बुधवार, 25 जनवरी 2012

ज़रा सोचिये


लोकतंत्र - कितना सफल



एक और बनता ही जा रहा था 
निर्माण का हिन्दुस्तान
दूसरी ओर गिरता ही जा रहा था 
ईमान का हिंदुस्तान॥

[केदारनाथ अग्रवाल]


हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन के बाद भारत को जब गणतंत्र घोषित किया गया, तब जनता में एक नया उत्साह और उल्लास था कि उन्हें सच्चे मायनों में आज़ादी मिल गई है;  अब वो अपनी तकदीर के मालिक हैं और अपने भविष्य का मार्ग खुद ही तय करेंगे।

भारतवासियों ने अपने राजनैतिक जीवन के लिए लोकतंत्र का मार्ग चुना, जब कि उनके एक और बड़े पड़ोसी देश चीन ने साम्यवाद का रास्ता अपनाया।  लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी और कदाचित सब से बड़ी कमज़ोरी भी, यह है कि उसका नागरिक राजनैतिक स्वतंत्रता में सांस लेता है, पर वह निरंकुश हो जाता है।  उसे साम्यवादी घुटन का सामना नहीं करना पड़ता है।  नतीजा यह होता है कि राजनैतिक तौर पर वह जागरूक तो रहता है पर अपनी स्वतंत्रता पर किसी प्रकार के अंकुश को सहन नहीं करता और अपने दायित्व को भुला बैठता है।  इसका एक प्रमाण है भारत का वह आपातकालीन युग जब राजनैतिक स्वतंत्रता को कुछ अवधि के लिए दबाया गया था यद्यपि उसका परिणाम यह हुआ कि उन नेताओं को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।  इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत के लोकतंत्र की नींव बहुत मजबूत है।

अब सवाल यह है कि लोकतंत्र के अंतरगत भारत ने कितनी राजनैतिक , आर्थिक तथा सामाजिक सफलता प्राप्त की है।  भारत एक कृषि प्रदान देश है तथा उसकी अधिकतम जनता गाँवों में रहती है जो मेहनत मज़दूरी करके अपना उदर-पोषण करती है।  ऐसे नागरिकों को शिक्षा के अधिक अवसर नहीं मिल पाते, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वे काफी परिपक्व साबित हुए हैं।

भारत के हर चुनाव में जनता ने यह प्रमाणित कर दिया है कि वे राजनीतिक तौर पर कितने जागरूक हैं और उन्हें अच्छे-बुरे नेता की परख है।  यह और बात है कि इन नेताओं ने जनता के साथ विश्वासघात किया हो।  झूठे आश्वासन और सुनहरे ख्वाबों के चुनावी वादों को वे वास्तविकता का जमा पहनाने में असफल रहे।  चुनावी वादे केवल वादे बनकर रह गए।  जब यही वादे हर चुनाव में दुहराए जाने लगे तो लोगों ने इन नेताओं को सत्ता से उखाड़ फेंका।  लोकतंत्र में यदि नेता जनता की सेवा न करें और अपनी सत्ता को न सम्भाल सके तो इसमें जनता का कोई दोष नहीं हो सकता।  वो तो सत्ता के भूखे नेताओं की साजिशों का परिणाम मात्र कहा जाएगा।

यदि भारत के लोकतंत्र और पड़ोसी चीन के साम्यवाद पर एक नज़र डालें, तो कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि चीन ने भारत के मुकाबले में अधिक तरक्की की है, परंतु किस मूल्य पर!  यदि इसे सच भी मान लिया जाए तो भी यह गौरतलब है कि उस देश की प्रगति के लिए जनता को क्या कीमत चुकानी पड़ी और क्या वहाँ के आम नागरिक उस प्रगति का फल भोग रहे हैं?  यह एक लम्बी बहस का विषय हो सकता है।

भारत में छः दशक से चले आ रहे लोकतंत्र पर यदि एक दृष्टि डालें तो यह कहा जा सकता है कि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा है यद्यपि किसी भी देश के इतिहास में यह अवधि कोई लम्बी अवधि नहीं मानी जाती।  फिर भी,  इतना तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि इस अवधि में भारत अपने एक सौ से अधिक करोड़ लोगों के लिए अन्न उत्पादन करता है, उसे विदेशों से अब खाद्यान्न आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।  औद्योगिक क्षेत्र में वह काफ़ी आगे बढ़ गया है और संसार के दस औद्योगिक देशों में भारत की गिनती होती है।  उच्च शिक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का योगदान संसार भर में अधिकतम रहा है।

इस लोकतंत्र को सब से बड़ा आघात तब लगा जब नेताओं के भ्रष्ट चरित्र से देश लूटा जाने लगा और यह नासूर फैलते-फैलते अब इस देश के चरित्र को खाए जा रहा है।  ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार अन्य देशों में नहीं है पर हमारा कानून इतना अक्षम साबित हो रहा है कि भ्रष्टाचारी यह जान चुके हैं कि कोई भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता है।  दूसरी ओर हाल ही में चीन के कुछ नेताओं को भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर गोली मार कर इन्साफ़ किया गया।  यदि ऐसे कड़े कानून भारत में भी नहीं बनाए जाते हैं तो भ्रष्टाचार इस देश को पतन के कगार पर ला खड़ा करेगा।  तब भी जनता क्या इसी प्रकार मूक असहाय दर्शक की भाँति देखती रहेगी?  

अंततः यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र को जनता ने सफल बनाया है पर इस लोक और तंत्र को चलानेवालों ने मिलकर उसे विफल कर दिया है।


10 टिप्‍पणियां:

Amrita Tanmay ने कहा…

जरा सा सोच-सोच कर तो ये हाल हो गया है . अब कौन मालिक ..राम जाने..

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

लोकतंत्र की सफलता और असफलता वहां के लोगो की मानसिकता पर निर्भर करता है ! हालांकि मैं भी यह मानता हूँ कि लोकतंत्र से बेहतर विकल्प कोई नहीं मगर इसकी भी सीमायें होनी चाहिए !

GYANDUTT PANDEY ने कहा…

जनता समाज बनाती है और मैने किसी भ्रष्टाचारी का सामाजिक बहिष्कार होते नहीं देखा।
उलटे येन केन प्रकरेण पैसा कमाने वाले की समाज में इज्जत है।
लोकतंत्र नहीं, यह समाज कितना सफल है?

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

ज्ञानदत्त जी व गोदियाल जी बात में ही मेरी भी बात सम्मिलित है.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

प्रसाद जी , देश की फसल तो ग़ज़ब की है लेकिन बाड़ ही खाए जा रही है ।

Arvind Mishra ने कहा…

अंततः यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र को जनता ने सफल बनाया है पर इस लोक और तंत्र को चलानेवालों ने मिलकर उसे विफल कर दिया है।
यही सारभूत है

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही सामयिक और सार्थक विश्लेषण । सही सटीक प्रश्न उठाए गए हैं । आज वास्तविकता यही है । लेकिन अब परिवर्तन देखने को मिल रहा है ,बेशक बहुत ही छोटा और बहुत ही कम ,किंतु बदलाव की शुरूआत हो चुकी है ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कौन संतुलन ला पायेगा,
लोभ बड़ा मदमाया रे..

सतीश सक्सेना ने कहा…

चिंतनीय दशा, सुंदर लेख ...
शुभकामनायें भाई जी !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मुझे नहीं लगता की आज लोकतंत्र बाकि रह गया है देश में ... आज बस कुछ लोगों का ही तंत्र बाकी अहि जिन्होंने राजाओं की जगह ले ली है ...