गुरुवार, 26 मई 2011

मजरूह सुल्तानपुरी- Majrooh


घायल शायर- मजरूह सुल्तानपुरी


असरार-उल-हसन खाँ एक प्रसिद्ध शायर थे पर साहित्यिक क्षेत्र में ही नहीं फिल्मी क्षेत्र में भी यह नाम अपरिचित सा लगता है।  परंतु जब हम मजरूह सुल्तानपुरी कहें तो पचास-साठ साल पहले के लोकप्रिय फिल्मी गीत लोगों के ज़हन पर तैरने लगते हैं।  आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद कस्बे में १९१९ में जन्मे असरार-उल-हसन खाँ ने अपना जीवन एक हकीम की हैसियत से शुरू किया था।  न जाने कब, कहाँ और किसने उनके दिल पर चोट लगाई कि वे एक शायर बन गए और अपना तक़ल्लुस ‘मजरूह’ [घायल] रख लिया।  हकीमी करते-करते शायरी का शौक मुशायरों में ले गया।  जहाँ भी मुशायरे मुंतक़िब होते, मजरूह का नाम उस मुशायरे को चार चाँद लगा देता।  यही असर उन्हें मुम्बई खींच लाया तो वे वहीं के  होकर रह गए।

मजरूह बम्बई की चकाचौंध में खो नहीं गए, बल्कि अपने साहित्यिक कलम को भी जीवित रखा।  उन्होंने अपने फिल्मी लेखन का सफर ए.आर.कारदार की फिल्म ‘शाहजहाँ’ से शुरू किया। कारदार जैसा मशहूर निर्माता, कुंदनलाल सहगल की पुरकशिश आवाज़ और वह दर्द भरा गीन जो किसी घायल की ही कलम से निकल सकता है तो शोहरत निश्चित थी; और वह गीत था- जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे।  इसके बाद मजरूह ने अपनी हकीमी को अलविदा कहा और बम्बई को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया जो उनके जीवन के अंत तक बना रहा।  फिल्म संगीत की दुनिया में एक गीतकार की हैसियत से मजरूह का नाम जो जुड़ा तो मरते दम तक प्रसिद्ध रहा।

साहित्य की दुनिया में जब गीत और गज़ल की बात चलती है तो कुछ तथाकथित तरक्कीपसंद प्रगतिशील रचनाकार गज़ल की विधा को मरे हुए सामंती समाज का हिस्सा मानते हैं क्योंकि उनके लिए गज़ल का मतलब सामंती महफ़िलों में गाए गए शबाब और शराब की हद तक ही महदूद विषय रहे।  परंतु मजरूह यह मानते थे कि जो बात गज़ल में जिस पुरअसर तरीके से कही जा सकती है, वह शायद अन्य विधा में कह पाना मुश्किल है। सामन्ती युग के बाद गज़ल भी आम जनता तक पहुँच गई और उसका दायरा भी वसी हो गया है।  इस विस्तृत परिवेश में गज़ल के माध्यम से गरीब मज़लूम और मजबूर मज़दूर की बात भी कही जा सकती है।  मजरूह भी अपनी रचनाओं में न केवल खिज़ां-बहार, शराब-साखी, जाम-पैमाना, गुल-गुलिस्तां, बुलबुल-सैयाद आदि की बात कही बल्कि इससे हट कर भी गरीब और मज़दूर की बात की है।

अब ज़मीन गाएगी हल के साज़ पर नग़्मे
वादियों में नाचेंगे हर तरफ तराने से

अहले-दिल उगाएंगे ख़ाक से माहो-अंजुमन१
अब गुहर२ सुबक३ होगा जौ के एक दाने से

मनचले बुनेंगे अब रंगो-बू के पैरहन
अब संवर के निकलेगा हुस्न कारखाने से॥
१.चाँद-तारे २.मोती ३.सस्ता

इसी कारखाने ने एक दिन उन्हें कारावास भी भेज दिया था।  मजरूह प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे और सरकार को किसी प्रगतिशीलवादी रचना में विद्रोह की बू आती थी।  उनके जेल जाने का कारण और उस घटना को वे अपने एक साक्षात्कार में बताते है।  उन्होंने मार्क्सवाद से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के बारे में एक विवादस्पद गीत लिखा था।  इस पर कांग्रेस सरकार ने उन्हें फंसाने की कोशिश की थी।  एक कारखाने की मज़दूर बस्ती में वे अपना गीत ‘अमन का झंडा’ सुना रहे थे जिसका मुखड़ा था- मार दो साथी, जाने न पाये।  इस पंक्ति को हर एक बंद के अंत में दोहराया गया था।  एक बंद की पंक्ति थी- कामनवेल्थ का दास नेहरू और तबाही लाने न पाये।  इसे लेकर यह प्रचारित किया गया कि वो नेहरू को मारने की बात कह रहे हैं।  महाराष्ट्र के तत्कालीन गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें बुलाकर कहा कि यदि वे माफ़ी मांगते हैं तो आगे कार्रवाई नहीं की जाएगी।  मजरूह ठहरे निडर साहित्यकार।  उन्होंने कहा कि माफ़ी मांगने का अर्थ होगा  गुनाह कबूल करना और उन्होंने इन्कार कर दिया।  वे जेल जाना बेहत्तर समझते थे बनिस्बत माफी मांगने के।  परिणामस्वरूप उन्हें डेढ़ वर्ष तक मुम्बई की आर्थर रोड़ जेल में रहना पड़ा था।

प्रसिद्ध उर्दू शायर जिगर मुरादाबादी  भी मजरूह की लेखनी से प्रभावित थे।  उनका मानना था कि मजरूह की शायरी में समाज का दर्द झलकता है और उन्होंने उर्दू शायरी को नया आयाम दिया है।  मजरूह के कुछ अशार इस बात को प्रमाणित भी करते हैं।

दुश्मनों की दोस्ती है अब अहले-वतन के साथ
है अब खिज़ां चमन में नये पैरहन के साथ॥

मजरूह काफ़िले की मेरे दास्तां ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ॥

जला के मशाल-ए-चमन हम जुनूं सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाये, हमारे साथ चले॥

ये आग और नहीं दिल की आग है नादां
चिराग हो के न हो जल बुझेंगे परवाने॥

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए है गुनहगार की तरह॥


इसमें दो राय नहीं कि आज मजरूह की बात चलती है तो लोग उनके फ़िल्मी गीतों को ही याद करते हैं; जैसे, उठाए जा उनके सितम और जिए जा, आंचल में सजा लेना कलियां, कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा, आँखों में क्या जी, है अपना दिल तो आवारा, शामे-ग़म की कसम, जलते हैं जिसके लिए, सुन मेरे बंधु रे, चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, दिल की तमन्ना है मस्ती में मंज़िल से भी दूर निकलते... आदि।  चार सौ फिल्मों में लिखे तीन हज़ार से अधिक गीतों में से किस-किस गीत पर चर्चा हो! इसी सफलता को देखते हुए मजरूह को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो देश के किसी अन्य गीतकार को यह सम्मान आज तक नहीं दिया गया।

फिल्मी गीतों के लिए जाने जानेवाले शायर ने उर्दू साहित्य में भी अपना एक अलग मुकाम बनाया था।  साहित्य और फिल्मी रचनाओं को वे गडमड नहीं करते थे भले ही कुछ साहित्यिक रचनाओं को दोस्ती की खातिर फिल्मों के लिए दिया हो; जैसे, राजेंद्र सिंह बेदी की फिल्म ‘दस्तक’ के लिए उनकी प्रसिद्ध गज़ल ली गई थी- हम है मताए-कूच-ओ-बाज़ार की तरह, उठती है हर निगाह खरीदार की तरह।  परंतु जब वे किसी मुशायरे में जाते और उनसे कोई फिल्मी गीत पढ़ने की फरमाइश करता तो वे साफ नकार देते और कहते कि "मैं अदबी मुशायरे में आया हूँ, गज़ल और गीत सुनाए बिना ही बैठ जाऊँगा।"  इस प्रकार उन्होंने ऐसे तमाम अवसरों पर उर्दू शायर की अपनी अलग पहचान बनाए रखी।

मजरूह वह शायर हैं जिसने अपनी ज़िंदगी का आगाज़ एक अंजान शहर में अंजान व्यक्ति की तरह शुरू किया और शोहरत की मंज़िल हासिल की।  तभी तो उन्होंने कहा था-

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर
लोग पास आते गए और कारवां बनता गया॥

या फिर,

मुझे सहल हो गई मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गए॥

मुम्बई के लीलावती अस्पताल में २४ मई २००० की रात मजरूह के लिए ऐसी तारीकी लेकर आई जिसकी कोई सहर नहीं थी।  २५ मई २००० को मजरूह के पार्थिव शरीर को उनके करीबी रिश्तेदारों और फिल्मी मित्रों- आनंद बख्शी, गुलशन बावरा, कल्याण जी आदि की मौजूदगी में सुपुर्देख़ाक कर दिया गया।  उस समय शायद मजरूह के ये शब्द फिज़ा में गूज रहे हों-

वो तक रहे थे, हमीं हँस के पी गए आँसू
वो सुन रहे थे, हमीं कह सके न अफ़साने॥


11 टिप्‍पणियां:

डा० अमर कुमार ने कहा…


इसमें कोई सँदेह नहीं कि, मज़रूह साहब ने फिल्मी शायरी को एक नयी दिशा दी ।
खुदा उन्हें जन्नत बख़्शे !

सञ्जय झा ने कहा…

s u n d a r........

खुदा उन्हें जन्नत बख़्शे !


pranam.

Kajal Kumar ने कहा…

मज़रूह साहब का 1.5 साल तक जेल में रहना बताता है कि किस जीवट वाले व्यक्ति थे वे.

Gyandutt Pandey ने कहा…

ओह, मजरूह सुल्तानपुरी तो बहुत पठनीय लग रहे हैं! इस पोस्ट में उनके इस रूप से परिचय के लिये धन्यवाद।

ऋषभ Rishabha ने कहा…

''अहले-तूफ़ाँ आओ दिल वालों का अफ़साना कहें
मौज को गेसू, भँवर को चश्मे-जानानाँ कहें''
[मजरूह सुलतानपुरी]

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मजरूह सुल्तानपुरी पर बहुत सुन्दर आलेख । आभार ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बस नाम सुना था, आज आपने पूरा व्यक्तित्व बता दिया।

राज भाटिय़ा ने कहा…

कामनवेल्थ का दास नेहरू और तबाही लाने न पाये इस मे झूठ कहा था, बिलकुल सच कहा, इस अच्छी जानकारी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद,मजरूह सुल्तानपुरी जी के गीतो का मै दिवाना हुं,

Suman ने कहा…

bahut badhiya jankari......
aabhar ......

Arvind Mishra ने कहा…

बेमिसाल नायाब प्रस्तुति-ऐसी प्रस्तुतियां ही आपको 'पक्के दाने' का साबित करती रहती हैं -
मगर थे वे आजमगढ़ पर तखल्लुस सुल्तानपुरी क्यों रखा ? आजमगढ़ी क्यों नहीं ?
इस बारे में क्या मालूमात है ?
तो -लोग आते गए कारवाँ जुटता गया इन्ही साहब का है !:)

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

गज़ब! मज़ा आ गया मजरूह जी के बारे में इतना सब कुछ जानकार..
ऐसी ही और अनमोल खजाने लुटाते रहें..

आभार
सुख-दुःख के साथी पर आपके विचारों का इंतज़ार है..