बुधवार, 8 सितंबर 2010

Old age - बुढ़ापा [3] - सिमोन द बुवा -'मानव जाति विज्ञान'


बुढ़ापा : मानव जाति विज्ञान     

अनादि काल से मानव एक झुंड में रहता आया  है। झुंड में रहने के कई कारण हो सकते हैं परंतु एक मुख्य कारण था अपने आप को खूंखार जीव-जंतुओं से बचाए रखना।  झुंड में रहते-रहते मानव जाति की स्थापना हुई और विभिन्न प्रकार की जातियां संसार में पनपने लगीं।  हर जाति की अपनी अलग पहचान बनी और अपनी अपनी सुविधानुसार प्रथाएं भी  बनने लगीं। इन जातियों में वृद्धों की क्या परिस्थिति थी, इसके खोजपूर्ण इतिहास को प्रस्तुत  किया है सिमोन द बुवा  ने अपनी पुस्तक ‘ओल्ड एज’ में। अपनी इस पुस्तक में वे बताती हैं कि -

"सभी प्राणियों में [जिनमें पशुओं की जातियां भी आती हैं] वृद्धों का विशेष स्थान रहा है। गौर करनेवाली बात यह है कि प्रायः हर जाति के जीवों में पुरुष का प्रमुख स्थान रहा है।  जहाँ वृद्धों की मुख्य भूमिका रही, वहीं लड़ाई-झगड़े नहीं होते थे क्योंकि वे अनुभवी और शांत होते हैं।  वानर जाति के अध्ययन में यह पाया गया कि उनके बच्चे वृद्धों की करनी का अनुसरण करते हैं जबकि हमउम्र की करतूतों को अनदेखा कर देते हैं।  यह भी देखा गया कि जब कोई बंदर समझ जाता कि नेता बूढ़ा हो गया है और उसमें अब उतनी शक्ति नहीं रह गई है कि वह अपने झुंड को सम्भाल सके तो वह सत्ता प्राप्त करने के लिए उस वृद्ध की हत्या कर देता।  मानव जातियों के इतिहास में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।

"मानव जातियों में अपने ज्ञान और अनुभव के कारण वृद्ध को विशेष स्थान भले ही दिया गया हो पर अवसर पाकर उसे घर और समाज के इस विशेष स्थान से हटा भी दिया जाता है; या फिर, परिस्थिति भांप कर वृद्ध खुद ही हट जाता है।  मानव समाजों में बुढ़ापे को एक प्राकृतिक अभिशाप माना गया है।  वृद्ध को युवा पीढ़ी एक प्रकार से घृणित दृष्टि से देखती है और कभी-कभी उनका मखौल भी उड़ाया   जाता है। वृद्धों के प्रति विभिन्न जातियों में किस प्रकार का व्यवहार होता है, इसे विस्तार से देखा जाय।

"अफ्रीका  के कोंगो क्षेत्र की  चिटुमे जाति के लोग जब यह समझ जाते कि उनका मुख्य पुरोहित कमज़ोर हो गया है और उसका स्वास्थ्य  गिरने लगा है तो वे उसे मार देते थे। वे यह मानते थे कि यदि वह अपनी पूरी आयु जीकर प्राकृतिक मृत्यु को प्राप्त होगा तो अपने साथ वह अपनी दैविक शक्ति भी ले जाएगा।

"फ़्रेज़र यह जानकारी देते हैं कि फ़िजी के वृद्ध भी स्वेच्छा से इसलिए आत्महत्या कर लेते  थे कि इस आयु को आगे लेकर जिएंगे और भविष्य में जराक्षीणता से सदा के लिए बच जाएँगे। कई लेखकों ने सूडान की डिंका जाति में भी इसी प्रकार की प्रथाओं का ज़िक्र किया है। इस जाति में यह माना जाता है कि कुछ लोग वर्षा लाने या मछली के भाले बनाने की क्षमता रखते है। ऐसे लोग वृद्ध होने पर अपनी स्वेच्छा से कहते हैं कि उन्हें जीवित गाड दिया जाय।  इस जाति का यह मानना है कि ऐसे व्यक्तियों की यदि स्वाभाविक  मृत्यु होती है तो उनके साथ समस्त जाति भी नष्ट हो जाती है।  ऐसी जातियों का जीवन आधुनिक सभ्यता से दूर है और औद्योगिक प्रगति उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती है।

"हर जाति की अपनी मान्यताएं होती हैं। पैसिफ़िक समुद्र के छोर पर बसनेवाली जातियों का यह विश्वास है कि प्रथा की चूक के कारण ही जलप्रलय हुई थी।  नील नदी के तट पर बसनेवाली जाति ओसीरिस में श्रद्धा रखती है जिसे  वे   खेत का देवता मानते हैं और यह विश्वास करते हैं कि हर वर्ष फ़सल की कटाई के बाद वह  मर जाता   है और अगले वर्ष फिर जीवित हो जाटा है।  चीन के राजा के राज्याभिषेक से नए संवत्सर का प्रारम्भ होता है और यह माना जाता है कि उस दिन से पुराना युग समाप्त हो गया है। जापान की शिन्तो प्रथा में मंदिरों का निर्माण भी समय समय पर नए सिरे से किया जाता है। ‘इसे’ देवता का महान मंदिर तो हर बीस वर्ष में नवनिर्मित होता है।  उनका मानना है कि इस प्रकार के नवनिर्माण से मनुष्य और ईश्वर के बीच का गठबंधन कभी पुराना नहीं होता। इन मिथकों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मनुष्य भविष्य की ओर देखने की बजाय अपने अतीत की अधिक सुरक्षा करना चाहता है।

"समस्या तब होती है जब बुढ़ापे को घृणा से देखा जाता है क्योंकि सारा समाज एक साथ बूढ़ा नहीं होता।  युवा पीढ़ी वृद्धों को बोझ समझती है।  परंतु ऐसी सोच हर कहीं देखने में नहीं आती।  यदि कोई वृद्ध विद्वान और सम्पन्न होता है तो उसे आदर से देखा जाता है।  अपनी  वृद्धावस्था के कारण वह मरने के करीब होता है, इसलिए उसे 'इस' दुनिया और ‘उस’ दुनिया के बीच की कड़ी के रूप में देखा जाता है।

"उत्तरी ध्रुव के एस्किमो समाज में यह माना जाता है कि ‘नेविर्क देवी’ समुद्र के नीचे रहती है और मरनेवालों के प्रेत  उसके साथ वास करते हैं।  जब तक कोई ओझा उसके सिर के बाल नहीं संवारता तब तक वह आंधी, तूफ़ान से संरक्षण नहीं देती। मौसम और परिस्थितियों की मार को झेलनेवाली ऐसी जातियों के वृद्धों का जीवन जानवरों की तरह होता है।

"साइबेरिया की जनजाति में जादू-टोने की अधिक मान्यता है।  इसलिए यहाँ ओझाओं को आदर से देखा जाता  है भले ही वे बूढ़े हों।  इस जाति में पितृसत्ता की प्रथा है।  पिता को पूर्ण अधिकार है कि वह अपनी संतान को बेचे या मार दे।  यदि कोई संतान अपने पिता की आज्ञा का निरादर करती है तो उसे सम्पत्ति से वंचित करने का अधिकार पिता को होता है।  इसके चलते पिता अपने परिवार पर सख्ती से राज करता है।  जब वह बूढ़ा और असहाय हो जाता है तो उत्तराधिकारी भी उसे अनादर की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे वृद्ध को या तो उसकी किस्मत पर कहीं छोड़ दिया जाता है या वह भूख और ठंड से तड़प-तड़प कर मर जाता है। इसी प्रकार की प्रथा जापान की ऐनु जाति में भी देखी जाती है।

"एक दूसरा पहलू बोलीविया के जंगलों में रहनेवाली गरीब सिरियोनो जाति में देखने को मिलता है। इस जाति के लोग अपने बच्चों से अधिक प्रेम करते हैं यद्यपि ये बच्चे जंगलों की विषम परिस्थितियों  में पैदा होते हैं।  ये लोग अपने वृद्धों को आदर और सम्मान से देखते हैं।  गबून में बसनेवाली फ़ेंग जाति सिरियोनो के जितनी अभावग्रस्त तो नहीं है। यहाँ के युवा शिकार करते और मछली पकड़ते हैं और कुछ खेती भी करते हैं।  गोरों के आगमन से अधिकतर लोग ईसाई बन गए हैं और अपने पूर्वजों के देवताओं को भूल गए हैं।  इस जाति में भी वृद्धों को सम्मान से रखा जाता है पर महिलाओं को कोई अधिकार नहीं मिलता।  ईसाइयत अपनाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। वृद्ध महिलाएं दुखी व तिरस्कृत रहती हैं और जंगलों में छोड़ दी जाती हैं।

"दक्षिण अफ्रीका  की  थोंगा जाति के पुरुष कई महिलाओं को अपनी पत्नी बनाकर रखते हैं। उनका काम खेती करना, भेड़-बकरी चराना और कमा कर पुरुषों व बच्चों का पालन-पोषण करना होता है।पहले वे अपने पति को, फिर बच्चों को खिलाएंगी और अंत में खुद खाएंगी।  बूढ़ों और बीमारों का उतना आदर नहीं होता है। पौत्र भी दादा की इज़्ज़त नहीं करते और उन्हें चिढ़ाते रहते हैं।  थोंगा जाति की कोई सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरोहर नहीं है। अमीर बनने के लिए पुरुष कई विवाह करते हैं क्योंकि जितनी अधिक पत्नियां होंगी, उतनी अधिक सम्पन्नता होगी।

"१९४५ में साइमंस  ने ३९ जातियों का एक सर्वेक्षण किया था। इन ३९ जातियों में से १८ ऐसी हैं जिनमें बूढ़ों को तिरस्कृत करके उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।  उत्तर साइबेरिया के कोर्याक में यह प्रथा है कि बूढ़ों की सहमति [ज़बरदस्ती से ही सही] लेकर उन्हें एक समारोह में मार दिया जाता है। यहाँ की चुक्ची जाति में भी इसी प्रकार की प्रथा है जिसमें वृद्ध का बेटा या भाई उसे रेत देता है। दक्षिण अफ्रीका  के होपी, क्रीक, बुशमैन जाति के लोग ग्राम के बाहर एक झोंपड़ी बनाकर उसमें वृद्ध को उसके भाग्य पर छोड़ देते हैं।  एस्किमो अपने वृद्धों को बर्फ़ के नीचे गाड़ देते हैं ताकि वे ठंड से मर जाएँ  जबकि ग्रीनलैंड के वृद्ध एस्किमो जब यह जान लेते हैं कि वे समाज के किसी काम के नहीं रहे तो वे बोझ बनने की बजाय आत्महत्या कर लेते हैं।

"विन्निपेग के उत्तरी ओजिववे के लोग गोरों की संस्कृति से प्रभावित होकर वृद्धों का सम्मान करने लगे हैं।  पिता अपने पुत्र के साथ रहता है और पौत्र-पौत्री वृद्ध का सम्मान करते हैं।  वृद्ध भी उन्हें प्रेम से अच्छे संस्कार सिखाता है। अल्यूशन टापू के अल्यूट जाति के मंगोल मेहनतकश होते हैं और मछली पकड़ने का काम करते हैं।  इनमें वृद्धों को सम्मान से देखा जाता है और बच्चे अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं।  बूढ़ी महिलाएं बीमारों की देखरेख करती हैं।

"कई आदिवासियों में ज्ञान और जादूटोना एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं और इनके बीच रेखा खींचना कठिन है।  वृद्धों  के  ज्ञान और उनकी जादुई शक्ति का आदर होता है। यह समझा जाता है कि जो जितना वृद्ध है उसके पास उतना अधिक ज्ञान और जादुई शक्ति है।  इस आयु के व्यक्ति को दोनों जहान के मध्य की एक कड़ी के रूप में देखा जाता है। ऐसे वृद्ध अगली पीढ़ी को ज्ञान बाँटते है परंतु उन लोगों को इस ज्ञान से वंचित रखते हैं जो गोरों के सम्पर्क में रहते हैं।

"सूडान की  ज़ेन्डे जाति में जादू को प्राथमिकता दी जाती है।  इसी प्रकार चाको, चोरटी, मटाको और टोबा जातियों में भी जादू का प्रभाव अधिक है।अरोज़ोना की नवाजो जाति एक सम्पन्न समाज है। इस समाज में ज्ञान और जादू को अलग दृष्टि से देखा जाता है।  इसमें वृद्धों, कमज़ोरों और बीमारों की अच्छी देखभाल होती है।

"अनेक  जातियों में यह आम सोच है कि बूढे मरने के बाद प्रेत बन जाते हैं। इन जातियों के लोग अधिक मेहनत इसलिए नहीं करते कि पड़ोसी उनसे जलने न लगें  और उनपर जादू-टोना न करा दें।  बूढों का उस समय तक आदर नहीं होता जब तक वे अपने ज्ञान और जादू को नहीं दर्शाते।  ऐसे वृद्धों को आदर से देखा जाता है जिसका प्रमाण चीन और थाईलैण्ड में  बसनेवाली  मियाओ जाति है।मियाओ यह समझते हैं कि मृतक की आत्मा घर में वास करती है और रखवाली करती है और फिर नवजात शिशु में आकर बस जाती है।

"जिस क्षेत्र की जातियां अधिक आधुनिक हो गई हैं, वहाँ जादू-टोने को अधिक महत्व नहीं दिया जाता, जैसे हिमालय के लेपचा।  लेपचा जाति के लोग लिखना पढ़ना जानते हैं और लामावाद में आस्था रखते हैं।  उन्हें अपने बच्चों से प्रेम होता है और बच्चे भी बडे-बुज़ुर्गों का आदर करते हैं।

"बाली के लोग धार्मिक होते हैं।  उन्होंने भारत, चीन और जावा से धर्म को अपनाया था।  उनमें एक दंतकथा प्रचलित है।.... बहुत समय पहले एक पहाड़ी गाँव में यह प्रथा थी कि रोज़ एक वृद्ध की बलि  दी जाती थी।  अंत में स्थिति यह हो गई कि कोई वृद्ध ही नहीं बचा।  उन्हें कठिनाई का सामना उस समय करना पड़ा जब सभागृह के लिए लकड़ी काटी गई।  सभी युवा थे और वे यह नहीं बता पा रहे थे कि पेड़ का ऊपरी भाग कौन सा है और निचला कौन सा!  तब एक युवक ने इस समस्या का समाधान इस शर्त पर देने का वादा लिया कि भविष्य में किसी वृद्ध की बलि  नहीं दी जाएगी। सब ने हामी भरी तो युवक एक वृद्ध को ले आया जिसे उसने छुपा कर रखा था।  कहते हैं कि उस रोज़ से बूढ़ों को आदर से देखा जाने लगा।

"उपर्युक्त सारी जानकारी के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं; यद्यपि ऐसा करना विषय का सरलीकरण होगा।  यह साफ़ देखा जा सकता है कि समृद्ध और सम्पन्न जातियों में वृद्धों का जीवन सुविधाजनक एवं सम्मानपूर्ण  रहा। जिन बच्चों को प्रेमपूर्वक पाला-पोसा गया, वे बड़े होने पर अपने बुज़ुर्गों का आदर-सम्मान करते हैं; जबकि ऐसी जातियों में वृद्धों के प्रति तिरस्कार भाव होता है जिन्होंने अपने बच्चों को तिरस्कृत किया।  जिन बच्चों का जीवन भय और भूख में बीता, वे बड़े होकर आक्रामक और क्रूर निकले और अपने वृद्धों की हत्या से भी नहीं हिचकिचाए।  उन बूढ़ों का  सम्मान होता है जिनके पास अपनी सम्पत्ति है और जो अपनी देखभाल खुद कर सकते हैं।

"जिस समाज में सुरक्षा की भावना है, वहाँ के वृद्ध सम्मानपूर्वक रहते हैं क्योंकि यहाँ के युवा उनमें अपना भविष्य देखते हैं।  जिस समाज ने संस्कार छोड़े और वृद्धों का तिरस्कार किया, उसका भविष्य भी अंधकारमय ही रहेगा।  वृद्ध समाज की आवश्यकता हैं , जिसका प्रमाण बलिप्रथा की पूर्वोक्त दंतकथा में मिलता है।

"बूढ़ों का आदर उन जातियों में  भी होता है जहाँ ज्ञान और जादू का घालमेल है। यहाँ भय के कारण वृद्धों का आदर होता है ताकि उनकी सम्पत्ति का लाभ मिले या फिर मरने के बाद वे भूतप्रेत बनकर जाति को हानि न पहुँचाएँ । इसे हृदय से किया सम्मान नहीं बल्कि स्वार्थपूर्ण ही माना जाएगा।

"आधुनिक विचारों वाले समाजों में बूढ़ों का सम्मान घटता है क्योंकि ऐसे समाजों की  जादूटोना जैसी चीज़ों  में आस्था नहीं होती और न ही उन्हें  मरणोपरांत भूतप्रेत बनने का भय सताता है। बूढों की सम्पत्ति का लालच भी उतना नहीं होता।

"वृद्धावस्था के मायने स्त्री और पुरुष के लिए एक जैसे नहीं होते और न ही उनकी परिस्थिति एक जैसी होती है।  रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं की स्थिति लड़कियों जैसी हो जाती है।  अब वे निश्चिंत व स्वच्छंद होकर नाच-गा सकती हैं और पुरुषों के संग बैठ कर नशा, खेल आदि कर सकती हैं।  कई समाजों में वृद्धों और बच्चों में अधिक घनिष्ठता  होती है।  बच्चों की देखभाल से लेकर उनकी शिक्षादीक्षा की जिम्मेदारी इन वृद्धों पर रहती है।  इस प्रकार उनका समाज में एक आवश्यक स्थान बना रहता है।  परंतु बहुत अधिक गरीब जातियों में बच्चों और बूढ़ों का कोई मूल्य नहीं होता।  इसीलिए नावाजो जैसी जातियों में उन्हें मार देने में कोई हिचक नहीं होती।

"सबसे मुख्य तथ्य यह उभर कर आता है कि वृद्ध  सम्मान अर्जित नहीं करते बल्कि सम्मान उन्हें दिया जाता है। वृद्धावस्था की यह जैविक सच्चाई है कि जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अनुत्पादक और अनुपयोगी हो जाता है वह समाज में कोई योगदान नहीं दे पाता।  ऐसी अवस्था में वृद्धों की स्थिति क्या होती है, वही समाज का सच्चा दर्पण माना जा सकता है।   कतिपय आदिवासियों की तरह वृद्धों को मार दिया जाता है, या उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता  है या उन्हें सम्मानपूर्वक अपने अंतिम दिन तक जीवित रखा जाता है, इसी पर आधारित होगा किसी समाज की सभ्यता का मापदण्ड|"

सिमोन के इस निष्कर्ष  को देखते हुए आज के आधुनिक और  सभ्य कहे जाने वाले युग में भी हमें कभी-कभी ऐसे समाचार मिलते हैं कि लगता है कि अभी हम आदिवासियों के युग में जी रहे हैं!! क्या यह परिस्थिति बदलेगी.... यह तो भविष्य ही बताएगा।

6 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

@"मानव जातियों में अपने ज्ञान और अनुभव के कारण वृद्ध को विशेष स्थान भले ही दिया गया हो पर अवसर पाकर उसे घर और समाज के इस विशेष स्थान से हटा भी दिया जाता है; या फिर, परिस्थिति भांप कर वृद्ध खुद ही हट जाता है।
वृदावस्‍था की लाचारियों को इस तरह रेखांकित किया है कि कई स्‍थानों पर रोंगटें खड़े होने लगते हैं। यह सोचना भयावह लगता है कि सतत क्रियाशील रहनेवाला व्‍यक्ति वृदावस्‍था आते ही पंगु हो जाता है।
देसिल बयना-खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!, “मनोज” पर, ... रोचक, मज़ेदार,...!

विवेक सिंह ने कहा…

हमें तो कभी कभी लगता है कि हम आदिवासियों के युग से कई बातों में पिछड़े हुए हैं ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप ने आज के भारत मै वृद्धओ का हाल नही लिखा, बहुत सुंदर जानकारियां दी आप ने धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वृद्धों के बारे में ऐतिहासिक व भौगोलिक वृत्तान्त देकर पोस्ट को ज्ञानवर्धक बनाने का आभार।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

विभिन्न जातियों में वृद्धों के बारे में बढ़िया जानकारी प्रदान की है आपने ।
बेशक , वृद्धों का अनुभव पूरे समाज के लिए लाभदायक रहता है । इसलिए उनका सम्मान करना समाज के ही हित में है । हालाँकि आजकल हालात बिगड़ते जा रहे हैं ।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

प्रसाद जी, भिन्न मानव जातियों से सम्बंधित रोचक तथ्य ! और आपकी इस बात का पूरा समर्थन कि बेशक , वृद्धों का अनुभव पूरे समाज के लिए लाभदायक रहता है । इसलिए उनका सम्मान करना समाज के ही हित में है । हालाँकि आजकल हालात बिगड़ते जा रहे हैं ।