सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

जीवन मूल्य


जीवन मूल्य - परम्परा और आधुनिकता

विद्वानों का यह मानना है कि आधुनिक सौंदर्यशास्त्र की नव्यतम उपलब्धियाँ तथा प्राचीन संस्कृत साहित्य और काव्यशास्त्र के तुलनात्मक अध्ययन से अनेक स्थलों पर समानताएं मिलती हैं। फिर भी, परम्परावादी और आधुनिकतावादी के बीच टकराव देखा जा सकता है।  किसी भी पथप्रदर्शक या रचनाकार के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने आसपास के परिदृश्य पर नज़र रखें पर परिवेश की प्रतिक्रियाओं के प्रभाव से अपनी आत्मनिष्ठा को मलिन न होने दें और जीवन-मूल्यों के निजी-बोध को दिन-ब-दिन समृद्ध करें।

यह जीवन मूल्य क्या हैं?  मूल्य का अर्थ है जीवन-दृष्टि या स्थापित वैचारिक इकाई। विचार तो समय के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए मूल्यों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है- शाश्वत और सामयिक।  सामयिक मूल्यों में समय के साथ परिवर्तन होता रहता है ।  आज समय की रफ़्तार तेज़ हो गई है और इसी के साथ इन मूल्यों में भी तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है।  परिणामस्वरूप, इसका असर धीरे-धीरे शाश्वत मूल्यों पर भी पड़ रहा है जो इतनी धीमी रफ़्तार से होता है कि इन बदलावों को महसूस करने में लम्बा समय लगता है।

स्वभाव से मनुष्य सदैव व्यवस्था को तोड़ना चाहता है और यही प्रवृत्ति समाज में मूल्य-परिवर्तन का प्रमुख कारण है।  इसीलिए नई पीढ़ी आदर्श भावना या पुराने चलन को तोड़ना चाहती है।  इसका एक कारण यह भी है कि आदर्श और यथार्थ का संघर्ष निरंतर चलता रहता है और यथार्थ आदर्श की मंजिल पर कभी नहीं पहुँच पाता।  इसके कारण सदा ही एक रिक्तता महसूस की जाती है।  इस रिक्तता को पाटने के लिए बदलाव की प्रक्रिया होती रहती है।

यूँ तो, मूल्य-परिवर्तन के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। जैसे, किसी अन्य संस्कृति का अनुसरण या सरकार द्वारा लोकमत बनाया जाना, जिससे बदलाव की प्रक्रिया शुरू होती है।  सती प्रथा, बाल विवाह, पुनर्विवाह जैसी सामाजिक रीतियों के बारे में समाज की सोच में बदलाव आए हैं।  इन बदलावों का प्रभाव समाज पर क्या होगा, इसे भविष्य ही आंक सकेगा।  अब यौन-क्रांति के इस युग में अश्लील भी श्लील होता जा रहा है। एक समय था जब किसी पत्र-पत्रिका में अश्लील चित्र नहीं छपते थे, धीरे धीरे कुछ पत्रिकाएं छापने लगीं तो यह बवाल भी उठा कि इन पत्रिकाओं को परिवार से दूर रखा जाना चाहिए लेकिन आज ऐसी कोई पारिवारिक पत्रिका नहीं है जहाँ ऐसे चित्र न छपते हों और अब इन्हें पाठकों ने स्वीकार भी कर लिया है!  ऐसे में, यह प्रश्न उठता है कि श्लील और अश्लील की विभाजन रेखा क्या है?

आज तो बात इससे आगे बढ़ गई है।  गे पावर मूवमेंट, यूनिसेक्स मूवमेंट, तलाक, गर्भपात, समलैंगिकता आदि को दी गई विधिक स्वीकृति यह साबित कर रही है कि आज परम्परागत मूल्यों पर चारों ओर से प्रहार किया जा रहा है।  सांस्कृतिक-क्रांति के नाम पर यौन क्रांति लाई जाएगी तो इसका असर परिवार और समाज के पारम्परिक जीवन-मूल्यों पर पडेगा।  यह एक गम्भीर विचार का मुद्दा है कि क्या इस माहौल में पारम्परिक मूल्यों की रक्षा की जा सकती है?

आज समाज और संसार सिकुड़ते जा रहे हैं जिसके कारण मूल्य-परिवर्तन बहुत तेज़ी के साथ हो रहे हैं और उनका विस्तार निरंतर होता जा रहा है।  इस तेज़ रफ़्तार के कारण परिवर्तन इस युग का ‘संक्रमण’ बन गया है।  वैज्ञानिक प्रगति के कारण जैसे-जैसे संसार सिकुडता जाएगा, वैसे-वैसे पारम्परिक मूल्य घटते जाएँगे।  

आधुनिकतावादी यह मानते हैं कि परम्परावादी यथास्थिति को बरकरार रखना चाहते हैं जिससे उनका वर्ग-स्वार्थ सिद्ध हो सके और आधुनिकतावादी अपने वैचारिक चुनौतियों से बदलाव लाना चाहते हैं।  प्रायः यह देखा गया है कि परम्परा के पक्षधर बदलाव नहीं चाहते।  यह भी सत्य है कि वे जबरन सीमाएँ थोपते हैं और यदि कोई इन सीमाओं को लांघना चाहें तो उसे विद्रोही करार दिया जाता है और यहीं से टकराव शुरू हो जाता है।

यूनान, मिस्त्र, हिंदुस्तान, चीन आदि देशों में सभ्यता की एक लम्बी परम्परा का इतिहास है। ऐसे में, कुछ परम्पराएँ रूढ़ि-जर्जर हो गए हैं और इनमें कोई सृजनात्मक परिवर्तन किया जाय तो वे आज के आधुनिक समाज को भी लाभान्वित कर सकते हैं।  परंतु आधुनिकतावादी इन्हें सिरे से नकार देते हैं क्योंकि वे अपनेआप को विद्रोही प्रमाणित करना चाहते है। वे यह समझते हैं कि आधुनिकता परम्परा के सिर चढ़ कर ही पाई जा सकती है।

विश्व सिकुड़ता जा रहा है और अब भारतीय एवं पाश्चात्य टकराव कोई मायने नहीं रखता क्योंकि किसी नए जीवन-मूल्य को रोकना अब आसान नहीं है।  ऐसे में आधुनिकता-बोध ढोने और बढ़ाने का दायित्व नई पीढ़ी पर है।  आज तो आधुनिकता भी तेज़ी से परम्परा और रूढ़ि की ओर अग्रसर है जबकि उत्तर-आधुनिकता उसका स्थान ले रहा है।

जीवन परिवर्तनशील है और उसके साथ कुछ जीवन-मूल्यों में भी बदलाव आता है; परंतु कुछ ऐसे शाश्वत जीवन मूल्य हैं जो कभी नहीं बदलते और उन्हें उत्तर-आधुनिकतावादियों को अपने कंधों पर ढोना ही पड़ेगा।  इसका सटीक उदाहरण हमें डॉ. हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नई लीक’ में मिलता है:

जिन्दगी और जमाने की कशमकश से
घबरा कर मेरे लड़के मुझसे पूछते हैं,
"हमें पैदा क्यों किया था?"
और मेरे पास इसके सिवा
कोई जवाब नहीं है
कि मेरे बाप ने भी मुझसे बिना पूछे
मुझे पैदा किया था,
और मेरे बाप से बिना पूछे उनके बाप ने, उन्हें
और मेरे बाबा से बिना पूछे उनके बाप ने, उन्हें...
जिन्दगी और जमाने की कशमकश
पहले भी थी,
अब भी है, शायद ज़्यादा,
आगे भी होगी, शायद और भी ज़्यादा।
तुम्हीं नई लीक धरना
अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना॥    


[यह लेख कुछ वर्ष पूर्व विभिन्न विद्वानों के विचारों को लेकर लिखा गया था पर आज उनके नाम बताने में असमर्थ हूं,  इसलिए यह लेख सभी वरिष्ठ हिंदी साहित्यकारों को समर्पित है :) ]

17 टिप्‍पणियां:

ऋषभ Rishabha ने कहा…

जिससे जीवन मूल्यवान बने, उसे जीवनमूल्य कहें, तो सवाल पैदा होता है कि मूल्यवान होना किसे कहते हैं.

जीवन की मूल्यवत्ता सापेक्ष प्रतीत होती है.शायद इसी को आपने सामयिक जीवनमूल्य माना है.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

वर्तमान मे जीवन का ही मूल्य नही तो जीवनमूल्य का क्या मूल्य

सतीश सक्सेना ने कहा…


हम परम्परा और स्थापित आदर्शों को अपने जीवन में देखना चाहते हैं और नयी पीढ़ी इन आदर्शों को इस उम्र में स्वीकार नहीं करती ! वैचारिकता में यह टकराव नया तो नहीं की आप जैसा प्रबुद्ध वर्ग भी दिग्भ्रमित हो !
शायद हमें स्वीकार कर लेना चाहिए की दोनों के रास्ते ही अलग हैं...कष्ट दायक है मगर झेलना ही होगा !
जियो और जीने दो ...
शुभकामनायें आपको !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विचारों की हिलोर लेता हुआ लेख। प्रश्न सौन्दर्य का नहीं है, वह तो सदा ही आकर्षण उत्पन्न करता रहा है, प्रश्न उसकी अभिव्यक्ति का है, शालीन या फूहड़।
प्रश्न सुख का भी नहीं है, सबको चाहिये, पर वह समग्रता से आये सार्वजनिकता से आये या व्यक्तिगत और फूहड़ तरीके से।

सञ्जय झा ने कहा…

bhai praveenji ke shabd mere vichar ko paribhashit
karte hain..........

pranam.

Suman ने कहा…

samay ke sath sab kuch badlta rahata hai.yehi prakrti ka niyeam hai.prsad ji bahut acha lekh hai........

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सर जी, कविता क्या कही आपने मेरे दिल की बात कह दी !:) यह संयोग ही है कि इसी टोपिक पर हम कुछ मित्र लोग अपने उत्तराखंड के पोर्टल पर वाद-विवाद कर रहे है आज कल ! आपके लेख के कुछ अंश आपको बिना पूछे ( मगर आपके ब्लॉग के लिंक के साथ) वहा भी उद्घृत कर रहा हूँ ! उम्मीद है आप मुझे इजाजत देंगे ! उस पोर्टल का लिंक यह है http://uttaranchal.yuku.com/topic/2788/Namaskar?page=2

cmpershad ने कहा…

भाई गोदियाल जी, यह कविता बच्चन जी की लिखी है जिसका शीर्षक है ‘नई लीक’। इस लेख को आप सहर्श कहीं भी प्रयोग में ला सकते हैं क्योंकि जैसा कि मैंने खुद अपने फुटनोट में लिखा है कि यह किन्हीं लेखकों के लेख से लिए गए विचार है। कौन लेखन थे, पता नहीं क्योंकि बहुत अर्सा पहले यह लेख लिखा गया था। आप को पसंद आया, मेरा लिखना सार्थक हुआ:)

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

गहन वैचारिक प्रस्तुति..... इन बातों पर विचार किया जाना आवशयक है.....

Arvind Mishra ने कहा…

विचारोत्तेजक निबंध -बस आनंद या यूं कहिये घनानंद आ गया !

ZEAL ने कहा…

हर पीढ़ी यही प्रश्न कर रही है है अगली पीढ़ी से ।

Luv ने कहा…

Brilliant writing as usual. Here are my 2 cents:

There are highly personal value systems and there are societal norms. When value systems of a sizable individuals is not in sync with norms - turbulence will be seen. Not to surprising that the norms morph a little to accommodate such differences.

To me, and I guess you and most of your readers would agree, it doesn't sound right that norms should represent the majority.

Also, I believe that the core of our value systems is too deep rooted to change - built upon centuries. I mean, a Japanese is collectivist and an American is not - that is broadly not going to change. I believe, sooner than later, we would be seeing a co-existence with understanding - that others are built differently, even talk differently - Latinos wont let you finish and will jump in, Japs and even Indians (Atalji effect :P) would think for sometime after you finish talking - rather than a convergence of value systems and norms.

hoping to listen from you...

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

बिल्कुल सही बात कहें आप ............. सच , इस परिवर्तनशील समाज में जीवन मूल्यों का ह्रास हुआ है. बहुत ही विचारणीय और बेहतरीन प्रस्तुति.
'
सैनिक शिक्षा सबके लिये

amit-nivedita ने कहा…

ek saargarbhit lekh....

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

जानदार और शानदार है। प्रस्तुति हेतु आभार।
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कृपया पर्यावरण संबंधी इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
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शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

cmpershad ने कहा…

हां भाई डॊ.डंडा जी, तभी तो बोन्साई का युग आ गया है :)

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

चंद्रमौलेस्वर जी नमस्कार .
बहुत ही विचारणीय और बेहतरीन प्रस्तुति.