मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

तेलुगु कथाकार

तेलुगु के कुछ प्रसिद्ध कथाकार  
चंद्र मौलेश्वर प्रसाद  

तेलुगु कहानी की यात्रा बीसवीं सदी के शुरू में हुई और प्रथम चरण की कहानियों में सुधारवादी तत्व रहे। इसका एक मुख्य कारण यह था कि उस समय का समाज कुरूतियों के जाल में फंसा हुआ था और समाजसेवी संस्थाएँ उन्हें दूर करने का अभियान चला रहे थे। स्वाभाविक था कि साहित्यकार भी इस अभियान से जुड़ते और अपनी लेखनी से जनता को जागृत करते।  इस प्रकार प्रारम्भिक तेलुगु कहानीकारों ने सामाजिक चेतना को अपना कथानक बनाया था।

गुरजाडा अप्पाराव को यह श्रेय जाता है कि वे तेलुगु के प्रथम कहानीकार कहलायें।  उनकी कहानी ‘दिद्दुबाटु’ [सुधार] सन्‌ १९१०ई. में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी में दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को उजागर किया गया था। तेलुगु के एक और कहानीकार हैं श्रीपाद सुब्रह्मण्य शास्त्री जिन्होंने इतिहास, राजनीति और लोक-कथाओं पर आधारित कहानियाँ लिखीं। दक्षिण के समाज सुधारक वीरेशलिंगम से प्रेरणा लेकर उन्होंने समाज की विसंगतियों पर कहानियाँ रचीं, जिनमें उनकी प्रयोगात्मक कहानी ‘मुल्लु चेट्टू कम्मनी पुव्वुलु’[कंटीला पौधा रंगीले फूल] काफी लोकप्रिय हुई।  इस कहानी में उन्होंने संवाद के माध्यम से एक स्त्री, उसके पुत्र और बहू को पात्र बना कर जीवन की विषमताओं पर प्रकाश डाला है।

गुडिपाटि वेंकटाचलम अपने पाठकों में चलम के नाम से प्रसिद्ध हुए।  वे क्रांतिकारी विचारोंवाले साहित्यकार थे।  वीरेशलिंगम, ब्रह्मसमाज और गांधीजी के विचारों को नकारते हुए उन्होंने साहित्य के माध्यम से क्रांति फैलाने का अभियान चलाया था। उनके आदोलनकारी लेख इतने सशक्त होते थे कि ‘समाज के ठेकेदारों’ के भय से कुछ प्रकाशक उन्हें छापने से भी डरते थे।  उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘नेनेमि चेशानू’ [मैंने क्या किया?’] एक बालिग लड़की की दुखद स्थिति का जीता-जागता चित्रण करती है।

जीवन के विषाद को दूर करने के लिए यदि पाठक कुछ हल्की-फुल्की रचनाएँ ढूँढ़ता है तो मुनिमाणिक्यम्‌ नरसिम्हा राव उनका साथ देंगे।  राव ने जीवन में पति-पत्नी के बीच घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं और नोक-झोंक को अपनी लेखनी में उतारा है।  इसके लिए उन्होंने काल्पनिक पात्रों - वेंकट राव और कांतम्‌, का निर्माण किया जो तेलुगु साहित्य के अब कालजयी पात्र बन गए हैं। इन पात्रों को केंद्रित करके  उन्होंने कई व्यंग्यात्मक रचनाएँ रचीं जिनमें ‘बोम्मल पेल्ली’[गुड़ियों की शादी] बहुचर्चित रही।

आधुनिक विज्ञान ने सृजन के कई माध्यम खोल दिए है जिनमे रेडियो, सिनेमा और अब टी वी प्रमुख हैं। सिनेजगत से जुडे लेखक, निर्देशक हैं गिपीचंद जिन्होंने अपनी लेखनी में ग्रामीण जन-जीवन का चित्रण किया है।  वे न केवल अपनी वामपंथी विचारधारा के लिए जाने जाते हैं बल्कि ‘आंध्र-रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी’ के कार्यदर्शी भी रह चुके हैं। उनकी प्रसिद्ध फिल्में थीं ‘रैतु बिड्डा’[किसान पुत्र] और ‘गृह प्रवेश’। उनकी  रचनाओं में ‘स्वयंकृतम्‌’[खुद की कारस्तानी] प्रसिद्ध हुई जिसमें भिन्न संस्कृतियों के कारण पति-पत्नी के बीच उठी समस्याओं को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

गरीब और दलित को केंद्र में रखकर कई रचनाकारों ने साहित्य-सृजन किया। कोंडवटिगंटि कुटुम्ब राव तेलुगु साहित्य में लगभग पचास वर्षों से जुटे हुए हैं और पाँच सौ से अधिक कहानियाँ, लघुकथाएं, उपन्यास, बालसाहित्य और रेडियो नाटक लिख चुके है। उनका लेखन सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर केंद्रित होता है। चागंटि सोमयाजुलु को पाठक चासो के नाम से अधिक जानते हैं।  यद्यपि चासो की कहानियाँ सरल और मन को छूने वाली होती हैं पर उन्हें बुनने में लेखक कितनी मेहनत करता है इसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी कहानी ‘एंदुकु पारेस्ता नान्ना’[क्यों फेंकूंगा बाबूजी] को अंतिम रूप देने में उन्हें तीन वर्ष लगे। किसानों और दलितों पर लिखनेवाले एक और कहानीकार हैं करुण कुमार जिनकी प्रसिद्ध कहानी ‘कोत्त चप्पुलु’[नई चप्पल] में उन्होंने उस दलित महिला की गाथा कही जिसे इसलिए मार दिया गया कि उसने मालिक के चप्पल लाने में देरी कर दी थी!

ऐसे कई तेलुगु कथाकार हैं जिन्होंने समयानुसार साहित्यिक योगदान दिया।  गहन पठन करनेवाले चित्रकार-साहित्यकार थे शिवराजु वेंकट सुब्बा राव जो साहित्यिक क्षेत्र में बुच्चीबाबू के नाम से जाने जाते हैं।  उनके विदेशी चिंतन को देखते हुए यह कहा जाता था कि वे अंग्रेज़ी में सोंचते हैं और तेलुगु में लिखते हैं। युवा पीढ़ी की ज़ुबान माने जानेवाले साहित्यकार हैं राचाकोंडा विश्वनाथ शास्त्रीजो रा वी शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध हुए। अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से उन्होंने युवा पीढी को एक दिशा देने का प्रयास किया।  

इस प्रकार, सामाजिक सुधार से लेकर युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन तक, हास्य-व्यंग्य से लेकर रेडियो और सिनेजगत तक, तेलुगु साहित्यकारों न अपना योगदान दिया। ऐसे कई साहित्यकार हैं जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य को समृद्ध किया है। प्रसिद्ध अनुवादक एवं रचनाकार डॉ. विजय राघव रेड्डी ने अपनी पुस्तक ‘चर्चित तेलुगु कहानीकार और कहानियाँ’ में सही कहा है-"सन्‌ १९१०ई. में लिखी गई ‘दिद्दुबाटु’ कहानी से लेकर आज तक वस्तु तथा शिल्प की दृष्टि से तलुगु कहानी बहुत ही आगे निकल चुकी है। निस्संदेह हम यह कह सकते हैं कि तेलुगु कहानी के विकास की गति बहुत तेज़ है जिसकी वजह से भारतीय कहानी साहित्य में यह विशिष्ट स्थान की अधिकारी हो गई है।"    



11 टिप्‍पणियां:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

बहुत अच्छा लगा जानकारी में यह विस्तार। धन्यवाद।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तेलगू साहित्य के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

तेलगू साहित्य के उत्थान में योगदान देने वाले साहित्यकारों के बारे में जानकारी के लिए साधुवाद !
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

केवल राम ने कहा…

आदरणीय चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी
नमस्कार
तेलगू भाषा के साहित्यकारों के बारे में जानकार , ज्ञानवर्धन हुआ ..आपका बहुत बहुत आभार

shiva ने कहा…

आदरणीय चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी.
नमस्कार,
तेलगू साहित्य ,साहित्यकारों के बारे में जानकार पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
धन्यवाद।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

आंध्रा के विशिष्ठ साहित्यकारों का सुन्दर वर्णन !

Arvind Mishra ने कहा…

तेलगू साहित्य के कथा विकास क्रम और कथाकारों के बारेम में बताने के लिए आभार -क्या यहाँ साईंस गल्प के बारे में कुछ जानकारी दे सकते हैं ?

सतीश सक्सेना ने कहा…

काफी दिन बाद आ पाया भाई जी ....जो महत्वपूर्ण और मौलिक कार्य आप कर रहे हैं हिंदी जगत आपका आभारी रहेगा !
आज से आपको नियमित पढने के लिए आपका फालोवर बन रहा हूँ !
सादर

ऋषभ Rishabha ने कहा…

अति उत्तम.
अच्छा हो कि आप तेलुगु साहित्यकारों पर निरंतर लिखें.

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

तेलुगु कहानीकारों पर आपकी सधी हुई शैली में गुंथा हुआ निबंध पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

बधाई.

हल्ला बोल ने कहा…

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
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