मंगलवार, 30 जून 2009

‘झूठा सच’ - यशपाल


‘झूठा सच’ में मानसिकता का चित्रण
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उपन्यासकार यशपाल का नाम हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद सर्वाधिक सशक्त लेखक के रूप में लिया जाता है। उनके वृहत उपन्यास ‘झूठा सच’ में देश के विभाजन की त्रासदी के साथ-साथ मानव की मानसिकता के विभिन्न पहलुओं का भी गम्भीर चित्रण मिलता है।
‘झूठा सच’ की एक मुख्य पात्र है तारा - जो विभाजन के तूफानी दिनों में अपने संस्कार और खनदानी मर्यादा की दुहाई पर अपने मुस्लिम प्रेमी को त्याग कर एक हिंदू घराने में ब्याह तो कर लेती है; परंतु दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ता। पति की उलाहना और जहालत से बचने के लिए वह घर से भाग निकलती है और देश में विभाजन को लेकर चल रहे उस आतंकी माहौल में एक मुस्लिम गुंडे के हत्थे चढ़ जाती है। दूसरे दिन वहाँ की महिलाओं की बातचीत में उस समय की मानसिकता देखी जा सकती है।
"यह तो हिन्दनी है। इन्हें खराब किया तो क्या? ये बेहया तो इसी लायक है।"
"तेरे लिए हिंदू ऐसा कहें तो कैसा लगे? औरत को तो औरत का दरद होना चाहिए। खुदा न करे तू किसी ऐसे के बस में पड़ जाए। अल्ला-ताला ने हिंदू-मुसलमान मर्दों में तो फ़रक किया है, औरतों में तो उसने भी कोई फरक नहीं रखा।"
"मरे आपस में लड़ते हैं, मिट्टी औरतों की खराब होती है।"
"खुदावन्द ने तो मर्द पर फ़र्ज़ आयद किया है कि औरत पर रहम करे और उसकी हिफ़ाज़त करे क्योंकि औरत मर्द को अपने जिस्म से पैदा करती है और पालती है।"
"खाक रहम और हिफ़ाज़त करते हैं। बेहया जहाँ से निकलते हैं, उसी को बेइज़्ज़त करते हैं। मर्द मुहब्बत करे तो, गुस्सा करे तो, उनका तो सब ज़ोर वहीं उतरता है।"
तारा को लाहौर के उस इलाके के जानेमाने वयोवृद्ध समाजसेवी हाफ़िज़ जी के हवाले किया जाता है। वे तारा को अपने घर ले जाते हैं और अपने परिवार के साथ रखते हैं। उनकी बेगम जब हिंदुओं और मुसलमानों में स्त्री की तुलनात्मक अवस्था की बात छेड़ती हैं तो हाफ़िज़ जी बताते हैं कि "हिंदुओं की सभ्यता आदिम और बर्बर है। वे लोग औरत को अपने हैवानों की तरह खानदान की जायदाद समझते हैं। बेवा को खाविंद की लाश के साथ जला देना सवाब समझते हैं। इससे ज्यादा हैवानियत और क्या होगी! इस्लामी शरह में लड़के-लड़की दोनों को जायदाद पर हक दिया गया है। तलाक का हक मर्द और औरत दोनों को हासिल है। मर्द को एक वक्त में चार से ज़्यादा बीवियाँ रखने का हक नहीं। हिंदुओं में चार हज़ार पर भी पाबंदी नहीं है।...उनका किरसन, जिसे हिंदू अपना खुदा मानते हैं, सोलह हज़ार औरतों से ताल्लुक रखता था। लेकिन हिंदू की औरत अगर बेवा हो जाय तो शादी का हक नहीं रखती। हिंदू की बहिन, बेटी, औरत एक दिन के लिए राह भटक जाए, बाप या शौहर से दूर रह जाए तो फिर घर में जगह नहीं पा सकती। हिंदू लोग तो औरत को मिट्टी का कुल्हड़ समझते हैं। एक शक्स ने पानी पी लिया और उसे फेंक कर तोड़ दिया।...खुदा ने औरत को फ़रीस्ता सीरत बनाया है लेकिन इबलीस [शैतान] उसके दिमाग पर गालिब रहता है इसलिए शरह में हुक्म है कि वह मर्द की हिफ़ाज़त में रहे - बचपन में बाप की हिफ़ाज़त में जवानी में शौहर की और बुढ़ापे में अपने बेटों के...।"
तारा ऐसी बातों को सुनती रहती और सोचती रहती कि स्त्री को पर्दे और बुर्के में बंद रखनेवाले, मर्दों के सामने आने का हक न रखनेवाली स्त्रियों की स्वतंत्रता और मर्दों से समता की बातें कितनी अनर्गल है। इन बातों का असर तारा पर नहीं होता है और जब हाफिज़ जी के पर भी वो इस्लाम कुबूल नहीं करने की इच्छा व्यक्त करती है तो हाफिज़ जी की बहू कहती है-
"इन हिन्दनियों को लावारिस गाय-बछिया की तरह उघाडे़ मुँह-सिर और गली-बाज़ारों में घूमने-फिरने की आदत पड़ जाती है। ये शरीफ-बाइज़्ज़त औरतों की तरह पर्दे में कैसे रह सकती हैं? हम लोगों के ऊपर बुर्का न हो तो दरवाज़े के बाहर कदम उठाना मुश्किल। खुदा की कहर पडे़ इन बेहयायों पर। हया न हुई तो औरत क्या हुई?"
ऐसा नहीं है कि इस उपन्यास के सभी मुस्लिम पात्र हिंदुओं के प्रति द्वेष रखते हैं। तारा का प्रेमी असद एक बहस के दौरान यह मानता है कि "हिंदुत्व कोई मज़हब या धर्म-विश्वास नहीं है। वह एक समाज और संस्कृति है। उसमें विश्वासों के बंधन नहीं, व्यवहार के बंधन हैं। आप भगवान में विश्वास करें तो हिंदू , विश्वास न भी करे तो अपने-आपको हिंदू कह सकते हैं। आप चाहें जैसे भगवान में, साकार में या निराकार में, एक ही भगवान में, या अनेकों भगवानों में विश्वास कर सकते हैं। अवतारों में विश्वास कीजिए या ना कीजिए; ब्रह्म, जीव और माया को एक मानिए या पृथक-पृथक; पुनर्जन्म को भी मानने या न मानने की स्वतंत्रता है। बंधन केवल सामाजिक खान-पान और विवाह के नियमों का है। हिंदू समाज में चिंतन की स्वतंत्रता है, व्यवहार की नहीं। इस्लाम ऐसी स्वतंत्रता सहन नहीं कर सकता। इस्लाम चिंतन का नहीं, विश्वास का मार्ग है। आप खुद से मुनकिर नहीं हो सकते। आप खुदा से मुनकिर हैं तो आप काफ़िर हैं। यहीं तक हद नहीं है, उस खुदा का एक रसूल भी मानना होगा और वह रसूल केवल मोहम्मद साहब को मानना होगा। आप आज के विज्ञान और साइंस से खुदा के संबंध में तर्क नहीं कर सकते क्योंकि जिस वक्त मुहम्मद साहब पर इस्लाम का इलहाम नाज़ल हुआ था, यह विज्ञान मौजूद नहीं था।"
यशपाल ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से उस समय की सामाजिक स्थिति और दो समाजों की मानसिकता का जायज़ा लिया है जो देश विभाजन की त्रासदी से गुज़र रहे थे। प्रश्न यह है कि क्या यह मानसिकता बदली भी है?

बुधवार, 17 जून 2009

दूसरे ग्रहों के कीट

दूसरे ग्रह के कीट


वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्होंने ग्रीनलैंड की बर्फीली परत में दबे एक अतिसूक्षम रहस्यमय बैक्टीरियम को जीवित किया है जिसके बार में उनका कहना है कि यह शायद दूसरे ग्रहों के जीवों से मिलता-जुलता है। अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक दल ने ग्रीनलैंड में बर्फ की परतों के तीन किलोमीटर नीचे १,२०,००० वर्ष तक दबे रहे ‘हरमिनिमोनास ग्लैसीइ’ कीट को जीवित किया है। वैज्ञानिक इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं क्योंकि इसकी समानता उन ‘माइक्रोब’ से की जा सकती है जिनका विकास बर्फ में या अन्य ग्रहों पर हुआ होगा।

अभी तक की सूक्षमतम बैक्टीरियम ‘एश्चीरिचिया कोलाइ’ से करीब १० से ५० गुणा छोटे आकार की इस नई खोज ‘हरमिनिमोनास ग्लैसीइ’ के बारे में पेनसिलवानिया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रमुख जेनिफ़र लवलैंड कुट्रेज़ का मानना है कि "सबसे अनूठी बात यह है कि यह बहुत ही सूक्ष्म है और बहुत कम पोषक तत्त्वों पर भी टिक सकता है।"

वैज्ञानिकों ने पाया कि यह कीट बर्फ के पतले से बारीक रेशे में जीवित रह सकते हैं और बर्फ के साथ दबे पोषक तत्त्वों के कुछ कणों पर टिक सकते हैं। डॉ. कुट्रेज़ के मतानुसार " बर्फ के साथ ही धूल होती है, बैक्टीरिया की कोशिकाएँ होती हैं, फफूंद के स्पोर वनस्पति स्पोर, खनिज और अन्य जैविक मलबे होते हैं। सो हमारा कयास है कि वह इन सूक्षम पोषणों पर जीते है।" यह विचार उन्होंने विज्ञान पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ में व्यक्त किये हैं।

[दैनिक पत्र स्वतंत्र वार्ता के १६ जून अंक से साभार]

शनिवार, 6 जून 2009

सन२००९- अंतर्राष्ट्रीय खगोलविज्ञान वर्ष

चार सौ वर्ष पूर्व गेलिलियो गेलिली (१५६४-१६४२ई.) नामक वैज्ञानिक ने टेलिस्कोप का अविष्कार सन १६०९ई में किया और आकाश पर दृष्टि दौडा़ई थी। उन्होंने निकोलस कोपर्निकस (१४७३-१५४३ई.) के उस कथन का समर्थन किया कि धरती सूर्य के गिर्द घूमती है; जबकि उस समय के धर्मानुसार धरती को समस्त सृष्टि का केंद्र बिंदु माना जाता था। धर्माचार्यों ने जब इस कथन का विरोध किया तो उन्हें खामोश हो जाना पडा़ था, पर सच्चाई तो विद्वानों के सामने आ ही गई थी।
उसी वर्ष एक और वैज्ञानिक व चिंतक जोहनेस केप्लर ने अपनी कृति ‘एस्ट्रोनोमिया नोवा’ में गणित के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि मंगल ग्रह का भी एक सुनिश्चित परिक्रमा पथ है और सभी ग्रह इसी प्रकार अपने-अपने निर्धारित पथ पर सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
आधुनिक खगोल विज्ञान की आधारशिला इन दो महान वैज्ञानिकों के निष्कर्षों पर ही आधारित है। इन महान खगोल शास्त्रियों के अविष्कारों के चार सौ वर्ष बाद संयुक्तराष्ट्र महासंघ ने वर्ष २००९ को अंतर्राष्ट्रीय खगोलविज्ञान वर्ष घोषित किया है। गेलिलियो तथा केप्लर के प्रति आधुनिक खगोलवैज्ञानिकों के श्रद्धासुमन के रूप में इस वर्ष को देखा जा सकता है।

गुरुवार, 4 जून 2009

भारत-गांधी नेहरू की छाया में - गुरुदत्त

प्रसिद्ध उपन्यासकार गुरुदत्त ने अपनी पुस्तक ‘भारत- गांधी नेहरू कि छाया में’ में नेहरू जी के बारे में कहाहैं :-
"एक सुंदर रथ पर एक भव्य मूर्ति बैठी हुई एक मार्ग पर चल पड़ी थी। मार्ग तट पर खड़े कोटि-कोटि जन को भी उस भव्य पुरुष ने अपने साथ आने का आह्वान किया और जन साधरण सुन्दर रथ और उस में बैठे भव्य पुरुष को देख, रथ के साथ-साथ चल पडा। उन सब का इस सुन्दर रथ के साथ चल पड़ना यह सिद्ध नहीं करता कि रथ ठीक मार्ग पर चला जा रहा था। वास्तव में जनता का मन और बुद्धि भी तो उसी कारखाने में बनी थी, जिसमें रथ पर बैठे भव्य पुरुष का मन और उसकी बुद्धि बनी थी। अतः जनता भी चल पड़ी थी, उधर ही, जिधर रथ जा रहा था।
"नेहरू जी के मन और बुद्धि ने कुछ तो किया है। सन १९४७ से १९६४ तक भारत में उद्योग-धन्धों में द्रुत गति से प्रगति हुई है। इस पर भी यह निर्विवाद ही है कि देश और जातियां उद्योग-धन्धो से ही जीवित नहीं रह सकतीं। केवल ये ही किसी जाति का जीवन है, कोई मूर्ख ही ऐसा मानेगा। इन उद्योग-धन्धों के भुलावे में जर्मनी दो बार ठोकर खा चुका है। यदि वह आज जीवित है तो अमेरिका की सहायता पा जाने के ही कारण है। पूर्वी जर्मनी का उदाहरण पाठकों के समक्ष है।
"आज अंग्रेज़ी काल से भी अधिक उद्योग और धन्धे चलाये जा रहे हैं और जन-मन अंग्रेज़ी काल से भी अधिक पतित और कष्ट में है। जनता नैतिक दृष्टि से पतनोन्मुख, मानसिक दृष्टि से हीन और शारीरिक दृष्टि से दुर्बल हो रही है। यदि यह है तो यह नेहरू काल की नीतियों के कारण ही है। १९४७ से १९६५ तक भारत में प्रत्येक बात का ह्रास हुआ है और इसमें नेहरू जी के विचारों और नीतियों का महान भाग है।"

बुधवार, 3 जून 2009

धर्म ही नहीं जाति भी बदल रहे हैं लोग

नागरिक अपना धर्म किसी लोभ के कारण बदल रहे थे। अब यह देखा जा रहा है कि लोग राजनीतिक नीतियों के कारण अपनी जाति भी बदल रहे है और लाभ उठा रहे है। ऐसे ही एक मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पहले लोग धर्म बदलते थे और अब जाति भी बदल रहे हैं। यह विचार न्यायमूर्ति काटजू जी ने उस समय व्यक्त किया जब छात्रा नीलम का प्रवेश महाराष्ट्र की सरकार ने निरस्त कर दिया और छात्रा ने कोर्ट की पनाह ली।

क्या अब समय नहीं आ गया है कि हमारे नेता आरक्षण नीति पर पुनःविचार करें और आर्थिक आधार पर सहायता पहुँचाए। तब तक ‘दलित की बेटी’ के नाम पर मुख्यमंत्री बने या सांसद के अध्यक्ष, पर वे हैं तो ‘करोडपत्नि’ ही।

सोमवार, 1 जून 2009

बाबा नागार्जुन की कविताएँ - सन्‌ १९६२ ई.

१९६२ युद्ध पर बाबा नागार्जुन ने कुछ कविताएँ लिखी थीं जो उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में छपी थी। धर्मयुग के २३ दिसम्बर १९६२ अंक में छपी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं :-


तप्त लहू की धार बह चली
वो निकले ज़हरीले कीडे़, लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

हमने देखा रंग बर्फ़ का बदल रहा है

शांति सुंदरी का तो दम ही निकल रहा है

जी करता है, सीखूं मैं बंदूक चलाना

जी करता है, सीखूं मैं फ़ौलाद गलाना

जी करता है, जन-मन में भड़काऊँ शोले

जी करता है, नेफ़ा पहुंचूं, दागूं गोले

विश्व शाँति की घायल देवी चीख रही है

सर्वनाश की डायन हँसती दीख रही है

दुनिया की छत पर टपका है लाल दनुज की

पंचशील से बिदक गई चेतना मनुज की

सीमाओं पर लहराया भारत का यौवन

छलक गया लहू, शर्म से पिघला कंचन

दीपशिखा-सी कोटि-कोटि मन की इच्छाएँ

मचल उठी है, सेनापति का इंगित पाएँ

वो निकले ज़हरीले कीडे़ लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

कट्टर कामरेड
आओ जी, आओ जी, आओ जी

माओ-सी, शाओ-ची, चाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

हटा नहीं आँखों का पट्टर

कामरेड हूँ कैसा कट्टर

मुझे लील लो

मुँह तो पुरा बाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी!
जपता हूँ स्टेलिन का नाम

नेफ़ा क्या आएगा काम

पेकिंग-मास्को-बर्लिन-प्राग

घूम चुका हूँ चारो धाम

नेहरू को गालियाँ सुनाईं

तुमको किया सदैव प्रणाम

वर्ग चेतना के गुरुदेव

तुम से डरता है ख़्रुश्चेव

मुझ बुद्धू को आँखें मत दिखलाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

नये तर्ज़ पर इंटरनेशनल गाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

---साभारः साहित्यपरिक्रमा-अप्रेल-जून २००९