लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

एक खयाल


बड़ा

सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का वह दोहा था-

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर
पथिक को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥

यह सही है कि बड़ा होने का मतलब होता है नम्र और विनय से भरा व्यक्ति जो उस पेड की तरह होता है जिस पर फल लदे हैं जिसके कारण वह झुक गया है।  बड़ा होना भी तीन प्रकार का होता है। एक बड़ा तो वह जो जन्म से होता है, दूसरा अपनी मेहनत से बड़ा बनता है और तीसरा वह जिस पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  

अपने परिवार में मैं तो सब से छोटा हूँ।  बडे भाई तो बडे होते ही हैं।  बडे होने के नाते उन पर परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां भी थीं।  पैदाइशी बड़े होने के कुछ लाभ हैं तो कुछ हानियां भी हैं।  बड़े होने के नाते वे अपने छोटों पर अपना अधिकार जमा देते हैं और हुकुम चलाते हैं तो उनके नाज़-नखरे भी उठाने पड़ते हैं।  उनके किसी चीज़ की छोटे ने मांग की तो माँ फ़ौरन कहेगा- दे दे बेटा, तेरा छोटा भाई है।  छोटों को तो बड़ों की बात सुनना, मानना हमारे संस्कार का हिस्सा भी है और छोटे तो आज्ञा का पालन करने लिए होते ही हैं। परिवार में बडे होने के नुकसान भी हैं जैसे घर-परिवार की चिंता करो, खुद न खाकर भी प्ररिवार का पोषण करो आदि। अब जन्म से बडे हुए तो ये ज़िम्मेदारियां तो निभानी भी पड़ेंगी ही।

जन्म से बडे कुछ वो सौभाग्यशाली होते हैं जो बड़े घर में पैदा होते हैं।  वे ठाठ से जीते हैं और बडे होने के सारे लाभ उठाते हैं।  बडे घर में जन्मे छोटे भी बडे लोगों में ही गिने जाते हैं।  इसलिए ऐसे लोगों के लिए पहले या बाद में पैदा होना कोई मायने नहीं रखता।  उस परिवार के सभी लोग बडे होते हैं।

दूसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जो अपने प्ररिश्रम से बडे बन जाते हैं।  एक गरीब परिवार में पैदा होनेवाला अपने परिश्रम से सम्पन्न होने और बुद्धि-कौशल से समाज में ऊँचा स्थान पाने वाले लोगों के कई किस्से मशहूर हैं ही।  ऐसे लोगों को ईश्वर का विशेष आशीर्वाद होता है और उनके हाथ में ‘मिदास टच’ होता है।  वे मिट्टी को छू लें तो सोना बन जाय!  अपने बुद्धि और कौशल से ऐसे लोग समाज में अपना स्थान बनाते है और बड़े कहलाते हैं।  

ऐसे बडों में भी दो प्रकार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।  कुछ बडे लोग अपने अतीत को नहीं भूलते और विनम्र होते है।  उनमें अभिमान नाममात्र को नहीं होता।  इसलिए समाज में उनका सच्चे मन से सभी सम्मान करते हैं।  दूसरी प्रवृत्ति के बडे लोग वे होते हैं जो शिखर पर चढ़ने के उसी सीड़ी को लात मार देते हैं जिस पर चढ़कर वे बडे बने रहना चाहते हैं।  वे अपने अतीत को भूलना चाहते हैं और यदि कोई उनके अतीत को याद दिलाए तो नाराज़ भी हो जाते हैं।  इन्हें लोग सच्चे मन से सम्मान नहीं देते;  भले ही सामने जी-हुज़ूरी कर लें पर पीठ-पीछे उन्हें ‘नया रईस’ कहेंगे।  ऐसे बड़े लोगों के इर्दगिर्द केवल चापलूस ही लिपटे रहते हैं।  कभी दुर्भाग्य से जीवन में वे गिर पडे तो उनको कोई साथी नहीं दिखाई देगा।  सभी उस पेड के परिंदों की तरह उड़ जाएंगे जो सूख गया है।

तीसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जिन पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  इस श्रेणी में धनवान भी हो सकते हैं या गुणवान भी हो सकते हैं या फिर मेरी तरह के औसत मध्यवर्गीय भी हो सकते हैं जिन्हें कभी-कभी समय एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देता है जब वे अपने पर बड़प्पन लदने का भार महसूस करते हैं।  हां, मैं अपने आप को उसी श्रेणी में पाता हूँ!

मैं एक मामूली व्यक्ति हूँ जिसे अपनी औकात का पता है।  मैं अपनी क्षमता को अच्छी तरह से परक चुका हूँ और एक कार्यकर्ता की तरह कुछ संस्थाओं से जुड़ा हूँ।  जब मुझे किसी पद को स्वीकार करने के लिए कहा जाता है तो मैं नकार देता हूँ। फिर भी जब किसी संस्था में कोई पद या किसी मंच पर आसन ग्रहण करने के लिए कहा जाता है तो संकोच से भर जाता हूँ।  कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब मुझे स्वीकार करना पड़ता है तो मुझे लगता है कि मैं उस तीसरी श्रेणी का बड़ा हूँ जिस पर बडप्पन लाद दिया जाता है।  इसे मैं अपने प्रियजनों का प्रेम ही समझता हूँ, वर्ना मैं क्या और मेरी औकात क्या।  क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा! मुझे पता है कि बड़ा केवल पद से नहीं हो जाता बल्कि अपने कौशल से होता है।  ऐसे में मुझे डॉ. शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव की यह कविता [बहुत दिनों के बाद] बार बार याद आती है--

बड़ा को क्यों बड़ा कहते हैं, ठीक से समझा करो
चाहते खुद बड़ा बनना, उड़द-सा भीगा करो
और फिर सिल पर पिसो, खा चोट लोढे की
कड़ी देह उसकी तेल में है, खौलती चूल्हे चढ़ी।

ताप इसका जज़्ब कर, फिर बिन जले, पकना पड़ेगा
और तब ठंडे दही में देर तक गलना पड़ेगा
जो न इतना सह सको तो बड़े का मत नाम लो
है अगर पाना बड़प्पन, उचित उसका दाम दो!

सोमवार, 30 जनवरी 2012

मुम्बई का एक नज़ारा

Boot Polish
चित्र :बूटपालिश  [२००७] से साभार



बूटपालिश वाला

रेल व्यवस्था मुम्बई शहर की जीवनरेखा कही जाती है।  हर अपरिचित व्यक्ति इस व्यवस्था को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है।  इतनी तेज़ी से आती जाती रेलगाडियों के बावजूद स्टेशनों पर भीड़ जस की  तस नज़र आती है।  ऐसे में किसी ट्रेन में विंडो सीट मिलना एक प्रतियोगिता जीतने जैसा होता है।  एक दिन मैंने भी यह प्रतियोगिता जीती और बैठ गया ट्रेन की विंडो सीट से बाहर का नज़ारा झांकने। 

रेलवे ट्रैक के समीप बने स्लम की लगातार कतार देख कर लगा कि मुम्बई दो छोरों का शहर है जहाँ ऊँची अट्टालिकाओं के साथ ये झोपड़पट्टियां भी है। सम्पन्न लोग उन अट्टालिकाओं में रहते हैं तो गरीब इन झोपड़ियों में रहकर उनकी सेवा करते हैं! शायद यह आज के हर बड़े शहर की विडम्बना है।

मुम्बई की ट्रेन में बैठे नज़ारे देखने का एक अलग ही अनुभव होता है।  गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी नहीं कि ‘आक्रमण’ के नाद के साथ लोग ट्रेन में घुसने लगते हैं।  यह महाभारत सीरियल की प्रेरणा का असर है।  यह आक्रमण दोतरफ़ा होता है।  ट्रेन में घुसने वाले लोगों को भीतर की ओर ठेलते रहते हैं तो भीतर से उतरने वाले बाहर की ओर ज़ोर लगाते रहते हैं।  इस ठेलम्ठेल में कुछ उतरने वाले नहीं उतर पाते और कुछ चढ़नेवाले छूट जाते हैं।  जो उतर नहीं पाया वह अगले स्टेशन के लिए तैयार रहता है तो जो नहीं चढ़ पाया वह अगले ट्रेन की प्रतीक्षा में।

वैसे तो दूसरी ट्रेन कुछ ही मिनट में आ जाएगी।  इन चंद घडियों में फिर भीड जस की तस हो जाती है।  अभी जो स्टेशन खाली दिख रहा था कुछ ही मिनिट में फिर भर जाता है।  फिर वही ‘आक्रमण’ और वही ठेलम्ठेल का सिलसिला...।

मुम्बई के रेलवे स्टेशन पर दो खास तरह के व्यवसाई दिखाई देते हैं।  ये व्यवसाई  अपने हुनर में बडे तेज़ होते हैं। एक हैं- तेल-मालिश चम्पी करने वाले और दूसरे हैं बूट पालिश वाले। बूट पालिश का ज़िम्मा छोटी आयु के बच्चे निभाते हैं।  मैं अपनी विंडो सीट से बैठा-बैठा एक ऐसे ही बच्चे को देख रहा था।  ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी थी केवल दो मिनट के लिए पर इतने अल्प समय की झलक ने ही मेरे मानस पटल पर एक अमिट छाप छोड़ दी।

प्लेटफ़ार्म के एक कोने में लकडी के छोटे से डिब्बे को स्टूल बना कर एक बारह-तेरह वर्ष का बालक बैठा था।  उसके सामने एक और डिब्बा रखा था जिसपर एक व्यक्ति अपना पैर रखे हुए था।  वह बालक बड़े मनोयोग से एक छोटी-सी डिब्बी से पालिश निकाल कर बडी नज़ाकत से जूते पर मल रहा था।  पालिश अच्छी तरह जूते पर फैला देने के बाद वह अपने कंधे पर रखे कपडे को पट्टी की तरह मोड़ कर उस जूते पर रगड़ने लगा।  लो, जूता चमचमाने लगा।  फिर, जूते के चारों ओर एक ब्रश को  बड़ी सलाहियत से घुमाने लगा।  काम समाप्त हुआ तो जूते को हल्के से ठोका। ग्राहक समझ गया कि उसके एक जूते का काम हो गया है।  उसने दूसरा पाँव उस स्टूल पर रख दिया।  फिर उसी तन्मयता से वह बालक पालिश लगाने लगा।  अब ट्रेन खिसक चली थी।

जब तक निगाह जाती, मैं उसी नज़ारे को देखता रहा।  वह बालक- जिसके कंधे पर शायद परिवार की ज़िम्मेदारी थी, जिसके कंधे पर मैंने वह कपड़ा देखा जो उसकी रोज़ी-रोटी का अभिन्न अंग था, उसी कंधे पर वह अचकन थी जो जगह जगह पालिश के रंग बिखेर रही थी, वह अचकन जिसकी उम्र तमाम हो चुकी थी पर उस बालक के युवा कंधों को ढाँपे थी  और वह युवा हो रहे कंधे परिवार का बोझ उठाने शायद अभी परिपक्व नहीं हुए थे!!!!!!!  

बुधवार, 25 जनवरी 2012

ज़रा सोचिये


लोकतंत्र - कितना सफल



एक और बनता ही जा रहा था 
निर्माण का हिन्दुस्तान
दूसरी ओर गिरता ही जा रहा था 
ईमान का हिंदुस्तान॥

[केदारनाथ अग्रवाल]


हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन के बाद भारत को जब गणतंत्र घोषित किया गया, तब जनता में एक नया उत्साह और उल्लास था कि उन्हें सच्चे मायनों में आज़ादी मिल गई है;  अब वो अपनी तकदीर के मालिक हैं और अपने भविष्य का मार्ग खुद ही तय करेंगे।

भारतवासियों ने अपने राजनैतिक जीवन के लिए लोकतंत्र का मार्ग चुना, जब कि उनके एक और बड़े पड़ोसी देश चीन ने साम्यवाद का रास्ता अपनाया।  लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी और कदाचित सब से बड़ी कमज़ोरी भी, यह है कि उसका नागरिक राजनैतिक स्वतंत्रता में सांस लेता है, पर वह निरंकुश हो जाता है।  उसे साम्यवादी घुटन का सामना नहीं करना पड़ता है।  नतीजा यह होता है कि राजनैतिक तौर पर वह जागरूक तो रहता है पर अपनी स्वतंत्रता पर किसी प्रकार के अंकुश को सहन नहीं करता और अपने दायित्व को भुला बैठता है।  इसका एक प्रमाण है भारत का वह आपातकालीन युग जब राजनैतिक स्वतंत्रता को कुछ अवधि के लिए दबाया गया था यद्यपि उसका परिणाम यह हुआ कि उन नेताओं को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।  इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत के लोकतंत्र की नींव बहुत मजबूत है।

अब सवाल यह है कि लोकतंत्र के अंतरगत भारत ने कितनी राजनैतिक , आर्थिक तथा सामाजिक सफलता प्राप्त की है।  भारत एक कृषि प्रदान देश है तथा उसकी अधिकतम जनता गाँवों में रहती है जो मेहनत मज़दूरी करके अपना उदर-पोषण करती है।  ऐसे नागरिकों को शिक्षा के अधिक अवसर नहीं मिल पाते, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वे काफी परिपक्व साबित हुए हैं।

भारत के हर चुनाव में जनता ने यह प्रमाणित कर दिया है कि वे राजनीतिक तौर पर कितने जागरूक हैं और उन्हें अच्छे-बुरे नेता की परख है।  यह और बात है कि इन नेताओं ने जनता के साथ विश्वासघात किया हो।  झूठे आश्वासन और सुनहरे ख्वाबों के चुनावी वादों को वे वास्तविकता का जमा पहनाने में असफल रहे।  चुनावी वादे केवल वादे बनकर रह गए।  जब यही वादे हर चुनाव में दुहराए जाने लगे तो लोगों ने इन नेताओं को सत्ता से उखाड़ फेंका।  लोकतंत्र में यदि नेता जनता की सेवा न करें और अपनी सत्ता को न सम्भाल सके तो इसमें जनता का कोई दोष नहीं हो सकता।  वो तो सत्ता के भूखे नेताओं की साजिशों का परिणाम मात्र कहा जाएगा।

यदि भारत के लोकतंत्र और पड़ोसी चीन के साम्यवाद पर एक नज़र डालें, तो कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि चीन ने भारत के मुकाबले में अधिक तरक्की की है, परंतु किस मूल्य पर!  यदि इसे सच भी मान लिया जाए तो भी यह गौरतलब है कि उस देश की प्रगति के लिए जनता को क्या कीमत चुकानी पड़ी और क्या वहाँ के आम नागरिक उस प्रगति का फल भोग रहे हैं?  यह एक लम्बी बहस का विषय हो सकता है।

भारत में छः दशक से चले आ रहे लोकतंत्र पर यदि एक दृष्टि डालें तो यह कहा जा सकता है कि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा है यद्यपि किसी भी देश के इतिहास में यह अवधि कोई लम्बी अवधि नहीं मानी जाती।  फिर भी,  इतना तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि इस अवधि में भारत अपने एक सौ से अधिक करोड़ लोगों के लिए अन्न उत्पादन करता है, उसे विदेशों से अब खाद्यान्न आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।  औद्योगिक क्षेत्र में वह काफ़ी आगे बढ़ गया है और संसार के दस औद्योगिक देशों में भारत की गिनती होती है।  उच्च शिक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का योगदान संसार भर में अधिकतम रहा है।

इस लोकतंत्र को सब से बड़ा आघात तब लगा जब नेताओं के भ्रष्ट चरित्र से देश लूटा जाने लगा और यह नासूर फैलते-फैलते अब इस देश के चरित्र को खाए जा रहा है।  ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार अन्य देशों में नहीं है पर हमारा कानून इतना अक्षम साबित हो रहा है कि भ्रष्टाचारी यह जान चुके हैं कि कोई भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता है।  दूसरी ओर हाल ही में चीन के कुछ नेताओं को भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर गोली मार कर इन्साफ़ किया गया।  यदि ऐसे कड़े कानून भारत में भी नहीं बनाए जाते हैं तो भ्रष्टाचार इस देश को पतन के कगार पर ला खड़ा करेगा।  तब भी जनता क्या इसी प्रकार मूक असहाय दर्शक की भाँति देखती रहेगी?  

अंततः यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र को जनता ने सफल बनाया है पर इस लोक और तंत्र को चलानेवालों ने मिलकर उसे विफल कर दिया है।


शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

अंधविश्वास???


भूत प्रेत : अंधविश्वास या सत्य?

भारत के कई प्रदेशों से यदा-कदा जादू-टोने के समाचार मिलते रहते हैं।  ऐस भी हुआ है कि जादू-टोना करने या करवाने के आरोप में गाँववालों ने जान भी ले ली है।  भूत-प्रेत और साया भगाने के लिए तांत्रिकों के पास जाकर टोना-टोटका भी किया जाता है।  इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कुछ समाज-सेवी संस्थाएं अभियान भी चला रही हैं।  पर क्या यह मात्र अंध-विश्वास है या इसमें कुछ तथ्य भी है?  भारत में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी भूत-प्रेत होते हैं या नहीं, यह चर्चा का विषय बना हुआ है।  हाल ही में ब्रिटेन के शाह एडवर्ड के राजमहल में एक साया घूमता देखा गया था।  इसकी पुष्टि वहाँ के कर्मचारियों ने भी की है।  कहा जाता है कि इस राजमहल में शाह की एक पत्नी का सिर काटकर हत्या कर दी गई थी। तब से उसका साया यदा-कदा वहाँ देखा जाता रहा है।  इस मामले को सुलझाने के लिए तांत्रिकों को बुलाया गया था।  इन तांत्रिकों को वहाँ पैरा-सैकॉलोजिस्ट कहा जाता है।

पूर्व में भी कई देशों में कुछ ऐसी ही विचित्र घटनाओं के समाचार मिलते रहे हैं जिनको साधारण ज्ञान-विज्ञान द्वारा समझ पाना कठिन है।

लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और बाईस यात्री मारे गए थे।  जब हवाई जहाज़ का मलबा साफ करके निकाला जा रहा था तो एक ऊँचे कद के व्यक्ति ने वहाँ आकर पूछा कि क्या उन्हें उसका बस्ता मिला है जिसमें उसके ज़रूरी कागज़ात थे?  वह बेचैनी से बार-बार यही प्रश्न दोहरा रहा था।  आधे घंटे के बाद जब कर्मचारियों ने मलबे में से एक शब को निकाला तो वे डर कर भाग खड़े हुए क्योंकि वह शव उसी व्यक्ति का था जो उस बस्ते के बारे में पूछ रहा था!

अमेरिका जैसा विकसित देश भी ऐसी अनहोनी घटनाओं के समाचारों से नहीं बच सका है।  सब से बड़ा आश्चर्य तो यह है कि वहाँ के राष्ट्रपति भवन [व्हैट हाउज़] में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिसके साक्षी वहाँ पर निवास कर रहे विभिन्न राष्ट्रपति भी हैं।  यह तो सर्वविदित है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या की गई थी।  कहते हैं कि कुछ खास मौकों पर उनका साया व्हैट हाउज़ में घूमता देखा गया है।  उनका सबसे प्रिय स्थल है व्हैट हाउज़ की दूसरी मंज़िल पर स्थित शयन कक्ष।  सन्‌ १९३४ में जब फ़्रेंकलिन रूज़्वेल्ट राष्ट्रपति चुने गए थे, तब उन्होंने व्हैट हाउज़ की दूसरी मंज़िल पर स्थित उस कमरे को ही अपना शयन-कक्ष बनाना चाहा था।  उस स्थान की सफ़ाई शुरू करने के लिए कर्मचारी जब वहाँ गए तो देखा कि राष्ट्रपति लिंकन एक काला सूट पहने, सोफ़े पर बैठे अपने जूतों की डोर बांध रहे हैं! जब रूज़्वेल्ट को इस बात की खबर मिली तो उन्होंने अपना शयन-कक्ष वहाँ बनाने का इरादा तर्क कर दिया।

ऐसा नहीं है कि लिंकन के साए को सिर्फ रूज़्वेल्ट के कर्मचारी  ही देख पाये थे।  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल, अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रूमैन, आइज़नहॉवर तथा केनेडी को भी इस साये से दो-चार होना पड़ा था।

ऐसी कई घटनाएँ हैं जिन्हें किसी तर्क से समझा नहीं जा सकता।  इसीलिए तो कहा जाता है कि जो इसमें विश्वास करते हैं उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती और जो विश्वास नहीं करते, उनके लिए कितने भी प्रमाण पर्याप्त नहीं होते॥

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011


शायरे-इन्क़िलाब- जोश मलीहाबादी

लोग कहते हैं कि मैं हूँ शायरे-जादूबयाँ
सदरे-माना, दावरे-अलफ़ाज़, अमीरे-शायरी॥
फ़िक्र में कामिल न फ़न्ने-शेर में यक्ता हूँ मैं
कुछ अगर हूँ तो नक़ीबे-शायरे-फ़र्दा हूँ मैं॥

यह इन्केसारी जतानेवाले शायर हैं शबीर हसन खाँ ‘जोश’ जिनका जन्म १८९४ ई. में लखनऊ के ज़िला मलीहाबाद के एक जागीरदार घराने में हुआ था।  शायरी उनकी जनम-घुट्टी में पिलाई गई थी।  उनके परदादा फकीर मोहम्मद ‘गोया’ अपने ज़माने के अच्छे शायर होने के साथ-साथ अमीरुद्दौला की सेना के रिसालेदार भी थे।  उनके दादा मोहम्मद अहमद खाँ ‘अहमद’ और पिता बशीर अहमद खाँ ‘बशीर’ शायरी के शोबे में अपना विशेष स्थान रखते थे।  यही शबीर हसन खाँ ‘जोश’ ने आगे चलकर ‘जोश’ मलीहाबादी के नाम से उर्दू अदब में अपनी जगह बनाई।

‘जोश’ को उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा घर पर ही मिली।  बाद में उन्होंने सीतापुर स्कूल और जुबली स्कूल, लखनऊ में इब्तेदाई शिक्षा तथा सेंट पीटर कालेज व अलीगढ़ में उच्च शिक्षा हासिल की।  

सामन्ती वातावरण में पले-बड़े तो ज़ाहिर है कि घमण्ड, स्वेच्छाचार और अहंभाव स्वभाव में आएगा ही, पर ऐसा नहीं था कि ‘जोश’ में भावुकता नहीं थी।

गुंचे! तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है
बस एक तबस्सुम के लिए खिलता है
गुंचे ने कहा कि ‘इस चमन में बाबा
ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है?’

ऐ दोस्त! दिल में गर्दे-कदूरत न चाहिए
अच्छे तो क्या बुरों से भी नफ़रत न चाहिए
कहता है कौन, फूल से रग़बत न चाहिए
काँटे से भी मगर तुझे वहशत न चाहिए...

काँटे के रग में भी है लहू सब्ज़ाज़ार का
पाला हुआ है वो भी नसीमे-बहार का॥

जोश नौ बरस की उम्र से ही शायरी करने लगे थे पर तेईस-चौबीस वर्ष की आयु तक आते-आते ‘उमर खैयाम’ और ‘हाफ़िज़’ की शायरी का अध्ययन करने के बाद उनकी शायरी परवान चढ़ी।  शायद इसीलिए सुरा और साक़ी के बारे में वे इतना सुंदर लिख पाते थे।

मुस्कुराते हुए यूँ आये वो मैखाने में
रुक गई साँसे छलकते हुए पैमाने में॥

हम दोनों हैं ऐ फ़क़ीर! दीवाने से
मतलब है फ़क़त दिल के बहलाने से
हर शामो-सहर करते हैं ऐयाशी हम
तू ज़र्फ़े-वज़ू से और मैं पैमाने से।

जिस दौर में ‘जोश’ ने जन्म लिया था वह सुरा और अप्सरा से अधिक राजनीतिक उथलपुथल का दौर था और देश की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि कोई भी शायर क्रांति की भावना से अछूता नहीं रह सकता था।

क्या उनको ख़बर थी सीनों से जो खून चुराया करते थे
इक रोज़ इसी खामोशी से टपकेंगी दहकती तक़रीरें ।...
संभलो कि वो ज़िंदां गूँज उठा, झपटो कि वो कैदी छूट गए
उट्ठो कि वो बैठी दीवारें, दौड़ो कि वो टूटी ज़ंजीरें॥

बहादुरो वो ख़म हुई बुलंदियां बढ़े चलो
पए-सलाम झुक चला वो आस्माँ बढ़े चलो
फ़लक के उठ खड़े हुए वो पासबां बढ़े चलो
ये माह है वो मेहर है ये कहकशां बढ़े चलो
लिए हुए ज़मीन को कशां-कशां बढ़े चलो
रवां-दवां बढ़े चलो, रवां-दवां बढ़े चलो

‘जोश’ ने देशवासियों को अपनी शायरी से इस तरह बेदार किया कि उन्हें ‘शायरे इन्क़िलाब’ की उपाधि दी गई।  अंग्रेज़ सम्राट जार्ज पंचम की ताजपोशी पर उन्होंने हिन्दोस्तान की दशा इस तरह बयान की थी-

ताजपोशी का मुबारक दिन है ऐ आलमपनाह
ऐ ग़रीबों के अमीर ऐ मुफ़लिसों के बादशाह!
दिल के दरिया नुत्क़ की वादी में बह सकते नहीं
आप की हैबत से हम कुछ खुलकर कह सकते नहीं।
लेकिन इतना डरते-डरते अर्ज़ करते हैं ज़रूर
हिन्द से वाक़िफ़ किए जाते नहीं शायद हुज़ूर!
आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं
तन पे इक धज्जी नहीं है, पेट को रोटी नहीं।
गर्म है सोज़े-बग़ावत से जवानों का दिमाग़
आंधियाँ आने को है ऐ बादशाही के चिराग़!
तुंद-रौ दरिया के धारे को हटा सकते नहीं
नौजवानों की उमंगों को दबा सकते नहीं।
चौंकिए जल्दी, हवा-ए-तुंदो-गर्म आने को है
ज़र्रा ज़र्रा आग में तब्दील हो जाने को है॥

देश की आज़ादी के लिए सब से ज़रूरी है देश के सभी कौमों की यकजहती और ‘जोश’ को हिन्दोस्तान की विभिन्न कौमों में एकता की कमी का एहसास था।

सिख ने गुरु के नाम को बट्टा लगा दिया
मंदिर को बरहमन के चलन ने गिरा दिया
मस्जिद को शेखजी की करामत ने ढा दिया
मजनूं ने बढ़के पर्दाए-महमिल गिरा दिया
एक सूए-ज़न को ग़ुलग़ुलए-आम कर दिया
मरियम को खुद मसीह ने बदनाम कर दिया ...
ये मुसलमां है, वो हिंदू, ये मसीह, वो यहूद
इसपे ये पाबंदियां हैं और उस पर ये क़यूद
शैख़ो-पण्डित ने भी क्या अहमक बनाया है हमें
छोटे-छोटे तंग ख़ानों में बिठाया है हमें॥
फ़र्ज़ भी कर लूँ कि हिंदू हिंद की रुसवाई है
लेकिन इसका क्या करूँ फिर भी वो मेरा भाई है॥

बाज़ आया मैं तो ऐसे मज़हबी ताउन से
भाइयों का हाथ तर है भाइयों के खून से॥

सब से पहले मर्द बन हिन्दोस्तां के वास्ते
हिंद जाग उठे तो फिर सारे जहां के वास्ते॥
फिर लुत्फ़ की चादर सरों पर तन जायें
फिर ख़ैर से यक-जान-ओ-दो क़ालिब बन जायें...
हम तुम रूठे रहेंगे आखिर कब तक?
क्या उम्र का एतबार, आओ मन जायें॥

‘जोश’जानते थे कि कौमी एकता होगी तो आज़ादी के दरवाज़े खुद-ब-खुद खुल जाएँगे।

शबनम से न गुल धुलें तो मेरा ज़िम्मा
मोती न अगर रुलें तो मेरा ज़िम्मा
इक दर जो हुआ बंद तो आइ ये सदा
सौ दर न अगर खुलें तो मेरा ज़िम्मा॥

‘जोश’ नास्तिक थे ऐसी बात नहीं थी पर उन्हें मुल्लाओं के अंधविश्वास और कट्टरता से चिढ़ थी।  उनके दोहरेपन को वे अपनी शायरी में इस तरह जताते हैं-

नेकी की हमें राह बताते रहिए
अल्लाह से हर आन डराते रहिए
पीनेवालों को कहते रहिए बेदीन
और शौक़ से माले-ग़ैर खाते रहिए॥

जन्नत के मज़ों पे जान देने वालो
गंदे पानी में नाव खेने वालो
हर खैर पे चाहते हो सत्तर हूरें
ऐ अपने ख़ुदा से सूद लेने वालो॥

हर रंग में इब्लीस सज़ा देता है
इन्सान को ब-हर-तौर दग़ा देता है
कर सकते नहीं गुनाह जो अहमक़ उनको
बेरूह नमाज़ों में लगा देता है।

क्या शैख़ की ख़ुश्क ज़िन्दगानी गुज़री
बेचारे की इक शब न सुहानी गुज़री
दोज़ख के तख़य्युल में बुढ़ापा बीता
जन्नत की दुआओं में जवानी गुज़री॥

देश की जंगे-आज़ादी में आम जनता अपनी जान पर खेल गई पर कल तक जो फ़िरंगियों की गुलामी कर रहे थे वही लोग आज़ादी के बाद फिर से राज कर रहे हैं और रिश्वत का बाज़ार गर्म है।

बर्तानिया के खास गुलामाने-खानाज़ाद
देते थे लाठियों से जो हुब्बे-वतन की दाद
एक एक ज़र्ब जिनकी है अब तक सिरों की याद
वो आई.सी.एस. अब भी है खुशबख़्तो-बामुराद
शैतान एक रात में इन्सान बन गए
जितने नमक हराम थे कप्तान बन गए॥
भूल कर भी जो लेता है रिश्वत, चोर है
आज क़ौमी पागलों में रात दिन ये शोर है...
किसको समझाएँ इसे खो दें तो फिर पाएँगे क्या?
हम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खाएँगे क्या?
कैद भी कर दें तो हम को राह पर लाएँगे क्या?
ये जुनूने-इश्क के अंदाज़ छूट जाएँगे क्या?...
मुल्क भर को क़ैद कर दें किस के बस की बात है
खैर से सब हैं, कोई दो-चार-दस की बात है?

जब गांधीजी की हत्या हुई तो उनका कवि हृदय रो उठा था--

जब कि बच्चे ख़्वाब के हंगामे थे गर्मे-ख़रोश
बाप की सिर्फ़ एक ‘हूं’ ने कर दिया सब को खामोश
जब हुए थे आख़री अवतार गांधी जी हलाक
आई थी उस वक़्त क्या कोई सदा-ए-हौलनाक
इतनी चुप सधे हुए है किसलिए अर्शे-बरीं
क्यों हमारा आसमानी बाप ‘हूं’ करता नहीं?

‘जोश’ केंद्रीय प्रकाशन विभाग की मासिक पत्रिका ‘आजकल’ के उर्दू संस्करण का सम्पादन  कर रहे थे।  उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मविभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया था।  भारत में इतना सम्मान मिलने पर भी न जाने ‘जोश’ को कौन सा ऐसा डर खाए जा रहा था कि उन्होंने भारत छोड़ कर पाकिस्तान में रहने का फैसला किया, लेकिन वहाँ पर भी उन्हें सुख-चैन हासिल नहीं हो सका।

आगाही-ए-इल्मो-फ़न नहीं है ऐ दोस्त
अस्तबल है अंजुमन नहीं है ऐ दोस्त
होता है वतन हर इक बशर का लेकिन
मेरा कोई वतन नहीं है ऐ दोस्त॥...

इक उम्र से ज़हर पी रहा हूँ ऐ दोस्त
सीने के शिगाफ़ सी रहा हूँ ऐ दोस्त
गोया सरे-कोहसार तन्हा पौधा
यूँ अपने वतन में जी रहा हूँ ऐ दोस्त॥

‘जोश’ जब अपनी पुरानी यादें ताज़ा करने भारत आए तो यहाँ पर उनका ख़ैरमक़्दम इस जोश से हुआ कि उन्हें अपने बीते हुए सुनहरे पल याद आए।

ये सदाएं बराबर आती है
दिल का दरवाज़ा खटखटाती है...
भूल जाओ कही सुनी बातें
न तो वो दिन है अब न वो रातें॥...

हाँ यही है वो मकाँ, जन्नते-दौरे-कुहन
कल था जिसकी अंजुमन में हुस्ने-सदरे-अंजुमन
चुभ रही है दिल में मिस्ले-नश्तर कम्बख़्त सांस
ये मकाँ है या कोई चुभती हुई सीने की फाँस॥

जब वे वापिस पकिस्तान गए तो ‘जोश’ का दिल टूट चुका था।  उनके अहसासात एक प्रकार थे :-
"बस ले देकर मेरा एक ही जुर्म है कि उसे मुआफ़ नहीं किया जा सकता।  काश! मैं साहिबे-अहलो-अयाल [बाल-बच्चे वाला] न होता।  मुझ नामुराद को क्या मालूम था कि ये मेरे सर पर सेहरा नहीं बाँधा जा रहा है, मेरी शख़्सियत की कब्र पर चादर चढ़ाई जा रही है।"  वे एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह पुकार उठे-

देता नहीं बोस्तां भी सहारा मुझको
करती नहीं बुलबुल भी इशारा मुझको
मुरझाए हुए फूल ने हसरत से कहा
अब तोड़ के फेंक दो ख़ुदारा मुझको॥

सर घूम रहा है नाव खेते खेते
अपने को फ़रेबे-ऐश देते देते
उफ़ जहदे-हयात! थक गया हूँ माबूद
दम टूट चुका है साँस लेते लेते॥

आखिरकार ‘जोश’ ने कराची में यह बयान दिया कि वे तन्हाई की ज़िंदगी बसर करना चाहते हैं।

मसर्रत की ताने उड़ाता गुज़र जा
तरब के तराने सुनाता गुज़र जा
बशाशत के दरिया बहाता गुज़र जा
ज़माने से गाता बजाता गुज़र जा
गुज़र जा ज़मीं को नचाता गुज़र जा॥


शनिवार, 10 सितंबर 2011

एक विचार


बाद मेरे मरने के....

एक अर्से बाद कल मेरे मुलाकात एक दोस्त से हुई।  उसका शरीर कमज़ोर पड़ गया था।  हाल पूछने पर उसने कहा,"बस... मौत का इंतेज़ार कर रहा हूँ।"  चौंक कर मैंने पूछा कि सब खैरियत तो है, तो उसने बताया कि अब तो शरीर बार बार शरारत कर रहा है और मानसिक तकलीफ़ भी बर्दाश्त नहीं होती।   परिवार का हाल यह है कि भाई-भतीजे इंतेज़ार में है कि कब यह खूसट सटके और कब ज़मीन-जायदाद का बटवारा हो।
"भाई भतीजे?"
"हां भई, संयुक्त परिवार है।  बाप-दादा की जायदाद को अब तक सम्भाल कर लाया हूं।  अब वे अलग होना चाहते हैं और अपना हिस्सा मांग रहे हैं।  मेरा कहना है कि एकजुट रह कर ही परिवार की गरिमा बनी रहती है। अब आगे जो भाग्य मे लिखा है सो होगा ही!"

बहुत दिन बाद मिले और उसके मानसिक दुख को देखते हुए मैं ने यह तय किया कि किसी होटल में बैठ कर बात करेंगे ताकि उसका दुख कुछ हल्का हो।  हम होटल के एक कोने के टेबल पर बैठ कर अपना सुख दुख बाँटने लगे।  यकायक मित्र गम्भीर हो गया और अपने मौत की बात करने लगा।  फिर एक दार्शनिक की तरह वह अपने मरने का चित्र खींचने लगा-
"मैं अपने  मरने के बाद के उस सारे सीन को देख रहा हूं। मेरा पर्थिव शरीर ज़मीन पर रखा गया है। सिरहाने एक दिया जलाया गया है।  कहते हैं कि यह दिया शरीर की सारी उर्जा समेट लेगा।  पास में गमज़दा पत्नी बैठी रो रही है।  बेटा सब को फोन पर सूचना दे रहा है और रोता भी जा रहा है।  भाई इस रुदन को सुन कर अपने कमरे से निकल आया है।  उसके भाव मेरी समझ में नहीं आ रहे हैं।  वह खुश है या दुविधा में है या भावी नीति उसके मस्तिष्क में रेंग रही है।  मेरा भतीजा भी यह सारा माहौल देख कर कमरे के बाहर निकल गया है।

"अब जान-पहचान के लोग आने लगे हैं।  घर के बाहर ही मेरा भाई उनको बता रहा है कि यह सब कब और कैसे हुआ। मेरे बेटी और दामाद भी आ पहुँच हैं।  मुझे मालूम है कि बेटी मुझसे बेहद लगाव रखती है।  वह बहुत रो रही है और मैं यह भी जानता हूँ कि उसके एक एक आँसू पर मेरा दिल भी रो रहा है।  

"दोस्त और रिश्तेदार मेरी नेकियों के चर्चा कर रहे हैं तो कुछ उन खामियों का भी दबी ज़ुबान में ज़िक्र कर रहे हैं।  शायद मेरे पाप-पुण्य का लेखा-जोखा हो रहा है।  सब अपनी-अपनी तरह से अनुमान लगा रहे हैं।  परंतु जो मेरे अपने थे, उनके मन में जो हो रहा है, उसे जानकर दुखी हूँ।

"मेरा भाई सोच रहा होगा कि हमें अधर में लटका कर भाई साहब चले गए।  अब शायद हम अपनी ज़िंदगी खुल कर जी सकेंगे।  भतीजा सोच रहा है कि अब तक हाथ खुला नहीं था, अब शायद हम खुल कर खर्च कर सकेंगे।  अब हमें टोकने के लिए ताऊ नहीं रहेंगे।  उनकी तेरहवीं भी बडी धूमधाम से मनाएँगे।"

इस तरह का सीन खींच कर मेरा मित्र कुछ देर चुप रहा।  फिर उसने अपना दर्द उँडेलते हुए कहा, "जो कुछ मैंने आज तक किया, वह परिवार की भलाई के लिए किया।  मेरे परिवार वाले समझते हैं कि मैं सब जोड़कर रख रहा हूं, समाज में भी मेरी हैसियत एक धनाड्य की है।  वे समझते है जिसके पास पचास एकड़ ज़मीन है, वह सम्पन्न ही होगा।  उन्हें क्या पता कि किस तरह एक किसान जुआरी की तरह  सब कुछ दाव पर लगा कर मौसम के भरोसे पर बैठ जाता है।  मौसम ने साथ दिया तो लाभ और....।  

"परिवार के इस भरम को तो मैंने अब तक बनाए रखा  पर लगता है कि अब आगे इसका निभाव कठिन है।  अब तो परिवार के लोग ही साथ नहीं दे रहे हैं, इसलिए भी मुझे यह दुख सालता है।  देखें, अब भविष्य में क्या लिखा है। "

वह दुखी मन से उठा और चलने लगा।  मुझे भी दुख हुआ कि एक व्यक्ति अपना जीवन घर-परिवार के लिए समर्पित कर देता है और वही लोग उस पर आरोप लगा कर उसका दामन छोड़ देते हैं।  क्यों कोई उस परिवार के मुखिया के दर्द समझ नहीं पाता!!!




गुरुवार, 1 सितंबर 2011

भ्रष्टाचार और साहित्य


साहित्य में भ्रष्टाचार


यह बात वर्षों से सुनते आए हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है पर अब जाकर यह समझ पाए कि सचमुच साहित्य समाज का आईना ही तो है।  एक समय था जब साहित्य को सब के हित के लिए रचा गया लेखन समझा जाता था।  अब तो समय के साथ साहित्य भी बदल रहा है।  साहित्य के नाम पर राजनीति भी की जाती है, भ्रष्टाचार भी पनप रहा है और भाई-भतीजावाद भी।

साहित्यकारों में जो आपसी मनमुटाव है, वो यदाकदा उनके लेखन में छलक जाता है और रही सही कसर उनके पासपडोस के साहित्यकार इन मुद्दों को उछाल कर पूरी कर देते हैं।  ऐसे कई प्रकरण पढ़ने को मिलते हैं जिनमें वरिष्ठ साहित्यकार एक दूसरे पर ताने कसते या लेखन में ही दो-दो हाथ आज़माते मिल जाते हैं।  इन प्रकरणों में कहीं अपने वाद के कारण तो कहीं  निजी विचारों की भिन्नता के कारण कीचड़ उछालते हुए साहित्यकार दिखाई देते हैं। जब ऐसा मतभेद लेखनी में उतरता हैं तो भ्रष्ट मानसिकता को जन्म देता है।

यही रचनाकार जब अपनी-अपनी विचारधारा के चलते अपनी संस्थाएं बना लेते हैं तो गुटबाज़ी का आरम्भ हो जाता है।  अंततः इसी गुटबाज़ी से पनपता है भ्रष्टाचार का ऐसा लॉलीपॉप जिसे बताकर अपने गुट को संघटित रखने का प्रयास किया जाता है।  इस लॉलिपॉप के कई रूप होते हैं।  कहीं उच्च शिक्षा में वरीयता- पी.एच डी. आदि की उपाधियाँ, कहीं पुरस्कार की रेवडियां और कहीं उच्च पदों की बंदरबाँट।

जब कोई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार राजनीति से जुड़ जाता है तो सोने पर सुहागा ही कहलाएगा।  उसके हाथ में साहित्य, सरकारी पुरस्कार और वित्तीय सहायता जैसे चाबुक होते हैं।  वह अपने चेले-चपाटों को ये रेवड़ियाँ बाँटता है और दूसरों को ठेंगा बताता है और वे मुँह ताकते रह जाते हैं।  इस प्रकार के भ्रष्टाचार को कोई इसलिए नहीं रोक पाता कि इन पुरस्कारों के लिए ऐसे नियम बनाए जाते हैं कि वही चेला उन नियमों में खरा उतरता है जिसे पुरस्कृत करना है।  दूसरा कोई हिम्मत करके चुनौती भी दे तो यही कहा जाएगा कि निर्णायकों का निर्णय अंतिम है!!

यह तो हुई पुरस्कारों की रेवडियों की बात।  अब वित्तीय सहायता को देखें।  ऐसी कई सरकारी संस्थाएँ है जो भाषा के उत्थान के लिए वित्तीय सहायता देती हैं।  इस वित्तीय सहायता के हकदार भी वही होते हैं जो उस संस्था के अध्यक्ष की हाँ में हाँ मिलाने वाले होते हैं।  दूसरा रचनाकार, चाहे कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, वह उस संस्था के द्वार तक भी नहीं पहुँच सकता।  उसे तो अपनी प्रतिभा घर फूँक कर जतानी पड़ती है।  इसीलिए हम देखते हैं कि जो साहित्य के नाम पर वित्तीय सहायता से छपता है, उसके पाठक प्रायः ही होते हैं।

सरकारी वित्तीय सहायता पत्र-पत्रिकाओं को भी दी जाती है; परंतु सरकारी विज्ञापनों के रूप में मिलने वाली यह सहायता केवल उन्हें मिलती है जो या तो सरकार का स्तुतिगान करते हैं या सरकारी अधिकारियों की हथेलियाँ गरम करते हैं।  तब जाकर ही उन्हें अपने पत्र-पत्रिका के लिए सरकारी विज्ञापन मिलते हैं।  जो निर्भीक पत्रिका चलाना चाहते हैं, उनके लिए एक ही रास्ता है कि अपनी जुगाड़ करें या अपना खीसा ढीला करे।  ऐसी कई लघुपत्रिकाएं हैं जो निर्भीक पत्रकारिता चलाती तो हैं पर कुछ ही दिन में दम तोड़ देती हैं।

साहित्य के इस अदृश्य भ्रष्टाचार को कोई अण्णा हज़ारे नहीं मिटा सकता क्योंकि यह आम जनता को प्रभावित नहीं करता और आज का साहित्यकार भी आम जनता से अपने को जोड़ नहीं पाया।  इसका सटीक प्रमाण है अण्णा हज़ारे का भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान में साहित्यकारों को साँप-सूंघता-मौन!


शनिवार, 20 अगस्त 2011

मुस्कान


मुस्कराहट से अट्टहास तक


कभी शेक्सपीयर ने कहा था- ए मैन मे स्माइल एण्ड स्माइल एण्ड यट बी ए विलेन।  इस मुस्कुराहट के कई रूप होते हैं।  जब हम प्रसन्न होते है तो हमारे होटॊं पर एक धीमी सी मुस्कुराहट फैल जाती है।  सामनेवाला पूछ बैठता है- क्या बात है, बडे खुश नज़र आ रहे हो!  शायद इसीलिए चेहरे को आदमी का आइना कहा जाता है।

किसी परिचित को रास्ते में देखते है तो होंटों पर मुस्कुराहट अनायास ही आ जाती है।  इस प्रकार हम उससे बिन बात किए ही संवाद स्थापित कर लेते हैं।  यह मुस्कुराहट आपस में आत्मीयता का पैगाम पहुँचाती है।   यही मुस्कुराहट कभी दंभ का रूप भी ले लेती है।  जब हम किसी को नमन करते हुए हाथ जोड़ते हैं और वह केवल सिर हिलाकर मुस्कुरा देता है, तो लगता है कि वह अपने दम्भ में चूर है।  उसे प्रतिउत्तर में हाथ जोड़ना भी गवारा नहीं है। 

मासूम बच्चे की मुस्कुराहट सभी को भाती है। बच्चा झूले में खेलते हुए अपनेआप में  प्राकृतिक और निश्चल  मुस्कुराहट बिखेरता है तो देखने वाले को आनंदित कर देता है। तभी तो शायर कह उठता है- मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा।  यह मासूम मुस्कुराहट कभी हँसी में भी बदल जाती है।

अब हँसी भी तो कई प्रकार की होती हैं। एक तो उस मासूम की हँसी है जो बिना कारण ही हँस देता है।  एक वह हँसी होती है जिसे देखकर सामने वाला समझता है कि मुझे देखकर हँसा जा रहा है।  यह तो खतरनाक हँसी ही कही जाएगी जो बिना किसी कारण के बैरभाव खडा कर देती है।  सब से खतरनाक हँसी तो स्त्री की होती है जो महाभारत भी करा देती है।  कुटिल हँसी का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी किया है।  तात्पर्य यह कि हँसी अच्छी भी हो सकती है,  जो हँसी-खुशी के समय निकलती है और घातक भी जो उपहास करने, मज़ाक उड़ाने या मुँह चिढ़ाने के समय निकल जाती है।  हम फिल्मों में देखते भी है कि किस प्रकार विलेन हिरोइन को अपने जाल में फँसा तडपते देख हँसता है और उसकी आँखें दुर्भावना से फैल जाती है।

अब फिल्मों की बात चली है तो रावण का अट्टहास कैसे भूल सकते हैं?  हमने रावण को साक्षात हँसते हुए तो देखा नहीं है, केवल फिल्मों में ही देखा है पर हमारे मानस पटल पर उस ठहाके में एक क्रूर व्यक्तित्व की छवि छा जाती है।  परंतु यह आवश्यक नहीं कि हर अट्टहास रावणी ही हो।  हम भी कभी किसी चुटकुले या मनोरंजक घटना पर ठहाका लगा ही लेते है जो शुद्ध देसी घी की तरह केवल अपने मन की प्रसन्नता को सौ नम्बर देने का द्योतक होता है।  अब यह पढ़कर आप जो ठहाका लगा रहे हैं, उससे हम समझ गए कि कितने नम्बर दिए जा रहे हैं। हा...हा....हा!

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

gudgudi


गुदगुदी

मेरा पोता रोज़ रात में सोने से पहले मुझसे गले मिल कर ‘गुड नाइट’ कहने आता है।  वह तब तक मुझसे लिपटा रहता है जब तक मैं उसे गुदगुदी न करूँ। इस गुदगुदी से वह कसमसाता है और हँसते हुए ‘गुड नाइट’ कह कर चला जाता है।  यह प्रक्रिया सुबह भी चलती है जब वह उठ कर ‘गुड मार्निंग’ कहता है।  


गुदगुदी का चलन प्राचीन काल से चलता आ रहा है, भले ही उसका नामकरण संस्कार न किया गया हो।  कृष्ण ने सुदामा को परोक्ष रूप से गुदगुदी ही तो की थी जब उन्होंने बिन बताए ही सुदामा को धन-धान्य से सम्पन्न कर दिया था।  ज़रा सोचिए कि झोंपड़ी के स्थान पर महल को देख कर सुदामा को कितनी गुदगुदी हुई होगी।  इस गुदगुदी से उनके सारे बदन में झुरझुरी फैल गई होगी।

हाँ, कभी ऐसी गुदगुदी प्राण घातक भी हो सकती है।  कल्पना कीजिए कि यदि सुदामा का हृदय कमज़ोर होता तो इस गुदगुदी से हार्ट फ़ेल का खतरा भी हो सकता था।  प्रत्यक्ष रूप से हम देख सकते हैं कि जिनकी आँखें कमज़ोर हैं, उन्हें गुदगुदी करने पर आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं।  बेचारे कमज़ोर हृदयी की गति तो चिकनहृदयी ही बेहतर जान सकता है।

गुदगुदी करते समय उस व्यक्ति के शारीरिक और मौखिक हालत तो देखने लायक होती है।  उसका शरीर कई मोड़ ले लेता है जैसे किसी पहाडी की पगडंडी हो और मुखमुद्रा सुबह की लाली लगने लगती है।  यदि व्यक्ति मोटा हुआ तो उसकी तोंड किसी बिश्ती की थैली की तरह थुलथुल हिलती रहती है। 

गुदगुदी करते हैं तो हँसी आ ही जाती है।  हँसी भी कई प्रकार की होती है।  यह उस व्यक्ति पर निर्भर होता है कि वह किस प्रकार की हँसी का मालिक है।  

जो व्यक्ति हश्शाश-बश्शाश है, वह तो बिना गुदगुदाए भी हँसता रहता है।  गुदगुदी पर उसकी हालत का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।  दूर से ही उँगलियाँ हिलाने पर वह हँसना शुरू कर देगा और गुदगुदी कर दी तो वह लोट-पोट हो जाएगा।  समाचार पत्र में कभी पढ़ा भी था कि एक व्यक्ति हँसते-हँसते मर गया।  ऐसी गुदगुदी को निश्चय ही ‘घातक गुदगुदी’ का विशेषण जड दिया जा सकता है।  अच्छा हो कि हम ऐसी गुदगुदी से बचें और अपनी उँगलियाँ ऐसे व्यक्ति की ओर बढ़ाने के पहले उसकी मेडिकल रिपोर्ट जाँच लें।


संजीदा मिजाज़ वाला केवल मुस्कुरा देगा।  शायद उसके दाँत भी देखने को न मिले। ऐसे व्यक्ति की पत्नी की दयनीय हालत पर केवल दया ही व्यक्त कर सकते हैं जो अपने पति की एक इंच मुस्कान देखने के लिए तड़पती होगी।

यदि यह पढ़कर आपके मन में गुदगुदी हुई तो यह समझ लीजिए कि मेरे चेहरे पर दो इंच मुस्कान दौड़ गई है॥


गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बोनालु- bonalu



एक स्थानीय पर्व - बोनालु


आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में बोनालु त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार खास तौर पर हैदराबाद-सिकंदराबाद नगर-द्वय में बहुत हर्षो-उल्हास से मनाया जाता है।   आषाढ़ मास के प्रारम्भ के प्रथम रविवार को यह पर्व प्रसिद्ध दुर्ग गोलकोण्डा से प्रारम्भ होता है।  दूसरे रविवार को सिकंदराबाद में तथा तीसरे रविवार को सारे शहर के काली माता के मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ इसका समापन होता है।  इसे एक प्रकार से माता को धन्यवाद का त्यौहार माना जाता है।  यह माना जाता है कि माँ काली साल भर इस स्थान और इसकी संतान की रक्षा करती है जिसके लिए यह संतान अषाढ़ मास में धन्यवाद स्वरूप धूमधाम से पूजा करती है।

बोनालु शब्द की उत्पत्ति भोजनालू से हुई।  घर-घर से महिलाएँ माता काली के लिए अपने घर से भोजन बना कर ले जाती है और माता को चढाती है।  इस भोजन को ले जाने की भी एक विशेष प्रक्रिया होती है।  महिलाएँ माता के भोजन के लिए स्नानादि करके शुद्ध होकर एक खास किसम का भोजन बनाती है।  इस भोजन मे चावल को दूध और शक्कर में पकाया जाता है।  कोई-कोई प्याज़ का भी प्रयोग करते हैं।  इस पकवान को एक पीतल या मिट्टी के छोटे से मटके में रखा जाता है जिसके ऊपर एक कटीरी ढाँपी जाती है।  इस कटोरी में घी या तेल की बाती बना कर दिया जलाया जाता है।  इस मटके को हल्दी, कुमकुम और खडी से पोत कर रंगा जाता है।  मटके के इर्दगिर्द नीम की छोटी डालियां लगा कर सजाया जाता है। इस  पूजा के लिए महिला अपनी सब से भारी सिल्क की साड़ी पहन कर बोनम को[भोजन से भरा मटका]  सिर पर लिए निकलती है।  इस प्रकार जब सजधज कर महिलाएँ एक साथ निकलती है तो वह जलूस का आकार ले लेता है।

बोनाम को सिर पर रखे महिलाएं बाजे-गाजे के साथ निकलती है।  इस बाजे की धुन पर उनके पैर भी थिरकने लगते हैं और कुछ महिलाएँ नाचने भी लगती हैं। वे इतनी दक्ष होती हैं कि इस नृत्य पर भी उनके सिर से मटका नहीं सरकता है।  कभी कभी तो कुछ महिलाएँ एक ट्रांस [अवचेतनावस्था] में चली जाती है और झूलने लगती हैं।  उन्हें माता का स्वरूप मान कर उन पर से निंबू काट कर फेंके जाते है और रास्ते भर उनके पैरों पर पानी छिड़का जाता है।  इस प्रकार भक्ति से विभोर होकर ये महिलाएँ माता काली के मंदिर में पहुँचती हैं और उन्हें बोनम चढ़ाती हैं।

बोनाम ले जाते हुए हैदराबाद की मेयर श्रीमती कार्तिका रेड्डी,  आंध्र प्रदेश की वरिष्ट मंत्री डॉ. गीता रेड्डी और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीमती रेणुका चौधरी


माता काली को विभिन्न नामों से जाना जाता है और उस स्थानीय मंदिर को इसी नाम से ख्याति मिलती है; जैसे, मैसम्मा, पोचम्मा, एलम्मा आदि।  गंडीपेट के पास स्थित मंदिर को गंडी मैसम्मा कहा जाता है तो सिकंदराबाद के मंदिर को उज्जैनी महांकाली।

बोनालु पर्व के समय इन मंदिरों को रंग-बिरंगे फूलों और लाइटों से सजाया जाता है।  रात के समय इनकी रौशनी देखने लायक होती है।  दर्शकों कि गहमा-गहमी और शोरगुल में लाउडस्पीकर पर बज रहे माता के गानों का इतना योगदान होता है कि पड़ोसी की बात भी कानों में नहीं पड़ती।  कभी-कभी तो आसपास के लोग इस शोरगुल बेहाल हो जाते हैं और पुलिस की शरण लेते हैं जो इस शोर को रात में कम करने का आदेश देते हैं।

नगर-द्वय हैदराबाद-सिकंदराबाद के बोनालु का पर्व गोलकोंडा किले के जगदम्बिका मंदिर से प्रारम्भ होता है।  यह पर्व आषाढ के प्रथम सप्ताह के रविवार को मनाया जाता है।  इस पर्व के दूसरे दिन मेला [जातरा] लगता है जहाँ बच्चों के लिए खिलौनों की दुकानों से लेकर बड़ों के लिए नारियल, फूल आदि पूजा की सामग्री की दुकानें फुटपाथों पर भी बिखर जाती हैं।  इस जातरा का आनंद तो बच्चे ही अधिक उठाते है।

गोलकोंडा किले में बोनालु मनाने के अगले रविवार को सिकंदराबाद के उज्जैनी महांकाली मंदिर में ज़ोर शोर से यह पर्व मनाया जाता है।  इस पर्व की एक विशेषता यह है कि यहाँ वरिष्ठ राजनेता भी माथा टेकने और महिला मंत्रियां बोनम सिर पर उठाए अन्य महिलाओं के साथ मंदिर में प्रसाद चढाती हैं।

दूसरे दिन एक कन्या जो इस मंदिर को समर्पित कर दी गई है, वह बाजे-गाजे के साथ मंदिर में प्रार्थना करती है।  उस समय उसके शरीर पर देवी आती है और वह झूलते हुए कच्ची मिट्टी के घड़े पर खडी होकर वर्ष भर कि भविष्यवाणी करने लगती है।  इस को रंगम कहा जता है।  रंगम के लिए वह कन्या हल्दी से पुती होती है और भारी साड़ी पहने बाजे-गाजे के साथ मंदिर की ओर बढ़ती है।  उसके पीछे पोतराजू हाथ में कोड़ा लिए होता है।   पोतराजू को माता का भाई माना जाता है। साधारणतः पोतराजू मज़बूत काठी का और भारी डील-डौल वाला व्यक्ति होता है।  वह नंगे बदन होता है और एक छोटी लाल लंगोटनुमा धोती पहने होता है।  उसका बदन भी हल्दी से मढा होता है।  उसको भयानक रूप देने के लिए उसके मुँह में निम्बू रखे जाते हैं ताकि उसके गाल भरे दिखें।  पैरों में घूँघरू बांधे वह ढपली की थाप पर नाचते हुए रंगम के साथ साथ चलता है।  समय-समय पर वह अपने हाथ के कोड़े को फिराते हुए बदन पर मारता है जिससे तड़ाके की आवाज़ होती है।  कभी-कभी तो उसके बदन पर खून के दाग भी नज़र आते हैं।  रंगम भी ट्रांस में बाजे की धुन पर नाचती-चीखती चलती जाती है।



पोतराजू



एक समय था जब माता के मंदिर में बलि दी जाती थी। कहते हैं कि  पहले भैंसे की बलि देने की प्रथा थी जिसे बाद में प्रतिबंधित कर दिया गया।  बाद में बकरे की बलि देने की प्रथा चल पड़ी।  हमें बचपन में उस समय मंदिर के परिसर में नहीं जाने दिया जाता था जब बलि का कार्यक्रम चल रहा होता।  कहा जाता है कि उस समय पोतराजू अपने मुँह से बकरे की गरदन को काटता था।  इस प्रथा के बंद होने के बाद मुर्गे की बलि चल निकली।  आज केवल निंबू ही काटे जाते हैं।

तीसरा सप्ताह सारे नगर के माता की अन्य मंदिरों की पूजा-अर्चना के लिए होता है।  हर मुहल्ले में इस सप्ताह बोनालु पर्व मनाया जाता है।  अपनी अपनी क्षमता और भक्ति से माता की पूजा की जाती है। जिन प्रमुख मंदिरों में पूजा का शोर होता है वे हैं हरिबाउली का अकन्ना-मादन्ना मंदिर, कारवान का मैसम्मा मंदिर और लालदरवाज़ा का जगदम्बा मंदिर।  इन मंदिरों में काफी जोर-शोर से बोनालु का पर्व मनाया जाता है।

तीन सप्ताह के इस कार्यक्रम में ‘घटम’ का बड़ा महत्व होता है। देवी का यह रूप बड़ा अनोखा होता है।  एक पीतल या तांबे की परात में बांस के टुकड़ों से  लम्बे आकार का ‘घट’ बनाया जाता है जिसे चारों ओर से फूलों से सजाया जाता है।  बीच में माता का मुखौटा लगाया जाता है।  यह ‘घटम’ पूजा के दिन शाम के समय घर-घर गली-गली घूमते हैं और घर के सामने आने पर घरवाले नारियल फोड़ते है और पूजा करते हैं।  यह माना जाता है कि देवी अपने घर आई है।  घटम उठाने वाले को तो उसका नेग मिलता ही है।  इस घटम के पीछे भक्त भी चलते रहते है और साथ ही चलते हैं ‘फलारम बंडी’ जिनमें माता की झांकियां सजी होती है।  ये झांकिया हर छोटे-बडे मंदिर से निकाली जाती है और एक प्रकार की प्रतियोगिता मानी जाती है कि किस मंदिर की ‘फलारम बंडी’ कितनी शानदार निकली।  इन ‘फलारम बंडियों के आगे भी बैंड-बाजे चलते हैं।  एक तरह से यह प्रतियोगिता उन छोटे नेताओं के लिए है जो अपनी गली-मुहल्ले में अपनी साख जमाना चाहते हैं।

अंतिम सप्ताह मनाए जाने वाले बोनालु का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हैदराबाद के पुराने शहर की हरिबाउली के अकन्ना-मादन्ना मंदिर से  निकल कर ‘घटम’ मुचकुंदा [मूसी] नदी को ले जाया जाता है।  इसी तरह लाल दरवाज़े के जगदम्बा मंदिर से निकल कर मुचकुंदा नदी के दूसरे छोर पर लाया जाता है।  इन्हें श्रद्धाभाव से नदी में निमज्जन किया जाता है।  इसी प्रकार सिकंदराबाद के घटम को हुसैन सागर में निमज्जन किया जाता है।

कहा जाता है कि इस पर्व का आरम्भ १८६९ में उस समय हुआ जब प्लेग की महामारी हैदराबाद में फैल गई थी।  तब किसी ने कहा  कि यह महामारी देवी माता के प्रकोप के कारण फैल रही है।  उस समय किसी भी महामारी को माता ही कहा जाता है।  आज भी चिकन पॉक्स को छोटी माता और चेचक को माता कहते हैं।   यह पर्व मुस्लिम शासकों के काल में प्रारम्भ हुआ तो वे भी इस पूजा-अर्चना में भाग लेते थे।  यही परम्परा आज भी चली आ रही है कि एक सरकारी अधिकारी आकर माता के मंदिर में सरकार की ओर से पूजा सामग्री अर्पित करता है।

भविष्यवाणी करते हुए कुँवारी कन्या स्वर्णलता

इस वर्ष का बोनालु पर्व ३ जुलाई से प्रारम्भ हुआ और १७ जुलाई को उसका समापन होगा।  इस अवसर पर सिकंदराबाद स्थिन उज्जैनी मंदिर में रंगम ने भविष्यवाणी करते हुए बताया कि वर्तमान में प्रदेश में फैली अशांति के लिए आप के द्वारा विगत में की गै अपनी गलतियां ही हैं।  देवी के रूप में कुँवारी कन्या स्वर्णलता नामक रंगम ने कहा कि गलतियां करने वालों को भी भगवती माफ कर देगी तथा जनता को बहुत कुछ देगी।  आज की राजनीतिक उथल-पुथल में तेलंगाना का मुद्दा जोरों पर है।  रंगम से जब इस मुद्दे पर किसी ने पूछा तो करीब बैठे नेताओं ने ऐसे प्रश्न पूछने की मनाही कर दी और रंगम भी बेहोश होकर गिर गई।  उसे पास वालों ने थाम लिया और जब उसे होश आया तो उसका ट्रांस खत्म हो चुका था।  देखा जाय तो अब यह पर्व राजनीतिक रूप धारण कर चुका है।  इस स्थानीय पर्व को राष्ट्रीय पर्व बनाने की बात तेलंगाना के नेता कर रहे हैं।  अब यह रंगम ही शायद किसी दिन बता सकेगी कि ऐसा कब होने जा रहा है॥

[ऐसे कई स्थानीय पर्व आपके शहर में भी होते होंगे।  हो सके तो इनकी अधिक जानकारी पाठकों को मिलनी चाहिए।]


मंगलवार, 12 जुलाई 2011

दोस्ती का हाथ


[दिल्ली में  सांसद-अध्यक्षों की बैठक का उपरोक्त चित्र देखकर भारत और पाकिस्तान के दो शायरों की कविताएं याद हो आई जिनमें आम जनता की मानसिकता झलकती है।]

हिंदुस्तानी दोस्तों के नाम

गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं
फ़कत तुम्हीं को नहीं रंजे-ज़ाक दामनी
जो सच कहूँ तो दरीदा लिबास हम भी हैं

तुम्हारे बात की शम्में भी ताबनाक नहीं
मेरे फ़लक के सितारे भी ज़र्द-ज़र्द से हैं
तुम्हारे आइना खाने भी ज़ंग आलूदा
मेरे सुराही व सागर भी गर्द-गर्द से हैं

न तुमको अपने खद-व-खाल ही नज़र आएँ
न मैं यह देख सकूँ जाम मे भरा क्या है
बसारतों पे वह जाले पड़े हैं दोनों के
समझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है

तुम्हें भी ज़िद है कि रस्मे सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि ज़ोरो-जफ़ा के आदी हैं
तुम्हें भी ज़ाम महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी फ़क्र कि हम करबला के आदी हैं

न सरु में वह गुरूरे कशीदा कामती है
न क़ुमारियों कि उदासी में कुछ कमी आई
न खिल सके किसी जानिब मुहब्बतों के गुलाब
न शाख़े-अमन लिए फ़ाख़्ता कोई आई

सितम तो यह है कि दोनों के मर्गज़ारों में
हवाए फ़ित्ना व बू-ए-फ़साद आती है
आलम तो यह है कि दोनों को वहम है कि बहार
अदू के खूँ में नहाने के बाद आती है

सो अब यह हाल हुआ इस दरिंदगी के सबब
तुम्हारे पाँव सलामत रहे न हाथ मेरे
न जीत जीत तुम्हारी न हार हार मेरी
न कोई साथ तुम्हारे न कोई साथ मेरे

हमारे शहरों की बेनवा मख़लूम
दबी हुई है दुखों के हज़ार ढेरों में
अब इनकी तीरा-नसीबी जराग चाहती है
जो लोग निस्फ़ सदी तक रहे अंधेरों में

चराग जिन से मुहब्बत की रोशनी फैले
चराग जिन से दिलों के दयार रोशन हों
चराग जिन से जिया अमन व आश्ली को मिले
चराज जिन से दिए बेशुमार रोशन हों

तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तो अब के
न साज़ न नग़मा की महफ़िल न शायरी के लिए
अगर तुम्हारी अना कहीं का है सवाल तो फिर
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
-अहमद फ़राज़

अहमद फ़राज़ के नाम

तुम्हारा हाथ बढ़ा है जो दोस्ती के लिए
मेरे लिए वह इक यारे-ग़मगुसार का हाथ
वह हाथ शाख़े-गुले-गुलशने-तमन्ना है
महक रहा है मेरे हाथ में बहार का हाथ

खुदा करे कि सलामत यह हाथ अपने
अता हुए हैं जो ज़ुल्फ़ें संवारने के लिए
ज़मीं से नक्श मिटाने को ज़ुल्म व नफ़रत के
फ़लक से चाँद-सितारे उतारने के लिए

ज़मीने-पाक हमारे लिए जिगर का टुकड़ा है
हमें अज़ीज़ है देहली व लखनऊ की तरह
तुम्हारे लहजे में मेरी नवा का लहजा है
तुम्हारा दिल है हसीं मेरी आरज़ू की तरह

करें यह अहद कि अवज़ारे-जंग है जितने
उन्हें मिटाना है ख़ाक में मिलाना है
करें यह अहद कि अरबाबे जंग हैं जितने
उन्हें शराफ़त व इन्सानियत सिखाना है

जबीं-ए-तमाम हसीना-ए-खैबर व लाहौर
जबीं-ए-तमाम जवानाने-जन्नते-कश्मीर
हो लब-ए-नग़मा मेहरो-वफ़ा की ताबानी
किताबे-दिल पे फ़कत हर्फ़े-इश्को-तहरीर

तुम आओ गुलशने-लाहौर से चमन-बरदोश
हम आएँ सुबहे-बनारस की रोशनी लेकर
हिमालय की हवाओं की ताज़गी लेकर
फिर इसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है
-अली सरदार जाफ़री

[साभार- चित्र ‘स्वतंत्र वार्ता’ के दिनांक १२ जुलाई २०११ से तथा कविताएँ डॉ. आनंद राज वर्मा के लेख- ‘दोस्ती का हाथ’ से जो ‘स्वतंत्र वार्ता’ के दिनांक २६ नवम्बर २००६ से उद्धृत]

बुधवार, 6 जुलाई 2011

अमावस की रात - समीक्षा



तांत्रिक विद्या का पतन- ‘अमावस की रात


डॉ. उषा यादव का नाम हिंदी जगत में अपने साहित्यिक योगदान के लिए जाना जाता है।  अब तक उनके तीन कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, एक कविता संग्रह, पाँच आलोचनात्मक ग्रंथ सहित लगभग तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  उनका छठवाँ उपन्यास ‘अमावस की रात’ तांत्रिक विद्या की पृष्ठभूमि में रचा गया है।

उपन्यास का आरम्भ होता है इस दृश्य से- ‘आज अमावस की रात थी। आसमान में घने काले बादल। एक तारा भी नहीं। घुप अंधेरा। इस घुप अंधेरे में एक टूटे-फूटे मकान के सामने घरेलू सामान से लदी एक गाड़ी आकर ठहर गई।’ यह वर्णन पाठक को प्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यासकार एड्गर ऐलन पो की याद दिलाता है।  

‘अमावस की रात’ के इस घर में छोटा पंडित उसकी निःसंतान पत्नी, माँ और अपाहिज बाप [बड़ा पंडित] आकर बसते हैं।  बड़ा पंडित खटिया पकड़ चुका है और माँ भी बूढ़ी हो गई है जो चल-फिर नहीं सकती।  पत्नी हर हाल में संतान चाहती है पर छोटे पंडित को मालूम है कि उसके वंश पर बडे पंडित की तांत्रिक विद्या का दुरुपयोग करने के कारण संतान दोष का श्राप है जिससे कुछ वर्ष बाद ही उसका परिवार मुक्त हो सकता है।

पत्नी के लगातार दबाव के कारण छोटा पंडित तंत्र के टोटके करके पडोसी गरिमा के घर में चीज़ें फेकता रहता है ताकि उसकी संतान दुष्परिणाम से बच जाए और पड़ोसी संकट झेले। प्रारम्भ में तो गरिमा यह सोच कर नकार देती है कि ‘मनोवैज्ञानिक दवाव में आ जाने की वजह से ही उसे ऐसा महसूस हो रहा है और अगर खुद को सबल नहीं बनाएगी तो वहम में पड़कर भूत-प्रेत भी देखने लगेगी।’ परंतु पंडित के निरंतर  टोटके चलते रहते हैं।  गरिमा सोचती है- ‘तंत्र मंत्र का मुझे भय नहीं। आर्यसमाजी संस्कार मेरे भीतर जड़ें जमाए है।  टूटा चूल्हा-चक्की फेंककर कोई हमारा अहित नहीं कर सकता।  हाँ, घर के फाटक पर गंदगी जरूर बुरी लगती है।  सिर्फ इसलिए मुझे उस शख्स से शिकायत है।" बात आगे बढ़ती जाती है और यहाँ तक पहुँचती है कि एक दिन मृत गाय उसके गेट के सामने फेंक दी जाती है।  

यह शख्स कौन है जो ऐसे टोने टोटके कर रहा है, यह न तो गरिमा को पता था और न उनके घर वालों को और न अन्य पड़ोसियों को;  जबकि छोटे पण्डित की पत्नी पडोस के बहाने कुछ न कुछ टोटके उनके घर पहुँचाती रहती है।  पत्नी को गर्भवती बनाने के लिए छोटा पण्डित अपने अपाहिज पिता की बली भी तंत्र में झोंक देता है और माँ चुपचाप देखती रह जाती है- बेटे के सहारे जीवन जो काटना है।

इस श्राप के कारण पंडित का बेटा विकलांग पैदा होता है और छोटे पंडित को यह पता है कि उस बच्चे का जीवन कठिन होगा परंतु पत्नी के दबाव में वह तंत्र विद्या का दुरुपयोग करता ही चला जाता है ताकि बच्चे की सारी विपदाएं पडोसी को लगे और बच्चा सुरक्षित रहे।  वह पडोस की गरिमा की गर्भवती पुत्री की कोख पर भी वार करने की सोचता है।  

इस प्रकार के कई उतार-चढ़ाव से गुज़रते हुए अंततः गरिमा इस निश्चय पर पहुँचती है कि तंत्र-मंत्र के कारण उसपर एक के बाद एक विपदाएँ आ रही है यद्यपि वह तर्क बुद्धिवादी है।  वह अपने गुरुजी के पास सारी व्यथा सुनाती है तो गुरुजी उसे कुछ उपाय सुझाते हैं जो सारे घर के इर्दगिर्द एक अदृश्य जाल की तरह सुरक्षा चक्र बना देगा।  अब पंडित के सारे टोटके विफल होने लगते हैं तो वह अंतिम हथियार के रूप में ‘रक्त कमल’ जैसा घातक तंत्र प्रयोग करने का निश्चय करता है जिसके असफल होने से वह रक्त कमल लौट कर उसे ही मार सकता था।  अंत में गरिमा के सुरक्षा चक्र को न तोड़ पाने के कारण रक्त कमल लौट आता है।  उसे किसी का रक्त तो चाहिए ही।  बुढिया माँ अपने बेटे छोटे पंडित को बचाने के लिए उस रक्त कमल को उसके पुत्र की ओर मोड़ देती है और इस प्रकार छोटे पंडित के अभिशप्त पुत्र की मृत्यु हो जाती है।  

सारा उपन्यास तंत्र-मंत्र और तर्क बुद्धिवाद के युद्ध के इर्दगिर्द घूमता रहता है।  तर्क बुद्धिवाद वाली गरिमा को भी अंत में तंत्र के सुरक्षा चक्र का सहारा लेना पड़ता है, जिससे निष्कर्ष यही निकलता है कि तंत्र-मंत्र में लोगों की आस्था है और उसका असर भी होता है।  भले ही लोग उदार विचारधारा और आधुनिक तर्कबुद्धिजीवी भले ही हों, पर लगातार चोट लगने से उनकी मानसिकता भी हिल जाती है।  डॉ. उषा यादव ने शायद यही संदेश इस उपन्यास के माध्यम से देना चाहा है कि तांत्रिक विद्या एक सच है और इसके उपयोग ऐसी दोधारी तलवार है जिसके अच्छे या बुरे परिणाम उस विद्या के प्रयोग पर निर्भर करते है।  उद्देश्य चाहे जो भी हो, उपन्यासकार का एक उद्देश्य तो सफल माना जाएगा और वह है कि उपन्यास पाठक को बांधे रखता है।

पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम : अमावस की रात
लेखिका : उषा यादव
मूल्य: ३०० रुपये
प्रकाशक: किताब घर
२४/४८५५, अंसारी रोड़
नई दिल्ली - ११० ००२




सोमवार, 4 जुलाई 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-३

मणिपुर में हिंदी का इतिहास-३
प्रो. देवराज


[पिछली पोस्ट की टिप्पणी में आदरणीय डॉ अमर कुमार जी ने कहा है कि मैं ‘अपने विचार रखूं कि इस बयान के पीछे निहित सोच का पता चले’।  प्रो. देवराज जी की इस पुस्तक की भूमिका पढ़कर मुझे लगा कि इसमें मणिपुर में हो रहे हिंदी के विकास का संपूर्ण इतिहास दिखाई देता है।  हाल ही में यह बवाल मचाया गया था कि हिंदी का लेखन तो उत्तर में ही होता है।  वैसे, लोगों की सोच यह भी रही है कि लेखन तो मात्र दिल्ली में ही होता है और बाकी सब कूड़ा है!!  ऐसे लोग शायद हिंदी के इतिहास की जानकारी कम ही रखते हैं; या फिर, उससे विमुख हैं।  इस लेख से उन जैसे तथाकथित साहित्यकारों को पता चलेगा कि देश के कोने-कोने में लोग अपने-अपने तरीके से, अपनी-अपनी क्षमतानुसार अपना तन-मन-धन लगा कर भी राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा करते आ रहे हैं- तब से,  जब राष्ट्रभाषा शब्द  बोलना  भी वर्जित था।  इस लेख से पता चलता है कि किन विपरीत परिस्थितियों में हिंदीतर कहे जानेवाले प्रांतों में लोग  अपने प्राण की बाज़ी लगा कर भी देश और भाषा की सेवा के लिए कृतसंकल्प रहे।  उस छोटी सी शुरुआत ने अब विशाल तरु का रूप धारण कर लिया है।]

मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल


हिंदी की व्यवस्थित शिक्षा देने के लिए १९३३ में इम्फाल के व्यापारी-समाज के विशेष प्रयास से सेठ भैरोदान मोहता [बिकानेरवासी] के नाम पर ‘भैरोदान हिंदी स्कूल’ की स्थापना हुई।  इसकी मुहूर्त पूजा पं. राधामोहन शर्मा ने की और समाज के आग्रह पर वे इसी विद्यालय में हिंदी का अध्यपन भी करने लगे।  मणिपुर में हिंदी शिक्षण की समस्त सुविधाओं से युक्त यह पहला विद्यालय था, जिसमें अध्यापकों को नियमित वेतन भुगतान पर नियुक्त किया गया।  श्री टी. बिशेश्वर शास्त्री के प्रयास से १९५१ में इसका सरकारीकरण हुआ।

संस्थागत हिंदी-प्रचार आंदोलन की दृष्टी से मणिपुर में हिंदी-प्रचार का कार्य १९२७-२८ में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ द्वारा प्रारम्भ हुआ।  पहले से ही मणिपुर के जो कार्यकर्ता राष्ट्रीय चेतना से युक्त हो चुके थे, उन्होंने सम्मेलन के कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।  अंगरेज़ सरकार के अनेक विरोधों के बावजूद सम्मेलन ने इस क्षेत्र में परीक्षा केंद्र चलाया तथा हिंदी के प्रचार का कार्य किया।  ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के अंतर्गत मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना १९३९-४० में हुई।  यह उल्लेखनीय तथ्य है कि प्रारम्भ में अंगरेज़ सरकार ने ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द पर आपत्ति करते हुए इस नाम से कार्य करने की मनाही कर दी थी।  इस पर, मूल उद्देश्य को मह्त्व प्रदान करते हुए हिंदी प्रचारकों ने इसका नाम ‘मणिपुर हिंदी प्रचार समिति’ रखकर कार्य करना शुरू किया और जैसे ही अनुकूल अवसर मिला, पुनः ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ नाम रख लिया।  इस संस्था द्वारा ५१ राष्ट्रभाषा विद्यालय, १३ राष्ट्रभाषा महाविद्यालय तथा ५० से अधिक परीक्षा केंद्र प्रारम्भ किए गए।  १९५९ में इम्फाल जेल में भी एक परीक्षा केंद्र शुरू किया गया, जिससे बंदी लोग हिंदी सीख कर परीक्षा दे सकें।

‘मणिपुर हिंदी प्रचार सभा’, ‘नागरी लिपि प्रचार सभा’, ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’, ‘मणिपुर ट्राइबल्स हिंदी सेवा समिति’ आदि अन्य संस्थाएँ हैं, जिन्होंने इस राज्य में हिंदी-आदोलन की जड़ें मज़बूत करने का कार्य किया।  ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ और ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षा संघ’ आदि भी हिंदी का वातावरण तैयार करने का प्रयास करते हैं। केंद्रीय हिंदी शिक्षण योजना [गृह मंत्रालय के नियंत्रण में संचालित कर्मचारी हिंदी शिक्षण योजना], हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, आकाशवाणी की हिंदी शिक्षण एवं हिंदी कार्यक्रम योजना आदि को भी यदि सम्मिलित किया जाए, तो इस राज्य में हिंदी की अच्छी तस्वीर उभरती है।  मणिपुर विश्वविद्यालय में एक समृद्ध हिंदी-विभाग कार्य कर रहा है।  यह १९७९ में तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय विस्तार केंद्र के नियंत्रण में प्रारम्भ हुआ था।  इसमें स्नातक कक्षाओं के अध्यापन के साथ ही उच्च स्तरीय शोध कार्य भी किया-कराया जाता है।

मणिपुर राज्य में हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है।  ‘युमशकैश’ और ‘महिप पत्रिका’ यहाँ से प्रकाशित होनेवाली नियमित - मासिक एवं त्रैमासिक - पत्रिकाएँ हैं।  इसके साथ ही ‘कुन्दोपरेङ्‌’ नामक पत्रिका अनियतकालीन रूप में प्रकाशित होती हैं।  स्कूल-कालेज से लेकर विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं में भी सम्बंधी सामग्री का स्वतंत्र विभाग होता है।  ये प्रयास हिंदी-प्रचार के इतिहास में उल्लेखनीय मह्त्व रखते हैं।

मणिपुर राज्य में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटी ‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ अन्य सभी संस्थाओं से विशिष्ट है।  कारण यह, कि इस संस्था ने हिंदी भाषा के प्रचार अथवा परीक्षा संचालन तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित न रख कर हिंदी एवं मणिपुरी भाषाओं के भाषायी एवं साहित्यिक विकास का स्मरणीय प्रयास किया है।  

[साभार- ‘संकल्प और साधना’ पुस्तक में प्रो. देवराज द्वारी लिखी गई भूमिका]

पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम :  संकल्प और साधना
[‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ और उसके प्रमुख आधार स्तंभों का मूल्यांकन]
लेखक : देवराज
मूल्य : ८० रुपए
प्रकाशक : पत्रिका विभाग, 
मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल
विधानसभा मार्ग, इम्फाल - ७९५ ००१ [मणिपुर]


बुधवार, 29 जून 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-१


{मणिपुर में हिंदी के इतिहास पर प्रकाश डालता यह लेख प्रो. देवराज ने ७ जून १९९८ में लिखा जब ‘मणिपुर हिंदी परिषद’ के स्थापना दिवस के अवसर पर ‘संकल्प और साधना’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ था।  यह लेख हिंदी और वैष्णव धर्म के बारे में विस्तार से ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता  है।  इस लेख के माध्यम से हम मणिपुर मे हो रही हिंदी की गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त कर सकते है।  इस पुस्तक में उन कर्मठ हिंदी सेवियों के बारे में भी जानकारी मिलेगी जो भाषा और संस्कृति की सेवा में जुटे हुए हैं।  देवराज जी मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल में डीन के पद पर रह चुके हैं।  यहाँ उनके इस लेख का प्रथम भाग प्रस्तुत है।]



संकल्प और साधना - मणिपुर हिंदी परिषद
देवराज

१८वीं शताब्दी में वैष्णव-पदावली ["ब्रजबुलि-पदों" के नाम से] मणिपुर के मंदिरों में गाई जाने लगी थीं।  इसे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य वैष्णव धर्म के संदेश के साथ लेकर मनिपुर पहुँचे थे।  इन भक्तों की चार विशेषताएँ थीं।  
एक- राधा-कृष्ण की सरस व मोहक लीलाओं को संगीतमय बनाकर आकषक रूप में प्रस्तुत करना; 
दो- बिना किसी विरोध को जन्म दिए स्थानीय जनता के मन में भक्ति व प्रेम की स्थापना करना; 
तीन- मणिपुर के लौकिक वातावरण को स्वीकार करके भक्ति को पढ़े बे-पढ़े सबके लिए सुलभ बनाना  और 
चार- समूह गान की परम्परा।  धीरे-धीरे वैष्णव-मत का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा।  गाँव-गाँव, घर-घर मंदिर बनाए जाने लगे और कीर्तन की ध्वनि गूँजने लगी।  मणिपुर के राजा वैष्णव मत में दीक्षित हो गए।  इससे राधा-कृष्ण और उनके माध्यम से भारत की वैष्णवी-सांस्कृतिक धारा इस राज्य में बहने लगी।

इस धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण का विशेष पहलू है- तीर्थ यात्राओं की परम्परा।  राधा और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले लोग मथुरा-वृंदावन के उन क्षेत्रों के दर्शन करना अपना परम सौभाग्य मानते थे, जहाँ राधा-कृष्ण ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न की थीं।  जो साधना-सम्पन्न थे, वे कभी-कभी प्रतिवर्ष इस यात्रा में भाग लेते थे।  इसके अतिरिक्त यथा-समय हरिद्वार, काशी, प्रयाग, गया, नवद्वीप आदि की यात्राओं का क्रम चलता रहता था।  मणिपुर के राजाओं व सम्पन्न जनसाधारण द्वारा इनमें से कुछ तीर्थ स्थानों पर बनवाए गए मंदिरों व रासमंडलों को आज भी देखा जा सकता है।  तीर्थ-यात्राओं का वह आयोजन मणिपुर निवासियों को भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और ब्रज भाषा तथा हिंदी की बोलियों के निकट सम्पर्क में लाता था।  ये लोग जब अपने घरों को लौटते थे तब उन्हें हिंदी के इन रूपों का परिचय प्राप्त हो चुका होता था।  साथ ही वे यह भी समझ चुके होते थे कि मणिपुर के बाहर मणिपुरी में काम चलाना कठिन है तथा इसके लिए व्यापक सम्पर्क की भाषा जानना आवश्यक है।  यात्रा की सुविधा और सम्पर्क की सरलता के लिए ये धर्म-प्रधान मणिपुरी अनजाने ही हिंदी को अपनी निज की भाषा स्वीकार कर लेते थे।  इस प्रकार पहले-पहल हिंदी ने मणिपुर में अपना स्थान बनाया।

भारतवर्ष पर मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही प्रब्रजन एकाएक बढ़ना शुरू हुआ।  मुसलमानों के लूट-पाट, राज्य स्थापना और शक्ति के बल पर इस्लाम के प्रचार को उद्देश्य बना कर भारत पर आक्रमण किए।  ११वीं शताब्दी के काल में ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन का क्रम चल पड़ा था।  इसके परिणाम सामने आए।  कुछ लोग कत्ल कर दिए गए, कुछ ने प्राणों की रक्षा हेतु धर्म बदलना स्वीकार कर लिया और कुछ ने इधर-उधर भाग कर अपने धर्म की सुरक्षा का प्रयास किया।  मणिपुर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे ब्राह्मण परिवारों के वंशज हैं, जिनके पूर्वज अपना धर्म बचाने के लिए इधर चले आए थे।  इनमें से काफी ब्राह्मण मिथिला के हैं।  गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से भी इस क्रम में अनेक ब्राह्मण आ गए थे।  अन्याय से बचने के लिए ये ब्राह्मण अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भाँति मणिपुर में यत्र-तत्र जहाँ भी अनुकूल परिवेश मिलता था, बस जाते थे।  जैसे-जैसे समय बीतता जाता था, ये लोग अपने को स्थानीय परिस्थितियों में ढाल लेते थे।  यहाँ की भाषा सीख लेते थे।  आज तो मणिपुर के सभी ब्राह्मण शर्मा लिखते हैं किंतु यदि इनके गोत्र पूछे जाएँ तो इनके मूल निवास स्थान का पता लगाना कठिन नहीं है।  प्राचीन काल में हिंदी के पक्ष में वातावरण बनाने में इन प्रब्रजित लोगों ने महत्वपूर्ण कार्य किया।  इसका कारण यह है कि संस्कृत और हिंदी जानने वाले इन ब्राह्मणों ने अपने को मणिपुरी समाज  के अनुकूल बनाकर अपना परम्परागत जीवन कर्म, पौरोहित्य प्रारम्भ कर दिया।  ये धार्मिक कृत्य में बीच-बीच में हिंदी का प्रयोग करते थे।  मंदिर में भोग चढ़ाने, धार्मिक-भोज और कीर्तन के अवसर पर पुरोहित प्रायः संस्कृत के शब्द भी बोलते थे।  वैष्णव धर्म के श्रद्धालु-जन उचित रूप में इन्हें समझ लेते थे।  इस प्रकार मणिपुर के जीवन में हिंदी का महत्व बढ़ता गया।

प्राचीन काल से ही अपने बल पर और राजाओं से छात्रवृत्ति प्राप्त करके मणिपुर के बाह्मण बालक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने नवद्वीप व काशी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थानों में जाया करते थे।  इनमें से काशी के, हिंदी के वातावरण से घिरे होने के कारण संस्कृत के साथ हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेना इनके लिए बड़ा सहज था।  इनमें से अनेक पौरोहित्य कर्म के साथ सक्रिय रूप से हिंदी के प्रचार में जुट जाते थे।  कुछ आकर हिंदी का व्यवस्थित शिक्षण भी प्रारम्भ कर देते थे।  इनके पूजा-पाट में भी संस्कृत और मणिपुरी के साथ हिंदी का पर्याप्त अंश होना स्वाभाविक था।  मणिपुर में ब्राह्मणों के घर में मंदिर और उसके सामने बड़ा सा चौकोर बैठका बनवाने की प्राचीन परम्परा आज भी मिलती है।  भगवान के दर्शन के बाद भक्त लोग इसमें इकट्ठे होते थे और एक निश्चित समय पर पुजारी इन्हें उपदेश करते थे।  इस उपदेश की मुख्य भाषा मणिपुरी होती थी और बीच-बीच में प्रसंग पड़ने पर हिंदी का प्रयोग होता था।  कीर्तन का माध्यम "ब्रजबुलि" की भाषा था ही, इससे हिंदी मणिपुर में बढ़ी।  इस प्रकार प्राचीन काल में हिंदी, धर्म तथा संस्कृत भाषा के साथ इस क्षेत्र में आई।


बुधवार, 8 जून 2011

पुरस्कार-पिपासा


हिदी के पंडों की पुरस्कार-पिपासा

सुबह-सवेरे फोन की घंटी घनघना उठी।  नित्यकर्म से निवृत होकर  अभी अखबार लिए बैठा था कि फोन बजने की आवाज़ सुनकर श्रीमती जी ने किचन से आवाज़ लगाई- ‘ज़रा देखना, किसका फोन है, मैं चाय बना रही हूँ।’  मरता क्या न करता- चाय तो हमें पीनी ही थी, सो अखबार टेबल पर पटक कर फोन तक गए ही थे कि घंटी रुक गई।  पुनः टेबल की ओर लौट ही रहे थे कि फिर घंटी घनघना उठी। कुढकुढाते हुए फोन उठाया तो उधर से पिपासु जी की मृदु आवाज़ सुनाई दी- नमस्ते जी।  

‘अरे पिपासु जी, नमस्कार। कहिए सुबह-सुबह कैसे याद किया।’
‘हम तो सदा ही आप को याद करते रहते हैं सर।  आखिर आप ही के सहारे हमारी कलम चल रही है।’

‘अरे नहीं साहब, हम क्या और हमारी औकात क्या।’ हमने अपनी सदाशयता दिखाते हुए कहा।

पिपासु जी अपने असली उद्देश्य पर उतर आए।  उन्होंने बताया कि एक स्थानीय संस्था वार्षिक पुरस्कार देने की घोषणा कर चुकी है और वे चाहते थे कि इस वर्ष के पुरस्कार के लिए मैं उनका नाम सुझाऊँ।  पिपासु जी का मुझे याद करने का असली उद्देश्य अब मेरी समझ में आया।  

अस्सी वसंत पार कर चुके पिपासु जी के पुरस्कार-पिपासा पर मुझे तरस आता है। जब कभी कहीं भी पुरस्कार की घोषणा होती है तो पिपासु जी का फोन आ ही जाता है और वे चाहते हैं कि हर पुरस्कार उन्हें ही मिले।  एक बार मैंने उन्हें सलाह दी थी कि इस आयु में उन्हें पुरस्कारों का मोह छोड़ना चाहिए तो सकुचाते हुए उन्होंने कहा था- अब यही चाह तो उन्हें जिंदा रखे हुए है और लिखने को मजबूर करती है।

ऐसा नहीं है कि पिपासु जी केवल पुरस्कार के समय ही मुझे याद करते हैं।  अपनी पुस्तक प्रकाशित करते ही वे सूचना देंगे कि उनकी कृति प्रकाशित हो गई है और इसकी एक प्रति वे मुझे भेज रहे है।  पुस्तक भेजने के एक सप्ताह बाद फिर फोन आएगा और पुस्तक मिलने की सूचना लेंगे।  फिर गिड़गिड़ाएंगे कि इसकी समीक्षा फ़लां-फ़लां पत्र-पत्रिकाओं को भेज दीजिए।  एक सप्ताह बीता ही नहीं कि फिर फोन आएगा यह जानने के लिए कि समीक्षा भेजी या नहीं।  समीक्षा छप जाएगी पर धन्यवाद के लिए पिपासु जी फोन करना भूल जाएँगे।

ऐसा नहीं है कि पिपासु जी ही एक ऐसे चरित्र हैं।  ऐसे कई पिपासुओं से आपका भी पाला पड़ा होगा, जो अपनी आयु का लिहाज़ भी नहीं करते और बड़े बेझिझक होकर अपनी पुरस्कार-पिपासा का इज़हार कर देंगे।  वे यह भी नहीं सोंचेंगे कि जिसके सामने वे गिड़गिड़ा रहे हैं वह तो उनके पुत्र की आयु का है।

पुरस्कार-पिपासु किसिम-किसिम के होते हैं।  कुछ पिपासु पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ के फ़न में भी माहर होते हैं।  वे किसी  भी कीमत पर पुरस्कार चाहते हैं भले ही इसके लिए उन्हें कुछ ‘खर्च’ भी करना पड़े।  इन पिपासुओं में लिंग-भेद नहीं होता।  अर्थात, वे पुरुष या महिला- कोई भी हो सकते हैं।  ऐसे पिपासु ‘बैक डोर मेथेड’ का प्रयोग करते हैं।  वे पुरस्कार देनेवाली संस्था से समझौता कर लेते हैं कि पुरस्कृत राशि संस्था को पुनः लौटा दी जाएगी।  संस्था भी ऐसे पिपासुओं का स्वागत करती है क्योंकि ऐसी संस्थाएं इसी जोड़-तोड़ के लिए तो बनती है।

संस्थाओं की बात चली तो याद आया, कुछ ऐसी संस्थाएँ भी होती हैं जो केवल पुरस्कार देने के लिए ही बनाई जाती हैं।  ऐसी संस्थाएँ पुरस्कार-ग्रहिताओं के पैसों से ही चलती है।  ये संस्थाएँ एक साथ कई पिपासुओं के नाम की घोषणा करती है और उनसे पैसे लेकर पुरस्कार का आयोजन करती है।  ऐसी संस्थाओं को लोग भले ही भली-भांति जानते हों पर जब पुरस्कार के रूप में काष्ट का एक टुकड़ा मिलता है तो उसे दिखाते हुए समाचार पत्र में अपनी फोटो डाल कर पिपासु जी पुरस्कृत होने की घोषणा भी करते हैं।  

पता नहीं पुरस्कार की लोकेषणा इन बूढे पिपासुओं में कब जाएगी।  जाएगी भी या नहीं? इस प्रश्न पर एक छोटी सी कथा याद आई।  एक बुढ़ऊ रोज़ लड़कियों के कालेज के पास रिक्शे में बैठ कर दो सुंदर लड़कियों को रिक्शे में जाते हुए देखता और उनके मुहल्ले तक पीछा करके लौट जाता।  कई दिन इस प्रक्रिया को देखती लड़कियों ने एक दिन अपने रिक्शे वाले से चमन की ओर ले जाने को कहा।  चमन में एकांत स्थान पर बैठ कर बुढ़ऊ को इशारा करके बुलाया।  बुढ़ऊ खुशी-खुशी पास पहुँचा।  लड़कियों ने कहा कि वे उसकी तपस्या से प्रसन्न हैं और वह जो चाहे उनके साथ कर सकता है।  बुढ़ऊ ने दोनों लड़कियों के हाथ लिए और आँखों से लगाते हुए कहा- आँखों की प्यास नहीं बुझी थी।

तो क्या इन बुढ़ऊ पिपासुओं की पुरस्कार-प्यास कभी बुझेगी?