शुक्रवार, 13 मई 2011

परितोष सेन = Paritosh Sen


       आधुनिक कला के प्रवर्तक- परितोष सेन 



ढाका में जन्मे परितोष सेन [१९१८-२००८] आधुनिक कला [मॉडर्न आर्ट] को प्रोत्साहित करने के लिए स्थापित ‘कलकत्ता ग्रूप’ के संस्थापक सदस्यों में से थे।  ‘कलकत्ता ग्रूप’ भारत की पहली कला संस्था है जिसने आधुनिक कला के लिए कलाकारों को एकजुट किया।  

परितोष सेन ऐसे कलाकार थे जिन्होंने रंगों के नये नये प्रयोग किए।  वे अपनी कला को निखारने के लिए अकादमी आंद्रे ल्हार्ट, अकदमी ला ग्रेंड शॉमीर, इकोल ड ब्यो आर्ट्स और इकोल ड लॉवरे जैसी फ़्रांस की संस्थाओं में शिक्षा ली।  इनकी कला से प्रभावित होकर १९५३ में विश्व के सब से महान कलाकार पाब्लो पिकासो ने उनके चित्रों को कुछ समय तक अपने पास रखने की इजाज़त माँगी थी।  हुआ यूँ कि पेरिस में सेन ने पिकासो से मिलने की इच्छा जताई तो उन्हें केवल पंद्रह मिनिट का समय दिया गया।  जब वे पिकासो से बात करके पंद्रह मिनट बाद अपनी कलाकृतियों को समेटने लगे तो पिकासो ने कहा कि ‘कुछ देर ठहर जाओ, मैं तुम्हारे चित्र कुछ देर और देखना चाहता हूँ। क्या तुम कुछ देर रुक सकते हो।’  यह ‘कुछ देर’ पूरे चार घंटी चली।  जब परितोष सेन निकल रहे थे तो पिकासो ने कहा ‘तुम्हारे चित्र मैंने देख लिए, अब तुम्हें मेरे चित्र देखना चाहिए’।  सेन इस घटना को अपने जीवन की अविस्मरणीय घटना मानते हैं।

१९५३ की इस घटना के बाद तो परितोष सेन ने कई प्रदर्शनियों में भाग लिया और वाहवाही लूटी।  उनके जीवन में कई सम्मान भी मिले।  १९६९ में उन्हें फ़्रेंच फ़ेलोशिप मिली और १९७० में रॉकफ़ेल्लर फ़ेलोशिप दी गई।  निश्चय ही इस कलाकार पर भारत ही नहीं संपूर्ण कला जगत को गर्व होगा।   




15 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

एक और महान कलाकार से आपने परिचय करवाया है आपके आभारी है

सतीश सक्सेना ने कहा…

परितोष सेन के बारे में जानकार अच्छा लगा ! शुभकामनाये आपको !

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

नमस्कार सर.
आपने मुझे भावुक बना दिया. दो बड़े कलाकारों की भेट, कितना अपना पन, कितना प्रेम और एक दूसरे के प्रति सम्मान. 'कुछ देर' 'चार घंटे' बनना, ऐसा तो पुराने दोस्त ही कर सकते हैं.जिनके मन जुड़े होते हैं. पिकासो और परितोष के मन जुड़े हुए थे. दोनों की भेट हुई. हिंदी और अंग्रेजी लिपि के अनुसार दोनों के नामों में 'प' की ध्वनि आती है.नामों की ध्वनियाँ मिलती हैं एक और संयोग देखिए इस लेख के लेखक के नाम में भी 'प' (प्रसाद) है.

बड़े लोग अपने पद या दाम से बड़े नहीं होते. वे बड़े होते हैं अपने व्यहार और काम से.

इसे पढ़कर मुझे अपने प्रो.दिलीप सिंह जी से मिलने की बात याद आ गयी. मेरे पीएच.डी के काम के समय वे हैदराबाद आए हुए थे.

जब मैं कक्ष में पहुंचा तब सर लेटे हुए थे. जैसे ही मैंने अपनी सामग्री सर की ओर बढ़ाई सर झठ से उठकर बैठ गए और एक-एक पन्ना पलट-पलट कर देखा. अंत में कहा - भाषा वाले हिस्से को ध्यान से देख लेना. फ़ाइनल के पहले प्रूफ भी अच्छी तरह से देख लेना कहकर आशीर्वाद दिया.

मेरे कहने का मतलब यह है कि महान व्यक्ति अपने व्यवहार से किसी भी साधारण सी बात या घटना को असाधारण बना देते हैं. और भेट कर्ता के मन में कभी न मिटने वाला चित्र बना देते हैं.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

निश्चय ही हमें गर्व है।

Gyandutt Pandey ने कहा…

ढ़ूंढते हैं परितोष सेन के चित्र नेट पर।

Gyandutt Pandey ने कहा…

Oh, unlike the art which is beyond understanding, the paintings are really having strokes of greatness!

Suman ने कहा…

अच्छी जानकारी के लिए
आभार .............

arpanadipti ने कहा…

paritosh sen ke baare me jaankar achcha laga

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आधुनिक कला के प्रवर्तक- परितोष सेन जी के बारे में जानकार सुखद लगा !
आभार ...

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

एक महान कलाकार से परिचय कराने के लिए आभार। दो महान कलाकारों के भेंट संस्मरण ने यह बता दिया कि जो जितना महान होता है वह उतना विनम्र।

राज भाटिय़ा ने कहा…

परितोष सेन जी से परिचय करवाने के लिये आप का धन्यवाद

Babli ने कहा…

परितोष जी के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा! सुन्दर प्रस्तुती!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रितोष सेन के बारे में जानकर अच्छा लगा ...

Babli ने कहा…

आपकी उत्साह भरी टिप्पणी और हौसला अफजाही के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

Amrita Tanmay ने कहा…

परितोष सेन के बारे में जानना सुखद है ..सुन्दर पोस्ट