गुरुवार, 19 जनवरी 2012

घुटने



ये  घुटने है या बला!





 दिल्ली के सुप्रसिद्ध डॉ. टी.एस.. दराल- ब्लाग जगत के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  अपनी चिकित्सा के तजुर्बे से वे मानव घुटने के बारे में बताते हैं कि " इन्सान में बुढ़ापा सबसे पहले घुटनों में ही आता है । इसीलिए :
* ४० + होते होते आपके घुटनों की व्यथा एक्स रेज समझने लगते हैं ।
* ५० + होने पर आपको भी आभास होने लगता है ।
* ६० + होने पर सब को पता चल जाता है कि आपके घुटने ज़वाब दे चुके ।
* ७० + होकर आप भी भाइयों में भाई बन जाते हैं क्योंकि अब तक सब एक ही किश्ती के सवार बन चुके होते हैं ।"

जब मैं घुटने के बारे में सोंचने लगा तो मुझे बुढापे की चिंता तो नहीं हुई क्योंकि बूढ़ा तो हो ही गया हूँ फिर भी मेरे घुटने अभी तक ढोने में सक्षम हैं। मैं जितना सोचता गया, उतना ही इस ‘घुटने’ के कई रूप सामने आने लगे।   कुछ रूप  जो मस्तिष्क में घूम रहे हैं, उन्हें यहाँ उँडेल देता हूँ :)

इन घुटनों के कारण कभी महिलाओं को सज़ा भी भुगतनी पड़ती है।  आप को याद होगी वह घटना जब सूडान की एक ईसाई किशोरी को घुटने की लंबाई तक की स्कर्ट पहनने को एक जज ने अभद्र करार देते हुए उसे 50 बार कोड़ा मारने की सजा सुनाई है।   पता नहीं मिनि स्कर्ट पहनने पर कितने कोड़े पड़ते!!

ऐसे में घुटने टेकने के सिवाय चारा भी क्या हो सकता है!  घुटने तो हमारे खिलाडी भी खेल के मैदान में यदाकदा टेक ही देते हैं।  जब वेस्ट इंडीज़ से भारत हारा था तो यह समाचार पढ़ने को मिला था-

"भारतीय बल्लेबाजों ने कब्रगाह बनी फिरोजशाह कोटला की पिच पर बेहद निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले क्रिकेट टेस्ट के दूसरे दिन आज यहां घुटने टेक दिए ।"  अब ऑस्ट्रेलिया में जो हश्र हो रहा है, उसका अनुमान आप भी लगा ही सकते हैं।


 इसी प्रकार जब गायक दलजीत  ने कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग किया तो उसे माफ़ी मांगनी पड़ी थी।  तब यह समाचार देखने में आया था कि अपने गीतो में औरतों के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल करने पर दलजीत ने अखिरकार मांफी मांग ली हैं।   पंजाब केसरी के दफ्तर में विशेष तौर पर आए दलजीत ने घुटने टेक कर मांफी मांगते हुए कहा कि उसने कभी भी औरतों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल नही किया।"


आजकल चिकित्सा क्षेत्र ने इतनी तरक्की कर ली है कि घुटने बदल दिए जा रहे हैं।   सवाल यह है कि क्या घुटने बदलने के बाद व्यक्ति की चाल भी बदल गई है।  घुटने की सर्जरी में तो  चार-छः लाख रुपये  लग ही जाते हैं। पर ऑपरेशन के बाद ठीक से चलते  देखा नहीं गया। अपने अटल बिहारी वाजपेयी को ही लें। वह ऑपरेशन से पहले काफी ठीकठाक चलते थे।  अब तो बेचारे बिस्तर पकड़ चुके हैं।

इस लेख को लिखने के असली मकसद पर अब आते हैं।  आपने इसी ब्लाग पर एक निमंत्रण देखा होगा कि यहाँ हैदराबाद लिटरेरी फ़ेस्टिवल २०१२ का आयोजन हो रहा है।  इस आयोजन के आखरी दिन एक हिंदी काव्य गोष्ठी हुई जिसमें एक ‘युवा’ कवि ने अध्यक्षता की। युवा इसलिए कहा जा रहा है कि वे बिना किसी सहायता के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँच गए।  अन्य दो कवि और एक कवयित्री ऐसे थे जिन्हें पकड कर मंच पर चढ़ाना पड़ा था।  कारण.... वही.... घुटने का दर्द!!!!!!




23 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post

समस्याओं का समाधान यही है.
http://ahsaskiparten.blogspot.com/

Kumar Luv ने कहा…

agar aapne galti se kabhi Daljeet ko suna ho, to jaan jaayenge ki ye ghutne tekna bas ek chhalava hai!

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बढिया पोस्ट!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सूडान की ईसाई किशोरी को कोड़े तो इसलिए मारे गए होंगे कि स्कर्ट इतनी नीचे घुटनों तक क्यों पहनी.

Praveen Trivedi ने कहा…

घुटने तो हथियार की तरह प्रयोग करते देखा है हमने
:)

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सर जी, यह नहीं बताया आपने की ८०+ होने पर कुछ और भी "घुटने" की आशंका हर समय बनी रहती है :)

zoya rubina usmani ने कहा…

hamare pitaji bhi is ghutne se pareshan hain..professor hone ke naate unhen kafi waqt khade hokar guzarna padta hai,isliye takleef aur badh jati hai.
aapka blog hum unhen zarur padhaenge.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

वाकई बड़ी तकलीफ़ देते हैं घुटने .
कभी मर्म से , तो कभी शर्म से .

Suman ने कहा…

बहुत अच्छी लगी पोस्ट भाई जी !
पहले दांत का दर्द अब घुटने का, आप के व्यंग्य का जवाब नहीं :)
वाह मजेदार है !

Amrita Tanmay ने कहा…

रोचक आलेख .. आपकी कलम तो पाठकों को घुटना-टेकू बना ही देती है ..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

गोदियाल जी, इस प्रश्न का उत्तर तो डॉ. दराल ही दे सकते हैं :)

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट " हो जाते हैं क्यूं आद्र नयन पर ": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

डॉ टी एस दराल ने कहा…

एक खोज से पता चला है कि ८० + की उम्र में भी लाइफ को एन्जॉय किया जा सकता है । घुटने की ज़रुरत नहीं । :)

dheerendra ने कहा…

उत्तम प्रस्तुति,बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन पोस्ट....
new post...वाह रे मंहगाई...

Arvind Mishra ने कहा…

और वो घुटनों में अक्ल होने की बात का तो अपने जिक्र ही नहीं किया

Monika Jain "मिष्ठी" ने कहा…

bahut achchi prastuti :)
मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

अति सुंदर

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

bilkul dilchasp pr prernatmk ....badhai

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

घुटनों पर शर्तिया ढेरों साहित्यिक अध्याय लिखे जा सकते हैं, बशर्ते दर्द न करें..

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट "धर्मवीर भारती" पर आपका सादर आमंत्रण है । धन्यवाद ।

GYANDUTT PANDEY ने कहा…

घुटने में दर्द की उम्र में आ रहे हैं हम। लगता है वजन कुछ कम हो जाये तो ठीक रहेगा।

prerna argal ने कहा…

आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (२7) में शामिल की गई है /आप इस मंच पर पधारिये/और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आपका आशीर्वाद हमेशा इस ब्लोगर्स मीट को मिलता रहे यही कामना है /आभार /लिंक है /
http://www.hbfint.blogspot.com/2012/01/27-frequently-asked-questions.html

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी लगी पोस्ट मजेदार है !