सोमवार, 1 जून 2009

बाबा नागार्जुन की कविताएँ - सन्‌ १९६२ ई.

१९६२ युद्ध पर बाबा नागार्जुन ने कुछ कविताएँ लिखी थीं जो उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में छपी थी। धर्मयुग के २३ दिसम्बर १९६२ अंक में छपी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं :-


तप्त लहू की धार बह चली
वो निकले ज़हरीले कीडे़, लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

हमने देखा रंग बर्फ़ का बदल रहा है

शांति सुंदरी का तो दम ही निकल रहा है

जी करता है, सीखूं मैं बंदूक चलाना

जी करता है, सीखूं मैं फ़ौलाद गलाना

जी करता है, जन-मन में भड़काऊँ शोले

जी करता है, नेफ़ा पहुंचूं, दागूं गोले

विश्व शाँति की घायल देवी चीख रही है

सर्वनाश की डायन हँसती दीख रही है

दुनिया की छत पर टपका है लाल दनुज की

पंचशील से बिदक गई चेतना मनुज की

सीमाओं पर लहराया भारत का यौवन

छलक गया लहू, शर्म से पिघला कंचन

दीपशिखा-सी कोटि-कोटि मन की इच्छाएँ

मचल उठी है, सेनापति का इंगित पाएँ

वो निकले ज़हरीले कीडे़ लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

कट्टर कामरेड
आओ जी, आओ जी, आओ जी

माओ-सी, शाओ-ची, चाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

हटा नहीं आँखों का पट्टर

कामरेड हूँ कैसा कट्टर

मुझे लील लो

मुँह तो पुरा बाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी!
जपता हूँ स्टेलिन का नाम

नेफ़ा क्या आएगा काम

पेकिंग-मास्को-बर्लिन-प्राग

घूम चुका हूँ चारो धाम

नेहरू को गालियाँ सुनाईं

तुमको किया सदैव प्रणाम

वर्ग चेतना के गुरुदेव

तुम से डरता है ख़्रुश्चेव

मुझ बुद्धू को आँखें मत दिखलाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

नये तर्ज़ पर इंटरनेशनल गाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

---साभारः साहित्यपरिक्रमा-अप्रेल-जून २००९

2 टिप्‍पणियां:

शिशु ने कहा…

प्रिय भाई
साधुवाद प्रणाम!

ऐसे कवितायेँ बहुत कम पढ़ने और सुनने को मिलती हैं.
मन बाग़ बाग़ हो गया!
कुछ लाइने मैंने नोट कर ली हैं -
आओ जी, आओ जी, आओ जी
माओ-सी, शाओ-ची, चाओ जी
आओ जी, आओ जी, आओ जी
हटा नहीं आँखों का पट्टर
कामरेड हूँ कैसा कट्टर

और ऐसी कविताओं की प्रतीक्षा में आपका -
शिशु
http://iamshishu.blogspot.com/

Sachi ने कहा…

Wonderful poems....
baba ki yaad aa gayee...

unke jaise kavi bahut kam hue, jo kisi ko bhee gale laga lete they..

unki kavitaein bhee sabke lie hoti thee...
plaese kuch aur kavitaein post kijiye..