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सोमवार, 4 जुलाई 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-३

मणिपुर में हिंदी का इतिहास-३
प्रो. देवराज


[पिछली पोस्ट की टिप्पणी में आदरणीय डॉ अमर कुमार जी ने कहा है कि मैं ‘अपने विचार रखूं कि इस बयान के पीछे निहित सोच का पता चले’।  प्रो. देवराज जी की इस पुस्तक की भूमिका पढ़कर मुझे लगा कि इसमें मणिपुर में हो रहे हिंदी के विकास का संपूर्ण इतिहास दिखाई देता है।  हाल ही में यह बवाल मचाया गया था कि हिंदी का लेखन तो उत्तर में ही होता है।  वैसे, लोगों की सोच यह भी रही है कि लेखन तो मात्र दिल्ली में ही होता है और बाकी सब कूड़ा है!!  ऐसे लोग शायद हिंदी के इतिहास की जानकारी कम ही रखते हैं; या फिर, उससे विमुख हैं।  इस लेख से उन जैसे तथाकथित साहित्यकारों को पता चलेगा कि देश के कोने-कोने में लोग अपने-अपने तरीके से, अपनी-अपनी क्षमतानुसार अपना तन-मन-धन लगा कर भी राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा करते आ रहे हैं- तब से,  जब राष्ट्रभाषा शब्द  बोलना  भी वर्जित था।  इस लेख से पता चलता है कि किन विपरीत परिस्थितियों में हिंदीतर कहे जानेवाले प्रांतों में लोग  अपने प्राण की बाज़ी लगा कर भी देश और भाषा की सेवा के लिए कृतसंकल्प रहे।  उस छोटी सी शुरुआत ने अब विशाल तरु का रूप धारण कर लिया है।]

मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल


हिंदी की व्यवस्थित शिक्षा देने के लिए १९३३ में इम्फाल के व्यापारी-समाज के विशेष प्रयास से सेठ भैरोदान मोहता [बिकानेरवासी] के नाम पर ‘भैरोदान हिंदी स्कूल’ की स्थापना हुई।  इसकी मुहूर्त पूजा पं. राधामोहन शर्मा ने की और समाज के आग्रह पर वे इसी विद्यालय में हिंदी का अध्यपन भी करने लगे।  मणिपुर में हिंदी शिक्षण की समस्त सुविधाओं से युक्त यह पहला विद्यालय था, जिसमें अध्यापकों को नियमित वेतन भुगतान पर नियुक्त किया गया।  श्री टी. बिशेश्वर शास्त्री के प्रयास से १९५१ में इसका सरकारीकरण हुआ।

संस्थागत हिंदी-प्रचार आंदोलन की दृष्टी से मणिपुर में हिंदी-प्रचार का कार्य १९२७-२८ में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ द्वारा प्रारम्भ हुआ।  पहले से ही मणिपुर के जो कार्यकर्ता राष्ट्रीय चेतना से युक्त हो चुके थे, उन्होंने सम्मेलन के कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।  अंगरेज़ सरकार के अनेक विरोधों के बावजूद सम्मेलन ने इस क्षेत्र में परीक्षा केंद्र चलाया तथा हिंदी के प्रचार का कार्य किया।  ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के अंतर्गत मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना १९३९-४० में हुई।  यह उल्लेखनीय तथ्य है कि प्रारम्भ में अंगरेज़ सरकार ने ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द पर आपत्ति करते हुए इस नाम से कार्य करने की मनाही कर दी थी।  इस पर, मूल उद्देश्य को मह्त्व प्रदान करते हुए हिंदी प्रचारकों ने इसका नाम ‘मणिपुर हिंदी प्रचार समिति’ रखकर कार्य करना शुरू किया और जैसे ही अनुकूल अवसर मिला, पुनः ‘मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ नाम रख लिया।  इस संस्था द्वारा ५१ राष्ट्रभाषा विद्यालय, १३ राष्ट्रभाषा महाविद्यालय तथा ५० से अधिक परीक्षा केंद्र प्रारम्भ किए गए।  १९५९ में इम्फाल जेल में भी एक परीक्षा केंद्र शुरू किया गया, जिससे बंदी लोग हिंदी सीख कर परीक्षा दे सकें।

‘मणिपुर हिंदी प्रचार सभा’, ‘नागरी लिपि प्रचार सभा’, ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’, ‘मणिपुर ट्राइबल्स हिंदी सेवा समिति’ आदि अन्य संस्थाएँ हैं, जिन्होंने इस राज्य में हिंदी-आदोलन की जड़ें मज़बूत करने का कार्य किया।  ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ और ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षा संघ’ आदि भी हिंदी का वातावरण तैयार करने का प्रयास करते हैं। केंद्रीय हिंदी शिक्षण योजना [गृह मंत्रालय के नियंत्रण में संचालित कर्मचारी हिंदी शिक्षण योजना], हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, आकाशवाणी की हिंदी शिक्षण एवं हिंदी कार्यक्रम योजना आदि को भी यदि सम्मिलित किया जाए, तो इस राज्य में हिंदी की अच्छी तस्वीर उभरती है।  मणिपुर विश्वविद्यालय में एक समृद्ध हिंदी-विभाग कार्य कर रहा है।  यह १९७९ में तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय विस्तार केंद्र के नियंत्रण में प्रारम्भ हुआ था।  इसमें स्नातक कक्षाओं के अध्यापन के साथ ही उच्च स्तरीय शोध कार्य भी किया-कराया जाता है।

मणिपुर राज्य में हिंदी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है।  ‘युमशकैश’ और ‘महिप पत्रिका’ यहाँ से प्रकाशित होनेवाली नियमित - मासिक एवं त्रैमासिक - पत्रिकाएँ हैं।  इसके साथ ही ‘कुन्दोपरेङ्‌’ नामक पत्रिका अनियतकालीन रूप में प्रकाशित होती हैं।  स्कूल-कालेज से लेकर विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिकाओं में भी सम्बंधी सामग्री का स्वतंत्र विभाग होता है।  ये प्रयास हिंदी-प्रचार के इतिहास में उल्लेखनीय मह्त्व रखते हैं।

मणिपुर राज्य में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटी ‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ अन्य सभी संस्थाओं से विशिष्ट है।  कारण यह, कि इस संस्था ने हिंदी भाषा के प्रचार अथवा परीक्षा संचालन तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित न रख कर हिंदी एवं मणिपुरी भाषाओं के भाषायी एवं साहित्यिक विकास का स्मरणीय प्रयास किया है।  

[साभार- ‘संकल्प और साधना’ पुस्तक में प्रो. देवराज द्वारी लिखी गई भूमिका]

पुस्तक विवरण

पुस्तक का नाम :  संकल्प और साधना
[‘मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल’ और उसके प्रमुख आधार स्तंभों का मूल्यांकन]
लेखक : देवराज
मूल्य : ८० रुपए
प्रकाशक : पत्रिका विभाग, 
मणिपुर हिंदी परिषद, इम्फाल
विधानसभा मार्ग, इम्फाल - ७९५ ००१ [मणिपुर]


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-२


मणिपुर हिंदी का इतिहास-२ 
प्रो. देवराज

आधुनिक-काल में भारतीय पुनर्जागरण का परिणाम सामाजिक और राष्ट्रीय-जागरण के रूप में सामते आया।  महर्षी दयानन्द, महर्षी अरविन्द, राजा राममोहन राय आदि ने सम्पूर्ण भारतीय जीवन को झकझोर दिया।  यह अनुभव किया जाने लगा कि रूढ़ सामाजिक-मूल्यों के अस्वीकार के बिना भारतीय समाज को नहीं बचाया जा सकता।  इसी प्रकार राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया गया।  ‘भारतीय जनता के समस्त दुखों का मूल दासता है’ इस सोच ने आधुनिक भारत के निर्माण में क्रांतिकारी सहयोग दिया।  हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में खोजनेवाला भी यही नारा था।  अंगरेज़ों से इस देश को मुक्त कराने के लिए, भारत की सम्पूर्ण जनता को जगा कर यह बताना आवश्यक था कि अंगरेज़ इस देश के लिए अभिशाप हैं और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर खड़े होना अनिवार्य है।  इस महान कार्य के लिए भाषाओं की खोज के क्रम में हिंदी का नाम सामने आया।  हिंदी ही समस्त भाषाओं में ऐसी थी, जो अधिकांश भारतीय जनता द्वारा बोली और समझी जाती थी।  फिर भाषा वैज्ञानिक कारणों से इसे आसानी से सीखा जा सकता था।  इसने व्यापार की भाषा के रूप में विशाल क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली थी।  साथ ही धर्म, इतिहास और संस्कृति के व्यापक भारतीय मानकों को इस भाषा ने बहुत पहले से इस देश के व्यापक क्षेत्र तक पहुँचाना शुरू कर दिया था।  इन सब कारणों से एक मत से हिंदी को सामान्य सम्पर्क की भाषा के रूप में मान्यता मिली।  आगे चलकर हिंदी को स्वतंत्रता-संघर्ष की मुख्य भाषा बनने का अवसर मिला तथा जनता यह समझने लगी कि भारत के स्वतंत्र होते ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया जाएगा।  इसके साथ ही महात्मा गाँधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने जो आशाएँ जगाईं, उनसे लगने लगा कि हिंदी स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भारत को प्रतिष्ठा दिलाएगी, जिसके माध्यम से लोगों को अभिव्यक्ति-क्षमता के साथ-साथ रोज़गार भी मिलेंगे और जो समग्र भारत को एकता के सूत्र में बांधेगी।  जनता की इस आशा ने हिंदी-भाषी और हिंदीतर भाषी- दोनों प्रकार के प्रांतों में हिंदी के प्रचार को बल दिया।  ज्यों-ज्यों स्वतंत्रता निकट आती गई, वह प्रचार-बल बढ़ता गया।  हिंदी के प्रचार के लिए विभिन्न संस्थाएँ सामने आईं।  उन्होंने हिंदीतर-भाषी क्षेत्रों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य हाथ में ले लिया।  उधर हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के जो लोग शिक्षा आदि के लिए हिंदी भाषी क्षेत्रों में जाते थे वे अपने साथ राष्ट्रीय जागरण व हिंदी-प्रेम लेकर अपने-अपने क्षेत्रों में लौटे तथा हिंदी प्रचार कार्य के समर्पित कार्यकर्ता बने।  मणिपुर भी इस लहर से अछूता नहीं रहा।  परिणामस्वरूप इस राज्य में हिंदी-प्रचार आंदोलन का बीज अंकुरित हुआ।

श्री ललितामाधव शर्मा, श्री बंकबिहारी शर्मा, श्री थोकचोम मधु सिंह, पं. राधामोहन शर्मा एवं श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम को मणिपुर क्षेत्र के हिंदी प्रचार का आदि-स्तम्भ माना जाना चाहिए।  इन महानुभावों ने स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, सामान्य संपर्क की संभावना, आखिल भारतीय स्तर पर समस्त भारतीय नागरिकों के एक समान सोच, विश्वमंच पर भारत की प्रतिष्ठा की आकांक्षा आदि से प्रेरणा ग्रहण करके मणिपुर के इम्फाल नगर को मुख्यालय बनाया और सारे राज्य में हिंदी-प्रचार का कार्य किया।  उस काल में इस क्षेत्र में हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार देश-द्रोह माना जाता था।  अंगरेज़ सरकार जानती थी कि यदि हिंदी भाषा को फलने-फूलने दिया तो भारत की जनता अपने प्राचीन गौरव के बोध से भर उठेगी, जो उसके भविष्य के लिए अभिशाप सिद्ध होगा।  अंगरेज़ यह भी जानते थे कि हिंदी और भारतीय संस्कृति का चोली-दामन का साथ है।  हिंदी, मात्र भाषा की शिक्षा का माध्यम नहीं है, वरन उसमें राष्ट्रीय और सामाजिक-संस्कार तथा चारित्रिक-शिक्षा के साथ-साथ स्वाधीनता का ज्ञान कराया जाता है।  इससे भाषा और देश-भक्ति, दोनों का बोध साथ-साथ प्राप्त होता है।  यह बात ईसाइयत और अंगरेज़ी के प्रचार में प्रत्यक्ष बाधा थी।  अतः अंगरेज़ सरकार ने भाषा और धर्म के प्रचार को देशद्रोह करार दिया।  प्रचार के लिए बाहर से आनेवालों को हतोत्साहित किया और जो स्थानीय लोग प्रचार-कार्य करना चाहते थे, उन्हें तरह-तरह से डरा-धमका कर इस देश-सेवा से रोकने का प्रयास किया।  श्री बंकबिहारी जी ने निकट संबन्धी श्री भगवतादेव शर्मा [जो उन्हीं की प्रेरणा से हिंदी प्रचार में लग गए थे] ने जब राष्ट्रभाषा प्रचार का कार्य शुरु किया तब मणिपुर के तत्कालीन पोलिटिकल एजेन्ट ने उन्हें बुलाकर कहा कि ‘हिंदुस्तान कोई राष्ट्र नहीं है, फिर तुम लोग क्यों राष्ट्रभाषा, राष्ट्रभाषा चिल्लाते हो।  यहाँ की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, न तुम किसी राष्ट्रभाषा का प्रचार कर सकते हो।’  इतना ही नहीं उसने इस कार्य के लिए ‘सैडिसस’ शब्द का प्रयोग किया।  इससे उस समय की कठिनाइयों का कुछ अंदाज़ लगाया जा सकता है।

किंतु, इन लोगों ने अंगरेज़ सरकार द्वारा पैदा की गई कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया।  पहले घर पर ही बच्चों को हिंदी पढ़ाना शुरू किया फिर घर-घर जाकर लोगों को हिंदी और स्वतंत्रता के मह्त्व को समझाना।  इस प्रकार बहुत धैर्य के साथ हिंदी के प्रति सामान्य लोगों का रुझान पैदा किया और हिंदी के पठन-पाठन के लिए विद्यालय खोला।  इस प्रकार मणिपुर में हिंदी प्रचार के आधुनिक इतिहास की आधारशिला रखी गई।

हिंदी प्रचार के इस प्रारम्भीक-काल में तीन नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-- श्री भागवतदेव शर्मा, श्री अरिबम पं. राधामोहन शर्मा और श्री द्विजमणिदेव शर्मा।  इनमें से पं. राधामोहन शर्मा को थोकचोम मधु सिंह के साथ मिल कर हिंदी प्रचार के प्रारम्भिक काल में अनेक संकटों का सामना करते हुए हिंदी-विद्यालय शुरू करने और हिंदी का अध्ययन करने का गौरव प्राप्त है।  श्री द्विजमणिदेव शर्मा ने मणिपुर के राजा के शिक्षा-सलाहकार के रूप में हिंदी कि सेवा की।  इन्हीं के प्रयास से कुछ वर्षों बाद पहली बार हिंदी के कार्य के लिए राजकीय सहायता मिली।

मणिपुर का सबसे पहला विद्यालय थोकचोम मधु सिंह के घर में प्रारम्भ किया गया।  श्री थो. मधुसिंह केवल इकतीस वर्ष जीवित रहे, किंतु इस अल्प-अवधि में ही उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों से मणिपुरी समाज को नई दिशा देने का भरपूर प्रयास किया।  उस समय हिंदी की दबी-छुपी प्रतियोगिता बंगला भाषा के साथ भी थी।  अंगरेज़ों के साथ काम करनेवाले बंगला भाषी अधिकारी चाहते थे कि यदि अंगरेज़ी हटानी है तो उसके स्थान पर बंगला का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।    थो. मधु सिंह ने इस समस्या से निबटने का एक तरीका निकाला।  उन्होंने वैचारिक आदान-प्रदान के लिए इम्फाल में ‘डिबेटिंग-क्लब’ की स्थापना की।  उस क्लब में कई बार ‘हिंदी की आवश्यकता’ विषय पर वाद-विवाद का आयोजन किया और हिंदी का पक्ष स्वयं प्रस्तुत किया।  अपने ज़ोरदार तर्कों के बल पर वे यह सिद्ध करने में सफल रहे कि मणिपुर की जनता के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना सबसे उपयोगी और आवश्यक है।  इस प्रकार वाद-विवाद से जो विचार बने, उन्हें मूर्त रूप देने के लिए थो. मधु सिंह ने अपने संबंधी श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम और पं. राधामोहन शर्मा के सहयोग से अपने ही घर पर ‘हिंदी विद्यालय’ की स्थापना की।  ये तीनों सज्जन इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ाते थे।  स्मरणीय है कि उस काल में श्री बंकबिहारी शर्मा भी अपने कांङपोकपी निवासी मित्र पं. जनार्दन शर्मा के सहयोग से घर पर ही मंदिर के सामने के बैठके में लोगों को हिंदी पढ़ाना शुरू कर चुके थे।

कुछ समय बाद श्री कुंजबिहारी सिंह कैशाम ने मोइराङखोम और तेरा कैथेल में हिंदी स्कूल प्रारम्भ किए।  उन्होंने आगे चल कर ‘राष्ट्रलिपि स्कूल’ की स्थापना भी की, जो अब मणिपुर सरकार के नियंत्रण में चल रहा है।


क्र्मशः -अगली किश्त अंतिम 

बुधवार, 29 जून 2011

मणिपुर हिंदी परिषद-१


{मणिपुर में हिंदी के इतिहास पर प्रकाश डालता यह लेख प्रो. देवराज ने ७ जून १९९८ में लिखा जब ‘मणिपुर हिंदी परिषद’ के स्थापना दिवस के अवसर पर ‘संकल्प और साधना’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ था।  यह लेख हिंदी और वैष्णव धर्म के बारे में विस्तार से ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता  है।  इस लेख के माध्यम से हम मणिपुर मे हो रही हिंदी की गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त कर सकते है।  इस पुस्तक में उन कर्मठ हिंदी सेवियों के बारे में भी जानकारी मिलेगी जो भाषा और संस्कृति की सेवा में जुटे हुए हैं।  देवराज जी मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल में डीन के पद पर रह चुके हैं।  यहाँ उनके इस लेख का प्रथम भाग प्रस्तुत है।]



संकल्प और साधना - मणिपुर हिंदी परिषद
देवराज

१८वीं शताब्दी में वैष्णव-पदावली ["ब्रजबुलि-पदों" के नाम से] मणिपुर के मंदिरों में गाई जाने लगी थीं।  इसे चैतन्य महाप्रभु के शिष्य वैष्णव धर्म के संदेश के साथ लेकर मनिपुर पहुँचे थे।  इन भक्तों की चार विशेषताएँ थीं।  
एक- राधा-कृष्ण की सरस व मोहक लीलाओं को संगीतमय बनाकर आकषक रूप में प्रस्तुत करना; 
दो- बिना किसी विरोध को जन्म दिए स्थानीय जनता के मन में भक्ति व प्रेम की स्थापना करना; 
तीन- मणिपुर के लौकिक वातावरण को स्वीकार करके भक्ति को पढ़े बे-पढ़े सबके लिए सुलभ बनाना  और 
चार- समूह गान की परम्परा।  धीरे-धीरे वैष्णव-मत का प्रचार-प्रसार बढ़ने लगा।  गाँव-गाँव, घर-घर मंदिर बनाए जाने लगे और कीर्तन की ध्वनि गूँजने लगी।  मणिपुर के राजा वैष्णव मत में दीक्षित हो गए।  इससे राधा-कृष्ण और उनके माध्यम से भारत की वैष्णवी-सांस्कृतिक धारा इस राज्य में बहने लगी।

इस धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण का विशेष पहलू है- तीर्थ यात्राओं की परम्परा।  राधा और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले लोग मथुरा-वृंदावन के उन क्षेत्रों के दर्शन करना अपना परम सौभाग्य मानते थे, जहाँ राधा-कृष्ण ने अपनी लीलाएँ सम्पन्न की थीं।  जो साधना-सम्पन्न थे, वे कभी-कभी प्रतिवर्ष इस यात्रा में भाग लेते थे।  इसके अतिरिक्त यथा-समय हरिद्वार, काशी, प्रयाग, गया, नवद्वीप आदि की यात्राओं का क्रम चलता रहता था।  मणिपुर के राजाओं व सम्पन्न जनसाधारण द्वारा इनमें से कुछ तीर्थ स्थानों पर बनवाए गए मंदिरों व रासमंडलों को आज भी देखा जा सकता है।  तीर्थ-यात्राओं का वह आयोजन मणिपुर निवासियों को भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति और ब्रज भाषा तथा हिंदी की बोलियों के निकट सम्पर्क में लाता था।  ये लोग जब अपने घरों को लौटते थे तब उन्हें हिंदी के इन रूपों का परिचय प्राप्त हो चुका होता था।  साथ ही वे यह भी समझ चुके होते थे कि मणिपुर के बाहर मणिपुरी में काम चलाना कठिन है तथा इसके लिए व्यापक सम्पर्क की भाषा जानना आवश्यक है।  यात्रा की सुविधा और सम्पर्क की सरलता के लिए ये धर्म-प्रधान मणिपुरी अनजाने ही हिंदी को अपनी निज की भाषा स्वीकार कर लेते थे।  इस प्रकार पहले-पहल हिंदी ने मणिपुर में अपना स्थान बनाया।

भारतवर्ष पर मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही प्रब्रजन एकाएक बढ़ना शुरू हुआ।  मुसलमानों के लूट-पाट, राज्य स्थापना और शक्ति के बल पर इस्लाम के प्रचार को उद्देश्य बना कर भारत पर आक्रमण किए।  ११वीं शताब्दी के काल में ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन का क्रम चल पड़ा था।  इसके परिणाम सामने आए।  कुछ लोग कत्ल कर दिए गए, कुछ ने प्राणों की रक्षा हेतु धर्म बदलना स्वीकार कर लिया और कुछ ने इधर-उधर भाग कर अपने धर्म की सुरक्षा का प्रयास किया।  मणिपुर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी ऐसे ब्राह्मण परिवारों के वंशज हैं, जिनके पूर्वज अपना धर्म बचाने के लिए इधर चले आए थे।  इनमें से काफी ब्राह्मण मिथिला के हैं।  गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से भी इस क्रम में अनेक ब्राह्मण आ गए थे।  अन्याय से बचने के लिए ये ब्राह्मण अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भाँति मणिपुर में यत्र-तत्र जहाँ भी अनुकूल परिवेश मिलता था, बस जाते थे।  जैसे-जैसे समय बीतता जाता था, ये लोग अपने को स्थानीय परिस्थितियों में ढाल लेते थे।  यहाँ की भाषा सीख लेते थे।  आज तो मणिपुर के सभी ब्राह्मण शर्मा लिखते हैं किंतु यदि इनके गोत्र पूछे जाएँ तो इनके मूल निवास स्थान का पता लगाना कठिन नहीं है।  प्राचीन काल में हिंदी के पक्ष में वातावरण बनाने में इन प्रब्रजित लोगों ने महत्वपूर्ण कार्य किया।  इसका कारण यह है कि संस्कृत और हिंदी जानने वाले इन ब्राह्मणों ने अपने को मणिपुरी समाज  के अनुकूल बनाकर अपना परम्परागत जीवन कर्म, पौरोहित्य प्रारम्भ कर दिया।  ये धार्मिक कृत्य में बीच-बीच में हिंदी का प्रयोग करते थे।  मंदिर में भोग चढ़ाने, धार्मिक-भोज और कीर्तन के अवसर पर पुरोहित प्रायः संस्कृत के शब्द भी बोलते थे।  वैष्णव धर्म के श्रद्धालु-जन उचित रूप में इन्हें समझ लेते थे।  इस प्रकार मणिपुर के जीवन में हिंदी का महत्व बढ़ता गया।

प्राचीन काल से ही अपने बल पर और राजाओं से छात्रवृत्ति प्राप्त करके मणिपुर के बाह्मण बालक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने नवद्वीप व काशी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थानों में जाया करते थे।  इनमें से काशी के, हिंदी के वातावरण से घिरे होने के कारण संस्कृत के साथ हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर लेना इनके लिए बड़ा सहज था।  इनमें से अनेक पौरोहित्य कर्म के साथ सक्रिय रूप से हिंदी के प्रचार में जुट जाते थे।  कुछ आकर हिंदी का व्यवस्थित शिक्षण भी प्रारम्भ कर देते थे।  इनके पूजा-पाट में भी संस्कृत और मणिपुरी के साथ हिंदी का पर्याप्त अंश होना स्वाभाविक था।  मणिपुर में ब्राह्मणों के घर में मंदिर और उसके सामने बड़ा सा चौकोर बैठका बनवाने की प्राचीन परम्परा आज भी मिलती है।  भगवान के दर्शन के बाद भक्त लोग इसमें इकट्ठे होते थे और एक निश्चित समय पर पुजारी इन्हें उपदेश करते थे।  इस उपदेश की मुख्य भाषा मणिपुरी होती थी और बीच-बीच में प्रसंग पड़ने पर हिंदी का प्रयोग होता था।  कीर्तन का माध्यम "ब्रजबुलि" की भाषा था ही, इससे हिंदी मणिपुर में बढ़ी।  इस प्रकार प्राचीन काल में हिंदी, धर्म तथा संस्कृत भाषा के साथ इस क्षेत्र में आई।


शुक्रवार, 27 मई 2011

स्रवंति-मई २०११ Srawanti-May2011



स्रवंति का मई २०११ अंक अंतरजाल के माध्यम से देखा। आवरण पृष्ठ से ही इस पत्र के स्तर का अनुमान लगा लिया।  आवरण पृष्ठ पर लिपि भारद्वाज द्वारा दिया गया फूल का सुंदर चित्र एकदम ‘बतकम्मा’ त्योहार की याद दिला गया। इस बार सम्पादकीय में डॉ. नीरजा का लेखन तेलुगु के मूर्धन्य साहित्यकार वीरेशलिंगम को समर्पित है।  इस प्रकार के सम्पादकीय से हिंदी पाठकों को तेलुगु रचनाकारों की जानकारी मिलती है।  वीरेशलिंगम जी के इस कथन में तथ्य है कि ‘केवल किताबें लिखकर प्रकाशित करने से कोई लाभ नहीं होता। जिस सत्य को हम मानते हैं उसे धैर्य और साहस के साथ आचरण में रखना अनिवार्य है।’

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का प्रथम दीक्षांत समारोह भाषण दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के लिए गर्व की बात है, साथ ही यह  भाषण साहित्य जगत की धरोहर भी कहलाएगा। उन्होंने सच ही कहा था कि भारत को छोटे पैमाने पर सारे संसार का नमूना माना जा सकता है क्योंकि यहाँ विभिन्न जातियों, भाषाओं और धर्मों के लोगों का सहअस्तित्व शांतिपूर्ण ढंग से होता रहा है। 

इस वर्ष हिंदी साहित्य के चार सुप्रसिद्ध रचनाकारों की शताब्दी मनाई जा रही है।  इस अंक के माध्यम से अज्ञेय जी की शताब्दी पर सभा में हुई संगोष्ठी की विस्तृत जानकारी डॉ. नीरजा की रिपोर्ट के माध्यम से मिली।  इस कार्यक्रम की सफलता की कहानी यहाँ दिये गए चित्र गा रहे हैं।  इस वर्ष बाबा नागार्जुन की जन्मशताब्दी भी है।  इस अवसर पर प्रो. दिलीप सिंह का लेख नागार्जुन को एक जनकवि ही नहीं एक अच्छे गद्यकार के रूप में भी स्थापित करता है।  जैसा कि उन्होंने कहा कि नागार्जुन की भाषा कोई कठिन साहित्य भाषा न होकर साधारण ‘बतकही’ के ‘कहन’ का पाठ है जिसकी मिसाल ‘बलचनमा’ जैसा उपन्यास है।  प्रो. दिलीप सिंह ने ठीक ही कहा है कि इस तरह का गद्य रचने से नहीं बनता बल्कि बनता है जीवन को काँछ-काँछ कर साफ की गई जमीन को फिर-फिर देखने से।

इस वर्ष शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशती भी है। इस संदर्भ में 'धरोहर' के अंतर्गत संकलित आचार्य  रामस्वरूप चतुर्वेदी के लेख ‘शमशेर: गद्य की लय’ में वे यह मानते हैं कि आलोचना के क्षेत्र में प्रायः कविता कम और कवि अधिक विवेचित हुए हैं।  इसीलिए शायद कवि उसकी रचना से अधिक प्रसिद्ध हो जाता है; परंतु शमशेर जैसे बहुत कम रचनाकार हैं जो यह कहते हैं- बात बोलेगी, हम नहीं।

जमींदारों, सामंतों, पटेलों और पूंजीपतियों द्वारा  अपनी भूमि पर कृषि करने के लिए बंधुआ मज़दूरों को एक वर्ष के लिए खरीदा जाता है परंतु कर्ज़ और ब्याज़ से दबे ये मज़दूर जीवन भर दयनीय स्थिति में जीते हैं। इसका जीताजागता उदाहरण पूरन सहगल के लेख में मिलता है जो इस अंक में संकलित है।

आशा है कि प्रो. वेंकटेश्वर जी के उस सुझाव को कार्यान्वित किया जाएगा जिसमें उन्होंने ‘अज्ञेय’ पर विशेषांक निकालने की बात कही है।

‘स्रवंति’के सफल प्रकाशन के लिए संकल्पबद्ध  सह-सम्पादक डॉ.जी. नीरजा को एक और संग्रहणीय अंक निकालने के लिए बधाई। समस्त सम्पादक मंडल का यह प्रयास स्तुत्य है।  इसे अंतरजाल पर ‘srawanti.blogspot.com'  पर भी देखा जा सकता है।  

सोमवार, 23 मई 2011

‘मैं राही मासूम’


`सूत्रधार’ का निमंत्रण

‘मैं राही मासूम’


हैदराबाद की प्रसिद्ध नाट्य शिक्षण संस्था ‘सूत्रधार’ का एक पात्री नाटक ‘मैं राही मासूम’ की ख्याति चारों ओर फैल रही है।  इस नाटक को कई शहरों में सराहा गया है जिनमें मुख्यतः बेंगलुरू, मुम्बई, दिल्ली जैसे बड़े शहरों के प्रसिद्ध फिल्मी हस्तियों ने भी देखा है।  आज [२२ मई २०११को] हैदराबाद के प्रसिद्ध होटल ‘ताज बन्जारा’ में इस नाटक का  २५वां मंचन किया गया है।  इस नाटक को देखने का मन विशेष रूप से उस समय बना जब दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में इसे मंचित किया गया था। अवसर था शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशताब्दी और इसमें आये अतिथि डॉ. नामवर सिंह इस नाटक को देख कर रो पड़े थे और कहा था कि ‘मैं यहाँ शमशेर की शमशेरियत देखने आया था और मुझे आपने मेरे बडे भाई मासूम से मिला दिया।’ वे इतने गद्‌गद थे कि उनका गला रुंध गया था।  आज जब सूत्रधार के कर्ताधर्ता और मुख्य सूत्रधार विनय वर्मा ने न्यौता दिया तो मैंने तुरंत हामी भर दी।

‘ताज बन्जारा’ बड़ा नाम है पर हम जैसे छोटों के लिए यह जगह ढूँढ निकालना टेड़ी खीर साबित हुई।  दस लोगों से पूछ-पूछ कर वहाँ पहुँचे। देखा कि होटल के खुले लॉन में स्टेज सजा है और अभी लोग आ रहे हैं। मच्छरों का शायद कुछ अधिक ही बोलबाला था तो धुआँ देकर मच्छरों को भगाया गया।  साथ में दर्शक भी भाग खडे हुए क्योंकि धुआं तो धुआंधार आ रहा था।  कुछ देर बाद हम फिर पहुँचे तो मंच सजा हुआ था।  

सब से पहले सूचना दी गई कि प्रसिद्ध कलाकार बादल सरकार के निधन पर एक मिनट का मौन रखा जाएगा।  उसके बाद स्पॉंसर ‘सिस्ने फ़ॉर आर्ट्स’ ने अपनी संस्था का परिचय दिया जिन्होंने देश के बड़े कलाकारों को हैदराबाद से जोड़ा है जैसे पं.रविशंकर और अनुश्का, गायिका श्रेया घोषाल, कवि गुलज़ार और सूफ़ी गायिका बेगम आबिदा परवीन आदि।

विनय वर्मा मासूम रज़ा के रूप में


‘मैं मासूम रज़ा’ का एकालाप शुरू होता है...न जाने मौत किस लम्हा आएगी...।  मासूम दर्शकों की ओर घूम कर अपना जीवनवृत्त बताते है कि किस प्रकार उन्हें आठ वर्ष की आयु में बोन टी.बी. हो गया था और किस प्रकार वे आज़मगढ़ को नहीं बल्कि गाज़ीपुर के गंगोली को अपना गाँव और घर मानते है।  वे चाहते थे कि उनके देहांत के बाद उनके शरीर को गंगोली की गंगा में बहा दिया जाय।  वे अपने को तीन माँओं का बेटा मानते थे।  एक तो उन्हें जन्म देने वाली माँ, दूसरे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और तीसरे गंगा।  पहली माँ को आयु खा गई, दूसरी माँ ने उन्हें इसलिए  उखाड़ फेंका कि उनकी विचारधारा साम्यवादी थी।  इस पर उन्होंन यह प्रश्न किया-

मैं तो पत्थर था, उठाकर मुझे फेंक दिया
आज उस शहर में शीशे के मकाँ कैसे हैं?

उनका बेबाक कथन था कि वे पहले हिंदुस्तानी है और बाद में मुसलमान और वे गंगा को अपनी माँ व गंगोली को अपना घर मानते हैं।  इस पर मुसलमान उनसे नाराज़ थे; और जब वे मंदिर-मस्जिद के झगड़े को समाप्त करने के लिए वहाँ मासूम बच्चों के लिए फूलों का बगीचा बनाने की बात करते हैं तो हिंदू नाराज़ हो जाते हैं।  तभी तो उन्होंने कहा था-

ज़ाहिद तेरी नज़र ने काफ़िर जाना
और काफ़िर समझता है मुसलमान हूँ मैं॥

प्रसिद्ध टी.वी. सीरियल ‘महाभारत’ के संवाद लिखने पर भी लोगों ने बवाल मचाया था। तब उनके मन में जो विचार उमड़े, वे कुछ इस तरह थे-

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहू से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।

प्रसिद्ध निदेशक- डॉ. भास्कर शिवालकर

मासूम के इस एक-पात्री नाटक के लेखन में अभिनव कदम पत्रिका के अलावा उनके उपन्यास आधा गाँव, टोपी शुक्ल, ओस की बूँद आदि से सहयोग लिया गया है। इसे प्रसिद्ध निदेशक व ‘रंगधारा’ नाट्य संस्था के डॉ. भास्कर शिवालकर के निर्देशन में ‘सूत्रधार’ के विनय वर्मा ने मासूम के पात्र में ऐसी जान डाल दी कि दर्शक भी इस पात्र से समन्वय स्थापित कर पाते हैं।  हैदराबाद के नाट्य इतिहास में यह पहला एक पात्री नाटक है जो देश के कई शहरों में ख्याति पा चुका है और इसके पच्चीस सफल मंचन हो चुके हैं।  मैं विशेष रूप से विनय वर्मा और डॉ. भास्कर शिवालकर को बधाई देता हूँ कि उन्होंने हैदराबाद को रंगमंच के नक्शे में विशेष स्थान दिलाया है।  कौन कहता है कि हैदराबाद के लोगों में नाटक का ज़ौक नहीं है???

शुक्रवार, 6 मई 2011

अज्ञेय जन्मशती समारोह-रिपोर्ट

अभी कुछ दिन पहले मैंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद में हुए अज्ञेय जी के जन्मशती समा‘रोह में न जा पाने की बात कही थी।  बहुत से शुभचिंतकों ने मेरे स्वास्थलाभ की कामना के साथ यह भी कहा था कि इस समरोह की जानकारी दें।  इस सफल समारोह की रिपोर्ट  के साथ ध्यान देनेवाली बात यह है कि मुम्बई से आए  प्रो. त्रिभुवन राय ने अज्ञेय की जटिल रचनाओं को कितनी सरलता और सरसता से बताया।  इस लेख के अंत में वो लिंक है जिनमें प्रो. त्रिभुवन राय के कथन तथा समारोह के चित्र भी देखे.सुने जा सकते हैं।   अज्ञेयजी को जानने और समझने के लिए यह रिपोर्ट बहुत उपयोगी होगी, ऐसी आशा के साथ यहां यह प्रस्तुत की जा रही है।



हैदराबाद, १ मई,२०११ [प्रेस विज्ञप्ति].

यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के 'साहित्य संस्कृति मंच' और स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को  अज्ञेय जन्म शती समारोह के अंतर्गत एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया गया.

समारोह के उद्घाटन सत्र में मुम्बई से मुख्य अतिथि के रूप मे आए प्रो त्रिभुवन राय ने उद्घाटन भाषण में 'अज्ञेय की रस-चेतना' की व्याख्या करते हुए कहा कि अज्ञेय की साहित्य यात्रा सत्य की यात्रा है और वे मूलत: आनंद की राह के अन्वेषी हैं. अज्ञेय की कई छोटी-बड़ी कविताओं की रस-शास्त्रीय विवेचना करते हुए प्रो.राय ने बताया कि अहम् को इदं में विलीन करने की जिस प्रक्रिया की बात अज्ञेय बार बार करते हैं वह व्यक्ति चेतना को समष्टि चेतना में विलीन करने की साधारणीकरण की प्रक्रिया का ही आधुनिक सन्दर्भ में विस्तार है.

हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने बीज भाषण में याद दिलाया कि अज्ञेय ने अपने लेखन में जिन भी सिद्धांतों की स्थापना की, उन्हें अपनी रचनाओं द्वारा चरितार्थ करके भी दिखाया. डॉ. चतुर्वेदी ने प्रतिपादित किया कि अज्ञेय व्यंजना प्रधान साहित्य के समर्थक और सर्जक थे तथा मौन को शब्द से अधिक महत्त्व देते थे. उन्होंने अज्ञेय के काल-चिंतन और क्षणवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि अज्ञेय काल को एक साथ प्रवाहित और ठहरा हुआ दोनों मानते हैं. प्रो. चतुवेदी ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि अज्ञेय के अनुसार राष्ट्र के मन का गौरव व्यक्ति के मन से बड़ा है तथा वे रूढ़ि  की प्रवाहमानता से जुड़ना ज़रूरी मानते हैं.

विशेष अतिथि डॉ. विष्णु भगवान शर्मा ने अज्ञेय के भाषा संबंधी विचारों की राजभाषा नीति के सन्दर्भ में चर्चा करते हुए उनके साहित्य के प्रयोजनमूलक हिंदी के निर्माण में योगदान की दृष्टि से भी पुनर्विचार की ज़रुरत बताई.

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए संस्थान के कुल सचिव प्रो. दिलीप सिंह ने कवि और कविता पर केन्द्रित अज्ञेय की कविताओं का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वे शब्द से लेकर मौन तक के सजग प्रयोग से सम्प्रेषण की सिद्धि प्राप्त करने वाले अपनी तरह के इकलौते कवि हैं. उन्होंने बताया कि अज्ञेय इसके अप्रतिम उदाहरण हैं कि चिंतन और चिन्तक का रचना में रूपांतरण कैसे होता है. प्रो. सिंह ने यह भी ध्यान दिलाया कि अज्ञेय के चिंतन की नींव भारतीय संस्कृति है और उन्होंने पश्चिमी संस्कृति या साहित्य को उसी के सन्दर्भ में आत्मसात किया है.

इस अवसर पर 'लोकार्पण अनुष्ठान' के अंतर्गत प्रो. दिलीप सिंह की वाणी प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित पुस्तक ''अनुवाद की व्यापक संकल्पना'' का डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने विमोचन किया. इसके अतिरिक्त डॉ. एम. रंगय्या  के कविता संग्रह ''स्मृति के फूल'' को प्रो. दिलीप सिंह तथा डॉ. रुक्माजी राव अमर के कविता संग्रह ''दुःख में रहता हूँ मैं सुख की तरह'' को डॉ. त्रिभुवन राय ने लोकार्पित किया.  डॉ. जी नीरजा द्वारा संपादित 'स्रवंति' के ''शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक'' का लोकार्पण प्रो. सच्चिदानंद चतुर्वेदी के हाथों  संपन्न हुआ.

इसके पश्चात् दो विचार सत्रों में अज्ञेय के साहित्य के विविध पहलुओं को उजागर करते हुए  ग्यारह शोध पत्र प्रस्तुत किए गए जिनमे मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि अज्ञेय के साहित्य का मूल्यांकन उनकी अपनी रस चेतना, शब्द चेतना और काल चेतना के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए तथा उन्हें वादों और विचारधाराओं के चश्मों से देखना साहित्यिक अन्याय होगा जो बिलकुल भी वांछनीय नहीं है. इन शोधपत्रों में एक ओर तो अज्ञेय को वाल्मीकि और कालिदास की कवि-परंपरा से जोड़ा गया तथा दूसरी ओर भर्तृहरि की शास्त्र-परंपरा से. 

पहले विचार सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ''क्रांतद्रष्टा साहित्यकार अज्ञेय'', डॉ. मृत्युंजय सिंह ने ''समकालीनों के संस्मरणों में अज्ञेय'', डॉ.जी. नीरजा के ''अज्ञेय के भाषा चिंतन  के आलोक में उनकी काव्यभाषा'', डॉ.साहिरा  बानू बी. बोरगल ने ''साहित्य शास्त्री अज्ञेय : भूमिकाओं के विशेष सन्दर्भ में''  तथा प्रो. आलोक पाण्डेय ने ''हिंदी पत्र करीता की अज्ञेय को देन'' पर केन्द्रित शोधपत्र पढ़े .अध्यक्षासन  से बोलते हुए उस्मानिया विश्वविद्यालय के  पूर्व आचार्य डॉ. मोहन सिंह ने  क्रांतिकारी के रूप में अज्ञेय के सक्रिय जीवन और उनके कथा साहित्य के सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अपने अनुभवों के विशदीकरण द्वारा देशकाल की सीमाओं का अतिक्रमण करने वाले रचनाकार हैं.

दूसरे विचार सत्र में संस्कृति-चेतना के दृष्टिकोण से प्रो.एम्. वेंकटेश्वर ने ''शेखर : एक जीवनी का पुनर्पाठ'' , डॉ. बलविंदर कौर ने ''अज्ञेय के उपन्यासों में अस्मिता, जिजीविषा और मृत्युबोध'', डॉ. गोपाल शर्मा ने ''भाषा चिन्तक अज्ञेय : डायरी का सन्दर्भ'', डॉ. गोरखनाथ तिवारी ने ''अज्ञेय की कहानियाँ : संवेदना और शिल्प'', डॉ. पी. श्रीनिवास राव ने ''ललित गद्यकार अज्ञेय'' तथा डॉ.घनश्याम ने ''यात्रा साहित्य और अज्ञेय'' विषयक शोधपत्र प्रस्तुत किए. चन्दन कुमारी ने अज्ञेय के साहित्य को समझने की समस्या, एम् राजकमला ने हैदराबाद के हिंदी विभागों में संपन्न अज्ञेय संबंधी शोध कार्य तथा मौ. कुतुबुद्दीन ने विविध पाठ्यक्रमों में अज्ञेय के स्थान पर सर्वेक्षणमूलक आलेख प्रस्तुत किए.

इस सत्र की अध्यक्षता  'स्वतंत्र वार्त्ता'' के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने की . अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय पूर्ण समर्पण की संस्कृति में विश्वास रखने वाले रचनाकार थे तथा उनका काव्य व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसे चाहे जितना समेटो कुछ न कुछ छूट  ही जाता है.उन्होंने कहा की  कहा कि इतने विरत साहित्यकार को आलोचक बनकर कोइ भी अपनी बाहों में नहीं भर सकता, परन्तु यदि सहृदय के रूप में आप उनके 'पाठ' में प्रवेश करें तो वे अत्यंत सहज कवि प्रतीत होंगे.डॉ. शुक्ल ने कहा कि तुलसी के बाद  अकेले अज्ञेय ही इतनी विराट चेतना के कवि सिद्ध होते है. 
  
समापन सत्र में समाकलन  भाषण में अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने संगोष्ठी की सफलता के लिए बधाई देते हुए यह कहा कि अज्ञेय के साहित्य का पुनर्मूल्यांकन यदि भारतीय कसौटी पर किया जाए तो बहुत सटीक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं. प्रो. डिमरी से बताया कि भाषा, साहित्य, शब्द और सम्प्रेषण संबंधी अज्ञेय के चिंतन का अनुशीलन करने पर वे आनंद वर्धन, भर्तृहरि, कुंतक और मम्मट आदि आचार्यों की परंपरा का विकास करने वाले हिंदी आचार्य सिद्ध होते हैं.प्रो. डिमरी ने उदाहरण देकर यह भी दर्शाया कि अज्ञेय शब्दों के माध्यम से सामाजिक सन्दर्भों को भी प्रतीयमान अर्थ के रूप में संभव बनाने वाले अप्रतिम साहित्यकार हैं.

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के ही हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो.एम. वेंकटेश्वर ने इस संगोष्ठी को सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की जन्मशती के अवसर पर उनके पुनर्मूल्यांकन की सार्थक पहल मानते हुए कहा कि रचनाकार की मूलभूत मान्यताओं के प्रकाश में रचनाओं का यह मूल्यांकन कृति और कृतिकार दोनों को ही बेहतर रूप में समझने में अत्यंत सहायक होगा. 

समारोह  के आरंभ में कोसनम नागेश्वर राव ने सरस्वती वन्दना की तथा अतिथियों ने मंगल-दीप प्रज्वलित किया. इस अवसर पर अज्ञेय के जीवन, रचनायात्रा , मान्यताओं और रचनाओं पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया.प्रदर्शनी में छात्रों और शोधार्थियों द्वारा तैयार किए गए पोस्टरों के अलावा अज्ञेय की पुस्तकों और उन पर संपन्न शोध प्रबंधों को भी प्रदर्शित किया गया. यह प्रदर्शनी सात मई तक प्रतिदिन  प्रात दस से सायं पांच बजे तक खुली रहेगी. उद्घाटन  के अवसर पर दो सौ दर्शकों ने इस पोस्टर प्रदर्शनी का अवलोकन किया. 

समारोह के विभिन्न सत्रों का संयोजन डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. बी. बालाजी, मंजु शर्मा तथा डॉ.गोरखनाथ  तिवारी  ने किया. अतिथियों का स्वागत आंध्र सभा के सचिव डॉ. पी. ए. राधाकृष्णन,संपर्क अधिकारी एस के हलेमनी, डॉ. सीता नायुडू और ज्योत्स्ना  कुमारी ने किया. प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने धन्यवाद प्रकट किया.


इस समारोह की चर्चा अन्यत्र  निम्नलिखित पोस्टों में पढी जा सकती है-

गुरुवार, 5 मई 2011

बस यूँ ही:)


एक अदद नौकरानी चाहिए

आज सुबह सवेरे संतोक सिंह घर पर टपका।  मैने पूछा-‘क्या बात है सरदार, आज इतनी सुबह कैसे?’
‘अरे यार, क्या बताऊँ! हमारी नौकरानी चार दिन से गायब है।  लियो के चाय के डब्बे पर गया था। लियो भी नहीं मिला। उसकी जोरू दुकान पर बैठी थी। उससे कहा कि नौकरानी चाहिए, एक दो दिन के लिए ही सही तो उसने बताया कि सारे लोग गाँव गए हैं, सालाना जातरा लगता है ना।  अब तू ही बता मैं क्या करूं। तू तो जानता है, मेरी जोरू झुक नहीं सकती कमर दर्द के कारण।  दो दिन से मैं ही पोछा कर रहा हूँ।’

मेरा मन अतीत की ओर दौड़ गया। संतोक जब घर बना रहा था तो उसने बताया कि वह ग्रेनाइट की फ़्लोरिंग कराना चाहता है।  तब मैं ने कहा था कि सिमिट की फ़्लोरिंग करा ले ताकि मेंटेनेंस फ़्री रहे। ग्रेनैट की फ़्लोरिंग को सदा पोछा मारना पड़ता है। पोछा नहीं किया तो धब्बे दिखाई देंगे और देखने वाला कहेगा ‘ये नियोरिच के चोचले तो कर लिए पर मेन्टेन करना नहीं आता।’  दूसरी बात यह कि ग्रेनैट इतनी चिकनी होती है कि पैर फिसलने का डर रहता है।  मैंने उसे मिसेस अरोरा का उदाहरण भी दिया था। अरोरा ने ग्रेनैट की नई नई फ़्लोरिंग कराई। एक दिन उसकी पत्नी दफ़्तर जाने की जल्दी में चल पड़ी। ग्रेनैट पर पानी पड़ा था। जल्दी में देख नहीं पाई। चिकने ग्रेनैट पर चिकने पैर पड़े। नतीजा...धडाम और कुल्हे की हड्डी टूट गई।  दफ़्तर के बदले अस्पताल जाना पड़ा।

बात संतोक की समझ में आ गई थी पर पोश गेटअप का भूत सिर पर सवार था।  उसने ग्रेनैट की बजाय मार्बल फ़्लोरिंग करा ली। और अब.... पोछा मारने के लिए मज़दूरनी के पीछे घूम रहा है।

मैंने उसे उस दिन की बात याद दिलाते हुए कहा-‘यार, तू उस समय मेरी बात मान लेता और सिमेंट की फ़्लोरिंग करा लेता तो आज यह झंझट नहीं न होती।  नौकर नहीं भी है तो बस, झाडू फेर दो और कचरा साफ। पाश लुक के लिए एक अदद ग़लीचा डाल दो ड्राइंग रूम में।’

संतोक पहले से ही डिप्रेस्ड था। बोला-‘बीती बात छोड़ यार, अब तो एक अदद नौकरानी का सवाल है, नहीं तो मेरी जोरू घर में नहीं आने देगी।’  टीवी के एड की तरह मैंने भी डायलॉग मारा- ‘यार, तू जोरू से डरता बहुत है।’  फिर मैंने सुझाव दिया कि जाकर लियो से ही मिल। वही कुछ जुगाड़ लगा सकता है। उसके कहे मे दो-चार नौकर मजूर तो रहते ही हैं;  आखिर वह चाय के डब्बे का मालिक है।

‘हाँ यार, वहीं जाना पड़ेगा, शायद अब तक लियो आ गया हो, कुछ न कुछ तो मज़दूरनी का इंतेज़ाम करना ही पड़ेगा, नहीं तो म...’ वह आगे कुछ कहने की बजाय अपनी मोटरसाइकिल के किक स्टार्टर को किक किया और चल दिया।  


गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

गर्मी-Summer


गर्मी का मौसम

कल ही की बात है जब टेलिफोन पर बात हो रही थी तो डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने पूछा-"क्या बात है, तबियत तो ठीक है ना?  आवाज़ कुछ बदली सी लग रही है"।  मैंने दीनदयाल शर्मा की वो पंक्तियाँ दोहरा दी- 

तपता सूरज लू चलती है
हम सब की काया जलती है॥

प्रो. शर्मा ने सहानुभूति जताते हुए कहा कि "हाँ, मौसम का असर तो है..."  और फिर गर्मी  के कई प्रकार पर बात कहने लगे- मौसम की गर्मी से लेकर मिज़ाज़ की गर्मी, पर्यावरण और पौधों पर उनका प्रभाव वगैरह वगैरह।... और इस प्रकार यह ब्लाग पोस्ट बन गई।

गर्मी के मौसम में आदमी तो आदमी पेड़ भी कहीं अपने पत्ते तज देता है तो कहीं प्रकृति में सौंदर्य बिखेर देता है जैसे गुलमोहर और अमलतास। कहीं ‘फ़्लेम ऑफ़ द जंगल’ है तो कहीं सरसों की तरह पेड़ पर लगे पीले फूल फैले हुए हैं।  गर्मी का मौसम आया तो अम्बुआ के बौर फल बनने लगे, कोयल गाने लगी और बचपन के वो दिन याद आए जब कोयल की कूक के साथ हम बच्चे भी कूकते थे और कोयल और अधिक ज़ोर से कूकती थी।  यह  सौभाग्य की बात है कि कोयल अभी भी कूक रही है जबकि उसके सौंतेले भाई कौवे की काँव-काँव सुनाई नहीं दे रही है।  वो कौवा जब रोज़ मुंडेर पर बैठ कर काँव-काँव करता तो हम बच्चे कहते कि कोई मेहमान आनेवाला है।  अब न वो कौवा दिखाई देता है जो मेहमान का संदेशा लाता और न गौरैया जो आंगन में पड़े चावल के दाने चुगती।  हो सकता है कि भावी पीढ़ी जब कौवे की कहानी पड़ेगी- ‘एक कव्वा प्यासा था...’ तो उस पक्षी को मिथक ही मानगी जैसे हंस के मोती चुगने की बात है।  अब तो कौवा और गौरैया गायब हो गए हैं।

गायब होने की बात पर अशोक वाजपेयी जी की वो बात याद आ गई जो उन्होंने मुनींद्रजी की पुण्यतिथि के व्याख्यान में कही थी।  उन्होंने कहा था कि आज के समय में स्थानीयता गायब हो गई है।  सभी जगह एक सा माहौल दिखाई देता है।  सच है, कभी अतीत की ओर मुड़ कर देखते हैं तो याद आता है कि हमारे गाँव में कितने छोटे-छोटे चट्टान हुआ करते थे जिस पर चढ़ना-उतरना भी हम एक करतब मानते थे।  गाँव में ही नहीं, गाँव के बाहर भी निकल पड़े तो पत्थर का प्राकृतिक सौंदर्य इन चट्टानों में दिखाई देता था।  कहीं एक बड़ा चट्टान दूसरे छोटे चट्टान पर चढ़ा रहता जैसे कोई बच्चा बड़े आदमी का बोझ ढो रहा हो; या फिर, एक चट्टान दूसरे चट्टान पर यूँ बलखाए चढ़ा रहता कि देखने वाले को लगता कि कोई नर्तकी की मुद्रा है। ये चट्टाने हमारे पर्यावरण को भी संतुलित करती थीं।  गर्मी के दिनों में ये चट्टाने गर्म हो जातीं पर सांझ ढलते-ढलते ठंडी हो जाती।  परिणाम यह होता कि दिन की गर्मी साझ ढले ठंडी हवा में बदल जाती।  भला हो इस शहरीकरण का कि इन चट्टानों को काट-काट कर अट्टालिकाएं बनाई गई और अब न वो चट्टानें है और न वह ठंडी हवा।  अब तो बस, गर्म हवा इन अट्टालिकाओं की गलियों से गुज़रते हुए सब को गर्म कर रही हैं।

शहरीकरण की मार में भले ही अमीर अपने एयरकंडीशन्ड कमरे में बंद रहें परंतु दिन भर की गर्मी के बाद शाम की वह प्राकृतिक शीतल वायु का आनंद शायद ही उनके भाग्य में हो।

गर्म और गर्मी पर बहुत कुछ और लिखा जाना है पर ..... आगे फिर कभी... गर्मजोशी के साथ:)

रविवार, 24 अप्रैल 2011

केदारनाथ अग्रवाल





केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशताब्दी

केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशताब्दी के अवसर पर आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी में एक समारोह हुआ जिसमें प्रो. ऋषभदेव शर्मा मुख्य वक्ता थे और प्रो. गोपाल शर्मा [गेर यूनिस विश्वविद्यालय, बेनगाज़ी, लिबिया से पधारे ‘शरणार्थी’:)] मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे तथा दैनिक समाचार पत्र ‘स्वतंत्र वार्ता’ के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने केदारनाथ अग्रवाल को बहुआयामी रचनाकार बताते हुए कहा कि आज वे केवल उनकी रचनाओं में प्रेम पक्ष पर ही बोलेंगे।  यूँ तो केदारनाथ अग्रवाल को प्रगतिशील कवि कहा जाता है पर उन्हें प्रगतिवादी क्षेत्र में वह सम्मान नहीं मिला क्योंकि वे प्रेम पर कविताएँ कहते थे।  यह एक अजीब बात है कि भारत की प्रगतिशीलता में प्रेम का कोई स्थान नहीं है जब कि मार्क्स, लेनिन, एंगेल्स और चे गवारा ने भी प्रेम कवितायेँ लिखीं.  प्रो. शर्मा का मानना है कि शोषित और मजदूर भी प्रेम करता है और प्रेम कोई अछूत चीज़ नहीं है।

केदारनाथ अग्रवाल के जीवन पर प्रकाश डालते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने बताया कि केदारनाथ अग्रवाल व्यवसाय से वकील थे और बांदा में उनकी खेती व मकान है।  उन्होंने आगे बताया कि यह उनका सौभाग्य है कि दो वर्ष पूर्व उन्हें केदार सम्मान के कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला था।  यह भी उन्हें हर्षित करता है कि केदारनाथ अग्रवाल से जब उनकी भेंट १९९२ में चेन्नै में हुई थी तो इसका ज़िक्र केदार जी ने अपनी डायरी में भी दर्ज किया है। 

केदार जी की रचनाएँ छोटी हुआ करती थी पर उनमें सार छुपा होता है।  प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने उनकी छोटी कविताओं के कुछ उदाहरण भी दिये; जैसे,

मेरे गीतों को तब पढना
 बार बार पढ़कर फिर रटना   
सीखो जब तुम प्रेम समझना 
प्रेम पिए बस पागल रहना.

केदार की कविताओं में प्रेम में जो ‘तुम’ दिखाई देता है वह सम्बोधन उनकी पत्नी के लिए है।  प्रायः कवि की कविताओं में प्रेम का सम्बोधन प्रेयसी के लिए होता है परंतु केदारनाथ अग्रवाल का प्रेम केवल उनकी पत्नी के लिए ही सुरक्षित था।

तुमने गाए-
गीत गुँजाए
पुरुष हृदय के
कामदेव के काव्य-कंठ से
उमड़े-घुमड़े;
झूमे, बरसे
तुम शब्दों में स्वयं समाए,
चपला को उर-अंक लगाए,
चले
छंद की चाल, सोम-रस, पिए-पिलाए,
ज्वार तुम्हारे गीतों का ही
ज्वार जवानी का
बन जाता,
नर-नारी को
रख निमग्नकर,
एक देह कर
एक प्राण कर,
प्यार-प्यार से दिव्य बनाता।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने बताया कि केदारजी का यह प्रेम उनके हृदय में अपनी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक में समानता से प्रवाह करता रहा।  उन्होंने प्रेम पर इतनी सुंदर रचनाएँ लिखी हैं कि प्रो. ऋषभ देव शर्मा उन्हें महाकवि कालिदास की परम्परा का कवि मानते हैं।

केदार जी के बुढ़ापे के एकाकी जीवन के बारे में बताते हुए प्रो. शर्मा उनकी कुछ कविताओं को उद्धृत करते हैं-

मैं पौधों से,
फूलों से, 
करोटन से भी बात कर लेता हूँ.
पत्नी भी ऐसा ही करती है.

इस एकाकी जीवन की विडम्बना यह है कि ले-देकर आखिर ये ही तो सहृदय उदार कुटुम्बी रह गए है. अब पत्नी ही बच जाती है जो उनकी कविताओं की एकमात्र श्रोता हो जाती है।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘हे मेरी तुम’ की कई कविताओं को अपने भावपूर्ण स्वर में सुनाया तो सारे श्रोता गदगद हो गए।                     
                              
...लेकिन अपना प्रेम प्रबल है
हम जीतेंगे काल क्रूर को
उसकी चाकू हम तोड़ेंगे
और जियेंगे
सुख दुख दोनों
साथ पियेंगे
काल क्रूर से नहीं डरेंगे-
नहीं डरेंगे-
नहीं डरेंगे॥
******

हे मेरी तुम
वृद्ध हुए हम
क्रुद्ध हुए हम
डंकमार संसार न बदला
प्राणहीन पतझर न बदला
बदला शासन, देश न बदला
राजतंत्र का भेष न बदला
भाव-बोध-उन्मेश न बदला
हाड़-तोड़ भू-भार न बदला।

इस सारगर्भित व्याख्यान के बाद प्रो. गोपाल शर्मा ने केदार और शेक्स्पीयर के जीवन कि असमानता पर प्रकाश डाला कि कैसे केदार अपनी पत्नी का साथ जीवन भर निभाते रहे और उनसे रचना की प्रेरणा लेते रहे।

अध्यक्षीय भाषण में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि प्रेम तो प्रेम होता है चाहे वह किसी से भी हो... पत्नी से या प्रेयसी से।  शर्त यह है कि यह प्रेम वासना मात्र न हो।

एक कवितामयी शाम बिताने का यह लाभ हुआ कि हम भी घर आकर ‘हे मेरी तुम’ कहने लगे:)

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

राज्य बहुसंस्कृतिवाद की विफलता.....


हैदराबाद, २० फ़रवरी २०१० :

'हिंदी भारत' चर्चा समूह के चिंतनशील वरिष्ठ सदस्य अनूप भार्गव, अनिल जनविजय, सत्यनारायण शर्मा 'कमल' और चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक राधेश्याम शुक्ल के आलेख  'राज्य बहुसंस्कृतिवाद की विफलता पर छिड़ी बहस' पर गत सप्ताह जो बहु-आयामी विचार-विमर्श किया, उसे 'स्वतंत्र वार्ता' ने आज सम्मानपूर्वक प्रकाशित किया है. वैसे विमर्श अभी चालू है; और स्वयं डॉ.राधेश्याम शुक्ल का एक और आलेख (पिछले आलेख की शृंखला  में) सामने आया है. उसे भी देखा जाएगा. लेकिन पहले इसे देखते चलें.........(ऋ.) 


मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

तेलुगु कथाकार

तेलुगु के कुछ प्रसिद्ध कथाकार  
चंद्र मौलेश्वर प्रसाद  

तेलुगु कहानी की यात्रा बीसवीं सदी के शुरू में हुई और प्रथम चरण की कहानियों में सुधारवादी तत्व रहे। इसका एक मुख्य कारण यह था कि उस समय का समाज कुरूतियों के जाल में फंसा हुआ था और समाजसेवी संस्थाएँ उन्हें दूर करने का अभियान चला रहे थे। स्वाभाविक था कि साहित्यकार भी इस अभियान से जुड़ते और अपनी लेखनी से जनता को जागृत करते।  इस प्रकार प्रारम्भिक तेलुगु कहानीकारों ने सामाजिक चेतना को अपना कथानक बनाया था।

गुरजाडा अप्पाराव को यह श्रेय जाता है कि वे तेलुगु के प्रथम कहानीकार कहलायें।  उनकी कहानी ‘दिद्दुबाटु’ [सुधार] सन्‌ १९१०ई. में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी में दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को उजागर किया गया था। तेलुगु के एक और कहानीकार हैं श्रीपाद सुब्रह्मण्य शास्त्री जिन्होंने इतिहास, राजनीति और लोक-कथाओं पर आधारित कहानियाँ लिखीं। दक्षिण के समाज सुधारक वीरेशलिंगम से प्रेरणा लेकर उन्होंने समाज की विसंगतियों पर कहानियाँ रचीं, जिनमें उनकी प्रयोगात्मक कहानी ‘मुल्लु चेट्टू कम्मनी पुव्वुलु’[कंटीला पौधा रंगीले फूल] काफी लोकप्रिय हुई।  इस कहानी में उन्होंने संवाद के माध्यम से एक स्त्री, उसके पुत्र और बहू को पात्र बना कर जीवन की विषमताओं पर प्रकाश डाला है।

गुडिपाटि वेंकटाचलम अपने पाठकों में चलम के नाम से प्रसिद्ध हुए।  वे क्रांतिकारी विचारोंवाले साहित्यकार थे।  वीरेशलिंगम, ब्रह्मसमाज और गांधीजी के विचारों को नकारते हुए उन्होंने साहित्य के माध्यम से क्रांति फैलाने का अभियान चलाया था। उनके आदोलनकारी लेख इतने सशक्त होते थे कि ‘समाज के ठेकेदारों’ के भय से कुछ प्रकाशक उन्हें छापने से भी डरते थे।  उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘नेनेमि चेशानू’ [मैंने क्या किया?’] एक बालिग लड़की की दुखद स्थिति का जीता-जागता चित्रण करती है।

जीवन के विषाद को दूर करने के लिए यदि पाठक कुछ हल्की-फुल्की रचनाएँ ढूँढ़ता है तो मुनिमाणिक्यम्‌ नरसिम्हा राव उनका साथ देंगे।  राव ने जीवन में पति-पत्नी के बीच घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं और नोक-झोंक को अपनी लेखनी में उतारा है।  इसके लिए उन्होंने काल्पनिक पात्रों - वेंकट राव और कांतम्‌, का निर्माण किया जो तेलुगु साहित्य के अब कालजयी पात्र बन गए हैं। इन पात्रों को केंद्रित करके  उन्होंने कई व्यंग्यात्मक रचनाएँ रचीं जिनमें ‘बोम्मल पेल्ली’[गुड़ियों की शादी] बहुचर्चित रही।

आधुनिक विज्ञान ने सृजन के कई माध्यम खोल दिए है जिनमे रेडियो, सिनेमा और अब टी वी प्रमुख हैं। सिनेजगत से जुडे लेखक, निर्देशक हैं गिपीचंद जिन्होंने अपनी लेखनी में ग्रामीण जन-जीवन का चित्रण किया है।  वे न केवल अपनी वामपंथी विचारधारा के लिए जाने जाते हैं बल्कि ‘आंध्र-रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी’ के कार्यदर्शी भी रह चुके हैं। उनकी प्रसिद्ध फिल्में थीं ‘रैतु बिड्डा’[किसान पुत्र] और ‘गृह प्रवेश’। उनकी  रचनाओं में ‘स्वयंकृतम्‌’[खुद की कारस्तानी] प्रसिद्ध हुई जिसमें भिन्न संस्कृतियों के कारण पति-पत्नी के बीच उठी समस्याओं को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

गरीब और दलित को केंद्र में रखकर कई रचनाकारों ने साहित्य-सृजन किया। कोंडवटिगंटि कुटुम्ब राव तेलुगु साहित्य में लगभग पचास वर्षों से जुटे हुए हैं और पाँच सौ से अधिक कहानियाँ, लघुकथाएं, उपन्यास, बालसाहित्य और रेडियो नाटक लिख चुके है। उनका लेखन सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर केंद्रित होता है। चागंटि सोमयाजुलु को पाठक चासो के नाम से अधिक जानते हैं।  यद्यपि चासो की कहानियाँ सरल और मन को छूने वाली होती हैं पर उन्हें बुनने में लेखक कितनी मेहनत करता है इसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी कहानी ‘एंदुकु पारेस्ता नान्ना’[क्यों फेंकूंगा बाबूजी] को अंतिम रूप देने में उन्हें तीन वर्ष लगे। किसानों और दलितों पर लिखनेवाले एक और कहानीकार हैं करुण कुमार जिनकी प्रसिद्ध कहानी ‘कोत्त चप्पुलु’[नई चप्पल] में उन्होंने उस दलित महिला की गाथा कही जिसे इसलिए मार दिया गया कि उसने मालिक के चप्पल लाने में देरी कर दी थी!

ऐसे कई तेलुगु कथाकार हैं जिन्होंने समयानुसार साहित्यिक योगदान दिया।  गहन पठन करनेवाले चित्रकार-साहित्यकार थे शिवराजु वेंकट सुब्बा राव जो साहित्यिक क्षेत्र में बुच्चीबाबू के नाम से जाने जाते हैं।  उनके विदेशी चिंतन को देखते हुए यह कहा जाता था कि वे अंग्रेज़ी में सोंचते हैं और तेलुगु में लिखते हैं। युवा पीढ़ी की ज़ुबान माने जानेवाले साहित्यकार हैं राचाकोंडा विश्वनाथ शास्त्रीजो रा वी शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध हुए। अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से उन्होंने युवा पीढी को एक दिशा देने का प्रयास किया।  

इस प्रकार, सामाजिक सुधार से लेकर युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन तक, हास्य-व्यंग्य से लेकर रेडियो और सिनेजगत तक, तेलुगु साहित्यकारों न अपना योगदान दिया। ऐसे कई साहित्यकार हैं जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य को समृद्ध किया है। प्रसिद्ध अनुवादक एवं रचनाकार डॉ. विजय राघव रेड्डी ने अपनी पुस्तक ‘चर्चित तेलुगु कहानीकार और कहानियाँ’ में सही कहा है-"सन्‌ १९१०ई. में लिखी गई ‘दिद्दुबाटु’ कहानी से लेकर आज तक वस्तु तथा शिल्प की दृष्टि से तलुगु कहानी बहुत ही आगे निकल चुकी है। निस्संदेह हम यह कह सकते हैं कि तेलुगु कहानी के विकास की गति बहुत तेज़ है जिसकी वजह से भारतीय कहानी साहित्य में यह विशिष्ट स्थान की अधिकारी हो गई है।"    



शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

हिंदी शोध में स्टालिनवाद

हिंदी शोध में स्टालिनवाद- अशोक कुमार ज्योति   

पिछले दिनों महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली में तथाकथित विद्वत-समिति हिंदी-विषय में पीएचडी की शोधोपाधि के लिए प्रस्तावित रूपरेखा को स्वीकृत-अस्वीकृत कर रही थी।...

साक्षात्कार के लिए मेरी बुलाहट होने पर जब मैं उठा तो मेरे हाथ में आचार्य निशांतकेतु की गद्य-पद्य की लगभग २५ पुस्तकों और स्वयं द्वारा सम्पादित और अनुदिन ४ पुस्तकों से भरा एक लाल बैग था।  गोलमेज़ के बीचोंबीच हमारे बैठने की व्यवस्था थी।.....मेरी दाईं ओर दो पुरुष और एक महिला थे, बाईं ओर तीन पुरुष विराजमान थे, जिनमें से मैं एकमात्र कथाकार-पत्रकार डॉ. महीप सिंह को पहचानता था। ....

दाहिनी ओर से मेरे कानों में एक टनक आवाज़ आई- कहिए, क्या विषय है आपका?
मैं कुछ बोलता, बाईं ओर से एक आवाज़ आई- वही, अभी जो देखा है, आचार्य वाला।
इसी व्यक्ति [बाद में जाना, वे विश्वविद्यालय नियुक्त कन्वेनर डॊ. रामानंद शर्मा थे] ने पूछा- ये कैसे आचार्य हैं?
‘ये सैंतीस वर्षों तक प्रोफ़ेसर रहे और प्रोफ़ेसर को ‘आचार्य’ कहते हैं और इनकी विद्वता और गान-गरिमा से इन्हें यह लोक-प्रतिष्ठा है।’
डॊ. शर्मा - ‘यहाँ किसी आश्रम में बैठा भी अपने को ‘आचार्य’ कहता है।’
‘हां, वहाँ के आचार्य का अपना पद है।  संस्कृत में जो एम.ए. पास करता है, उसे विश्वविद्यालय की ओर से ‘आचार्य’ की उपाधि मिलती है और निशांतकेतु जी अपने बहुआयामी लेखन से ‘आचार्य’ हैं।’
अब महीप सिंह ने पूछा- तुम निशांतकेतु से मिले हो?
‘जी मिला हूं। इनका पूरा नाम चंद्रकिशोर पांडेय ‘निशांतकेतु’ है और अब इनका लेखकीय नाम ‘आचार्य निशांतकेतु’ है।’

मेरे दाहिनी ओर से फिर टनक आवाज़ आई- अरे, आचार्य बहुत बड़ा होता है।
‘ये वैसे ही हैं।’
‘अच्छा, तुम निशांतकेतु की कविता-पुस्तकों के नाम बताओ?’
‘ज्वालामुखी पुरुष-वाक, रेत की उर्वर शिलाएं, संगतराश, समव्यथी।’

वे मुझे एकटक देखते रहे।  मैं आश्वस्त हुआ कि यह सज्जन भी निशांतकेतु को जानते है।...  मैंने ‘जीवेम शरदः शतम्‌’ और ‘त्वचा पर जो लिखे आखर’ का नाम नहीं लिया था जिनका लोकार्पण २००० में त्रिवेणी सभागार में हुआ था।  इसी बीच कुलपति महोदय पधारे। टनक आवाज़ वाले विद्वान ने पुनः पूछा- किसी एक समीक्षक का नाम बताओ, जिसने निशांतकेतु पर एक पंक्ति भी लिखी है।
‘कई हैं, डॊ. अमर कुमार सिंह ने लिखा है।’
‘अरे, वो क्या लिखेगा!’
‘सर, वे विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे हैं।’
उन्होंने व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा- जानता हूं, पटना का छोटा-सा आदमी है।... किसी और का नाम बताओ।’
‘कई ने लिखा है। डॊ. जितेंद्र वत्स, डॊ. शिववंश पांडेय, डॊ. मिथिलेश कुमारी मिश्र, आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव...’
‘सब वैसे ही नाम है, ये ‘आचार्य’ कहां से आ जाता है बीच में’।

कुलपति महोदय ने कहा-पांडेय जी, ये सब क्या लिखेंगे!
मैंने कहा- डॊ. कमल किशोर गोयनका, डॊ. सुरेश गौतम ने लिखा है।  अभी अभी उनके एक उपन्यास ‘योषाग्नि’ की समीक्षा पं. सुरेश नीरव ने लिखी है।
श्री पांडेय ने कहा- अरे, ये सब वैसे ही हैं। कैसे समीक्षक हैं, मैं जानता हूं।

मुझे अब यह स्पष्ट लगने लगा कि यह किसी ‘वाद’ से जुडे समीक्षक का नाम जानना चाहते हैं।  मैंने कहा कि उनपर डॊ. गंगा प्रसाद विमल ने लिखा है। पांडेय जी की बगल में बैठे डॊ. हरिमोहन ने कहा-आप उन्हीं पर कुछ ले आते, हम स्वीकृत कर देते।  इन पर नहीं हो सकता।

श्री पांडेय- ‘किसी अच्छे समीक्षक का नाम बताओ जिसने एक पंक्ति भी लिखी हो?’
‘सर, कृपया आप ही नाम बताएं और मैं बताऊंगा कि उन्होंने लिखा है या नहीं।’ मेरे कथन पर वे थोड़ा तिलमिलाए।  कुलपति ने कहा- छोडिए, पांडेय जी।

पांडेय जी ने बडे विश्वास से कहा- निशांतकेतु पर नलिन विलोचन शर्मा ने लिखा है? तुम तो उनका नाम भी नहीं जानते होंगे?

मैंने स्थिर मन से उनके अज्ञान को जान और चेहरे पर थोड़ी हँसी लाते हुए कहा- सर, जब निशांतकेतु जी का संग्रह आया था, नलिन जी नहीं थे, उनका निधन सन्‌ १९६० में ही हो गया था।  उन्होंने इनके लिए प्रशस्ति लिखी है और उनके निर्देशन में इन्होंने एम.ए. का अपना लघु शोध प्रबंध लिखा था।  मैं आचार्य नलिन विलोचन के पिता महामहोपाध्याय़ पंडित रमावतार शर्मा को भी जानता हूं, जिन्होंने ‘परमार्थ दर्शन’ नामक ग्रंथ लिखा था।

‘ऐसा है, इस विश्वविद्यालय में इन पर शोध नहीं हो सकता है।  आप जा सकते हैं।’

मैंने कहा- ऐसा तो नहीं होना चाहिए, इन पर तीन-चार विश्वविद्यालयों में शोध हो चुका है। मगध विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, मदुरै कामराज विश्वविद्यालय इत्यादि जगहों पर लगभग ६ शोध हो चुके हैं।

कुलपति महोदय ने कहा-  आप वहीं से कीजिए।  यहाँ से नहीं हो सकता।  भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, आप अलग से किताब लिख लीजिए, यहां शोध-कार्य नहीं हो सकता।

मैं जानता था, यह हिंदी के अध्येता नहीं हैं, इसलिए उनकी बात का मुझे बुरा नहीं लगा था।  इसी बीच डॊ. महीप सिंह ने धीरे से कहा- निशांतकेतु की कितनी कहानियां छपी हैं?

मुझे बल मिला, उत्साह से कहा- सर, अब-तक उनकी पूरी एक सौ कहानियां छप चुकी हैं।  मैंने बैग से वह ग्रंथ निकाल कर उनके हाथों में सौंप दिया।  वह ग्रंथ को देखने लगे।  मुझे मौका मिला कि इनको अब ग्रंथ के माध्यम से जवाब दूं।  मैंने कुलपति महोदय के सम्मुख निशांतकेतु के दो उपन्यास ‘योषागिन’ और ‘ज़िंदा ज़ख्म’...पुस्तके उनकी विषय-वस्तु बताते हुए सामने रख दी।  अब श्री पांडेय हतप्रभ थे।  विद्वत-समिति के अन्य सदस्य कुछ भी नहीं बोल-पूछ रहे थे।

कुलपति महोदय को डायमंड पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित निशांतकेतु की किताबें दिखाते हुए कहा कि ‘देखिए सर, ये पुस्तकें डायमंड ने छापी है’।  छूटते ही कुलपति महोदय ने कहा- मैं जानता हूं डायमंड वालों को, वह पैसे लेकर किताब छापते हैं।  कोई भी छपवा सकता है।’

‘लेकिन इस लेखक ने पैसे दिए नहीं, लिए हैं।’
कुलपति- ‘नहीं-नहीं, इस विषय पर यह काम नहीं हो सकता।’
‘तो क्या तुलसी और कबीर....’
‘आप कबीर पर ही ले आते, हम स्वीकृत कर लेते।’
‘सर, मैं कहना यह चाह रहा हूं कि क्या तुलसी और कबीर पर ही शोध कार्य होना चाहिए? तुलसीदास पर अब तक लगभग ३००० शोध हो चुके हैं और कबीर पर ५००-७०० हो चुके हैं।  नए रचनाकारों पर कब शोध होगा?’
डॊ. शर्मा ने रुष्ट होकर कहा- आपके पास क्या लिस्ट है, ३००० शोध हो चुके हैं?
‘जी हां, है।  यह निशांतकेतु द्वारा संपादित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘चक्रवाक’ में प्रकाशित हो चुकी है।’
कुलपति-‘ये नए रचनाकर तो है नहीं। दस साल पहले रिटायर हो चुके हैं।’
‘नये से मेरा आशय आधुनिक काल से है।  आधुनिक काल में रचनाकारों पर कब शोध होगा?’
अब श्री पांडेय ने कहा- अरे, यहां तो कोई खेत में गीत लिखता है तो उस पर भी शोध के लिए सिनोप्सिस आ जाता है।  कल डी.लिट में ऐसे ही विषय आए थे।
‘बिलकुल ठीक है, सर।  आखिर जिसने रचना लिखी है, और यदि वह उत्कृष्ट है तो उस पर शोध हो तो अच्छी बात है।  ऐसा होना चाहिए।’

कुलपति महोदय ने कहा-‘अब आप अपनी ये किताबें समेटें और जाएं।’  मैंने किताबे उठाईं और कहानी संग्रह वाली किताब श्री पांडेय की ओर बढ़ाते हुए कहा- सर, लगता है आपने निशांतकेतु जी की कहानियां नहीं पढ़ी हैं।  यह किताब आपको देना चाहता हूं, कृपया लीजिए।’

‘ऐसा है, तुम इसे रखो।  निशांतकेतु मेरे मित्र हैं, पढ़नी होगी तो उनसे मंगवा लूंगा।’  यह वाक्य उन्होंने ऐसे विश्वास से कहा, जैसे निशांतकेतु के बहुत निकटस्थ मित्र हैं।  मैं उनके अधिकतर मित्रों के नाम जानता हूं, इसलिए उत्सुकता बढ गई इनका नाम तो जान ही लेना चाहिए, जो निशांतकेतु को ‘मित्र’ भी कहते हैं और उनके साहित्य पर शोध-कार्य नहीं होने देना चाहते हैं।  आखिर हिम्मत कर ही ली और पूछा- सर, क्षमा चाहूंगा, आपका शुभ नाम जानना चाहूंगा।

कुलपति महोदय ने थोड़े चिंताजनक रोष में कहा- अब देखिए, पांडेय जी, तभी तो यह हाल है।  अरे, ये डॊ. मैनेजर पांडेय हैं।’

अब तो मेरे लिए बिलकुल स्पष्ट हो गया कि ये मेरे शोध-कार्य के विषय-‘आचार्य निशांतकेतुः जीवन, सृजन एवं मूल्यांकन’ को क्यों नहीं स्वीकृत करने दे रहे हैं।  ये उनकी विद्वत्ता, ज्ञान, गरिमा, आध्यात्मिक उपलब्धि, पद्यकार-रूप, गद्यकार-रूप इत्यादि से द्वेष रखते हैं।  मैंने उन तथाकथित विशेषज्ञों के प्रश्नों के भी सही उत्तर दिए थे। फिर ये अन्याय क्यों??....

क्या इसे शिक्षा क्षेत्र में ‘तानाशाही’ प्रवृत्ति न मानी जाए?  मुझे लगता है, रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली को इसका जवाब देना पडेगा और छात्र हित में उसे अपना निर्णय बदलना पड़ेगा.....। हिंदी शोध साहित्य इतिहास में इस स्टालिनवादी प्रवृत्ति को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा, ताकि पुनः किसी योग्य शोधार्थी और समर्थ रचनाकार के साथ अन्याय न हो।


[साहित्यपरिक्रमा के अक्टूबर-दिसम्बर२०१०अंक के लेख का सारसंक्षेप- साभार सहित]