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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

गंभीरता से न लें




आग


आज के समाचार पत्र में पढ़ा कि नगर के सितारा होटल में आग लग गई।  उसी के निकट एक मित्र का घर है, तो चिंता हुई कि हालचाल पूछ लें।  फ़ोन पर उन्होंने बताया कि उस हादसे के वे चश्मदीद गवाह रहे हैं।  भयंकर आग की लपेटें देखकर वे दूर जा खड़े हुए और वहाँ की गतिविधियों को देखते रहे।  लोग इधर उधर भाग रहे थे।  होटल से बाहर निकलने वाले अपने अज़ीज़ों की तलाश कर रहे थे तो कुछ उनकी खोज में फिर अंदर जाने की जुस्तजू में थे जिन्हें वहाँ के कर्मचारी रोक रहे थे।  समाचार से पता चला कि कोई हताहत नहीं हुआ है और सभी सुरक्षित है।  

हमारे मित्र बता रहे थे कि इस हादसे की प्रतिक्रियाएं भी वहाँ ऐसी मिलीं कि इस गम्भीर परिस्थिति में भी व्यक्ति हँसने को मजबूर हो जाता है।  जिन लोगों के परिजन मिल गए वे खुश थे और उन्हें किसी अन्य की कोई चिंता नहीं थी।  दर्शकों में खड़े लोग भी उस आग को एक तमाशे की तरह देख रहे थे।  एक ने कहा कि हमारी फ़ायर ब्रिगेड को तैयार रहना चाहिए, इतनी देर लगा दी [इसकी सूचना देने की उन्होंने कोई पहल नहीं की, केवल ज़बानी जमा खर्च करते रहे]।  एक ने अपने मित्र के कांधे पर हाथ रखते हुए कहा कि आग की इतनी लम्बी कतार मैं तो पहली बार देख रहा हूँ! [उसके चेहरे पर ऐसी आनंद की लहर दिखाई दे रही थी मानो उसे इतना अच्छा दृश्य अपने जीवन में पहली बार देखने को मिल हो।]

मुझे पुरानी कहावत याद आई कि किसी का घर जलता है तो कोई हाथ सेंक लेता है। तभी तो, दुष्यंत ने भी कहा था- 
खडे हुए थे अलावों की आँच लेने को
सब अपनी-अपनी हथेली जला के बैठ गए॥  

आग भी किसिम किसिम की होती है।  एक वो आग है जो अपने आगोश में आई हर चीज़ को जला कर राख कर देती है, तो एक वो आग भी होती है जो सीने में सुलगती है और अरमानों को जला देती है।  तभी तो किसी दिलजले शायर ने कहा था- सीने में सुलगते हैं अरमान, आँखों में उदासी छायी है।  

एक ऐसी आग भी होती है जो एक को जलाती है तो दूसरे को ठंडक पहुँचती है।  यह त्रिकोणीय प्रेम में अधिक देखने को मिलता है। यह  आग भारतीय फ़िल्मों की आधारशिला मानी जाती है। तभी तो महमूद ने अपनी एक फ़िल्म में गाया भी था-  ‘अजब सुलगती हुई लकड़ियाँ है ये जगवाले, जले तो आग लगे, बुझे तो धुआँ करे’।  

रिश्तों में एक वो आग भी होती है जो महिलाओं में अक्सर सुलगती देखी गई है।[स्त्री-सशक्तीकरण का दम भरनेवालों से क्षमा माँगते हुए, वर्ना मैं उनके प्रकोप की आग में झुलस जाऊँगा।]  सास-बहू ही क्या, ननंद-भावज, जेठानी-देवरानी... सभी में यह आग कभी न कभी देखी गई है, भले ही अदृश्य रूप में हो।

वैसे तो आग लगाने-बुझाने के काम अनादि काल से चला आ रहा है और ऐसे लोगों के कुलदेवता नारद जी को माना जाता है।  घर की छोटी-मोटी झड़पों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय लड़ाइयों में भी ऐसे लोगों की एक अहम भूमिका देखी गई है।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस लगाऊ-बुझाऊ काम को ‘डबल क्रास’ का नाम दिया जाता है।  कुछ मसाले के साथ इधर की उधर और उधर की इधर लगा दो और तमाशा देखो।  इसे ही तो कहते हैं- आम के आम, गुठलियों के दाम।

कवियों और शायरों ने भी इस आग का बहुत लाभ उठाया है।  किसी उर्दू शायर ने इश्क की हिमाकत को क्या खूब बयान किया है- 
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना ही समझ लीजे। 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।  

हमारे हिंदी के अज़ीम शायर दुष्यंत कुमार ने भी तो कहा है- 
                                                         मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी ही चाहिए।

आग के इन विविध आयाम में जो कुछ छूट गया है, उसे मित्रगण अपनी टिप्पणियों के माध्यम से भर देंगे, ऐसी आशा है।  इस बीच, दुष्यंत ने  सितारा होटल के मालिक को एक ट्रेड सीक्रेट भी बता गए हैं-

थोड़ी आँच बची रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो
कल देखोगे कई मुसाफ़िर इसी बहाने आएँगे॥


सोमवार, 23 जनवरी 2012

शुद्ध हास्य


लोकार्पण पिपासा

डिस्क्लेमर: इस लेख के सभी पात्र काल्पनिक हैं।  यदि ऐसा कोई पात्र इस धरती पर चलता फिरता दिखाई दे तो उसकी ज़िम्मेदारी लेखक पर नहीं है :)


हाल ही में तिरबेनी परसाद से रास्ते में भेंट हुई थी।  उन्होंने बताया कि वे एक पुस्तक रच रहे हैं जिसका शीर्षक है ‘महापुरुषों की कारस्तानी’।  फिर उन्होंने उसके प्रकाशन में आने वाली कठिनाइयों का भी ज़िक्र किया। मैं जानता था कि तिरबेनी परसाद उन रचनाकारों में से हैं जो आपको किसी भी नुक्कड़ पर ठोक के भाव मिल जाते हैं।  वे यदाकदा रास्ते में मिल जाते थे तो मेरा हस्बे-आदत यही प्रश्न रहता है- क्या नया लिख डाला!  तब वे अपनी नई रचना के बारे बताते और बात कभी हास-परिहास तक भी पहुँच जाती।

अब देखिए ना, जब उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘महापुरुषों की कारस्तानी’ के बारे में बताया तो निश्चय ही मेरा पूछना लाज़मी था- अरे तिरबेनी बाबू, आपको इनकी कारस्तानियों के बारे में कैसे पता चला जिसको हमारे मीडिया के खोजी कुत्ते भी नहीं सूंघ सके; उन्हें तो ऐसी कारस्तानियों की गंध तो सब से तेज़ लग जाती है।   

उन्होंने बड़े राज़दाराना इस्टाइल में बताया कि यही तो घुंडी है।  हम ठहरे इन महापुरुषों के चमचे जो उनके घर में तो क्या, हमाम में भी घुस जाते हैं।  इनके बारे में हमसे ज़्यादा और कौन जाने है भला।

‘सो तो ठीक है, पर ऐसी पोशीदा बातें तो आम पब्लिक में बताना कापीराइट का उल्लंघन होगा।’  

‘अरे नहीं सा’ब, यही तो असली फ़ंडा है।  हमारे महापुरुष तो जानते हैं कि ऐसी ही बातें उन्हें समाचार में बनाए रखती हैं।’  

मैंने पूछा कि प्रकाशक कौन है?  उन्होंने प्रकाशन की कठिनाइयों का विस्तार से वर्णन करना शुरू किया। उन्होंने बताया- ‘पहले तो प्रकाशक मिलते नहीं और मिलते हैं तो उनका डिमांड बड़ा होता है।  यह कहाँ का इन्साफ़ है कि हम लिखो भी और छापने के लिए उन्हें पैसा भी दो।  अब हमें अपना पैसा लगाना ही है तो हम ही प्रकाशक बन जाते हैं।  इसलिए हमने अपनी पत्नी गंगा बाई के नाम से गंगा प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्था खोल रखी है।  इसी प्रकाशन से अपनी सारी पुस्तकें निकलेंगी।’


कुछ दिन बाद तिरबेनी परसाद फिर निक्कड़ पर मिल गए।  मैंने उनकी पुस्तक की अवस्था के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी वह गर्भावस्था में ही है।  कुछ और कारस्तानियों का बखान उसमें आना है, इसलिए उसकी छपाई पूरी नहीं हो पाई है।

राह चलते एक दिन तिरबेनी बाबू सिर झुकाए चिंतामग्न आ रहे थे।  मुझे देखते ही तपाक से हाथ मिलाया और बताया कि पुस्तक तो छप गई है।  अब लोकार्पण की चिंता में ही भटक रहा था और आप ही के बारे में सोच रहा था। अच्छा हुआ आपसे समय पर भेंट हो गई।

कहिए, मैं क्या सेवा कर सकता हूँ?

ऐसा है सा’ब, आप तो बडी-बडी गोष्ठियों की अध्यक्षता करते रहते हैं, और साहित्य के बडे तोपों से आपका परिचय है;  तो क्यों न आप इस पुस्तक के बढिया लोकार्पण का जुगाड़ करें।  आप ही उस समारोह की अध्यक्षता कर लीजिए।

यह तो ‘आ बैल मुझे मार’ की स्थिति हो गई।  मैं जानता हूँ कि तिरबेनी बाबू बड़े चिपकू हैं और पीछा नहीं छोड़ेंगे।  मैंने कहा कि मुझे अध्यक्षता करने में कोई ऐतेराज़ नहीं है पर सवाल यह है कि इसका संयोजन कौन करेगा?  

‘मैं तो चाहता था कि आप ही सारे कार्यक्रम की रुपरेखा बनाएं और अतिथियों को बुलाने का ज़िम्मा भी लें।’

मैंने कहा कि यह सब मुझ से नहीं होगा।  मेरी अपनी ज़िम्मेदारियां ही बहुत हैं।

‘नहीं साब, आपको मेरी खातिर तो इतना करना ही पड़ेगा।  आपका नाम रहेगा तो लोकार्पण धूम से हो जाएगा, इतना तो साहित्य का बच्चा बच्चा जानता है।’  

मरता क्या न करता, मैं ने कहा कि आप हाल बुक करा लीजिए, मंच पर आसीन अथितियों के लिए अच्छे से स्मृतिचिह्न ला लीजिए।  संचालन के लिए वर्माजी को बुला लीजिए और संयोजन का काम शर्मा जी को सौंप दीजिए।  आपका काम सफल हो जाएगा।

अब क्या था, तिरबेनी बाबू की बांछे खिल गई।  मार्गदर्शन के लिए आभार प्रकट किया और भावी कार्यक्रम की सफलता का अरमान लेकर चले गए।

आखर वो दिन भी आ गया। बहुत सारे लोग इस लोकार्पण के लिए पदार्पण करने लगे।  तिरबेनी बाबू प्रसन्न थे कि कार्यक्रम सफल जा रहा है।  अंत में उन्होंने चमकीली पन्नी में लिपटे पुस्तकों का बंडल लोकार्पणकर्ता को दिया।  उस बंडल से चार पुस्तकें निकली और मंच पर आठ अतिथि थे।  अब लोकार्पणकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ थे। उनकी समस्या यह थी कि किस को पुस्तक दें और किसको नहीं।  इस झंझट से छुटकारा पाने के लिए एक पुस्तक उठाई और दर्शकों को दिखा दिया।  क्लिक, क्लिक... फोटो खींचे गए और दर्शकों ने ताली बजाई।  तिरबेनी बाबू ने मंचासीन अतिथियों को स्मृतिचिह्न दिए।  कार्यक्रम समाप्त हुआ।  

दर्शकों को निराशा हुई कि ताली बजाने के एवज़ में उन्हें चाय तक नहीं मिली।  अतिथियों ने कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अपने स्मृतिचिह्न का अनावरण किया तो निराश हुए कि उसमे सड़कछाप पच्चीस रुपये का फ़ोटोफ़्रेम था।  सब के चेहरे मुर्झा गए।  किसी का चेहरा खीला था तो वो तिरबेनी परसाद का था जिन्हें लोकार्पण की सफलता की प्रसन्नता थी। आखिर हींग लगी न फिटकरी, रंग चोखा जो हो गया था।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

घुटने



ये  घुटने है या बला!





 दिल्ली के सुप्रसिद्ध डॉ. टी.एस.. दराल- ब्लाग जगत के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  अपनी चिकित्सा के तजुर्बे से वे मानव घुटने के बारे में बताते हैं कि " इन्सान में बुढ़ापा सबसे पहले घुटनों में ही आता है । इसीलिए :
* ४० + होते होते आपके घुटनों की व्यथा एक्स रेज समझने लगते हैं ।
* ५० + होने पर आपको भी आभास होने लगता है ।
* ६० + होने पर सब को पता चल जाता है कि आपके घुटने ज़वाब दे चुके ।
* ७० + होकर आप भी भाइयों में भाई बन जाते हैं क्योंकि अब तक सब एक ही किश्ती के सवार बन चुके होते हैं ।"

जब मैं घुटने के बारे में सोंचने लगा तो मुझे बुढापे की चिंता तो नहीं हुई क्योंकि बूढ़ा तो हो ही गया हूँ फिर भी मेरे घुटने अभी तक ढोने में सक्षम हैं। मैं जितना सोचता गया, उतना ही इस ‘घुटने’ के कई रूप सामने आने लगे।   कुछ रूप  जो मस्तिष्क में घूम रहे हैं, उन्हें यहाँ उँडेल देता हूँ :)

इन घुटनों के कारण कभी महिलाओं को सज़ा भी भुगतनी पड़ती है।  आप को याद होगी वह घटना जब सूडान की एक ईसाई किशोरी को घुटने की लंबाई तक की स्कर्ट पहनने को एक जज ने अभद्र करार देते हुए उसे 50 बार कोड़ा मारने की सजा सुनाई है।   पता नहीं मिनि स्कर्ट पहनने पर कितने कोड़े पड़ते!!

ऐसे में घुटने टेकने के सिवाय चारा भी क्या हो सकता है!  घुटने तो हमारे खिलाडी भी खेल के मैदान में यदाकदा टेक ही देते हैं।  जब वेस्ट इंडीज़ से भारत हारा था तो यह समाचार पढ़ने को मिला था-

"भारतीय बल्लेबाजों ने कब्रगाह बनी फिरोजशाह कोटला की पिच पर बेहद निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले क्रिकेट टेस्ट के दूसरे दिन आज यहां घुटने टेक दिए ।"  अब ऑस्ट्रेलिया में जो हश्र हो रहा है, उसका अनुमान आप भी लगा ही सकते हैं।


 इसी प्रकार जब गायक दलजीत  ने कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग किया तो उसे माफ़ी मांगनी पड़ी थी।  तब यह समाचार देखने में आया था कि अपने गीतो में औरतों के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल करने पर दलजीत ने अखिरकार मांफी मांग ली हैं।   पंजाब केसरी के दफ्तर में विशेष तौर पर आए दलजीत ने घुटने टेक कर मांफी मांगते हुए कहा कि उसने कभी भी औरतों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल नही किया।"


आजकल चिकित्सा क्षेत्र ने इतनी तरक्की कर ली है कि घुटने बदल दिए जा रहे हैं।   सवाल यह है कि क्या घुटने बदलने के बाद व्यक्ति की चाल भी बदल गई है।  घुटने की सर्जरी में तो  चार-छः लाख रुपये  लग ही जाते हैं। पर ऑपरेशन के बाद ठीक से चलते  देखा नहीं गया। अपने अटल बिहारी वाजपेयी को ही लें। वह ऑपरेशन से पहले काफी ठीकठाक चलते थे।  अब तो बेचारे बिस्तर पकड़ चुके हैं।

इस लेख को लिखने के असली मकसद पर अब आते हैं।  आपने इसी ब्लाग पर एक निमंत्रण देखा होगा कि यहाँ हैदराबाद लिटरेरी फ़ेस्टिवल २०१२ का आयोजन हो रहा है।  इस आयोजन के आखरी दिन एक हिंदी काव्य गोष्ठी हुई जिसमें एक ‘युवा’ कवि ने अध्यक्षता की। युवा इसलिए कहा जा रहा है कि वे बिना किसी सहायता के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँच गए।  अन्य दो कवि और एक कवयित्री ऐसे थे जिन्हें पकड कर मंच पर चढ़ाना पड़ा था।  कारण.... वही.... घुटने का दर्द!!!!!!




शनिवार, 31 दिसंबर 2011

ठंडक


ठंडक कैसी कैसी

कल ही की बात है जब मैं ब्लागदर्शन कर रहा था तो ब्लागगुरू बी.एस.पाब्ला जी का ब्लाग ‘ज़िंदगी के मेले’ पर उनका सफ़रनामा मिला।  मोटर साइकल पर यात्रा करते हुए सुंदर चित्रों के साथ दिल दहलाने वाले ठंडक का वर्णन भी था।  इस लेख के अंत में वे बताते हैं-
 ‘गरदन घुमा कर पीछे देखा तो मैडम जी चारों खाने चित्त धरती पर! हड़बड़ा कर मैं उतरा, गाड़ी खड़ी की और हाथ बढ़ाया कि उठो। लेकिन लेटे लेटे ही उलझन भरी आवाज़ आई ‘मेरे हाथ कहाँ हैं, मेरे पैर कहाँ हैं?’ तब महसूस हुआ कि बर्फीली ठण्डी हवाओं के मारे हाथ पैर ही सुन्न हो गए हैं।’  

ठंड के विविध आयाम मस्तिष्क में घूमने लगे और सोंचते सोचते बात दिल को ठंडक पहुँचाने तक चली गई।  ठंड में आदमी अकड जाता है तो शरीर सुन्न हो जाता है और जब हिमाकत में अकड़ जाता है तो मस्तिष्क सुन्न होगा।  इस हिमाकत में वो क्या कर बैठे, कुछ पता नहीं, पर यदि उसकी हिमाकत कामियाब हो गई तो उसके दिल को ठंडक पहुँचेगी।  

हर व्यक्ति के लिए ठंड की व्याख्या भी अलग होती है।  आमीर खान के लिए ठंडा मतलब कोका कोला!  किसी हिरोइन के लिए गाने की सीन क्रिएट होगी और वो गाने लगेगी- मुझे ठंड लग रही है...।  कभी हीरो भी ठंड की शिकायत में कांपते हुए कहेगा- सरका लो खटिया...।  इस प्रकार फिल्मी दुनिया में भी ठंड का बडा रोल होता है, वैसे ही जैसे बारिश या बर्फ़ का! यह और बात है कि यह ठंड कभी अश्लीलता के बार्डर लाइन तक पहुँच जाती है और डायरेक्टर को ‘कट’ कहना पड़ता है और यदि वो चूक गया तो नकटा मामू सेंसर तो है ही।  खलनायक की छाती में ठंडक उस समय पडती है जब वो किसी को ठंडा कर देता है।  हीरो तो ठंडे मिजाज़ का होता ही है और उसे देख कर विलेन के हाथ-पाँव ठंडे पड़ जाते हैं।  है ना,  फ़िल्मों में ठंड  के विविध आयाम!!!

साहित्य में भी ठंड ने अपना रोल अदा किया है।  मुहावरों की शक्ल में ठंड का उपयोग आम बात है जैसे, आँख की ठंडक किसी भी प्रेमी को दिल की ठंडक पहुँचा ही देती है।  जब प्रेमिका का बाप दिख जाता है तो प्रेमी को ठंडे पसीने छूटना स्वाभाविक बात ही कही जाएगी।  हो सकता है कि प्रेम की पींगे बढ़ने के पहले ही उनके इस प्रेम-प्रसंग पर ठंडा पानी फिर जाय।  यदि प्रेमिका को बाप के रूप में विलेन दिखाई दे तो बाप-बेटी के रिश्तों में ठंडक आ जाएगी।  यह और बात है कि दो प्रेमियों को अलग करके बाप के कलेजे में ठंडक पड़ जाएगी।

अब आप ठंडे दिमाग से सोचिए कि ठंड हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है।  ठंडे दिमाग के लिए चाहिए कुछ ठंडा- तो उठाइये ठंडा- यानि कोका कोला॥  

रविवार, 11 दिसंबर 2011

दाढ़ी-मूँछ


दाढ़ी मूँछ का प्रभाव

हाल ही में हैदराबाद के वरिष्ठ व्यंग्यकार भाई भगवानदास जोपट जी से बुद्धिजीवियों की जानकारी के साथ-साथ मूँछ-दाढ़ी के संबंध में भी ज्ञान की श्रीवृद्धि हुई।  उनका मानना है कि "बुद्धिजीवी को अलग से पहचाना जा सकता है क्योंकि ये दूसरों से अलग होते हैं।  आमतौर से चेहरे पर विराजमान गम्भीर मनहूसियत और बढ़ी हुई फ़्रेंच दाढ़ी इन्हें सामान्य लोगों से अलग करती है।"

जब दाढ़ी-मूँछ की बात आई तो एक पुराना किस्सा याद आया।  कहते हैं कि एक बस्ती में दो शायर रहते थे जिनमें से एक के चेहरे पर दाढ़ी थी तो दुसरे के चेहरे पर रौबदार मूँछें।  दोनों को अपनी शायरी के साथ-साथ अपने-अपने चेहरे पर भी बड़ा गुमान था।  एक बार दोनों में बहस हो गई कि दाढ़ी अच्छी होती है या कि मूँछ।  लम्बी बहस के बाद दोनों ने अपना तीर शे’र के रूप में छोड़ा जो इस प्रकार रहा-
दाढ़ी वाले ने दाढ़ी पर कसीदा पढ़ दिया-

दाढ़ी वो दाढ़ी जिस दाढ़ी पे हो गुमां
दाढ़ी शेरों के हुआ करती है बकरों के कहाँ॥

अब मूँछ वाला शायर भी कहाँ पीछे हटने वाला था! उसने भी लाइन मिलाई-

मूँछ वो मूँछ जिस मूँछ पे हो गुमां
मूँछें मर्दों के हुआ करती है हिजड़ों के कहाँ॥
कहते हैं कि तब से यह चलन शुरू हो गया है कि लोग दाढ़ी-मूँछ एक साथ पालने लगे हैं।

अब रही बात दाढ़ी-मूँछ के प्रभाव की, तो एक पुलिसवाले की याद आती है जो दशकों पहले हैदराबाद की सड़क के एक चौराहे पर खडा होता था।  [उस समय लाल-पीली-हरी बत्ती का चलन नहीं था।]  अपने काले भारी-भरकम चेहरे पर उन गलमूंछों के कारण वह  उस चौराहे पर चलनेवालों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बना रहा।  इस रौबीले पुलिसवाले को आंध्र प्रदेश  सरकार ने पुरस्कृत भी किया था और उसे ‘मूँछ भत्ता’ भी दिया जाता रहा।

मूँछों का एक लम्बा इतिहास भी है।  पुराने ज़माने में घनी कड़कदार मूँछे पाली जाती थी जिनको मोम आदि से संवारा और दमदार बनाया जाता था।  ‘इतिहासकार’ बताते हैं कि मूँछों पर निंबू खडा करने की प्रतियोगिताएं भी हुआ करती थीं।  हाय! अब न वैसी मूँछें दिखाई देती हैं न वैसे जवाँ मर्द!

‘इतिहासकार’ यह भी बताते हैं कि मुस्लिम काल तक भारत में दाढ़ी-मूँछ का चलन अधिक रहा।  अंग्रेज़ों के आगमन के साथ ही हमारी संस्कृति और सभ्यता के साथ पुरुष के चेहरे से दाढ़ी-मूँछ भी गायब होने लगे।  तभी तो हैदराबाद के अंग्रेज़ रेसिडेंट किर्कपैट्रिक ने मुस्लिम नवाबों की तरह जब मूँछे रखना शुरू किया तो बात इंग्लैंड तक पहुँच गई कि कहीं वो मुसलमान तो नहीं हो गए हैं और नतीजा यह हुआ कि उन्हें इंग्लैंड लौटना पड़ा।

फिल्म जगत में भी मुग़लेआज़म की अकबरी मूंछों से लेकर करण दीवान व राजकपूर कट मूँछें प्रसिद्ध हुईं।  यह अलग बात है कि करण दीवान को उतनी प्रसिद्धि नहीं मिली जितनी कि राज कपूर को। अब तो दाढ़ी-मूँछ देश या प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम पर भी जानी जाती हैं; जैसे, फ़्रेच, जर्मन या फिर लिंकन,लेनिन जैसी दाढ़ी।

वैसे तो दाढ़ी-मूँछ बढ़ा लेना मर्द की खेती कही जाती है परंतु इनकी देखभाल करना सरल काम नहीं है।  कैंची ज़रा फिसली नही कि दाढ़ी का संतुलन बिगड़ गया; ब्लेड की थोड़ी सी शरारत मूँछ का सफ़ाया कर देगी।  ऐसी हालत में व्यक्ति बड़ी दयनीय स्थिति में पड़ जाता है।  रुमाल से मुँह छिपाए घूमता है कि कहीं उसे सफ़ाई न देनी पड़े कि यह खैंची या ब्लेड की शरारत है न कि पत्नी से शर्त हारने का कारनामा!  परंतु लोग भी बड़े शातीर होते हैं, एक रहस्यभरी मुस्कान से समझा देते हैं कि अंदर की बात वे जानते हैं॥




शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

एक पुराना लेख


समीक्षक की व्यथा


समीक्षक के पास पुस्तक भेजते हुए हर रचनाकार यह आशा करता है कि उसकी कृति पर समीक्षा तुरंत ही किसी पत्र-पत्रिका में छप जाय।  समीक्षक के पास पुस्तक का पैकेट आते ही पहले तो वह कवर को घूरेगा, उलट-पुलट कर देखेगा कि किस लेखक, कवि, निबंधकार, कथाकार या ‘कलाकार’ [वही, जो अन्य की सामग्री चुराकर पुस्तकाकार बना देता है] ने इसे भेजा है या फिर किस प्रकाशक ने उसे प्रेषित किया है।

वैसे तो, पहले से ही समीक्षक के पास पुस्तकों का अम्बार लगा रहेगा जिन पर समीक्षा लिखना शेष है।  परंतु दाल-रोटी की जुगाड़ में अभी उसे इतना समय ही कहाँ मिल पाता है कि पावती की सूचना ही रचनाकार को दे सकें! उस पर समय-असमय लेखकों के पत्र आते हैं जिनमें समीक्षा के छपने की सूचना पहुँचाने का अनुरोध होता है।  अब उस भले-मानुस को कैसे समझाएँ कि "भैय्ये, समीक्षा छपवाना तो दूर, अभी लिखना तक भी नहीं हो पाया है।"

यह तो सभी जानते हैं कि समीक्षा का काम एक ‘थैंकलैस जॉब’ है।  लेखक की आलोचना करो और सुझाव दो कि ऐसे लेखन पर अपना पैसा बर्बाद न करें तो वह नाराज़ हो जाएगा।  उसके लिखने की त्रुटियों पर प्रकाश डालें तो वह समझेगा कि यह समीक्षक तो मास्टरी कर रहा है।  पुस्तक पर कुछ ठीक-ठाक लिख कर पत्र-पत्रिका को भेजो तो संपादक महोदय की डाँट आती है कि ऐसी घटिया पुस्तकों की समीक्षा हम नहीं छापते।  इसीलिए तो कभी-कभी रद्दी लेखक की पुस्तक पर भद्दी समीक्षा लिखकर भेजना होता है तो छद्मनाम का सहारा लेना पड़ता है।  ठीक है, सम्पादक महोदय हस्तलिपि देख कर समझ जाएँगे कि इस रद्दी समीक्षा के कुख्यात समीक्षक कौन हैं परंतु पाठक के आक्रोश से तो बचा जा सकता है।  अब ऐसे छद्मलेखन को प्रो. सियाराम तिवारी जी जैसे विद्वान इसे ‘आत्मविश्वास का अभाव या दुष्टता-जनित भीरुता’ का नाम ही क्यों न दे लें, पर समीक्षक के लिए तो है यह कोलगेट की सुरक्षा-चक्र जैसा सुरक्षित उपाय।

समीक्षा लिखने का समय नहीं हो तो आवरण पृष्ठ देखकर ही भाई लोग कुछ लिख देते हैं और लेखक को भेज देते हैं।  फिर भी यह एक्स्पेक्ट किया जाता है कि हम ही उसे किसी पत्र पत्रिका में छपवाएं!  छपवाएं ही नहीं बल्कि छपने के बाद उसकी ज़ेराक्स कॉपी भी उन्हें प्रेषित कर दें।  लो भला! गरीबी में आटा गीला’ शायद इसी को कहते हैं।  इस महँगाई के दौर में अपना समय निकाल कर समीक्षा लिखना, अपने पैसे लगाकर पत्र-पत्रिका को पोस्ट करना और सम्पादक की तुनुक मिज़ाज़ी का खतरा उठाना; और फिर, दुर्भाग्य से छप गई, तो उस समीक्षा की ज़ेरोक्स कॉपी करा कर, पोस्टेज लगा कर लेखक को भेजना!  इन सब में खर्चा ही खर्चा और समय की बरबादी।

समीक्षा लिखने के लिए इधर पुस्तक लेकर बैठे नहीं कि उधर से पत्नी की सदा सुनाई पड़ती है कि नून, तेल, लकड़ी का प्रबंध करने मार्केट जाना है।  तब खाली जेब में हाथ डालते हुए यह खयाल बड़ी शिद्दत से आता है कि समीक्षा लिखने से कुछ पैसे मिल जाते तो कितना अच्छा होता।  समीक्षा लिखने की साधना भी पूरी होती और पेट-पूजा के सामान का जुगाड़ भी हो जाता!

समीक्षक तो जानता है कि उसे कागज़-कलम का इंतेज़ाम भी अपने पैसे से ही करना है।  समीक्षा-लेखन तो ‘घर फूँक तमाशा देख’ से कम नहीं है।  शुरु-शुरु की समीक्षा-छपास की प्यास बुझने के बाद शायद हर समीक्षक के मन में यही बात उभर कर उठती है- बाज़ आए हम समीक्षा लिखने से..., फिर भी, छपास की प्यास कहाँ बुझ पाती है!!

/६जून२००४/

शनिवार, 17 सितंबर 2011

हिंदी का पर्व


हिंदी दिवस के मज़े [१]

हर पर्व की तरह ‘हिंदी दिवस’ भी हर वर्ष आता है और हिंदी पंडों [कृपया पंडित पढ़ें] के लिए कुछ न कुछ सौगातें ले कर आता है।  हर सरकारी, अर्ध-सरकारी और गैर-सरकारी संस्था यह पर्व बड़े ‘श्रद्धाभाव’ से मनाती है।  यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि इस दिवस को मनाना चाहिए या नहीं, या फिर, इस पर कितना बजट रखना चाहिए और इन पंडों को इस कर्मकाण्ड के लिए कितना मानदेय देना चाहिए।  हम इस बहस में से कन्नी काटते हुए अपने मुद्दे पर आते हैं।

हां तो, हिंदी दिवस धूमधाम से मनाया जाता है।  जिस प्रकार पितृपक्ष के समय पिंडदान के कार्य कराने के लिए पंडों का अकाल पड़ जाता है, उसी प्रकार हिंदी दिवस पर भी हिंदी पंडों की कमी  वर्ष में एक बार सभी संस्थानों को सालती है।  खैर, हम अपनी आपबीती सुनाते हैं।  वैसे तो हमारी गिनती इन पंडों में नहीं होती पर जैसा कि पंडों का अकाल पड़ने पर नाई ब्राह्मण को भी ब्राह्मण मान लिया जाता है, उसी प्रकार हमें भी छोटी संस्थाएं जो बडे पण्डों को समय पर बुक नहीं कर पातीं, हमें कभी-कभार याद कर लेती हैं।

हुआ यूँ, कि हमें एक छोटी संस्था के हिंदी दिवस के एक बड़े कार्यक्रम में बुलाया गया।  हमें अध्यक्षता करने के लिए कहा गया।  हम प्रसन्न थे कि हमारा इतना कद बढ़ गया है कि हमें उस कार्यक्रम में अध्यक्षता के लिए बुलावा आया है।  अपना पुराना कुर्ता, पायजामा और वासकोट निकाल कर झटक लिया, धो-धुलाकर इस्त्री-वस्त्री कर ली और लग गये अध्यक्षता की तैयारी में। सेंट-वेंट लगा कर निकल पडे अध्यक्ष बनने, तो बार-बार उस फिल्म की याद आ रही थी- चला मुरारी हीरो बनने!

कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ और मंच को सजाने के पहले दीप-प्रज्वलन के लिए हमें आमंत्रित किया गया।  साथ में अन्य लोग भी आये।  दीप प्रज्वलन क्या था, एक ऐसा अनुष्ठान जिसे जूते पहने ही लोग पूरा कर गए।  उसके बाद मंच पर सबसे पहले अध्यक्ष के नाते हमारा नाम पुकारा गया।  खरामा-खरामा चलते हुए हम मंच पर गए और झुक कर मंच के उस पार के लोगों को प्रणाम किया और बीच की कुर्सी पर आसन जमा लिया।  कार्यक्रम में कवियों के नाम पुकारे गए और वे भी हमारे अगल-बगल में बैठ गए।

संचालक महोदय ने हिंदी दिवस की आवश्यकता को रेखांकित किया और फिर काव्य गोष्ठी का शुभारंभ हुआ।  हर काव्य गोष्ठी की तरह इस में भी कविता कम और चुटकुले अधिक थे।  हम मुस्कुराये, इस लिए नहीं कि इन चुटकुलों में दम था पर इसलिए कि ये तो बासी कड़ी की उबाल की तरह थे, न इनमें कविता है और न ही कोई सार।  फिर भी, शिष्टता के नाते अपने अध्यक्षीय भाषण में न चाहते हुए भी हमें उन सभी कवियों की सराहना करनी पडी।

कार्यक्रम समाप्त हुआ तो सभी कविगण उस हिंदी अधिकारी की ओर लपके जो अपने हाथ में कुछ लिफ़ाफ़े और कागज़ात लेकर खड़ा था।  हमने संचालक महोदय से पूछा कि माजरा क्या है?  उन्होंने बताया कि उन्हें इस कार्यक्रम के लिए मानदेय दिया जा रहा है।  हम सोच रहे थे कि हमारा भी नम्बर आएगा ही। इतने में अल्पाहार के लिए न्यौता आया और सभी उधर बढ़ने लगे।  अल्पाहार में हम ने एक परिचित कवि से पूछा कि कितना मिला।  उसने उत्तर दिया- ‘साले, दो हज़ार की रसीद पर हस्ताक्षर करा कर एक हज़ार ही पकड़ा रहे हैं!’ हमने कहा - ‘भैया, हमे तो कुछ नहीं दिया अब तक।’ उन्होंने बताया कि अध्यक्ष को कैसे देंगे?  यह तो अध्यक्षपद का अपमान होगा ना!!

हम अपना मुँह लटकाये घर लौटे। 

शनिवार, 20 अगस्त 2011

मुस्कान


मुस्कराहट से अट्टहास तक


कभी शेक्सपीयर ने कहा था- ए मैन मे स्माइल एण्ड स्माइल एण्ड यट बी ए विलेन।  इस मुस्कुराहट के कई रूप होते हैं।  जब हम प्रसन्न होते है तो हमारे होटॊं पर एक धीमी सी मुस्कुराहट फैल जाती है।  सामनेवाला पूछ बैठता है- क्या बात है, बडे खुश नज़र आ रहे हो!  शायद इसीलिए चेहरे को आदमी का आइना कहा जाता है।

किसी परिचित को रास्ते में देखते है तो होंटों पर मुस्कुराहट अनायास ही आ जाती है।  इस प्रकार हम उससे बिन बात किए ही संवाद स्थापित कर लेते हैं।  यह मुस्कुराहट आपस में आत्मीयता का पैगाम पहुँचाती है।   यही मुस्कुराहट कभी दंभ का रूप भी ले लेती है।  जब हम किसी को नमन करते हुए हाथ जोड़ते हैं और वह केवल सिर हिलाकर मुस्कुरा देता है, तो लगता है कि वह अपने दम्भ में चूर है।  उसे प्रतिउत्तर में हाथ जोड़ना भी गवारा नहीं है। 

मासूम बच्चे की मुस्कुराहट सभी को भाती है। बच्चा झूले में खेलते हुए अपनेआप में  प्राकृतिक और निश्चल  मुस्कुराहट बिखेरता है तो देखने वाले को आनंदित कर देता है। तभी तो शायर कह उठता है- मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा।  यह मासूम मुस्कुराहट कभी हँसी में भी बदल जाती है।

अब हँसी भी तो कई प्रकार की होती हैं। एक तो उस मासूम की हँसी है जो बिना कारण ही हँस देता है।  एक वह हँसी होती है जिसे देखकर सामने वाला समझता है कि मुझे देखकर हँसा जा रहा है।  यह तो खतरनाक हँसी ही कही जाएगी जो बिना किसी कारण के बैरभाव खडा कर देती है।  सब से खतरनाक हँसी तो स्त्री की होती है जो महाभारत भी करा देती है।  कुटिल हँसी का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी किया है।  तात्पर्य यह कि हँसी अच्छी भी हो सकती है,  जो हँसी-खुशी के समय निकलती है और घातक भी जो उपहास करने, मज़ाक उड़ाने या मुँह चिढ़ाने के समय निकल जाती है।  हम फिल्मों में देखते भी है कि किस प्रकार विलेन हिरोइन को अपने जाल में फँसा तडपते देख हँसता है और उसकी आँखें दुर्भावना से फैल जाती है।

अब फिल्मों की बात चली है तो रावण का अट्टहास कैसे भूल सकते हैं?  हमने रावण को साक्षात हँसते हुए तो देखा नहीं है, केवल फिल्मों में ही देखा है पर हमारे मानस पटल पर उस ठहाके में एक क्रूर व्यक्तित्व की छवि छा जाती है।  परंतु यह आवश्यक नहीं कि हर अट्टहास रावणी ही हो।  हम भी कभी किसी चुटकुले या मनोरंजक घटना पर ठहाका लगा ही लेते है जो शुद्ध देसी घी की तरह केवल अपने मन की प्रसन्नता को सौ नम्बर देने का द्योतक होता है।  अब यह पढ़कर आप जो ठहाका लगा रहे हैं, उससे हम समझ गए कि कितने नम्बर दिए जा रहे हैं। हा...हा....हा!

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

gudgudi


गुदगुदी

मेरा पोता रोज़ रात में सोने से पहले मुझसे गले मिल कर ‘गुड नाइट’ कहने आता है।  वह तब तक मुझसे लिपटा रहता है जब तक मैं उसे गुदगुदी न करूँ। इस गुदगुदी से वह कसमसाता है और हँसते हुए ‘गुड नाइट’ कह कर चला जाता है।  यह प्रक्रिया सुबह भी चलती है जब वह उठ कर ‘गुड मार्निंग’ कहता है।  


गुदगुदी का चलन प्राचीन काल से चलता आ रहा है, भले ही उसका नामकरण संस्कार न किया गया हो।  कृष्ण ने सुदामा को परोक्ष रूप से गुदगुदी ही तो की थी जब उन्होंने बिन बताए ही सुदामा को धन-धान्य से सम्पन्न कर दिया था।  ज़रा सोचिए कि झोंपड़ी के स्थान पर महल को देख कर सुदामा को कितनी गुदगुदी हुई होगी।  इस गुदगुदी से उनके सारे बदन में झुरझुरी फैल गई होगी।

हाँ, कभी ऐसी गुदगुदी प्राण घातक भी हो सकती है।  कल्पना कीजिए कि यदि सुदामा का हृदय कमज़ोर होता तो इस गुदगुदी से हार्ट फ़ेल का खतरा भी हो सकता था।  प्रत्यक्ष रूप से हम देख सकते हैं कि जिनकी आँखें कमज़ोर हैं, उन्हें गुदगुदी करने पर आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं।  बेचारे कमज़ोर हृदयी की गति तो चिकनहृदयी ही बेहतर जान सकता है।

गुदगुदी करते समय उस व्यक्ति के शारीरिक और मौखिक हालत तो देखने लायक होती है।  उसका शरीर कई मोड़ ले लेता है जैसे किसी पहाडी की पगडंडी हो और मुखमुद्रा सुबह की लाली लगने लगती है।  यदि व्यक्ति मोटा हुआ तो उसकी तोंड किसी बिश्ती की थैली की तरह थुलथुल हिलती रहती है। 

गुदगुदी करते हैं तो हँसी आ ही जाती है।  हँसी भी कई प्रकार की होती है।  यह उस व्यक्ति पर निर्भर होता है कि वह किस प्रकार की हँसी का मालिक है।  

जो व्यक्ति हश्शाश-बश्शाश है, वह तो बिना गुदगुदाए भी हँसता रहता है।  गुदगुदी पर उसकी हालत का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।  दूर से ही उँगलियाँ हिलाने पर वह हँसना शुरू कर देगा और गुदगुदी कर दी तो वह लोट-पोट हो जाएगा।  समाचार पत्र में कभी पढ़ा भी था कि एक व्यक्ति हँसते-हँसते मर गया।  ऐसी गुदगुदी को निश्चय ही ‘घातक गुदगुदी’ का विशेषण जड दिया जा सकता है।  अच्छा हो कि हम ऐसी गुदगुदी से बचें और अपनी उँगलियाँ ऐसे व्यक्ति की ओर बढ़ाने के पहले उसकी मेडिकल रिपोर्ट जाँच लें।


संजीदा मिजाज़ वाला केवल मुस्कुरा देगा।  शायद उसके दाँत भी देखने को न मिले। ऐसे व्यक्ति की पत्नी की दयनीय हालत पर केवल दया ही व्यक्त कर सकते हैं जो अपने पति की एक इंच मुस्कान देखने के लिए तड़पती होगी।

यदि यह पढ़कर आपके मन में गुदगुदी हुई तो यह समझ लीजिए कि मेरे चेहरे पर दो इंच मुस्कान दौड़ गई है॥


शनिवार, 16 जुलाई 2011

खुजली :)

आपस की खुजली

बात निकलती है तो बहुत दूर तक पहुँचती है।  अब देखिए ना, बात खुजली की हो रही थी तो साहित्य से होते हुए कामसूत्र तक पहुँच गई।  खुजली बड़े बड़े साहित्यकारों की रचना का विषय बन चुकी है।  बाबा नागार्जुन ने कुत्ते की खुजली का वर्णन किया है तो परबाबा आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने अनामदास का पोथा खोल कर एक पात्र की खुजली का वर्णन करते हुए कहा था कि उसे खुजली इसलिए हो गई कि राजकुमारी ने अपनी दृष्टि उसकी पीठ पर डाली थी।  उनसे बुज़ुर्ग साहित्यकार कालिदास ने भी हाथी की खुजली का सुंदर वर्णन किया था और बताया कि किस प्रकार हाथी देवदार जैसे विशाल वृक्ष से अपनी देह की मालिश करता है।  ‘मारे गए गुल्फ़ाम’ में रेणुजी ने हीरामन की खुजली का वर्णन किया ही है, पर वह तो एक देहाती की खुजली थी।  शायद उसे वात्सायन को बिना पढ़े ही उस खुजली की तलब हो गई थी।  कामसूत्र में उन्होंने कामांग के विशेष प्रकार की खुजली- कामकंडू का वर्णन किया है। बेचारा हीरामन....!  और फिर,  एक प्रसिद्ध लेखिका ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके पति को खुजली की शिकायत थी।  उस बीमारी का काफी इलाज किया गया पर कोई लाभ नहीं हुआ।  उनकी खुजली तब अपनेआप चली गई जब दोनों का विच्छेद हो गया।

यह तो हो गई बड़े-बड़े साहित्यकारों की बात। एक और किस्म की खुजली का पता चला था विश्व युद्ध के बाद जिसे चिकित्सकों ने ‘फ़ैंटम इच’ का नाम दिया था।  यह युद्ध में ज़ख्मी फ़ौजियों में पाई गई थी जिनके अंग काटे जा चुके थे।  उन लोगों ने ऐसे अंगों में खुजली की शिकायत की थी जो कट चुके हैं।  इसके कारण का पता लगाने के लिए बहुत खोजबीन की गई थी।  शोध से पता चला कि जिन अंगों को काटा गया है उन से जुड़े रगों ने यह सिग्नल मस्तिष्क को भेजा है।  

विज्ञान की बात चली तो बता दें की होमियोपैथी के जनक हैनेमॉन ने खुजली को एक बीमारी नहीं बल्कि बीमारी के तीन कारण- सोरा, सिफ़िलिस और सैकोसिस में से इसे सोरा का लक्षण बताया है।  खुजली तो शरीर के भीतर छिपे सोरा को बाहर लाने का प्रयास मात्र है।  इस खुजली को लक्षणों के आधार पर दवाई दी जाय तो भीतर छिपा सोरा भी ठीक हो जाएगा।  इसके लिए सौ से अधिक दवाइयां हैं होमियोपैथी में। [ इस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी ।]

 अब रही हम जैसे अपढ़ों की बात।  बचपन में दादा पूछते थे- बेटा पीठ गुलगुला रही है क्या? और छड़ी उठा लेते थे।  हम भाग खड़े होते थे क्योंकि हमे तो मार खाने की खुजली थी नहीं।  किसी किसी को हाथों की खुजली होती है।  हाथ में खुजली कभी धन की आमद का संदेसा भी देती है।  कुछ को ज़बान की खुजली होती है।  वो चलती रहती है जैसे बस का टायर हो, कभी घिसती ही नही और रुकती भी नहीं।

सब से बेचैन करने वाली खुजली तो पीठ की खुजली होती है। इस खुजली का इलाज खुजलीवाले के हाथ में नहीं होता।  वह तो दूसरे के हाथ का मुहताज होता है। खुजानेवाला भी बेचारा पसोपेश में रहता है कि आखिर उसे खुजली कहाँ हो रही है।  वह तो दिलोजान लगा कर खुजाता है और उसे आवाज़ सुनाई देती है... यहाँ नहीं, ज़रा ऊपर, अरे वहाँ नहीं, ज़रा नीचे...  हाँ हाँ वहीं, ऊपर हड्डी के पास, नहीं नहीं थोड़ा नीचे। अंत में हार कर खुजानेवाला हाथ छोड़ कर सारी पीठ पर ही कंघी फिर देता है।

अंत में,  यह भी एक खुजली ही तो है कि हम ब्लाग लिख रहे हैं और पाठकों से आशा करते हैं कि टिप्पणी ठोंके।  इसी आशा से हम भी तो उनकी खुजली मिटाते हैं।  यही तो है ब्लाग की खुजली, तुम मुझे खुजाओ, मैं तुम्हें खुजाऊँ... है कि नै!!!

शनिवार, 25 जून 2011

प्रकृति


अपनी अपनी प्रकृति


डहडही बैरी मंजुडार सहकार की पै,
चहचही चुहल चहूँकित अलीन की।
लहलही लोनी लता लपटी तमालन पै,
कहकही तापै कोकिला की काकलीन की।
तहतही करि रसखानि के मिलन हेत,
बहबही बानि तजि मानस मलीन की।
महमही मंद-मंद मारुत मिलनि तैसी,
गहगही खिलनि गुलाब की कलीन की।

रसखान की इन पंक्तियों में प्रकृति का सुंदर वर्णन है। प्रकृति के इस वर्णन से बाग-बगीचे, फूल-गुंचे, पेड़-पौधे, रंग बिरंगी पक्षी-तितली आदि का चित्र मानसपटल पर दौड़ जाता है।  प्रकृति के बीच मनुष्य एक नई ताज़गी, एक नई ऊर्जा महसूस करता है।  इसीलिए लोग पर्यटन के लिए निकल पड़ते हैं, कुछ ‘वेकेशन’ के नाम से तो कुछ तीर्थ-यात्रा के नाम पर।  जब भी कोई शहरी व्यक्ति इस कंक्रीट जंगल से बाहर निकल कर कोई दूर दराज़ गाँव की ओर निकल पड़ता है तो उसे वहाँ भी प्रकृति के दर्शन हो जाते हैं।  खेत-खलिहान के बीच गाँव के लोग अपने अपने कार्य में व्यस्त हैं।  महिलाएँ कमर झुकाए खेत में कोई गीत गाती हुई काम पर लगी हुई हैं।  यह नज़ारा शहरी को एक प्राकृतिक दृश्य दिखाई देता है। 

यह तो हुई गाँव की प्रकृति की बात। लोगों की प्रकृति और नैसर्गिक प्रकृति के बीच भी कभी छत्तीस का आंकड़ा होता है। तभी तो दुष्यंत जी ने खूब कहा था-

एक कबूतर चिठ्ठी ले कर पहली—पहली बार उड़ा
मौसम एक गुलेल लिये था पट—से नीचे आन गिरा

यों तो बेचारे कबूतर की प्रकृति उड़ने की होती है पर  जब प्रकृति गुलेल लिये खड़ी हो तो उसे चेत जाना चाहिए था।  बेचारा बालक कबूतर पट से गिर पड़ा!  यही हाल कभी-कभी उन सैलानियों का होता है जो प्रकृति के कोप न भाँप पाने के कारण असुविधाओं को झेलते है।

प्रकृति को ढूँढ़ने के लिए लोग अपना देश छोड़ विदेशों में भी सैर के लिए निकल पड़ते हैं।  मुझे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि प्रकृति को ढूँढ़ते हुए पर्यटक देश-विदेश की सैर के लिए क्यों निकल पड़ते हैं!  प्राकृतिक दृश्य तो कहीं भी मिल ही जाते हैं, शायद अपने घर के पिछवाडे भी।  पर नहीं, प्रकृति की तलाश में जब तक कुछ मशक्कत न की जाय तब तक उसका आनंद नहीं आता; ठीक उसी तरह जिस तरह मुहल्ले के मंदिर में जाने से उतना पुण्य नहीं मिलता जितना केदारनाथ, बद्रीनाथ के मंदिरों में माथा टेकने से।


इसका अर्थ यही हुआ कि प्रकृति भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है।  इसमें दो राय हो सकते है कि प्रकृति भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं, परंतु यदि ऐसा नहीं होता और आदमी की प्रकृति एक ही प्रकार  की होती तो दुनिया कितनी फीकी होती। ‘द वर्ल्ड वुड डाई ऑफ़ मोनोटनी’।  न कोई प्रेम न बैर, न कोई झगडा न रगड़ा, कितना ‘मोनोटोनस’ होता जीवन।  तभी तो ईश्वर ने मनुष्य को अलग अलग प्रकृति दी है कि हम दुनिया में आकर बोर न हो जाएँ। प्रकृति भी अपने नये-नये रूप दिखाती रहती है।  

मनुष्य की इस प्रकृति के कारण ही तो मातहत अफ़सर से डरता है, संत्री मंत्री से डरता है और कार्यकर्ता नेता से।  इसका अर्थ यह हुआ कि प्रकृति और डर एक दूसरे के पुरक हैं।  

डर प्रकृति का अभिन्न अंग है।  आप नहीं मानते तो ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’!  यह डर ही है कि मालिक के गुस्सैल प्रकृति के कारण नौकर चौकन्ना रहता है; डर के कारण मंत्री संत्री को दूर रखता है कि वह सब गुर सीख कर खुद मंत्री की कुर्सी पर न बैठ जाए;  डर है कि कार्यकर्ता अच्छा वक्ता बन कर नेता न बन जाय और नेता को अपनी दुकान बंद करना पडे।  इस डर का कारण है मनुष्य की प्रकृति, जो उसे बेल की तरह पेड से ऊँचा हो जाने की प्रेरणा देती है।  यही डर भक्त को भगवान की ओर ले जाता है।  यदि स्वर्ग-नरक का डर नहीं रहा तो मनुष्य पूछने लगे - ‘कौन भगवान’, और इंद्र का सिंहासन डोल जाय।

प्रकृति को भी डर है!  उसे डर है कि मनुष्य उसको विकृत करता जा रहा है और यदि ऐसा ही चलता रहा तो उसका वजूद ही मिट जाएगा।  इसलिए वह समय-समय पर चेतावनी देती रहती है... कभी सुनामी के बहाने तो कभी लावा उगल कर।  इन चेतावनियों के बावजूद मनुष्य नहीं समझ पा रहा है कि प्रकृति को नष्ट करने में वह भी धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है।  परंतु लालच मनुष्य की प्रकृति है और इसके चलते वह इस डर को कालीन के नीचे छुपाता जा रहा है।  

अब यह अपनी-अपनी प्रकृति पर निर्भर है कि हम प्रकृति के कितने पास या दूर रहते हैं।  

मंगलवार, 21 जून 2011

सोना और सोने की चर्चा


सोना चढ़ा....

मैं रोज़ रात को सोने से पहले टीवी न्यूज़ चैनल लगाता हूँ और लेट जाता हूँ।  यह हर रोज़ की प्रक्रिया है। आज भी ऐसे ही हुआ पर कुछ गज़ब का संयोग रहा।  मैंने न्यूज़ चैनल लगाया और पलंग पर चढ़ा ही था कि टीवी से आवाज़ आई- सोना चढ़ा और जैसे ही तकिया पर सिर टिकाया, टीवी से आवाज़ आई चांदी लुढ़की।  मुझे कुछ आश्चर्य हुआ कि मेरी हरकत और सोने-चांदी के भाव में कैसा संयोगी जुड़ाव है! मेरा पलंग पर चढ़ना मेरे चांदी जैसे बालों से ढके सिर का तकिया पर लुढ़कना सोने-चांदी के भाव से कितना मेल खाता है।

खैर, अब सोने की बात चली है तो इसी पर चर्चा हो जाय। सोने के कितने लाभ होते है इसमें कोई दो राय नहीं।  आदमी के पास सोने लायक बिस्तर हो तो नींद की क्या पूछते हो। बस, लेटते ही खर्राटे भरने लगता है।  वैसे, बिना बिस्तर के भी थका मज़दूर घोड़े बेचकर सोता है।  भले ही सोना उसकी किस्मत में न बदा हो पर सोने से उसे कौन रोक सकता है। दिन भर की मेहनत के बाद निंदिया रानी उस पर मेहरबान हो जाती है।

धनवान के पास तो सोने की खान होती है पर सोने के नाम पर उसे नर्म बिस्तर पर भी नींद नहीं आती।  नींद की गोलियाँ भी कुछ असर नहीं करतीं।  आँख बंद करते ही उसे इन्कम टैक्स रेड और एन्फ़ोर्समेंट पूछताछ के भयानक सपने आते हैं और बैरन अखियों से नींद उड़ जाती है। अब उस पगले को कौन समझाए कि वो तेली का काम बंद कर दे।  कहते हैं ना कि तेली जोड़ें धारों-धार, कुप्पा लुढ़के एक ही बार।  बस रेड हो गया तो सारा जोड़ा हुआ तेल बिखर जाता है,  भले ही उसने इस कुप्पे के लिए न जाने कितने अधिकारों को तेल लगाया हो।

प्रेम के क्षेत्र में भी सोने का काफी महत्व होता है। प्रेमी तो अपनी  प्रेमिका की सुंदरता के कसीदे पढ़ते हुए  सोने जैसी सूरत और चाँदी जैसे बदन की तारीफ करता रहता है तो प्रेमिका भी फिल्मी स्टाइल में गाती फिरती है- ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे। खुश होकर प्रेमी उसे सोने के उपहार देता है। वह खुशनसीब दिन भी आता है जब दोनों का ब्याह हो जाता है।  अब उपहार में सोने की जगह चाँदी ले लेती है।  ब्याह के कुछ वर्षों बाद जब पति उसके पास प्रेमपूर्वक जाता है तो वह गुस्से में कहती है- सो ना रे, सो ना रे, सो ना रे।

उमरिया कटती जाती है। काया धातु की खान बन जाती है। सोना, चांदी अब देह में दिखाई देने लगते हैं। सिर पर चांदी जैसे बाल, मुँह में सोने के दाँत और शीश भरे घुटनों में इतनी ऐंठन कि चलने में भी कठिनाई हो तो व्यक्ति व्याकुल हो जाता है।  अब न उसे सोने की चाह रहती है और न उसे नींद आती है, बस... कटते हैं दिन इस तरह, करवट बदल बदल के... और वह टकटकी लगाए अलमारी में रखे सोने की रखवाली में दिन गुज़ारता है।  क्या जाने कब आँख लग जाए॥

शनिवार, 18 जून 2011

.....चारी?.


आपत्तिकाल परखिए चारी...


हमारे देश के सबसे वरिष्ठ हिंदी कवि गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था- आपत्तिकाल परखिए चारी... तो हमें समझ में नहीं आया कि वे किस चारी की बात कर रहे हैं! वैसे, देश में कई चारी रहते हैं जैसे ब्रह्मचारी, शिष्टाचारी, व्यभिचारी,  भ्रष्टाचारी आदि।  अब यदि हम इन्हें आपत्ति  की कसौटी पर परखना चाहें तो कौन कितना सहायक होगा, यह तो गोस्वामी जी ने इसलिए नहीं बताया कि वे भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाये।  आधुनिक समय में प्रसिद्ध टीवी चैनल ‘टाइम्स नाउ’ के अरनब गोस्वामी भी शायद इसी प्रयास में हर रात टीवी पर यही प्रयास कर रहे हैं कि कौन सा चारी देश के आपातकाल से लेकर आज तक प्रमुख भूमिका में रहा है। अरनब गोस्वामी के विश्लेषण प्रयास को ताक पर रख कर हम अपनी तईं देखें कि कौन सा चारी असली आपत्तिकाल निवारक होता है।

शिष्टाचारी हमेशा अपने शिष्टाचार का आचरण करता है।  जब सड़क पर कोई दो लोग लड़ रहे हॊं और अपना गुस्सा एक-दूसरे पर निकालने के लिए गाली-गलौज़ का प्रयोग ठीक उसी तरह कर रहे हों जैसे गली के दो कुत्ते आपस में एक दूसरे पर गुर्राते हैं, तो शिष्टाचारी शिष्टाचारवश वहाँ से कन्नीकाट कर निकल जाता है। उस आपात स्थिति से उलझना उसे शिष्टाचार के विरुद्ध लगता है।  इसका अर्थ तो यही हुआ कि शिष्टाचारी आपत्ति काल में काम आनेवाला नहीं है।

फ़िल्मी दुनिया में अक्सर अफ़ेयर की बातें होती हैं और जैसा कि जॉन इब्राहिम की लम्बे काल से चल रही प्रेमिका बिपाशा बसु कहती हैं कि समाचार में रहने का यह भी एक तरीका है कि हम अपने प्रेमियों के बारे में बातें करते रहें, प्रेमी बदलते रहें और हमारे समाचार लोग चटखारे लेकर पढ़ते रहें।  यदि ऐसे माहौल में कोई ब्रह्मचारी आ जाय तो वो किस काम का रहेगा।  वहाँ तो सलमान खान जैसे ही समाचारों में रहेंगे और ताज़ा समाचार मिलने तक अपनी लेटेस्ट प्रेमिका के साथ  ब्रेकिंग न्यूज़ बनाते दिखाई देंगे।

आज दिल्ली की सड़कें महिलाओं के लिए एक समस्या बन गई है।  गुज़रे ज़माने में दिल्ली की गलियां भी प्रसिद्ध हुआ करती थीं जहाँ महिलाएँ बेधडक अपनी ज़रूरत के सामान लिया करते थे पर आज गली तो गली, सड़कों पर भी आपत्ति छाई हुई हैं इन महिलाओं के लिए।  यहाँ हर तरह के व्याभिचारी हर भेस में पाये जाएँगे।  कहीं धनपति के पुत्र के रूप में, कभी पुलिस के रूप में तो कभी किसी बडे नेता या अधिकारी की संतान के रूप में। ये व्यभिचारी सभी पर भारी पड़ रहे हैं। पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकती, महिलाएं अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं और व्याभिचारी खुले आम मर्यादा का उल्लंघन करते जा रहे हैं।  ये लोग तो आपत्ति ला रहे हैं तो उन्हें आपत्ति काल में परखने का प्रश्न ही कहाँ उठता है।

भ्रष्टाचारी सब से बदनाम व्यक्ति होता है।  उसका मानना है कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।’  राजा रहकर भी कभी उसे रंक की तरह जेल की हवा खाना पड़ता है पर रहता तो है वह सुरखियों में! अब रही बात उसकी आपत्ति में परखने की तो यह कहा जा सकता है कि वह बहुत हेल्पफ़ुल होता है।  वह दूसरों की मदद करता है और उनका आर्थिक स्तर बढाने में मदद करता है।  यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब उसकी पोल खुलती है तो उसके साथी ठीक उसी तरह साथ छोड़ देते हैं जैसे नाविक डूबती नैय्या को।  फिर भी, यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचारी आपत्ति काल में सब से अच्छा मददगार होता है।  उसका कर्मवाक्य होता है- माले मुफ़त, दिले-बेरहम।  वह बेरहम नहीं होता बल्कि माल से उसका मोह नहीं होता। इसलिए वह माल बाँटने में संकोच भी नहीं करता।  

आपत्तिकाल  में चारी को परखने का सिलसिला गोस्वामी तुलसीदास के काल से लेकर अरनब गोस्वामी तक के आधुनिक कल तक चला आ रहा है। फिर भी, ‘आज तक’ जैसा सबसे तेज़ चैनल भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाया है।

  

गुरुवार, 16 जून 2011

ग्रहण


 ग्रहण क्या है?

शीर्षक देख कर डॉ. अरविंद मिश्र जैसे वैज्ञानिक मस्तिष्क वाले कहेंगे कि ये हमें क्या सिखाएगा!  हम तो इस विषय में पारंगत हैं। परंतु मैं तो उस ग्रहण की बात करने जा रहा हूँ जिससे हर कोई किसी न किसी प्रकार ग्रसित है।

हैदराबाद के एक प्रसिद्ध कवि हैं थ्री डी पाण्डेय। शायद यह नाम आपने नहीं सुना होगा क्योंकि उनका पूरा नाम है दुर्गा दत्त ‘दुष्ट’ पाण्डेय, जो अपने तीन डी और कविताओं के लिए प्रसिद्ध है। हाँ तो, पाण्डेय जी के पुत्र ने एक दिन उनसे यही सवाल किया था कि यह ग्रहण क्या होता है?  पाण्डेय जी ने उसे समझाते हुए कहा था कि बेटा जब सूर्य और चंदा मामा के बीच धरती आ जाती है तो चंद्र ग्रहण कहते हैं और जब तुम्हारी माँ और मेरे बीच तुम्हारे मामा आ जाते हैं तो परिवार को ग्रहण लग जाता है।

तो मित्रो.... [यह हमारे कई प्रोफ़ेसरों के संबोधन का स्टाइल है] ग्रहण भी कई प्रकार के होते हैं।  चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण से लेकर पाणिग्रहण तक। पाणिग्रहण तो ऐसा ग्रहण है जिससे पाणिनी जैसे विद्वान भी व्याकरण और ज़ुल्फ़ों के जाल में फंस कर अनुग्रहित हो गए। जब दुल्हन के पाणि का ग्रहण कर लिया है तो निभाना पडेगा और जीवन भर गाते रहना है- जो वादा किया तो निभाना पडेगा...।

यह तो हो गई परिवार के ग्रहण की बात, अब करते हैं समाज को ग्रहण लगने की बात।  समाज को ग्रहण तब लगता है जब तंत्री और मंत्री की सांठगांठ से व्यवस्था कुव्यवस्था की ओर बढ़ जाती है। उसकी इतनी अति हो जाती है कि सरकार के आँख और कान को ग्रहण लग जाता है।  तब न तो सत्याग्रह काम आता है न हड़ताल। शायद ऐसे में ही नक्सलवाद पनपता है, पर यह कितना सफल होता है.... ‘यह हमें देखना है और हम देखेंगे’।

देखने की बात चली तो प्रायः यह भी देखने में आया है कि राजनीति को भी ग्रहण लग जाता है तब नेता लोगों के बुद्धि पर दम्भ का ऐसा ग्रहण लग जाता है कि  किसी अन्य पर आरोप लगाने का अंधकार छा जाता है।  कभी दूर अतीत में भारत को सी.आइ.ए. का ग्रहण लगा था, पास अतीत में पड़ोसी आतंकवाद का ग्रहण लगा और वर्तमान में आर.एस.एस. का ग्रहण लगा हुआ है।  किसी भी समस्य पर इस प्रकार की संस्थाएँ ग्रसित हो जाती हैं, जैसे हर मर्ज़ की दवा ज़िंदा तिलिस्मात होता है। आज की राजनीति का हर ग्रहण आर.एस.एस. के नाम हो गया है और इससे सरकार अपनी धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए राजनीतिक ग्रहण का परिष्कार करती रहती है।

सरकार को लगा ग्रहण नागरिकों तक उस समय पहुँच जाता है जब बजट में टैक्स का प्रावधान होता है।  टैक्स के ग्रहण से तो हर कोई ग्रसित है पर कभी कभी शनि की सहानुभूति दृष्टि महिलाओं की ओर पड़ जाती है और उन्हें कर में कुछ छूट दी जाती है।  परंतु ऐसा नहीं है कि सरकारी ग्रहण से बच जाने वाली ये महिलाएँ प्राकृतिक ग्रहण से बच पायें।  हर गर्भवती ग्रहणी को ग्रहण के समय एहतियात बरतनी पड़ती है और उसे हिले-डुले बगैर चित्ता लेटे रहना पड़ता है। कहते हैं कि इससे संतान में कोई विकृति नहीं आती।  इस सदी के इस लम्बे चंद्र ग्रहण में कितनी महिलाएँ इसका निर्वाह कर पाएँगी, वह भविष्य के लिए एक शोध का विषय रहेगा जो यह प्रमाणित करेगा कि यह अंधविश्वास बुद्धि का ग्रहण है या इसमें कुछ तथ्य भी है।

ग्रहण करने के भी कई तरीके होते हैं।  पंडित और अग्नि के सामने पाणिग्रहण किया जाता है।  जोड़-तोड़ करके, जुगाड़ करके पिपासु लोग पुरस्कार ग्रहण करते हैं और अपने नाम के पीछे ...पुरस्कार ग्रहीता का टैग लगा लेते हैं।  धन ग्रहण करके व्यक्ति चिंता ग्रहण अपने जीवन में लगा लेता है जो उसे चिता की ओर ले जाता है।  हम ब्लागर भी तो टिप्पणियाँ ग्रहण करके अपने को टीप का ब्लागर बनाने का ग्रहण लगा ही लेते है।

देखा जाए तो हर व्यक्ति ग्रहण से ग्रसित है। अब आप ही निर्णय कर लें कि आप किस ग्रहण को ग्रहण कर रहे हैं।  वैसे मैंने एक विद्वान के कुछ टिप्स को ग्रहण करके इस लेख का जुगाड़ कर पाया हूँ॥