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शनिवार, 9 जुलाई 2011

एक संस्मरण

संतोख की आपबीती


शाम ढल रही थी।  पेड़ों के पीछे सूरज डूबने को था।  चिड़ियों का कलरव एक सुंदर प्राकृत माहौल बनाए हुए था।  उस पर चाय की चुस्की का मज़ा लेते घर के लॉन में  बैठे हम  मित्र गपशप कर रहे थे।  इतने में हमारा फ़्लाइंग सरदार- संतोख सिंह पहुँच गया।

संतोख को हम फ़्लाइंग सरदार इसलिए कहते हैं कि वह सदा फ़्लाइंग विज़िट पर ही रहता था।  आएगा, पाँच मिनट बैठेगा, सब की खबर लेगा और चल देगा अपनी मोटर बाइक पर।  इसलिए आते ही उसे भी एक कप चाय आफ़र की गई।  चाय की चुस्की लेते हुए वह मुस्कुरा दिया।  हमने इस मुस्कुराहट का राज़ पूछा तो वह बताने लगा-

बात साठ के दशक की है। जब मैं हैदराबाद से दिल्ली पहुँचा तो देखा कि सब गरम कपडों में लिपटे हुए हैं और मैं हूँ कि हाफ़ शर्ट पहने हुए था।  ट्रेन से उतर कर पता चला कि ठंड कहर ढा रही है और मुझे बंद डब्बे में उसका अनुमान भी नहीं लगा।  खैर, अपना बैग लेकर क्लोक रूम में रखा और बदन में गर्माहट लाने के लिए पास की चाय की दुकान पर पहुँचा।  चाय पीकर जेब में हाथ डाला तो सर्द मौसम में भी पसीने छूट गए। पर्स गायब और जेब खाली।  मैंने चायवाले से कहा- भैया, मेरा पर्स किसी ने मार दिया है, तुम यह घड़ी रख लो जो मैं बाद में छुड़ा कर ले जाऊँगा।  

बेचारा दयावान निकला। उसने कहा- अठन्नी की क्या बिसात है बाबूजी, पर्स मिलने पर दे जाना।  परंतु मेरी समस्य तो गाँव पहुँचने की थी और उस समय बस का किराया छः रुपये था।  अब पैसे लाएँ तो कहाँ से लाएँ?  उस चायवाले से कहा कि क्या घड़ी रखकर छः रुपये मिल सकते हैं?  उसने नकार दिया।  स्टेशन के बाहर निकला और एक रिक्शे वाले से पूछा कि क्या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मालूम है जो घड़ी रखकर पैसे दे सकेगा।  उसने भी नकार दिया।  अब मैं तो फँस ही गया।  गाँव पहुँच जाऊँ तो रिश्तेदार मदद कर देंगे, पर गाँव पहुँचूंगा कैसे!

मुझे एक तरकीब सूझी।  मैंने रिक्शेवाले से कहा कि क्या यहाँ कोई ब्लड बैंक है।  उसने कहा कि वह ऐसे बैंक को जानता है। [शायद उसने भी कभी पैसे की ज़रूरत पड़ने पर खून दिया होगा।]  

मैंने उससे कहा कि मुझे वहाँ ले चलो।  उसने वहाँ पहुँचाने के चार रुपये मांगे।  मैंने कहा कि चार नहीं पाँच रुपये दूंगा पर वहाँ कुछ देर ठहरना होगा।  वह मान गया।

हम ब्लड बैंक पहुँचे।  मैंने अपना खून दिया और उसके मुझे बारह रुपये मिले।  वैसे भी, मैं तो ब्लड डोनर हूँ ही।  मैं स्टेशन लौट आया और उस रिक्शेवाले को छः रुपये दिए।  उसने इन्कार कर दिया।  उसने कहा कि आपको सच में पैसे की ज़रूरत है तो मैं आपसे पैसे नहीं लूंगा।

मैंने कहा- भाई, मुझे गाँव जाने के लिए छः रुपये की ज़रूरत है।  बचे छः रुपये तुम ले लो क्योंकि तुमने मेरी इतनी मदद की है।

उसने कहा- ठीक है, बाबूजी। बोहनी का समय तो आप एक रुपया दे दीजिए।

मैंने उसे एक रुपया दे दिया और चाय वाले के पैसे अदा करके अपना बैग क्लोक रूम से निकाल कर गाँव की बस में बैठ गया।

फिर, जैसे दूर कहीं खो गया संतोख सिंह बोला- दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जो मानवीय संवेदना से भरे होते हैं। पर पता नहीं क्यों, ऐसे ही लोग गरीब होते है!!!!!



शनिवार, 11 जून 2011

शादी


बाज़ आए ऐसी शादियों से

अभी हाल ही में कुछ शादियों में जाने का अवसर मिला।  हर शादी में शिर्कत करने के बाद मन यही कहता कि भविष्य में किसी शादी में नहीं जाएँगे, परंतु जब कोई प्रेम से निमन्त्रण देकर जाता है तो लगता है कि यह सामाजिक धर्म तो निभाना ही पड़ेगा और फिर वही प्रण...। इस प्रण के भी कारण हैं।  

शादी का समय आठ बजे का दिया जाता और हम ठहरे समय के पाबंद।  पहुँच जाते हैं ठीक आठ बजे तो आलम यह कि वहाँ अभी दुल्हन वाले ही नदारद हैं। अब आए हैं तो बैठना ही पड़ेगा।  जो लोग व्यवस्था में व्यस्त हैं उनको छेड़कर बात कर लेते हैं। वे बेचारे भी शिष्टता के नाते दो चार सवाल-जवाब कर लेते और चलते बनते हैं।  धीरे-धीरे दुल्हन के घर से लोग शादीखाने में आने लगते हैं तो ढाढस बन्धता है कि कार्यक्रम अब शुरू होगा, पर नहीं- अभी तो दुल्हन ब्यूटी-पार्लर गई हुई है और आती ही होगी।  ‘वह आती ही होगी’ की प्रतीक्षा एक घंटे बाद खत्म होती है।  अब शुरू होते हैं मंडवे के रस्म!

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यह तो हो गई दुल्हनवालों की बात।  अब करते हैं बात बारात की।  बारात आनेवाली थी आठ बजे पर अब दस बज रहे हैं।  सेल फ़ोन पर बात करने से पता चला कि बारात अभी रास्ते में है और एक-आध घंटे में पहुँचेगी।  मरता क्या न करता- बस इंतेज़ार करना है।  बारात आकर द्वार पर रुकी तो बारातियों को और दम आ गया। मुँह में नोट देखकर बाजेवालों के बाजुओं में भी दम आ ही जाता है। फिर क्या है, आधा घंटा नाच चलता रहता है। सब अपने अपने जौहर यहीं तो दिखाते हैं! मुझे इनके नाच को देखकर उन अहीरों की याद आ जाती है जो शरद पूर्णिमा के दिन अपने खुलगों के सामने नाचते हुए इनको जुलूस में ले जाते हैं।[अब यह तमाशा भी शहरीकरण के कारण लुप्त होता जा रहा है]। बस फ़र्क यह है कि यहाँ खुलगे की जगह दुल्हा था पर देखने में खुलगे जैसा ही।

आजकल लोगों के पास समय नहीं है और न ही वे शादी के रुसूमात में दिलचस्पी रखते हैं। पंडित भी जल्दी में होता है तो आजकल की शादियों के रुसूमात भी उतने लम्बे नहीं होते। बस, दुल्हा-दुल्हन को शाही कुर्सियों पर बिठा दिया जाता है। पंडित कुछ मंत्रोच्चारण करता है जिसका अर्थ शायद वह भी नहीं जानता। इसके बाद अक्षत छिड़क देता है। लोग भी जहाँ खडे हैं, वहीं से अक्षत के चावल फेंक देते हैं जो हर कहीं गिरते हैं पर दुल्हा-दुलहन पर नहीं।  इसके बाद सुरुचि भोज के नाम पर ऐसे टूट पड़ते हैं कि न  तो भोज का मज़ा आता है और न ही रुचिकर लगता है।

दुल्हनवाले दुल्हेवालों की खातिरदारी में लगे रहते हैं।  उन्हें न तो आनेवालों की सुध रहती है और न खाने वालों की।  बस, एक ही चिंता रहती है कि दुल्हेवाले खुश रहें और ब्याह शांतिपूर्वक सम्पन्न हो।  हम भी उनकी मजबूरी समझते हैं, इसलिए दुल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देकर और दोनों पक्षों के पिताओं को बधाई देकर अपना ‘लिफ़ाफ़ा’ पकड़ा कर निकल पड़ते हैं।  

यह तो रही शादी की बात।  दुल्हे वालों के रिसेप्शन की बात फिर कभी करते हैं॥

मंगलवार, 24 मई 2011

बयाने-दर्दे-दाँत


बयाने-दर्दे-दाँत [२]


बात कोई दस-बारह बरस पहले की है जब मैं सर्विस से रिटायर होने के करीब पहुँच रहा था।  जैसा कि लोग अक्सर भविष्य की प्लानिंग पहले से ही करने लगते हैं, वैसा ही मैं भी कुछ सोच रहा था कि रिटायर होने के बाद अपने समय का उपयोग कैसे करूँ! साहित्य पढ़ने का शौक तो था ही, तो सोचा कि शहर में होनेवाली साहित्यिक गोष्ठियों में जाकर इस शौक को पूरा करना चाहिए।  इस प्रकार मैं हैदराबाद में होनेवाली गोष्ठियों से जुड़ा।  परंतु मेरे लिए विड़म्बना यह थी कि इन गोष्ठियों में अनिवार्य तौर पर काव्य पाठ होता था और मैं ठहरा इस लेखन में शून्य।  फिर भी, इस गोष्ठियों में सरौता बना बैठा रहता।  चौंकिए नहीं, सरौता से मेरी मुराद श्रोता से है।

इन गोष्ठियों में डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी भी आते और अहम भूमिका निभाते। हर गोष्ठी में मैं उन्हें मंचासीन देखता तो समझ गया कि वे एक सक्रिय एवं गोष्ठियों के मुख्य स्तम्भ है। बढ़िया हिंदी, प्रभावशाली आवाज़ और सुंदर लेखन के धनी, डॉ. शर्मा से मैं पहले दृश्य से ही प्रभावित हुआ।  धीरे-धीरे हमारा परिचय बढ़ा तो एक दिन उन्होंने मंच से घोषणा कर दी कि मैं कविता पाठ करूँगा।  मैं चकित... और वादा किया कि अगली बार पढूँगा।  खैर, मेरी कविता-यात्रा इस तरह से शुरू हुई, बिना कवि बने!  मैं कोई कवि तो हूँ नहीं जो हर गोष्ठी में नई नई रचना सुनाऊँ। कोई सरल मार्ग ढूँढ़ने में मेरी सहायता की जापानी विधा हाइकु ने।  मैं जानता हूँ कि इस विधा में लिखना सरल नहीं है और उसके भी कुछ कठिन मानदण्ड हैं; परंतु मैंने देखा कि लोग रदीफ़-काफ़िया मिला कर ‘गज़ल’ कहे जा रहे हैं तो सत्रह अक्षर बिठाकर ‘हाइकु’ भी सरलता से कही ही जा सकती है।  इस तरह मुझे इन गोष्ठियों में भाग लेने की घुंडी मिल गई।  बस, हाइकु के नाम पर सत्रह अक्षर कहता और बैठ जाता।  कभी-कभी तो संचालक चकित रहता कि अभी नाम पुकार कर कुर्सी को ओर लौटा भी नहीं कि दूसरे कवि को आवाज़ देने का समय आ गया!!  इस तरह मुझ पर हाइकुकार का ठप्पा लग गया।

हाल ही में जब मैंने अपने दाँत के दर्द की दर्दभरी दास्ताँ आपके सामने रखी थी और काफी संवेदना भरी टिप्पणियां मिली थीं तो सोचा कि इस सिलसिले में अपना दर्द बाँटने में कोई हर्ज नहीं है।  पोस्ट की पोस्ट और सहानुभूति की सहानुभूति [डार-डार और पात-पात की तर्ज़ पर:)]।

हुआ यूँ कि हमारे सर जी [अरे वही- डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी] से टेलिफोन पर बात हो रही थी तो उन्होंने दाँत के दर्द के बारे में पूछा।  मैंने उन्हें बताया कि इस आयु में जो दर्द आता है वो जाने के लिए नहीं होता। है, रहेगा  और मैंने भी शमशेर की तरह कह दिया - 

जो है
उसे ही क्यों न संजोना ?
उसी के क्यों न होना ?-
जो कि है ।

उन्होंने सुझाव दिया कि इनकी-उनकी कविता झेलने की बजाय आप अपने दर्दे-दाँत के बारे में कुछ हाइकु लिखिए बयाने-दर्दे-दाँत करते हुए और यह भी चैलेंज कर दीजिए कि टिप्पणीकार हाइकु में ही जवाब दें।  तो लीजिए साहब, कुछ हाइकु उछाल रहा हूँ... पकड़ सकें तो पकड़ लीजिए।

हा! दर्दे दाँत-
मर्ज़ बढ़ता गया
ज्यों-ज्यों दवा की।

दर्द गहरा
वो नहीं सुन पाया-
मर्द बहरा:)

दर्द दाँत का
नहीं आसाँ झेलना-
दण्ड पेलना।

दाँत का दर्द
कैसा है जनाब, वो
बने हमदर्द।

भर दे साक़ी
तू एक और जाम
दर्द के नाम।

मेरा पैगाम-
कर दो सारे बाम
दर्द के नाम
[कृपया नोट करें कि मैंने झंडु बाम का नाम जानबूझ कर नहीं किया क्योंकि इसी से मुन्नी बदनाम हुई थी:)]

और अंत में यह चैलेंज भी-----

निवेदन है
टिप्पणीकार लिखें
हाइकु में ही। :)

[दुनिया में सब को हाइकुकार बना कर छोडूँगा!!!]