बुधवार, 18 मई 2011

‘संकल्य’ त्रैमासिक पत्रिका का आदिवासी विशेषांक





‘संकल्य’ का आदिवासी विशेषांक


 हैदराबाद से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘संकल्य’ का अक्तूबर२०१०-मार्च २०११ का संयुक्त अंक  आदिवासी विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है।  इस अंक के सम्पादकीय में प्रधान सम्पादक डॉ. टी.मोहन सिंह कहते हैं कि "स्वतंत्रता प्राप्ति के ६४ वर्ष बाद भी विश्व की प्रसिद्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत में यदि कोई समुदाय उपेक्षित, शोषित, अशिक्षित एवं हाशिए पर डाला गया है तो वह है जनजातीय समाज।  देश के सुदूर अंचलों में, घने जंगलों में, पहाड़ों में रहते हुए अन्य नागरिकों को प्राप्त सुख-सुविधाओं से अनभिज्ञ अधिकांश आदिवासी आधुनिक प्रगति से दूर, पहले से भी बदत्तर जीवन जीने के लिए, अपमान और यातना को सहने के लिए विवश है।... देश के कई आदिवासी भयावह गरीबी, भूख, बेरोज़गारी, कुपोषण, बीमारी और विस्थापन के शिकार हैं।"

पत्रिका के अतिथि सम्पादक प्रो. हेमराज मीणा की कलम से यह विचार निकले- "आदिवासी और दलित विमर्श के अंतर का लोगों को पता ही नहीं है।  आदिवासी समाज का संसार अलग प्रकार का है।  वहाँ दलित चेतना का कोई स्थान नहीं है।  आदिवासी के पास अपनी भाषा, अपनी सांस्कृतिक विरासत तथा अपनी गौरवशाली परम्परा रही है।...जनजातीय भाषा, साहित्य एवं संस्कृति की समृद्ध परम्परा से पाठकों को परिचित कराना तथा अध्ययन अनुसंधान में अभिरुचि रखनेवाले और इस विषय से अपरिचित देशवासियों को आदिवासी समाज से परिचित कराना जनजातीय शोध की समझ के लिए प्रमाणिक जानकारी देना इस विशेषांक का मूल उद्देश्य है।"

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिंदी के वरिष्ठ लेखक और बुद्धिजीवियों ने सहयोग दिया है।  इस अंक में आदिवासी भारत, आंध्र प्रदेश, पूर्वोत्तर भारत, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड जैसे भारत के विभिन्न प्रदेशों के आदिवासियों की समस्याओं पर चर्चा की गई है।  साथ ही आदिवासी साहित्य, विमर्श और भेंटवार्ता का भी समावेश है।  अंत में पुस्तक समीक्षा में ‘करमा’ के समाजशास्त्र पर डॉ. श्रीप्रकाश शुक्ल की समीक्षा है।

प्रो. दिलीप सिंह, पंकज द्विवेदी, डॉ. जे.एस.यादव, हरिराम मीणा, प्रो. टी.वी.कट्टीमनी, डॉ.रमेशचंद मीणा, डॉ.प्रतिभा मुदलियार, डॉ.सुनीति आचार्य, डॉ.संजय चतुर्वेदी और ए. अनुराधा ने आदिवासी भारत का खाका खींचा है।

आंध्र प्रदेश के आदिवासी जीवन व साहित्य पर राजेश्वर तिवारी, नरसा रेड्डी, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. माया देवी, डॉ. वी.एल.नरसिंहम शिवकोटि तथा जाधव कविता ने प्रकाश डाला है।  पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम तथा सिक्किम के जनजातीय संस्कृति पर जिन ग्यारह रचनाकारों के विचारों को संकलित किया गया है, वे हैं-प्रो. अनंत कुमार नाथ, डॉ. रमण शांडिल्या, हरीश कुमार शर्मा, प्रो. जगमल सिंह, डॉ.शिबानी राय, के.ज्योखामो लोथा, प्रो. नंदकिशोर पांडेय, पॉली भौमिक, बनललरुआती, मिलन रानी जमातिया और डॉ.उत्तम लाल।  अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कृष्ण कुमार यादव, डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी, ममता चौहान और मंजू नायर की रचनाएं इस अंक में समाहित हैं।

गुजरात के जनजातियों पर डॉ.दीपेंद्र सिंह जाडेजा तथा डॉ. धनंजय चौहाण ने प्रकाश डाला है।  मध्य प्रदेश के लोक साहित्य पर डॉ. हीरालाल बाछोतिया और भीली भाषा पर डॉ.साईदा मेहर ने लेख लिखे हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी, मुंडा भाषा और बस्तर आदिवासियों के कुछ प्रसंग लेकर आए हैं डॉ. अनिता गांगुली, डॉ.रामनिवास साहू और शारदा।  झारखंड की मुंडारी लोक गीतों और भाषाओं का मूल्यांकन किया है डॉ. बालेंदु शेखर तिवारी और डॉ. दिग्विजय कुमार शर्मा ने।  उत्तर प्रदेश के लालजी राय, डॉ.वेद प्रकाश पांडेय और डॉ. अर्जुन दास केसरी ने वहाँ के थारू और सोनघाटी की प्रथाओं पर प्रकाश डाला है। भारत के आदिवासी क्षेत्रों पर सम्पूर्ण जानकारी देता यह अंक जिज्ञासुओं और शोधार्थियों के लिए बहुमूल्य प्रमाणित होगा।

‘संकल्य’ के इस विशेषांक का मूल्य २०० रुपये रखा गया है और इसे सम्पादकीय कार्यालय के पते- प्लाट नं.१०, रोड नं.६, समतापुरी कॉलोनी, न्यू नागोल, हैदराबाद-५०० ०३५ [फोन नं.०४०-२४०५४३०६] से सम्पर्क करके प्राप्त किया जा सकता है।


12 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

संकल्य का मुखपृष्ठ बड़ा आकर्षक लग रहा है। देखने टटोटले का मन हो आया!

Amrita Tanmay ने कहा…

आदिवासी विशेषांक आकर्षक जान पड़ रहा है ..जानकारी के लिए आभार..

Suman ने कहा…

अच्छी जानकारी
आभार भाई जी !

डा० अमर कुमार ने कहा…

खीर बहुत स्वादिष्ट है... यह तो बता दिया
जरा हमें भी तो चखाइये महाराज ! अर्थात
भाई साहब, यह तो बता दें कि यह पत्रिका कहाँ और कैसे उपलब्ध हो सकती है

डा० अमर कुमार ने कहा…

पुनःश्च -- उपरोक्त टिप्पणी इसलिये कि
वहाँ कोई फोन नहीं उठा रहा है !

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुन्दर और अच्छी जानकारी ,धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आदिवासियों को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत करने के विशेष प्रयास के लिये आभार।

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

nice and commendable initiative..

संजीव ने कहा…

डॉ. अनिता गांगुली, डॉ.रामनिवास साहू और शारदा हमारे लिए नये नाम है, चलिए देखते हैं क्‍या लिखा है इन्‍होंनें.

कविता रावत ने कहा…

आदिवासी विशेषांक की सुन्दर और अच्छी जानकारी के लिए आभार..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी, संकल्य का आवरण चित्र हैदराबाद के प्रसिद्ध चित्रकार एवं कवि नरेन्द्र राय ‘नरेन’ ने बनाया है।
आदरणीय अमृता तन्मयजी, सुमनजी, राज भाटिया जी, अमित श्रीवस्तव जी,संजीव जी और कविता रावत जी, आप सब का आभार कि यह अंक का परिचय आप लोगों को पसंद आया।

आदरणीय डॉ. अमर कुमार जी, मैं आपको इस पत्रिका के सचिव डॉ. गोरखनाथ तिवारी का सेल फ़ोन नं दे रहा हूं, शायद संपर्क हो जाय। उनका नं है 09441017160.

mahi ने कहा…

ये पत्रिका कहाँ मिलेगी सरजी ?बहुत जरुरत है..............