गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

मजाज़ - Majaaz


उर्दू का कीट्स- ‘मजाज़’


खूब पहचान लो असरार हूँ मैं।
जिन्से-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं॥
इश्क ही इश्क है दुनिया मेरी।
फ़ित्नाए-अक्ल से बेज़ार हूँ मैं॥
ख़्वाबे-इश्रत में है अरबाबे-खिरद।
और इक शायरे-बेदार हूँ मैं॥ 
ऐब जो हाफ़िज़-ओ-खैय्याम में था।
हाँ कुछ उसका भी गुनहगार हूँ मैं॥
ज़िन्दगी क्या है गुनाहे-आदम।
ज़िन्दगी है तो गुनाहगार हूँ मैं॥

यह सदा देनेवाला शायर था असरार-उल-हक़।  सन्‌ १९०९ में अवध के प्रसिद्ध कसबे रुदौली में जन्मे इसी असरार ने आगे चल कर ‘मजाज़’ तख़ल्लुस अपनाया और उर्दू अदब में उसका नाम शराबी अक्षरों में लिखा गया।  पिता सिराज-उल-हक़ एक ज़मींदार थे और उन्होंने अपने पुत्र असरार को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल भेजा था।  उच्च शिक्षा के लिए उन्हें आगरा के सेंट जॉन्स कालेज में दाखिल कराया गया था।  यहाँ पर उनकी संगत मुईन अहसन ‘जज़्बी’ और ‘फ़ानी’ जैसे शायरों से हुई और यहीं से उनकी शायरी परवान चढ़ी। बाद में उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय से बी.ए. किया और मजाज़ तख़ल्लुस से शायरी करने लगे। मजाज़ की शायरी में हुस्न-ओ-इश्क के इतने नाज़ुक खयाल रहते थे कि उन्हें उर्दू का कीट्स कहा जाने लगा था।  उन्होंने अपने खयालात को कुछ इस तरह अपनी शायरी में ढाला:

इश्क का ज़ौक़े-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है।
हुस्न खुद बेताब है जल्वे दिखाने के लिए॥

क्या हुआ मैंने अगर हाथ बढ़ाना चाहा?
आपने खुद भी तो दमन न बचाना चाहा॥

यूँ तो अफ़साना-ए-उल्फ़त था अज़ल से रंगीं।
हमने कुछ और भी रंगीन बनाना चाहा॥

मुझसे मत पूछ ‘मेरे इश्क में क्या रखा है?’
सोज़ को साज़ के पर्दे में दबा रखा है॥

वो मेरे शेर जब मेरी ही लय में गुनगुनाती थी
मनाज़िर झूमते थे बामो-दर को वज़्द आता था।

भड़कती जा रही है दम-ब-दम आग-सी दिल में
ये कैसे जाम है साक़ी, ये कैसा दौर है साक़ी।

मुझे पीने दे, पीने दे कि तेरे जामे-लअली में
अभी कुछ और है, कुछ और है, कुछ और है साक़ी॥

मजाज़ न केवल हुस्न के शैदा थे बल्कि व्यंग्य और चुटकुलेबाज़ी का मौका भी कभी नहीं गंवाते थे।  एक बार रास्ते में चलते-चलते न जाने क्या सूझी कि राह में खड़े तांगेवाले से पूछ बैठे-"क्यों मियाँ, कचहरी जाओगे?"  उसने तपाक से कहा-"हाँ जनाब।" "तो फिर जाओ" कह कर मजाज़ अपना रास्ता नापने लगे।

एक बार किसी मित्र की पत्नी के देहान्त पर सांत्वना देने गए मित्रों में एक ने सुझाव दिया ‘अभी लम्बी उम्र पड़ी है तो दूसरा ब्याह क्यों नहीं कर लेते?’ उन महाशय ने बड़ी गम्भीरता से कहा-‘चाहता तो हूँ कि किसी बेवा से कर लूँ।’ ‘इसकी फिक्र मत कीजिए, आप शादी कर लीजिए, वह बेचारी खुद बेवा हो जाएगी।’ तपाक से मजाज़ ने कह दिया।

इस खुशमिजाज़ शायर की दुनिया ने १९३६ में पलटा खाया जब वह ‘आवाज़’ पत्रिका का सम्पादक बनकर दिल्ली आया।  शायद किस्मत ने इसलिए ऐसा गम्भीर मज़ाक किया कि शायर के दिल पर चोट लगे और उसकी शायरी को धार मिले।  उन्हें एक अत्यंत सुंदर लड़की से इश्क हो गया जो एक सम्पन्न घराने की बहू थी।  नदी के दो किनारे तो कभी नहीं मिल सकते।  बस, शायर को गम के सागर में ऐसा डुबोया कि जीवन भर उससे वह उबर ही न सका।  मजाज़ ने उस इश्क की मजबूरी को कुछ इस तरह बयान किया है-

वो मुझको चाहती है और मुझ तक आ भी नहीं सकती।
मैं उसको पूजता हूँ और उसको पा नहीं सकता॥
ये मजबूरी सी मजबूरी, ये लाचारी सी लाचारी।
कि उसके गीत भी जी खोलकर गा नहीं सकता॥
हदें वो खैंच रखी है हरम के पासबानों ने।
कि बिन मुजरिम बने पैगाम भी पहुँचा नहीं सकता॥

इस हादसे के बाद मजाज़ शराब में सराबोर होने लगा।  न खाने की सुध, न कपड़ों का खयाल, न सेहत की फिक्र... बस एक ही धुन कि शराब कब, कहाँ और कितनी मिलेगी।

अब ये अरमाँ कि बदल जाए जहां का दस्तूर
एक-इक आँख में हो ऐशो-फ़रागत का सुरूर
एक एक जिस्म पे हो अतलसो-क़म-ख़ाबो-समूर
अब ये बात और है खुद चाके गिरेबां हूँ मैं।

एक अच्छा शायर एक घटिया शराबी बनकर रह गया।  दोस्तनुमा दुश्मनों ने भी इसका फायदा उठाया।  जाम पर जाम पिलाते और उनसे शायरी सुनते जाते-

हाय वो वक्त कि जब बेपिये मदहोशी थी।
हाय ये वक्त कि अब पी के भी मख़्मूर नहीं॥

‘मजाज़’ इक बादाकश तो है यकीनन।
जो हम सुनते थे वो आलम तो नहीं॥

वां इशारे है बहक जाना ही ऐने-होश है।
होश में रहना यक़ीनन सख़्त नादानी है आज॥

मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता।
सुकूँ लेकिन मेरे दिल को मुयस्सर आ नहीं सकता॥
कोई नग़्मा तो क्या अब मुझसे मेरा साज़ भी ले लो।
जो गाना चाहता हूँ आह, वो मैं गा नहीं सकता॥

हालत यह हो गई कि वे दिल्ली छोड़कर वापस लखनऊ चले गए।  दिल के हाथों इतने मजबूर थे कि शराब से घाव भरने की कोशिश करते रहे और हालत यहाँ तक पहुँची कि वे मानसिक रोगी हो गए।  उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया।  वहाँ पर उनकी तीमारदारी करनेवाली नर्स के बारे में उनका कहना था-

वो इक नर्स थी चारागर जिसको कहिए
मुदावा-ए-दर्दे-जिगर जिसको कहिए।
सफेद और शफ़्फ़ाक कपड़े पहन कर
मेरे पास आई थी इक हूर बनकर।
कभी उसकी शोक़ी में भी संजीदगी थी
कभी उसकी संजीदगी में भी शोक़ी।
घड़ी चुप, घड़ी करने लगती थी बातें
सिरहाने मेरे काट देती थी रातें।
अजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वो
कभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वो।
दवा अपने हाथों से मुझ को पिलाती
‘अब अच्छे हो’ हर रोज़ मुयदा सुनाती।

मजाज़ भले ही शबाब से धुत्कारे गए थे, शराब में डूब भी गए थे, लेकिन वक्त की रफ़्तार पर भी उनकी नज़र थी, तभी तो वे कहते हैं-

मुफ़लिसी और मज़ाहिर है नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्ताने जाबिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़ो-नादिर है नज़र के सामने
ऐ ग़मे-दिल क्या करूँ, ऐ वहशते-दिल क्या करूँ?

सब्ज़ा-ओ-बागो-लाला-ओ-सर्वो-समन को क्या हुआ?
सारा चमन उदास है हाय चमन को क्या हुआ?
कोई बताइये अज़मते-ख़ाके-वतन को क्या हुआ?
कोई बताये ग़ैरते-अहले-वतन को क्या हुआ?

बहुत मुश्किल है दुनिया का संवरना।
तेरी ज़ुल्फ़ों का पेंचो-ख़म नहीं है॥
बहुत कुछ और भी है इस जहां में।
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है।

मुझे आज साहिल पे रोने दो,
कि तूफ़ान में मुस्कुराना है।
ज़माने से आगे तो बढ़िये ‘मजाज़’
ज़माने को आगे बढ़ाना है।

बादल, बिजली, रैन अंधियारी
दुख की मारी दुनिया सारी
बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं,
दुखिया नर है दुखिया नारी।
बस्ती-बस्ती लूट मची है
सब बनिया है सब ब्यौपारी
बोल अरी ओ धरती बोल
राज सिंहासन डाँवाडोल॥

अक्ल के मैदान में ज़ुल्मत का ही डेरा रहा।
दिल में तारीकी, दिमागों में अंधेरा ही रहा॥
ज़हने-इन्सानी ने अब औहाम के ज़ुल्मात में।
ज़िन्दगी की सख्त तूफ़ानी अंधेरी रात में॥...
कुच नहीं तो ख़्वाबे-सहर देखा तो है।
जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है॥

होश की हालत में मजाज़ एक संजीदा और छोटे-बडे का लिहाज़ करने वाले व्यक्ति थे।  महिलाओं के सामने उनकी नज़र नहीं उठती थी।  वे नारी-जाति का सम्मान करते थे और महिलाओं को ऐसी बुलन्दी पर देखना चाहते थे कि वे पुरुषों की भाग्यरेखा बन जाए।

तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था...
तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था॥

हुस्न से मात खाए इस शायर को शराब ने धीरे-धीरे पीना शुरू कर दिया।  शराब के नशे में चूर एक रात शराबखाने की खुली छत पर सर्दी में पड़े रहने के कारण दिमाग की रग फट गई।  सुबह बलरामपुर के अस्पताल में दाखिल कराया गया और ६ दिसम्बर १९५५ को इस अज़ीम शायर ने दुनिया को अलविदा कहा-

मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्मे-नाज़ से आखिर
अभी फिर दर्द टपकेगा मेरी आवाज़ से आखिर
अभी फिर आग उठेगी शिकस्ता साज़ से आखिर
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्मे-नाज़ से आखिर॥

कोई दम में हयाते-नौ का फिर परचम उठाता हूँ
बा-ईमा-ए-हमीयत जान की बाज़ी लगाता हूँ
मैं जाऊँगा, मैं जाऊँगा, मैं जाता हूँ, मैं जाता हूँ
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्मे-साज़ से आखिर॥  



16 टिप्‍पणियां:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

मजाज के प्रति यह पढ़ कर आदर का भाव आया। अन्यथा अब तक उन्हे मात्र शराब का पर्याय मानता था।
धन्यवाद।

सञ्जय झा ने कहा…

मुझे पीने दे, पीने दे कि तेरे जामे-लअली में
अभी कुछ और है, कुछ और है, कुछ और है साक़ी॥..........

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.....................

PRANAM.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन के संदर्भों को जानकर कविता समझना और भी आसान हो जाता है। अतिशय आभार।

तनिष्क ने कहा…

शमशेर बहादुर सिंह की जन्म शताब्दी पर
द.भा.हि.प्र.स.और अ.क.आ.रा.वि.वि. द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने का और प्रो.नामवर सिंह को देखने तथा सुनाने का मौका मुझे भी मिला. शमशेर पर बोलते हुए जब उन्होंने उर्दू के बड़े शायर मजाज़ और फ़ैज़ की जन्म शताब्दी की बात कही तो इन बड़े शायरों को के बारे में पढ़ने की इच्छा मन में जगी. "आजकल " पत्रिका में फ़ैज़ के बारे में पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ मगर मजाज़ को पढ़ने का मौका अब तक नहीं मिला था. आपके इस लेख के माध्यम से मुझे इस बड़े शायर से मिलाने का मौका मिला.बहुत-बहुत धन्यवाद.लेख अच्छा है.पढ़कर खुशी हुई. - बालाजी

ऋषभ Rishabha ने कहा…

शायद मेरे समझने में गलती रही हो.
नामवर जी ने गत दिनों हैदराबाद में जब कहा कि मजाज़ की भी शताब्दी है, तो मैंने सोचा कि इसी वर्ष है.बाद में पता चला कि मजाज़ को तो दो बरस पहले ही सौ साल हो गए.

कहीं कुछ सुन-गुन न थी.

और अब फैज़ के सौ साल हो रहे हैं.
उर्दू जगत का तो पता नहीं, हिंदी-संसार ज़रूर धूम मचाए हुए है.

विशाल ने कहा…

मजाज़ के बारे में जानकारी बहुत ही अच्छी लगी.
शराबी होना तो व्यक्तिगत बात है.
उनकी शायरी बहुत ही अच्छी है.

कुछ तबीयत ही मिली थी ऎसी
चैन से जीने की सूरत न हुई

जिसको चाहा उसे अपना न सके
जो मिला उस से मोहब्बत न हुई

और

ऐ गमे दिल क्या करूं, ऐ वहशते दिल क्या करूं.

Vivek Jain ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने मजाज़ जी के बारे में ! धन्यवाद

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत बढिया जानकारी. आभार.

Arvind Mishra ने कहा…

आह मजाज की दर्दभरी दास्ताँ

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत कुछ और भी है इस जहां में।
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है।

गम में डूब कर ऐसी शायरी कहने वाले माजर साहब को आपकी लेखनी के द्वारा पर्त-दर -पर्त जानना मिश्रित अनुभूति दे रहा है.बहुत-बहुत धन्यवाद

Pratik Maheshwari ने कहा…

मजाज़ भी क्या गज़ब शायर थे.. उनके बारे में इतनी जानकारी एक जगह पाकर अच्छा लगा..

तीन साल ब्लॉगिंग के पर आपके विचार का इंतज़ार है..
आभार

Suman ने कहा…

nice

Ashok Khurana ने कहा…

ऐ ग़मे दिल क्या करू ऐ वहशते दिल क्या करू।.मजाज़ की एेसी नज़्म है जो रिसर्च के काबिल।

Ashok Khurana ने कहा…

ऐ ग़मे दिल क्या करू ऐ वहशते दिल क्या करू।.मजाज़ की एेसी नज़्म है जो रिसर्च के काबिल।

Ashok Khurana ने कहा…

ऐ ग़मे दिल क्या करू ऐ वहशते दिल क्या करू।.मजाज़ की एेसी नज़्म है जो रिसर्च के काबिल है।

Ashok Khurana ने कहा…

ऐ ग़मे दिल क्या करू ऐ वहशते दिल क्या करू।.मजाज़ की एेसी नज़्म है जो रिसर्च के काबिल है।