मंगलवार, 22 सितंबर 2009

Jinnah, India-Partition, Independence- A review

भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ- ‘जिन्ना, इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स’

छः दशक बाद भी विभाजन की त्रासदी भारत को विचलित करती है। इसके कारणों को जानने की अबुझ प्यास इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों को उस काल के ऐतिहासिक घटनाओं का पुनर्पाठ करते हुए अपने अपने निषकर्ष निकालते देखा गया है। ऐसे लेखन की न केवल अपनी सीमा होती है बल्कि उसके विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं जिसका ताज़ा उदाहरण है भारत के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह की अंग्रेज़ी कृति- ‘जिन्ना, इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स’॥

लगभग पाँच सौ पृष्ठों वाली ‘जिन्ना, इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स’ में जसवंत सिंह जी ने इतिहास के उन पन्नों को उकेरा है जिनमें भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि है। इस पुस्तक को ग्यारह अध्यायों बे बाँटा गया हैं - भूमिका, भारत व इस्लाम, जेनाभाई से जिन्ना[जिन्नाह], बीसवें दशक की खलबली, सिकुड़ते विकल्प, एक छोटा दशक, साम्राज्य का सूर्यास्त, उत्तराधिकार की जंग, वार्तालाप कि झलक, वाइसराय मौंटबेटन के राज का अंत, पाकिस्तान का जन्म व कायदेआज़म की अंतिम यात्रा तथा उपसंहार।

नाकाम इन्क़िलाब को बगा़वत और कामियाब बग़ावत को इन्क़िलाब कहा गया है। भारत की आज़ादी की जंग सन्‌ १८५७ ई. में शुरू हुई थी और ठीक ९० वर्ष बाद १९४७ में फ़लिभूत हुई। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेज़ी इतिहसकारों ने बग़ावत [म्यूटिनी] का नाम दिया था। इस संग्राम की चिंगारी देश के हिंदू और मुसलमान देशवासियों ने मिल कर जलाई थी। उन्होंने मिल कर जिस जंग को शुरू किया था, वह किन कारणों से खेमों में बँट गया और अंततः देश के विभाजन तक पहुँचा, इसका जायज़ा लिया है नेता जसवंत सिंह जी ने अपनी इस कृति ‘जिन्ना, इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेन्डेन्स’ में।

भारतीय इतिहास के इन पृष्ठों को उजागर करते समय लेखक ने जिन्ना को केंद्र में रखा है। जिन्ना की कहानी शुरु होती है गुजरात के उस क्षेत्र से जहाँ देश के दो मुख्य पात्रों ने जन्म लिया। काठियावाड़ की भूमि ने देश को मोहनदास करमचंद गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेता दिये।

पानेली गाँव के एक खोजा परिवार के पून्जाभाई के साथ उनके तीन पुत्र और एक पुत्री रहते थे- वालजीभाई, नथुभाई, जेनाभाई और मान बाई। इस परिवार के जेनाभाई ही भारतीय इतिहास के एक मुख्य पात्र बने। पिता के व्यापार में घाटा होने के बाद आर्थिक संकट के चलते जेनाभाई पानेली से निकल कर गोंदल गए। वहाँ से भाग्य ने उन्हें कराची, मुम्बई, इंग्लैंड आदि स्थानों की यात्रा कराई और इसी दौरान जेनाभाई से वे मुहम्मद अली जिन्ना बन गए। [अपना नाम बदलने के लिए उन्होंने २६ अप्रेल १८९३ को सरकार से आज्ञा मांगी थी, जिसकी प्रतिलिपि इस पुस्तक का अंग है।]

उस समय के इतिहास के पृष्ठों पर दृष्टि डालते हुए लेखक ने पुस्तक के अंत में कई दस्तावेज़ जोड़े हैं जो इन ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे हैं। जसवंत सिंह जी ने देश के नेताओं के उन वक्तव्यों को भी उद्धृत किया है जिनसे यह जानकारी मिलती है कि कैसे एक देशभक्त को सिकुड कर संप्रदाय-विशेष का नेता बना दिया और अंतिम परिणिति यह रही कि देश का विभाजन हुआ।

गोपाल कृष्ण गोखले ने जिन्ना को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत’ कहा था। घटनाक्रम के चलते इस एकता के दूत को मात्र मुस्लिम नेता बनने का बदलाव कैसे आया, इसकी जानकारी इस पुस्तक में मिलती है। सन्‌ १९१५ई. में दक्षिण अफ़्रिका से लौटने पर गांधीजी के स्वागत में एक गुर्जर सभा का आयोजन काठियावाड़ में किया गया था। इस सभा में जिन्ना ने गर्मजोशी से भाग लिया और इस सभा की अध्यक्षता की। अपने भाषण में गांधीजी ने कहा कि "मुझे प्रसन्नता है कि इस सभा में एक मुस्लिम है जो इस क्षेत्र का भी है।" सम्भवतः सम्प्रदाय का यह बीज यहीं अंकुरित हुआ। आगे की राजनीतिक घटनाएँ/माँगें जैसे सम्प्रदाय के आधार पर राजनीतिक आरक्षण[जो तब नकारा गया और आज देश में व्याप्त है-जिसे हम विड़म्बना ही कह सकते हैं], कांग्रेस और मुस्लिम लीग में वैचारिक मतभेद, गांधीजी की अली बंधुओं से निकटता.... ऐसी कई घटनाओं के चलते एक धर्मनिरपेक्ष नेता को मुस्लिम समुदाय के नेता में परिवर्तित किया, एक कांग्रेसी को पाला बदल कर मुस्लिम लीग के साथ हाथ मिलाने को बाधित किया और अंत में कायदेआज़म के रूप में देश के विभाजन का प्रणेता बनाया।

इस सारे घटनाक्रम में कौन सही था, कौन ग़लत, कौन किस दृष्टि से इतिहास को देखता है और उस समय पर लिए गए कितने सही या गलत निर्णय थे... यह तो अपनी-अपनी सोच, समझ और दृष्टिकोण पर आधारित होगा। जसवंत सिंह जी ने दस्तावेज़ों के आधार पर इतिहास के इन पन्नों को पुनः पाठकों के सामने रखा है। पाठक चाहे जो भी निष्कर्ष निकालें परंतु यह पुस्तक एक ऐतिहासिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में सदा साथ रखी जाएगी।


4 टिप्‍पणियां:

SUNIL DOGRA जालि‍म ने कहा…

किताब का तो पता नही आपकी बात रोचक है

ऋषभ ने कहा…

क्या यह पुस्तक आपके पास उपलब्ध है?
चाहिए.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

यह पुस्तक पढ़ रहा हूं और अब तक कुछ भी सेनसेशनल नहीं लगा जिसपर बवण्डर खड़ा हो!

cmpershad ने कहा…

सही कहा पाण्डेय जी आपने। मुझे भी इस पुस्तक में इतिहास के पुनर्पाठ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई दिया।