बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

Old age - Simone de Beauvoir - बुढ़ापा [5] - सिमोन द बउवा





बुढ़ापा : 
 आधुनिक समाजों में 
आधुनिक समाज सुशिक्षित समाज कहलाता है।  शिक्षा का प्रभाव समाज के बूढ़ों की परिस्थिति बदलने में कितना  सक्षम रहा; या फिर, शिक्षा के कारण संयुक्त परिवार टूटे और एकल परिवार के विस्तार से वृद्धों की दयनीय स्थिति यथावत बनी रही, इसकी पड़ताल सिमोन द बुआ अपनी पुस्तक ‘ओल्ड एज’ में करती हैं। वे बताती हैं कि --

"प्रायः यह देखा गया है कि सभी तरह की दुखद घटनाओं, विपरीत टिप्पणियों आदि का संज्ञान तब तक नहीं लिया जाता जब तक समाज के संतुलन में कोई बदलाव के आसार नहीं दिखाई देते।  तंत्र चलाने वाले हों या घर के छोटे-बड़े, वृद्धों के बारे में तब तक नहीं सोचते जब तक कोई तीव्र स्वर उनके प्रति न उठें।"

वृद्ध इतने कमज़ोर और निराश्रित होते हैं कि उनकी आवाज़ समाज के तुमुल कोलाहल में सुनाई भी नहीं पड़ती।  ऐसे में वृद्धों के पास शायद एक ही विकल्प रहता है... मौत की प्रतीक्षा!  इस विवशता के बारे में सिमोन का कहना है--

"समय वृद्ध को मौत के करीब ले जाता है जो न तो उसकी नियति है और न इच्छा। वह समाज के सक्रिय सदस्यों को ‘अन्य प्रजाति’ की तरह देखने लगता है।  एक हद तक वृद्ध बच्चे  के समान होता है जिस  पर युवा पीढ़ी इसलिए अधिक ध्यान नहीं देती किवह अभी बच्चा  है।  उसी प्रकार युवा यह समझते हैं कि वृद्ध तो चुक  गई पीढ़ी हैं  जिन्हें आज के समाज के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है।  परंतु यहाँ भी एक अंतर है - बालक अपने पिता का  आदर करता है, उनके नक्शेकदम पर चलना चाहता है, जबकि युवक अपने वृद्ध पिता को वह सम्मान नहीं देता इसकी  वह अपने पुत्र से अपेक्षा करता है।

"किसी हद तक युवक अपने वृद्धों का आदर करता भी है तो समाज के डर से, और उस सीमा के पार वह वृद्ध को न केवल कमतर करके आंकता है बल्कि उसे यह अहसास भी कराने का प्रयास करता है।  युवक वृद्ध को सीधे निर्देश नहीं देता बल्कि परोक्ष रूप से जताता है कि   उसके कहे के मानने में ही वृद्ध की भलाई है।  इसका एक उदाहरण है वृद्धाश्रम को भेजने का प्रस्ताव। कुछ दिन वहाँ रहकर देखने का सुझाव दिया जाएगा, फिर यह आश्वासन दिया जाएगा कि यदि उसे अच्छा न लगे तो वापिस घर ला लिया जाएगा; जबकि सभी जानते हैं कि यह दिन कभी नहीं आएगा।  वृद्ध निराशा की मानसिकता में डूबता जाता है। अब वह एक वस्तु मात्र बन कर रह जाता है- ऐसी वस्तु जिसका कोई मूल्य नहीं है।"

वृद्ध की मनःस्थिति को समझने का कोई प्रयास युवा पीढ़ी नहीं करती।  यह भी नहीं सोचा जाता कि उसकी भी कुछ इच्छाएँ होती हैं, वह भी मनुष्य है। अगर  कोई प्रौढ़ अपना एकाकीपन मिटाने के लिए पुनर्विवाह करना चाहे तो युवा पीढ़ी इसका विरोध करती है।  विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह बड़ी समस्या बन जाती है।  इस समस्या के बारे में सिमोन बताती हैं कि:-

"पुत्रियाँ भी माँ के पुनर्विवाह का विरोध उसी प्रकार करती हैं जिस प्रकार पुत्र अपने पिता का, और यदि ये वृद्ध विवाह कर भी लेते हैं तो उनकी संतानें उनसे ऐसा ठंडा व्यवहार करती  हैं कि ये वृद्ध गलती करने के अपराधबोध में दिन बिताते हैं।"

व्यवसायीकरण के इस युग में वृद्धों की दयनीय स्थिति का भी  लाभ आधुनिक समाज  धड़ल्ले से उठा  रहा है। सिमोन ने अपनी इस पुस्तक में इस व्यवसाय का पर्दाफ़ाश किया है-

"आजकल अमेरिका और फ़्रांस जैसे देशों में भी वृद्धों की स्थिति एक व्यवसाय बन गया है।  नर्सिंग होम, रेस्ट हाउज़, रेसिडेन्सी, विलेज जैसे नामों से अनेक संस्थान खुल गए हैं जहाँ वृद्धों को पैसा लेकर रखा जाता है।  यहाँ आकर ये वृद्ध ठगा महसूस करते हैं। पहले तो रंगीन ख़्वाब दिखा कर उनकी जमापूँजी ऐंठ ली जाती है। फिर कुछ समय की सुख-सुविधाओं के बाद ऐसा दौर शुरू होता है जिसमें वृद्ध अपमानित महसूस करने लगता है।  उसका जीर्ण शरीर  और थका मस्तिष्क इस आघात को सहन नहीं कर पाता।  धीरे-धीरे वह निराशा की मानसिकता में चला जाता है और मौत की प्रतीक्षा करता रहता है।  जैसे ही वह मरा नहीं कि दूसरा वृद्ध इस रिक्त स्थान को भर देता है।  इस प्रकार, वृद्धों की सेवा के नाम पर ये  संस्थाएं उन्हें मृत्यु के अधिक निकट ला खड़ा करती हैं।

"विज्ञान की प्रगति के साथ मानव की औसत आयु बढ़ती जा रही है। रोमन काल में यह दर अठारह वर्ष थी और सत्रहवीं सदी तक आते-आते बढ़ कर पच्चीस वर्ष हो गई।  अस्सी वर्षीय बूढा एक अजूबा हुआ करता था जिसे समाज सौ वर्ष का वृद्ध कह कर गर्व करता था।  अठारहवीं शताब्दी में फ़्रांस की औसत आयु तीस वर्ष थी और आज [१९८० में] वृद्धों की संख्या कुल जनसंख्या का १९ प्रतिशत है।  इसी प्रकार, बच्चों की मृत्युदर एक शताब्दी में ४० प्रतिशत से घटकर २.२ प्रतिशत हो गई है।  इसका परिणाम यह हुआ कि युवाओं से अधिक बूढ़ों की संख्या हो गई।

"इसके विपरीत, अविकसित देशों में युवाओं की संख्या अधिक होती है क्योंकि यहाँ की मृत्युदर अधिक है जिसके कारण हैं कुपोषण, गंदी आवासीय परिस्थितियां तथा चिकित्सा व दवाइयों का अभाव।  भारत में ३.६, ब्राज़ील में २.४५ और  टोगोलैण्ड में १.४६ प्रतिशत जनसंख्या बूढ़ों की श्रेणी में आती  है।"

वृद्धों की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक अभाव है। जीर्ण शरीर और शारीरिक शक्ति की कमी के कारण वे पहले की तरह कुशलता से कार्य नहीं कर पाते जिसका परिणाम यह होता है कि वे बेरोज़गार हो जाते हैं।  जो व्यक्ति बेरोज़गार है उसकी पूछ न घर में होती है न समाज में।  वृद्धों की आर्थिक सुरक्षा का एक उपाय है पेंशन योजना जिसका प्रभाव आधुनिक समाज पर किस प्रकार पड़ा, इसके बारे में सिमोन बताती हैं :-

"१७९६ई. में टॉम पेन ने वृद्ध मज़दूरों को पेन्शन देने का सुझाव रखा था।  पचास वर्ष की आयु पहुँचने पर हर मज़दूर को पेन्शन देने का प्रस्ताव था।  बेल्जियम और हॉलैंड में सरकारी कर्मचारियों को पेन्शन देने का प्रावधान १८४४ई. में आया।  १९वीं शताब्दी में फ़्रांस के सैनिकों और सरकारी अधिकारियों को पेन्शन प्राप्त होने लगी।  बाद में पेन्शन प्रणाली का विस्तार फ़्रांस के विभिन्न क्षेत्रों में होने लगा।  खान मज़दूर, रेल मज़दूर, नाविक आदि भी इस श्रेणी में लाए गए।  इसी काल में जर्मनी में पूँजीवाद तेज़ प्रगति पर था। औद्योगिक क्षेत्र ने रफ़्तार पकड़ी तो मज़दूरों की दुर्घटनाएं रोज़मर्रा की बात हो गई।  मज़दूर संघों के आक्रोश से बचने के लिए बिस्मार्क ने १८८३ और १८८९ई. के बीच सामजिक बीमा का प्रावधान बनाया जिसके अंतरगत हादसे के शिकार हुए अक्षम मज़दूर की आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था की गई |  बाद में लक्ज़ेमबर्ग, रोमानिया, स्वीडेन, आस्ट्रिया, हंगरी और नार्वे जैसे देशों में भी इस प्रकार की बीमा योजनाएं लागू हुईं।  १९५६ई. तक फ़्रांस के ८० प्रतिशत लोग सेवानिवृत्ति  पर पेन्शन पाने लगे।

"पूंजीवादी देशों में डेन्मार्क, स्वीडेन और नार्वे ही ऐसे देश हैं जहाँ नागरिकों के लिए स्वच्छ पर्यावरण और अच्छी जीवन सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है।  इसका एक मुख्य कारण यहाँ की बहुत कम जनसंख्या है | साथ ही यहाँ  राजनीतिक जीवन उदार एवं बिना किसी लागलपेट का  है।  यहाँ अमीर सबसे अधिक टैक्स देते हैं और विलासिता की  वस्तुओं पर बहुत अधिक टैक्स लगाया जाता है।  इस प्रणाली का सबसे अधिक लाभ वृद्धों को मिलता है। स्वीडन की औसत आयु ७६ वर्ष है, जो समस्त यूरोप में सबसे ऊँची दर है। यद्यपि पेन्शन इसलिए दी जाती है कि वृद्ध काम करने की स्थिति में नहीं है पर वास्तव में एक तिहाई बूढ़े जो साठ वर्ष पार कर चुके हैं, कुछ न कुछ काम करते हैं और अतिरिक्त आय कमा  लेते हैं।

"१९५१ई. में न्यूयार्क के एक सर्वेक्षण में ९४ संस्थाओं ने कहा कि वे वृद्ध कामगरों को अपना दुष्टतम शत्रु मानते हैं क्योंकि वे बात अधिक करते हैं, उन्हें कुछ नहीं सुहाता है, वे अपनी कार्य प्रणाली नहीं बदलते और न ही अनुशासन का पालन करते हैं।  तभी तो, ९७ प्रतिशत अमेरिकी विज्ञापन में यह देखा गया है कि नौकरी के लिए चालीस वर्ष की सीमा रखी होती है। जितना बड़ा उद्योग होगा, वहाँ उतनी ही तेज़ी से काम होता है; इसलिए यहाँ वृद्धों को जितना शीघ्र अवकाश दे पाएँ उतना उत्तम समझा जाता है।"

औद्योगिक प्रगति की सबसे बड़ी हानि यही रही कि मशीन को मनुष्य पर तरजीह दी गई।  मशीनों के आधुनिकीकरण से मनुष्य की उपयोगिता घटती गई और वह आर्थिक संकट में घिरता गया। यही कारण है कि व्यक्ति के काम करने की क्षमता और बेरोज़गारी के बीच कोई संबंध नहीं होता है।  इसकी पड़ताल करते हुए सिमोन बताती है:-

"१९५५ई. में आई  एल ओ [इंटरनेशनल लेबर ओर्गानाइज़ेशन] की एक रिपोर्ट में कहा गया  कि बेरोज़गारों की औसत आयु पचास वर्ष है।  कई लोग ऐसे होते हैं जो कार्य करने की क्षमता रखते हैं पर उन्हें घर भेज दिया जाता है। कारण यह बताया जाता है कि इन लोगों में शारीरिक शक्ति कम होती जाती है, सुनने और देखने की शक्ति क्षीण  पड़ जाती है, थकान, ठंड, गर्मी, नमीं, ध्वनि से जुड़े  कारण  इनकी कार्यक्षमता को कम कर देते हैं। कहा जाता है कि ऊँचे पदों पर बैठे प्रौढ़ अधिकारियों में भी यह देखा गया है कि निर्णय लेने की क्षमता में अनिश्चितता आ जाती है और कोई नया कदम उठाने से वे कतराते हैं जबकि युवा अधिकारी निर्णय लेने और उन्हें कार्यान्वित करने में चुस्ती दिखाते हैं। परंतु इस विचार को विज्ञान के अनुसंधान ने नकार दिया है।  इंग्लैंड की न्यूफ़ील्ड फ़ाउंडेशन का कहना है कि बढ़ती उम्र की कमियों को वे कई अन्य उपायों से दूर कर लेते हैं। यार्कशायर के कपड़ा मिल की वृद्ध महिलाएँ अधिक क्षमता से धागा पिरो लेती हैं भले ही  उनकी आँखें कमज़ोर पड़ गई हों।  १९४७ई. की इंग्लैंड की एक  रिपोर्ट में ११,१५४ कामगरों पर किए गए शोध का निष्कर्ष यह निकला कि खान मज़दूरों में उम्र के कारण क्षमता में कोई अंतर नहीं आया।  न्यूफ़ील्ड फ़ाउंडेशन ने यह स्वीकार किया कि जहाँ अधिक शक्ति के प्रयोग या हर समय हरकत करते रहने के कार्य हैं, वहाँ बूढे कामगरों को थोड़ा अधिक समय लगता है, परंतु कार्यकुशलता में कोई अंतर नहीं आता।  वृद्धों को कार्य देने के लाभ-हानि का जायज़ा लेते हुए बताया गया है कि काम में प्रसन्नता, नियमितता, सतर्कता, समय की पाबंदी, इच्छाशक्ति, अनुशासन, धैर्य और अंतर्विवेक जैसे लाभ हैं; तो दृष्टि और श्रवण शक्ति की कमी, शारीरिक व स्मरण शक्ति में कमी, चपलता में कमी, कल्पना एवं सृजनशीलता का अभाव; अनुकूलनशीलता, सतर्कता, शारीरिक बल तथा आपसी समन्वय जैसे तत्वों   का अभाव वृद्धों के पक्ष में नहीं जाता। फिर भी, विश्वयुद्ध के समय कनाडा, अमेरिका और इंग्लैंड के वृद्ध कर्मचारियों के कार्य को देखते हुए १९५०ई. की  जांच ने यह निष्कर्ष निकाला कि वृद्ध कामगर भी कार्यकुशल होते हैं।"

ऐसे निष्कर्षों के बावजूद यह देखा गया है कि वृद्धों और महिलाओं को काम पर लगाने से मालिक कतराते हैं और यदि काम पर लेते भी हैं तो उन्हें कम दाम देते हैं।  इसे शोषण ही कहा जाएगा | परंतु मालिक तो अपना लाभ ही देखेंगे!  इस युग में भी वृद्धों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डालते हुए सिमोन बताती हैं:-

"मार्सेलिस और सेंट एंटीन के वृद्धों पर हुए शोध से  यह निष्कर्ष निकला है कि दस प्रतिशत पुरुष और उन्नीस प्रतिशत महिलाएं भुखमरी में जी रहे हैं।  प्रो. बोर्ली कहते हैं कि पेरिस के क्षेत्र में कई हज़ार वृद्ध हर वर्ष भूख से मर जाते हैं; और हर वर्ष कई पत्र-पत्रिकाओं में वृद्धों के ठंड से मरने के समाचार छपते रहते हैं।  इंगलैंड, बेल्जियम, जर्मनी तथा इटली में भी लगभग यही स्थिति है।  एक गरीब पेन्शनधारक ने अपनी परिस्थिति का वर्णन करते हुए कहा था कि पेन्शन का पैसा मरने के लिए अधिक है और जीने के लिए कम ।  फिर भी, किसी भी वृद्ध को वृद्धाश्रम जाने की इच्छा नहीं होती।  वह वहीं मरना चाहता है जहाँ वह रह रहा है।"

प्रश्न यह है कि ये वृद्ध जाएं तो कहाँ जाएं कहाँ?  घरवाले रखना नहीं चाहते, प्रशासन पेंशन के अतिरिक्त कुछ और करता नहीं दिखाई देता ।  इसका समाधान वृद्धाश्रम हो सकता है; परंतु वृद्धों की मानसिकता तथा इन स्थानों की दयनीय स्थिति शायद समस्या को हल नहीं कर पाती।  इस समस्या पर प्रकाश डालते हुए सिमोन आगे कहती हैं :-

"इंग्लैंड में यह चलन है कि स्वस्थ वृद्धों की देखभाल परिवार करे, बीमार वृद्धों को अस्पताल भेजा जाय और अक्षम बूढ़ों को वृद्धाश्रम/अनाथाश्रम में रखा जाय।  अमेरिका ने भी इंग्लैंड की यही प्रथा जारी रखी।  १८८३ई. में केलिफ़ोर्निया राज्य में उन लोगों को सरकारी सहायता दी जाने लगी जो वृद्धाश्रम चला रहे हैं; परंतु यह सुविधा १८९५ई. में निकाल दी गई क्योंकि ये संस्थाएं वृद्धों के नाम पर पैसा लूटती हैं ।  इसके बदले सरकार ने खुद संस्थाएं स्थापित कीं  जहाँ वृद्धों की देखभाल हो सके।  फिर भी, वृद्धों की दयनीय स्थिति में कोई अंतर नहीं आया।  एक वृद्ध ने सेनिटोरियल कमिशन में अपने विचार देते हुए कहा था कि वृद्धों की दयनीय स्थिति के तीन कारण हैं- खराब स्वास्थ, गरीबी और एकाकीपन।

"एकल परिवार, शहरीकरण, कम आय और घरों की कमी - कुछ ऐसे कारण हैं जिन्हें  लेकर इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, कनाड़ा जैसे देश भी जूझ रहे हैं।  चूंकि जापान और जर्मनी में अब भी बूढ़े माता-पिता के अपनी संतान के साथ रहने की प्रथा है, समस्या कुछ हद तक स्थिर है।  परंतु जहाँ युवक गाँव या नगर छोड़कर शहर जा रहे हैं, परिस्थिति गम्भीर बनी हुई है।  ऐसे गाँव और नगर केवल बूढ़ों से भरे हुए हैं।

"वृद्धों के घर की  समस्या हल करने में स्विज़रलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड ने काफी सराहनीय कार्य किया है।  इसी प्रकार कोपेनहेगन व स्वीडेन ने भी वृद्धों और गरीबों के घर की समस्या हल की है।  अमेरिका जैसे देशों में वृद्धाश्रम या वृद्धों का ग्राम एक व्यवसाय बन गया है।  फ़्रांस में ‘होस्पाइस’ संस्थाएं वृद्धों के लिए बनाई गई हैं। ये संस्थाएं वृद्धों का आखरी धाम बन जाती  हैं।  अब तक इनमें २,७५,००० बिस्तर हैं जो पूरी तरह भर चुके हैं और लगभग दो लाख वृद्ध प्रतीक्षारत हैं।  इन संस्थाओं में जगह पाने के इच्छुक लोगों के चार मुख्य कारण हैं- संसाधनों की कमी, आश्रय की आवश्यकता, संतान का अपने पास रखने से इंकार और चिकित्सा की आवश्यकता।

"महिलाओं को इन संस्थाओं में सामन्जस्य बिठाने में अधिक कठिनाई इसलिए होती है कि वे परिवार में काम करने की  आदी होती  हैं और परिवारवालों से बंधे लगाव के कारण उन्हें अधिक मानसिक कष्ट होता है। इन संस्थाओं में आकर रहनेवालों को ऐसा लगता है कि उन्हें जड़ से उखाड दिया गया हो।  ऐसे मानसिक तनाव को झेलते हुए बहुत से वृद्ध एक वर्ष के भीतर ही मर जाते हैं। इन संस्थाओं के कानून भी कठोर होते है जिनके कारण उस आयु के लोग मानसिक तौर पर टूट जाते हैं।  उनको सारा दिन समय बिताने में कठिनाई होती है और जीवन में शून्यता छा जाती है।  सामाजिक जीवन से दूर उदास और निरुद्देश्य जीवन उन्हें धीरे-धीरे मौत की ओर ले जाता है।  उन्हें महसूस होने लगता है कि वे जीवंतता से दूर होते जा रहे हैं और भविष्य में उनके लिए मृत्यु के सिवाय कोई और चारा नहीं है।"

जीवन के इस मोड़ पर स्त्री और पुरुष का दृष्टिकोण भी अलग होता है। यह देखा गया है कि महिलाएं साधारणतया वृद्धाश्रम के जीवन को भी आसानी से झेल लेती हैं। इसका कारण बताते हुए सिमोन कहती हैं कि :-

"वृद्धाश्रम के जीवन को महिलाएं अधिक सफ़लता से अपना लेती हैं।  महिलाएं आपस में हँस-बोल लेती हैं और साफ़-सफ़ाई से लेकर पकाने तक के कामों से अपनी दिनचर्या बिता देती हैं।  पुरुषों के लिए ऐसे कोई कार्य नहीं होते।  वे दिन भर बिस्तर पर पडे रहते हैं या जिनके पास कुछ पैसे हैं, वे शराब पीकर समय बिताते हैं।

"सेवानिवृत्ति का प्रभाव अलग-अलग वर्ग के लोगों पर अलग-अलग ढंग से पड़ता है।  यदि कोई अधिकारी सेवा निवृत्त होता है तो उसे ऐसा लगता है जैसे उसका अस्तित्व ही मिट गया हो।  कुर्सी की सत्ता को छोड़ने पर उसे जीवन बिना चप्पू की नाव प्रतीत होता है ।  मज़दूर जब सेवा निवृत्त होता है तो उसे धनाभाव की चिंता सताती है यद्यपि वह  इस बात पर राहत की सांस लेता है कि उसे अब कठिन परिश्रम नहीं करना पड़ेगा।  दोनों का अलग दृष्टिकोण होता है। एक सत्ता के चले जाने से उदास है तो दूसरा धनाभाव से, पर दोनों के मन में एक ही बात चुभती है - अब उन्हें कौन पूछेगा! सत्ता नहीं तो पूछ नहीं, पैसे नहीं तो पूछ नहीं।

"सेवानिवृत्ति का समय करीब आने पर पत्नी भी चिंतित रहती है।  उसे अपनी गृहस्थी पर आनेवाले वित्तीय संकट की चिंता सताती है।  सभी जरावैज्ञानिक  [जेरेंटोलोजिस्ट] इस बात पर एक मत हैं कि जीवन के अंतिम बीस वर्षों में स्वस्थ व्यक्ति भी मानसिक एवं सामाजिक दृष्टि से असहज हो जाता है जब कि कोई व्यस्थता नहीं रहती।  उसे जीने का उद्देश्य ही दिखाई नहीं देता और यह परिस्थिति मृत्यु से अधिक कष्टदायी दिखाई देती है। इसीलिए जरावैज्ञानिकों का मानना है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी व्यक्ति को व्यस्त   रहना चाहिए अन्यथा वह आलस्य व उदासी के घेरे में आ जाएगा और उसका स्वास्थ्य गिरता जाएगा।"

सेवानिवृत्ति एक कठिन और जटिल समस्या है जिसमें व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक क्षरण होता है और इसे रोकने के लिए उसे निरंतर किसी कार्य में लगे रहना चाहिए। परंतु यदि ऐसा हुआ तो वृद्ध काम पर लगे रहेंगे और युवा पीढ़ी बेरोज़गार रहेगी। युवा पीढ़ी की बेरोज़गारी सरकार और समाज के लिए और अधिक गम्भीर परिणाम लेकर आएगी।  आज के बेरोज़गार या तो आत्महत्या कर रहे हैं या आतंकवाद और नक्सलवाद की  उग्र दिशा में जा रहे हैं।  अच्छा हो कि प्रौढ पीढी युवा पीढ़ी के लिए स्थान बनाएं और सेवानिवृत्ति के बाद समय का सदुपयोग करने की योजना पहले से ही बना कर रख लें। यह कार्य किसी समाज-सेवी संस्था से जुड़ कर भी पूरा किया जा सकता है। तब वृद्धों का जीवन सुख-शांति से बीतेगा।  घर ही वह स्थान हो सकता है जहाँ वृद्ध अपना अंतिम समय चैन से बिता सकता है- अपना घर, वह चाहे छोटा हो या बड़ा, संसाधनों से भरा भले ही न हो, संस्मरणों से भरा तो होगा ही।   
    

9 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप ने विस्तार से वृद्ध लोगो का दुख व्यान किया, युरोप मे तो फ़िर भी चल जाता है , लेकिन भारत ओर अन्य गरीब देशो मै तो वृद्ध लोगो का बुरा हाल कर देते हे उन के अपने ही बच्चे, इस लिये अंतिम समय तक इन वृद्धओ को चाहिये कि अपनी सम्पंती को समभाल कर रखे, ओर इन नालायक बच्चो के झूठे प्यार मे आ कर अपने पेर पर कुलहाडी ना मारे, जो सेवा करे अंत मे उसे ही मेवा भी मिले वर्ना सब समपंती किसी को दान देदे, आप का धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

ज्ञानपूर्ण आलेख। सारे के सारे विषय चिनतनीय हैं।

विवेक सिंह ने कहा…

बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

विचारणीय है.... सारी बातें..... इतना विस्तार से बताया आभार

SACCHAI ने कहा…

gyanvardhak aalekh ke liye aabhar

----- eksacchai { AAWAZ }

राहुल गाँधी याने .. सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली |

http://eksacchai.blogspot.com/2010/10/blog-post_07.html#links

ZEAL ने कहा…

ज्ञानपूर्ण आलेख

डॉ टी एस दराल ने कहा…

औसत आयु के बढ़ने से वृद्धों की बढती संख्या को मुद्दे नज़र रखते हुए , समाज की वृद्धों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है । अपने विस्तार से इस विषय के बारे में अवगत कराया । आभार ।

shiva ने कहा…

Gyanvardhak Aalekh ke leyai Bahut-Bahut Dhanayawad.

रंजना ने कहा…

सोचने को मजबूर करती इस सुन्दर पोस्ट के लिए आपका साधुवाद...

यह विषय मुझे भी बहुत उद्वेलित करती है...