारण बदनाम होकर सेवानिवृत्ति ले ली थी।  यह व्यक्ति है परशुराम जो अपने को ब्राह्मण समझता है और अन्य वर्गों के शिक्षकों को हेय दृष्टि से देखता है।

प्रिंसिपल परशुराम के इन कृत्यों से परेशान शिक्षक यू.जी.सी., शिक्षा मंत्री या कॉलेज कमिशनर से शिकायत करना चाहते हैं पर इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि इससे कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि उनके लिए यह छोटी बात है और ‘छोटी-छोटी बातों के लिए वहाँ कौन सिर खपाता है।’

डॉ. ‘हरिजीत’ खुद एक शिक्षक रह चुके हैं और अपने अनुभव का उपयोग उन्होंने इस नाटक में खूब किया है।  प्रशासनिक जोड़तोड़ में किस प्रकार शिक्षकों में फूट डाली जाती है और कैसे अपनी किसी व्यक्ति को कालेज के पदों पर आसीन किया जाता है उसका अच्छा चित्रण किया है।  कॉलेज में पढ़ाने के लिए अपने किसी व्यक्ति को लाने के हत्कण्डे भी इस नाटक में दिखाए गए हैं।  आचार्य के बेटे को- जो किसी कंपनी में मैनेजर है, उसे कालेज में भी पार्ट-टाइम नौकरी दिलाना चाहता है।  इसका जुगाड़ करते हुए प्रिंसिपल परशुराम कहते हैं कि आचार्य का बेटा ‘पार्ट-टाइम’ कैसे कहलाए! इसलिए ‘उन्हें वेतन ज्यादा ही देंगे और विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कहेंगे।’

जातिवाद को लेकर इस नाटक में कई पात्रों के मुख से अलग-अलग बिंदू पर बात कही गई है।  जैसे परशुराम का अन्य वर्गों के खिलाफ़ ज़हर उगलते हुए कहना- ‘हम जानते हैं क्न साले ठाकुरों की नीयत’; या फिर, मुख्यमंत्री का कहना- ‘अब राम और रहीम दोनों हमारी मुठी में हैं’।  इस नाटक में ब्राह्मणि के मांसहारी, व्याभिचारी और भ्रष्टाचारि के चित्रण से लेकर दलित की उस सोच तक का चित्रण मिलता है जिसमें सभी वर्गों को  संकुचित मनोभावों से उठकर मानवता के उत्थान का आह्वान किया गया है।

डॉ. ‘हरिजीत’ ने रूढिवाद और परम्परावाद में जकड़े लोगों को अपने तर्क से इन रूढ़ियों को बदलने की चुनौती स्वीकार करते हुए समय के साथ चलने को कहा है।  अपने नाटक में उन्होंने सरल भाषा के साथ-साथ कुछ नए मुहावरों और कहावतों का भी प्रयोग किया है; जैसे, मांद में रह कर शेर से बैर [पानी में रह कर मगर से बैर की तर्ज़ पर], कानी के भाह में नौ सौ जोखम, मैं अकेला चना क्या भाड़ फोड़ूँ, विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा आदि।

डॉ. ‘हरिजीत’ ने अब तक १५ कृतियों की रचना की है जिनमें ३ अंगेज़ी पुस्तकें भी हैं।  इनकी अधिकतर पुस्तकों को पुरस्कृत किया गया है।  मणिपुर की पृष्ठभूमि में लिखे गए उनके नाटक ‘विद्रोही’ को आकाशवाणी ने पुरस्कार दिया था। उन्हें हैदराबाद की संस्था ने ‘आचार्य आनंदऋषि साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित किया है।  उनकी रचनाओं पर कई शोधार्थी एम.फिल. और पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त कर चुके हैं। प्रस्तुत नाटक को मंगलूर विश्वविद्यालय के बी.ए. की ऐच्छिक हिंदी कक्षाओं के लिए पाठ्य पुस्तक के रूप में स्वीकार किया गया है।


पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम : प्रिंसिपल परषुराम
नाटककार      : डॉ. जी.जे.‘हरिजीत’
पृष्ठ संख्या : ९६
मूल्य : ४० रुपये
प्रकाशक : भुवन भारती प्रकाशन
 ३९५, ५वां मेन, छठा ब्लाक
बनशंकरी ।।।, स्टेज ॥ फेज़
बेंगलूर - ५६० ०८५


10 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अब भी समाज में कई कुप्रथाएं बदस्तूर जारी हैं...... अच्छा विषय लिए पुस्तक .... सुंदर समीक्षा आभार

Sunil Kumar ने कहा…

आचार्य का बेटा ‘पार्ट-टाइम’ कैसे कहलाए! इसलिए ‘उन्हें वेतन ज्यादा ही देंगे और विज़िटिंग प्रोफ़ेसर कहेंगे।’
बहुत विस्तार से की है समीक्षा नाटक का विषय भी सही चुना, आभार

डा० अमर कुमार ने कहा…


पुस्तक का विषय अच्छा है... समीक्षा भी आपकी जानदार है पर..
मुझे नाटक पढ़ने में बड़ी उलझन होती है, जब तक इप्टा में सक्रिय रहा.. शायद स्क्रिप्ट सुधारते सुधारते यह एलर्ज़ी हुई हो !
उफ़.. खुज़लीऽऽऽऽऽ .....:)

Arvind Mishra ने कहा…

पुस्तक परिचय के लिए आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन का स्वार्थ नंगा नाच नाचता है, दोष परम्पराओं को दिया जाता है।

ZEAL ने कहा…

ऐसे प्रिंसिपल यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे हुए मिल जायेंगे।

ऋषभ Rishabha ने कहा…

पुरस्कार भी.
पाठ्यक्रम में भी.
एम फिल - पीएच डी भी.

ऊपर से यह समीक्षा.

एक हिंदीतरभाषी हिंदी लेखक को भला और चाहिए ही क्या!!!

veerubhai ने कहा…

सार्थक बहुत सटीक समीक्षा .आभार .जातिवाद की अमर बेल ही फल फूल रही है क्षेत्र वाद की राजनीति में .

Suman ने कहा…

पुस्तक परिचय के लिए आभार!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

समीक्षा पढी । धन्यवाद