रविवार, 26 फ़रवरी 2012

अवकाश

आदरणीय ब्लागर मित्रो,
अस्वस्थ होने के कारण शायद अंतरजाल पर  न आ  पाऊँ  ।  इसलिए कुछ समय के लिए शायद आप से भेंट न हो। स्वास्थ लाभ करके पुनः आपसे सम्पर्क स्थापित करूंगा। तब तक के लिए विदा:)

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

कुछ उजाले, कुछ अँधेरे




कुछ उजाले, कुछ अंधेरे

बैकुंठ नाथ पेशे से वास्तुविद भले ही हों, पर हृदय से एक रचनाकार हैं जिनकी अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें उनके गीतों, कविताओं और कहानियों की अभिव्यक्ति हुई है।  ‘कुछ उजाले, कुछ अँधेरे’ उनका नवीनतम कथा संग्रह है जिसमें इक्कीस कहानियाँ संग्रहित हैं।  इन कहानियों से गुज़रते हुए पाठक को महसूस होगा कि लेखक एक सफल पर्यटक के अलावा पैनी दृष्टि का मालिक भी है।

जैसा कि कहानी संग्रह के शीर्षक से पता चलेगा कि इन कहानियों में जीवन की आशा-निराशा, अमीरी-गरीबी, प्रेम-घृणा जैसी मनोवृत्तियों को कहानीकार ने उजागर किया है।  अधिकतर कहानियों में गरीबी की विवशता और प्रेम के विविध रूपों का चित्रण मिलता है।  

बैकुंठ नाथ की कहानियों में गरीब की विवशता के साथ उसकी आस्था, आशा और आदर्श की झलक भी मिलती है। कहानी ‘तुम बिन को भगवान’ में उस गरीब के चरित्र की झलक मिलती है जो पहले किसी धनवान के यहाँ काम करता था और अब रिक्शा चला रहा है।  जब वह धनवान उसी रिक्शा में चढ़ कर अपने गंतव्य को पहुंचता है तो वह अपने पुराने मालिक को पहचान कर पैसे लेने से इंकार कर देता है, भले ही उसका परिवार एक दिन की रोटी से चूक जाएगा। 
गरीब बच्चे का परिवार भले ही एक कमरे में रहता हो पर जब वह अपनी पुस्तक में डाइनिंग रूम, किचिन, लाइब्रेरी आदि का वर्णन पढ़ता है तो उसे अपने भविष्य के प्रति आशा जागती है और वह सपने देखता है जो शायद कभी पुरे नहीं होंगे।  इसी को कहानीकार ने अपनी कहानी ‘आशा जीवन का सोपान’ में सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।  बेज़बान, हमसे कुत्ते अच्छे हैं, दीन्हिं लखै न कोय, छाबड़ीवाला, चुपके लागे घाव ऐसी ही कुछ कहानियां हैं जिनमें गरीबी से जुड़ी समस्याओं को कहानीकार ने उजागर किया है।  इनमें एक कहानी ‘गरम कमीज़’ भी है जिसे पढ़कर लगता है कि बैकुंठ नाथ ने इसे गोगोल की कहानी ‘द कोट’ से प्रभावित होकर लिखा है।

प्रेम के विविध रूप पर लिखी कई कहानियाँ इस कृति में मिलेंगी। नैतिकता-अनैतिकता, क्षणिक से लेकर गम्भीर प्रेम, सच्चा प्रेम और दैहिक प्रेम पर लिखी गई कहानियों पर लेखक एक स्थान पर बताते हैं कि "समय परिचय करा देता है।  परिचय मित्रता में बदल जाता है और मित्रता अक्सर प्रेम में  परिवर्तित हो जाती है।  परिचय घटनाओं की देन है- समय की संधि है; मित्रता एक मार्ग है और प्रेम सम्भवतः लक्ष्य।"[विदाई- पृ.१३१]  

‘चारदीवारी’ एक ऐसी कहानी है जिसमें एक ब्याहता किराएदार की दोस्ती मकानमालिक की जवान बेटी से हो जाती है।  बात आगे बढ़ने से पहले उस व्यक्ति को अपने परिवारवालों के पास से पत्र मिलता है कि उसकी जवान लड़की किसी के साथ भाग गई है।  वह पछतावे की आग में जलते हुए उस लड़की को सारी बात बता देता है।  प्रेम का एक वह रूप भी है जो किसी को प्रेमिका की सुंदरता को देख कर आजीवन साथ निभाने के सपने देखता है।  एक कला का विद्यार्थी एक सुंदर सहपाठिनी  के चित्र बनाता रहता है।  उसे एक चित्र पर पुरस्कार भी मिलता है।  वह लड़की उसके पास आती है और उसके अधिक चित्र देखना चाहती है।  लड़का उसे अपने घर ले जाकर कई चित्र बताता है जो उस पर केंद्रित हैं।  लड़की उसके प्रेम से द्रवित हो जाती है और अपने मोजे निकाल कर उसके ‘कोढ’ के निशान बताती है जिसके बाद प्रेमी का प्रेम काफ़ुर हो जाता है।  

रीत गई अँखियां, नदी-हवा-घटा, बीहू गीत, बिदाई आदि कुछ प्रेम कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनका निष्कर्ष पाठक पर छोड़ दिया गया है।  दूसरी ओर कुछ ऐसी कहानियाँ  जैसे सिनेमा की बलिवेदी पर, कुआँ और हड़ताल इस संग्रह में मिलेंगी जिनमें व्यक्ति बिना सोचे समझे ही कुछ कर बैठता है- जैसे आवेश में कुएँ में कूद कर प्राण त्याग देना या हड़ताल के समय किसे हानि पहुँचाई जा रही है इस सोच को भी ताक पर रख देना आदि।

इन कहानियों पर अपनी अनुभूति अभिव्यक्त करते हुए कहानीकार बैकुंठ नाथ कहते हैं कि "मैं जब समाज को देखता, परखता, विचारता, दुलारता या नकारता सा समाज के प्रति लिखता हूं... तो मुझे ऐसा लगता है जैसे उजालों और अँधेरों में  खड़ा देखता रह जाता हूँ।  मेरे सामने विरह-मिलन समान रूप धारण कर लेते हैं।  दिवा-निशा में कुछ भेद नहीं रहता।  ... न जाने कैसे मैं उजालों को अनुभव करने लगता हूँ, अँधेरों को तराशने लगता हूँ।  कुछ उजालों को पकड़े, कुछ अंधेरों को थामे मैं मूक सा खड़ा रह जाता हूँ।"  इन्हीं कुछ अनुभवों को तराश कर लिखी गई कहानियों से गुज़रते हुए पाठक कहीं उजालों से चकाचौंध हो जाएगा तो कहीं अंधेरों में उजाले की तलाश करेगा!


पुस्तक परिचय:
पुस्तक का नाम: कुछ उजले कुछ अँधेरे
लेखक: बैकुंठ नाथ
प्रकाशक: सिमिरन प्रकाशन
ए-१, परिक्रमा फ़्लैट्स
बोपल, अमदाबाद-३८००५८


रविवार, 19 फ़रवरी 2012

एक खयाल


बड़ा

सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का वह दोहा था-

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर
पथिक को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥

यह सही है कि बड़ा होने का मतलब होता है नम्र और विनय से भरा व्यक्ति जो उस पेड की तरह होता है जिस पर फल लदे हैं जिसके कारण वह झुक गया है।  बड़ा होना भी तीन प्रकार का होता है। एक बड़ा तो वह जो जन्म से होता है, दूसरा अपनी मेहनत से बड़ा बनता है और तीसरा वह जिस पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  

अपने परिवार में मैं तो सब से छोटा हूँ।  बडे भाई तो बडे होते ही हैं।  बडे होने के नाते उन पर परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां भी थीं।  पैदाइशी बड़े होने के कुछ लाभ हैं तो कुछ हानियां भी हैं।  बड़े होने के नाते वे अपने छोटों पर अपना अधिकार जमा देते हैं और हुकुम चलाते हैं तो उनके नाज़-नखरे भी उठाने पड़ते हैं।  उनके किसी चीज़ की छोटे ने मांग की तो माँ फ़ौरन कहेगा- दे दे बेटा, तेरा छोटा भाई है।  छोटों को तो बड़ों की बात सुनना, मानना हमारे संस्कार का हिस्सा भी है और छोटे तो आज्ञा का पालन करने लिए होते ही हैं। परिवार में बडे होने के नुकसान भी हैं जैसे घर-परिवार की चिंता करो, खुद न खाकर भी प्ररिवार का पोषण करो आदि। अब जन्म से बडे हुए तो ये ज़िम्मेदारियां तो निभानी भी पड़ेंगी ही।

जन्म से बडे कुछ वो सौभाग्यशाली होते हैं जो बड़े घर में पैदा होते हैं।  वे ठाठ से जीते हैं और बडे होने के सारे लाभ उठाते हैं।  बडे घर में जन्मे छोटे भी बडे लोगों में ही गिने जाते हैं।  इसलिए ऐसे लोगों के लिए पहले या बाद में पैदा होना कोई मायने नहीं रखता।  उस परिवार के सभी लोग बडे होते हैं।

दूसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जो अपने प्ररिश्रम से बडे बन जाते हैं।  एक गरीब परिवार में पैदा होनेवाला अपने परिश्रम से सम्पन्न होने और बुद्धि-कौशल से समाज में ऊँचा स्थान पाने वाले लोगों के कई किस्से मशहूर हैं ही।  ऐसे लोगों को ईश्वर का विशेष आशीर्वाद होता है और उनके हाथ में ‘मिदास टच’ होता है।  वे मिट्टी को छू लें तो सोना बन जाय!  अपने बुद्धि और कौशल से ऐसे लोग समाज में अपना स्थान बनाते है और बड़े कहलाते हैं।  

ऐसे बडों में भी दो प्रकार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।  कुछ बडे लोग अपने अतीत को नहीं भूलते और विनम्र होते है।  उनमें अभिमान नाममात्र को नहीं होता।  इसलिए समाज में उनका सच्चे मन से सभी सम्मान करते हैं।  दूसरी प्रवृत्ति के बडे लोग वे होते हैं जो शिखर पर चढ़ने के उसी सीड़ी को लात मार देते हैं जिस पर चढ़कर वे बडे बने रहना चाहते हैं।  वे अपने अतीत को भूलना चाहते हैं और यदि कोई उनके अतीत को याद दिलाए तो नाराज़ भी हो जाते हैं।  इन्हें लोग सच्चे मन से सम्मान नहीं देते;  भले ही सामने जी-हुज़ूरी कर लें पर पीठ-पीछे उन्हें ‘नया रईस’ कहेंगे।  ऐसे बड़े लोगों के इर्दगिर्द केवल चापलूस ही लिपटे रहते हैं।  कभी दुर्भाग्य से जीवन में वे गिर पडे तो उनको कोई साथी नहीं दिखाई देगा।  सभी उस पेड के परिंदों की तरह उड़ जाएंगे जो सूख गया है।

तीसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जिन पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  इस श्रेणी में धनवान भी हो सकते हैं या गुणवान भी हो सकते हैं या फिर मेरी तरह के औसत मध्यवर्गीय भी हो सकते हैं जिन्हें कभी-कभी समय एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देता है जब वे अपने पर बड़प्पन लदने का भार महसूस करते हैं।  हां, मैं अपने आप को उसी श्रेणी में पाता हूँ!

मैं एक मामूली व्यक्ति हूँ जिसे अपनी औकात का पता है।  मैं अपनी क्षमता को अच्छी तरह से परक चुका हूँ और एक कार्यकर्ता की तरह कुछ संस्थाओं से जुड़ा हूँ।  जब मुझे किसी पद को स्वीकार करने के लिए कहा जाता है तो मैं नकार देता हूँ। फिर भी जब किसी संस्था में कोई पद या किसी मंच पर आसन ग्रहण करने के लिए कहा जाता है तो संकोच से भर जाता हूँ।  कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब मुझे स्वीकार करना पड़ता है तो मुझे लगता है कि मैं उस तीसरी श्रेणी का बड़ा हूँ जिस पर बडप्पन लाद दिया जाता है।  इसे मैं अपने प्रियजनों का प्रेम ही समझता हूँ, वर्ना मैं क्या और मेरी औकात क्या।  क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा! मुझे पता है कि बड़ा केवल पद से नहीं हो जाता बल्कि अपने कौशल से होता है।  ऐसे में मुझे डॉ. शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव की यह कविता [बहुत दिनों के बाद] बार बार याद आती है--

बड़ा को क्यों बड़ा कहते हैं, ठीक से समझा करो
चाहते खुद बड़ा बनना, उड़द-सा भीगा करो
और फिर सिल पर पिसो, खा चोट लोढे की
कड़ी देह उसकी तेल में है, खौलती चूल्हे चढ़ी।

ताप इसका जज़्ब कर, फिर बिन जले, पकना पड़ेगा
और तब ठंडे दही में देर तक गलना पड़ेगा
जो न इतना सह सको तो बड़े का मत नाम लो
है अगर पाना बड़प्पन, उचित उसका दाम दो!

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

मजाज़ की कविता

Mother calms the sad daughter  Stock Photo - 9626488


गुरुदयाल अग्रवाल के माध्यम से

कई दिनों बाद गुरुदयाल अग्रवाल जी की कविता आई... मेरा मतलब है उनके द्वारा चयनित कविता, जिसकी भूमिका भी उन्होंने लिखी है।  तो अब मैं और क्या कहूं?  मैं तो कुछ नहीं कहूंगा, हां, डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी के विचार से आपको अवगत करा सकता हूँ।  उनका मानना है-
कविता तो सचमुच अच्छी है , और सच्ची भी है.
लेकिन एक संकेत इसमें छिपा है कि हिंदू  माताएं अपनी नासमझ बेटियों को गुड़ियों से खेलने की उम्र में मंदिर और पूजा में ठेल देती हैं जबकि उन्हें इनके अर्थ और विधि का कुछ भी पता नहीं होता है. पता नहीं कि उस महान शायर ने गोद के बच्चों को कभी देवमूर्तियों को प्रणाम करते देखा था कि नहीं. मैंने देखा है. इसीलिए मुझे यह कविता हिंदू  धर्म का मखौल उडाती प्रतीत होती है. प्रगतिवादी नज़रिए से यही ठीक भी है कि बच्चे के स्वविवेक के विकसित होने से पहले उसे आस्तिक बनाना अन्धविश्वास फैलाना ही है. 


गुरुदयाल अग्रवाल जी कहते हैं--
कुछ शायरों  की गजलो की pocket books अक्सर पढ़ता रहता हूँ! इनमें एक मजाज साहब भी हैं. इन गजलो के बीच में एक कविता भी है जो मैंने कभी पढ़ी नहीं.  हमेशा छोड़ दिया करता था कि मजाज कविता क्या लिखेंगे.  कल ऐसे ही इसको पढ़ लिया और तबसे ही अफसोस हो रहा कि पहले क्यों नहीं पढ़ी.  बहुत लज्जा सी लग रही है.  हाँ पढ़कर आप को सुनाने का लोभ संवरन   नहीं कर पा रहा हूँ.    
लीजिये हाजिर है:
           इक नन्ही-मुन्नी सी पुजारिन 
                     पतली बाहें, पतली गर्दन 
           भोर भये मन्दिर आई है 
                    आई नहीं है माँ लाई  है 
           वक्त से पहले जाग उठी है 
                     नींद अभी आँखों में भरी है 
            ठोड़ी तक लट आई हुई है        
                     यूँही सी लहराई हुई है 
            आँखों में तारों की चमक है 
                     मुखड़े पर चाँदी की झलक है
             कैसी सुंदर है क्या कहिये 
                     नन्ही सी इक सीता कहिये 
             धूप चढ़े तारा चमका है
                    पत्थर पर इक फूल खिला है
             चाँद का टुकड़ा, फूल की डाली 
                     कमसिन, सीधी भोली भाली 
              कान  में चांदी की बाली  है 
                     हाथ में पीतल की थाली है 
              दिल में लेकिन ध्यान नहीं है 
                     पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है 
               कैसी भोली और सीधी है 
                     मन्दिर की छत देख रही है 
               माँ बढ़कर चुटकी लेती है 
                      चुपके-चुपके हंस देती है 
               हंसना रोना उसका मजहब 
                      उसको पूजा से क्या मतलब 
               खुद तो आई है मन्दिर में 
                      मन उसका है गुडिया-घर में         
 
वाह मजाज साहब वाह, आफरीन  
 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

गंभीरता से न लें




आग


आज के समाचार पत्र में पढ़ा कि नगर के सितारा होटल में आग लग गई।  उसी के निकट एक मित्र का घर है, तो चिंता हुई कि हालचाल पूछ लें।  फ़ोन पर उन्होंने बताया कि उस हादसे के वे चश्मदीद गवाह रहे हैं।  भयंकर आग की लपेटें देखकर वे दूर जा खड़े हुए और वहाँ की गतिविधियों को देखते रहे।  लोग इधर उधर भाग रहे थे।  होटल से बाहर निकलने वाले अपने अज़ीज़ों की तलाश कर रहे थे तो कुछ उनकी खोज में फिर अंदर जाने की जुस्तजू में थे जिन्हें वहाँ के कर्मचारी रोक रहे थे।  समाचार से पता चला कि कोई हताहत नहीं हुआ है और सभी सुरक्षित है।  

हमारे मित्र बता रहे थे कि इस हादसे की प्रतिक्रियाएं भी वहाँ ऐसी मिलीं कि इस गम्भीर परिस्थिति में भी व्यक्ति हँसने को मजबूर हो जाता है।  जिन लोगों के परिजन मिल गए वे खुश थे और उन्हें किसी अन्य की कोई चिंता नहीं थी।  दर्शकों में खड़े लोग भी उस आग को एक तमाशे की तरह देख रहे थे।  एक ने कहा कि हमारी फ़ायर ब्रिगेड को तैयार रहना चाहिए, इतनी देर लगा दी [इसकी सूचना देने की उन्होंने कोई पहल नहीं की, केवल ज़बानी जमा खर्च करते रहे]।  एक ने अपने मित्र के कांधे पर हाथ रखते हुए कहा कि आग की इतनी लम्बी कतार मैं तो पहली बार देख रहा हूँ! [उसके चेहरे पर ऐसी आनंद की लहर दिखाई दे रही थी मानो उसे इतना अच्छा दृश्य अपने जीवन में पहली बार देखने को मिल हो।]

मुझे पुरानी कहावत याद आई कि किसी का घर जलता है तो कोई हाथ सेंक लेता है। तभी तो, दुष्यंत ने भी कहा था- 
खडे हुए थे अलावों की आँच लेने को
सब अपनी-अपनी हथेली जला के बैठ गए॥  

आग भी किसिम किसिम की होती है।  एक वो आग है जो अपने आगोश में आई हर चीज़ को जला कर राख कर देती है, तो एक वो आग भी होती है जो सीने में सुलगती है और अरमानों को जला देती है।  तभी तो किसी दिलजले शायर ने कहा था- सीने में सुलगते हैं अरमान, आँखों में उदासी छायी है।  

एक ऐसी आग भी होती है जो एक को जलाती है तो दूसरे को ठंडक पहुँचती है।  यह त्रिकोणीय प्रेम में अधिक देखने को मिलता है। यह  आग भारतीय फ़िल्मों की आधारशिला मानी जाती है। तभी तो महमूद ने अपनी एक फ़िल्म में गाया भी था-  ‘अजब सुलगती हुई लकड़ियाँ है ये जगवाले, जले तो आग लगे, बुझे तो धुआँ करे’।  

रिश्तों में एक वो आग भी होती है जो महिलाओं में अक्सर सुलगती देखी गई है।[स्त्री-सशक्तीकरण का दम भरनेवालों से क्षमा माँगते हुए, वर्ना मैं उनके प्रकोप की आग में झुलस जाऊँगा।]  सास-बहू ही क्या, ननंद-भावज, जेठानी-देवरानी... सभी में यह आग कभी न कभी देखी गई है, भले ही अदृश्य रूप में हो।

वैसे तो आग लगाने-बुझाने के काम अनादि काल से चला आ रहा है और ऐसे लोगों के कुलदेवता नारद जी को माना जाता है।  घर की छोटी-मोटी झड़पों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय लड़ाइयों में भी ऐसे लोगों की एक अहम भूमिका देखी गई है।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस लगाऊ-बुझाऊ काम को ‘डबल क्रास’ का नाम दिया जाता है।  कुछ मसाले के साथ इधर की उधर और उधर की इधर लगा दो और तमाशा देखो।  इसे ही तो कहते हैं- आम के आम, गुठलियों के दाम।

कवियों और शायरों ने भी इस आग का बहुत लाभ उठाया है।  किसी उर्दू शायर ने इश्क की हिमाकत को क्या खूब बयान किया है- 
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना ही समझ लीजे। 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।  

हमारे हिंदी के अज़ीम शायर दुष्यंत कुमार ने भी तो कहा है- 
                                                         मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी ही चाहिए।

आग के इन विविध आयाम में जो कुछ छूट गया है, उसे मित्रगण अपनी टिप्पणियों के माध्यम से भर देंगे, ऐसी आशा है।  इस बीच, दुष्यंत ने  सितारा होटल के मालिक को एक ट्रेड सीक्रेट भी बता गए हैं-

थोड़ी आँच बची रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो
कल देखोगे कई मुसाफ़िर इसी बहाने आएँगे॥


बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

World Hindi Secretariat, Mauritius



हिंदी की जानकारी देती- विश्व हिंदी पत्रिका-२०११

विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस हर वर्ष विशेषांक के रूप में विश्व हिंदी पत्रिका का वार्षिक अंक निकालती है जिसमें विश्व में हो रही हिंदी गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इस वर्ष के ‘विश्व हिंदी पत्रिका-२०११’ में भी समस्त विश्व में हिंदी भाषा की गतिविधियों  की जानकारी दी गई है।  इस पत्रिका की छपाई आर्ट पेपर पर की गई है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में रखने योग्य कही जाएगी।


‘विश्व हिंदी पत्रिका-२०११’ को पाँच खण्डों में बाँटा गया है। पहले खण्ड में हिंदी को लेकर दस विभिन्न देशों के लेखकों के लेख दिए गए हैं।  दूसरे खण्ड में सूचना प्रौद्योगिकी और विश्व में हिंदी पर चर्चा की गई है।  तीसरे खण्ड ‘विश्व में हिंदी: विविध आयाम’ के अंतर्गत विभिन्न देशों में चल रही भाषा गतिविधियों कि जानकारी वहाँ के सात विद्वानों ने दी है। ‘डायस्पोरा साहित्य के इतिहास पर विशेष आलेख’ के अंतरगत विश्व के साहित्यिक परिवेश की चर्चा पाँच विद्वानो ने की है और अंत में ‘अंतर्राष्ट्रीय हिंदी निबंध प्रतियोगिता २०१० के विजेताओं के तीन निबंध’ संकलित हैं।

 लेखों में सब से प्रथम हिंदी के उस मूधन्य लेखक का लेख है जो अब हमारे बीच नहीं है। फ़ादर डॉ. कामिल बुल्के ने जीवाकी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में १९६८ में दिए गए भाषण को उद्धृत किया गया है जिसमें उन्होंने हिंदी भाषियों को यह स्मरण कराया कि भाषा के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी उन पर है और केवल अंग्रेज़ी ्व अन्य भाषाओं से बैर रख कर हिंदी का भला नहीं हो सकता।  उन्होंने कहा था- "हम हिंदी के प्रश्न को प्रचार तथा आंदोलन का विषय बनाकर वास्तविकता का ध्यान नहीं रखते।  कठोर सत्य यह हि कि हिंदी प्रांतों में हिंदी और उसके साहित्य का समादर नहीं किया जाता है।  बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि प्रांतों के बुद्धिजीवी अपनी भाषा पर जितना गौरव करते हैं, अपने साहित्य से जितना प्रेम रखते है, उतना हम हिंदी वाले नहीं करते।’  इस खण्ड के अन्य रचयिता हैं डॉ. सुरेंद्र गम्भीर, प्रो. तेज कृष्ण भाटिया, डॉ. महावीर सरन जैन, डॉ. हीरालाल बाछोतिया, डॉ. कामता कमलेश, अजामिल मताबदल, धनराज शंभु, राकेश कुमार दुबे, प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी और राज हीरामन।

अंतरजाल के आगमन के बाद लेखन का नया माध्यम प्रचलित हो गया है। हिंदी भाषा में अभिव्यक्ति का नवीनतम माध्यम ब्लागिंग है जो अल्पावधि में बहुत प्रचलित हो गया है।  ब्लागिंग [चिट्ठा] करने वाले को ब्लागर कहा जाता है जिसे हिंदी में चिट्ठाकार का नाम दिया गया है।  यह विधा शिशु अवस्था में है और अपना  अस्तीत्व ढूँढ रही है।  इसी मुद्दे को लेकर दूसरे खण्ड में प्रसिद्ध ब्लागर बालेंदु शर्मा दधीच ने ‘हिंदी ब्लॉगिंग:कुछ पुनर्विचार’ में अपने विचार व्यक्त करते हुए बताते हैं कि "हिंदी ब्लागिंग के भीतर और बाहर एक सवाल बार-बार उठाया जाता है कि क्या ब्लागिंग लेखन साहित्य है?  इसी से जुड़ा एक अन्य प्रश्न भी चर्चा में रहता है कि हिंदी ब्लागिंग ने हिंदी साहित्य में कितना योगदान दिया है?" जहाँ वे यह तो मानते हैं कि हिंदी ब्लागिंग ने एक बड़ा योगदान इंटरनेट को समृद्ध करने में दिया है, वहीं वे यह भी कहते हैं-"जहाँ तक साहित्य और ब्लागिंग का मुद्दा है, सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है।  हिंदी ब्लागिंग में उस किस्म के स्तरीय तथा उत्कृष्ट लेखन की मात्रा कम है, जिसे ‘साहित्य’ की श्रेणी में गिना जा सके।"  यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि जितना आज साहित्य के नाम पर छप रहा है क्या वह उच्च कोटि का है या जैसा किसी प्रसिद्ध साहित्यकार ने कहा है आज हिंदी में ९०प्रतिशत कूडा ही छप रहा है!

अंतरजाल के आगमन के बाद अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने भी अपने पर वेब पत्रकारिता के माध्यम से अपने पर फैलाए हैं।  इसी मुद्दे को लेकर अनुभूति-अभिव्यक्ति’ वेब पत्रिका की संस्थापक डॉ. पूर्णिमा वर्मन ने अपने लेख में वेब पत्रकारिता के अतीत और भविष्य के साथ आज की स्थिति का भी जायज़ा लिया है।  अपने लेख ‘वेब पत्रकारिता:कल आज और कल’ में वे बताती हैं कि चिन्नै से निकलने वाला दैनिक ‘हिंदू’ सब से पहले १९९५ में वेब पर अपना पत्र डाला था और उसके बाद मुम्बई के टैम्स ऑफ़ इंडिया का अंतरजाल संस्करण १९९६ से आने लगा।  आज हैदराबाद का दैनिक ‘स्वतंत्र वार्ता’ भी अंतरजाल पर उपलब्ध है।

‘विश्व में हिंदी:विविध आयाम’ खण्ड में हंगरी, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, बेलारूस आदि में हो रही हिंदी की गतिविधियों की जानकारी दी गई है।  इसी खण्ड में केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद की डॉ. अनिता गांगुली ने अंडमान निकोबार द्वीप-समूह की हिंदी पर चर्चा की है और कुछ उदाहरण देकर बताया है कि वह मुख्यधारा के कितने करीब है।

आज साहित्य को खानों में बाँटा जा रहा है- जैसे स्त्री विमर्श, दलित साहित्य या मुस्लिम साहित्य आदि।  इसी मुद्दे को लेकर डेनमार्क में बसी श्रीमती अर्चना पैन्यूली का मानना है कि "इसी कडी में प्रवासी हिंदी साहित्य को भी जोड़ लिया जाए तो विसंगति तो नहीं है मगर लक्षणों के आधार प्र साहित्य की यह खेमेबाज़ी कई साहित्यकारों को सीमा तक ही ठीक लगती है।  अधिकांश प्रवासी लेखक स्वयं के लिए एक ‘प्रवासी लेखक’ क लेबल गुच्छ समझते हैं।  जब लेखकों और लेखन के बारे में चर्चा होती है तो स्वयं को प्रवासी लेखक खेमे में पाना उन्हें क्षुब्ध करता है।’

इस पत्रिका के प्रधान सम्पादक डॉ. पूनम जुनेजा ने अपने सम्पादकीय में हिंदी की स्थिति पर निष्कर्ष निकालते हुए कहा है कि "अन्य एशियाई देश जैसे कि चीन, जापान, कोरिया आदि ने भी संसार के विभिन्न देशों में अपनी भाषाई पहचान बनाई ह।  इसके बावजूद कि हिंदी जननेवालों की संख्या विश्व में तीसरे स्था न पर है; भारत और मॉरिशस से इतर देशों में चीनी, जापानी इत्यादि की हस्ती अधिक बुलंद है।"  इसी क्रम में पत्रिका के संपादक डॉ.गंगाधर सिंह सुखलाल ने हिंदी सैनिकों को अगली पंक्ति में सामने आने का आह्वान किया है।  वे यह मानते हैं कि युवा पीढ़ी को सैनिकों की तरह एकनिष्ठ होकर हिंदी की सेवा में रत रहने पर ही हिंदी विश्व की भाषाओं में अपना नाम दर्ज करा सकती है और एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप मेम संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा बन सकती है।  इसके लिए अभी समय भले ही हो पर समय को फिसलने भी नहीं देना होगा।  जैसा कि मॉरिशस के प्रसिद्ध कवि सोमदत्त बखोरोज़ी ने कहा है-

कुरुक्षेत्र में युद्ध जारी है
हे अर्जुन
गांडीव को हाथ से फिसलने न दो!

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नाम: विश्व हिंदी पत्रिका-२०११
प्रधान संपादक : डॉ. पूनम जुनेजा
संपादक : गंगाधर सिंह सुखलाल
प्रकाशक : विश्व हिंदी सचिवालय
स्विफ़्ट लेन, फ़ारेस्ट साइड
मॉरिशस

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

Looking back- Guy De Maupassant

Castle Mheer by kind permission of www.castles.nlp

अतीत में झाँकते हुए...
मूल : गाइ द मोपासाँ
अनुवाद: चंद्र मौलेश्वर प्रसाद
"अच्छा बच्चो, सोने का समय हो गया है, अब जाकर सो जाओ।"
राजकुमारी ने अपने दो पोतियों और एक पोते को दुलारते हुए कहा।  पादरी क्यूरे की गोद से उतरकर बच्चों ने दादी को ‘शुभरात्री’ कहा और अपने शयनकक्ष की ओर चल पड़े।

"आप बच्चों से बहुत प्यार करते हैं मोन्सियर क्यूरे?" राजकुमारी ने पूछा।
"बहुत प्यार।"
"तो क्या आपको नहीं लगता कि अकेले जीना कितना कठिन है?" राजकुमारी ने अपनी आँखें पादरी क्यूरे के चेहरे पर जमाते हुए पूछा।
"हाँ, कभी कभी... पर मैं तो रोज़मर्रा के जीवन के लिए नहीं बना था।"
"आप क्या जानते हैं रोज़मर्रा जीवन के बारे में?"
"ओह! मैं अच्छी तरह जानता हूँ।  मैं तो पादरी बनने के लिए पैदा हुआ था।"

राजकुमारी की नज़रे अभी भी पादरी क्यूरे के चेहरे पर जमी हुई थी।  उसने पूछा-"चलो मोन्सियर क्यूरे, यह बताओ कि तुमने सारे सुख-सुविधाओं  को छोड़कर विवाह और पारिवरिक जीवन का त्याग क्यों किया? आप न तो आध्यात्मिक और न ही धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं।  आप न तो आशावादी हैं न निराशावादी... तो फिर, आपके जीवन में ऐसा क्या घट गया जो जीवन को प्रेरणा देनेवाले पारिवारिक बंधन को त्याग कर एकल जीवन का फैसल करना पड़ा।  क्या आपके जीवन में ऐसी कोई गम्भीर दुखद घटना घटी जिसने आपको इस ओर प्रेरित किया?"

पादरी क्यूरे ने कोई उत्तर नहीं दिया।  वे सकुचाते हुए कमरे में टहलने लगे।  ऊँचा पूरा व्यक्तित्व, सुगठित कद-काठी का यह व्यक्ति पिछले बीस वर्षों से पड़ोस के संत अंतोनी के गिरजे में पादरी रहा है।  पड़ोस के सभी लोग उन्हें आदरभाव से देखते हैं।  अपनी सज्जनता, शांत स्वभाव और सहायक प्रवृत्ति के कारण इस पादरी का गाँव में बहुत सम्मान था।

वृद्धा राजकुमारी रोशर के महल में अपने तीन पोते-पोतियों के साथ रहती थी।  पुत्र और पुत्रवधु के अचानक मृत्यु के बाद इन बच्चों के देखरेख की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई थी।  वह जानती थी कि पादरी क्यूरे अच्छे स्वभाव के व्यक्ति हैं।  इसलिए वह अपने महल में उन्हें आने का आमन्त्रण दे चुकी थी।  अब पादरी क्यूरे हर गुरुवार की शाम राजकुमारी के महल में भोज के लिए आते और देर रात तक अपनी बीती बातें याद करते बिताते थे।  

अचानक राजकुमारी ने ज़ोर देकर कहा-"मोन्सियर क्यूरे, आज समय आ गया है कि आपको मेरे सामने अपना कन्फ़ेशन करना होगा।"
पादरी क्यूरे ने अपनी बात दोहराते हुए कहा-"मैं तो आम जीवन के लिए नहीं बना था।  सौभाग्यवश इसका अहसास मुझे समय पर हो गया और मैं समझता हूँ कि मेरा निर्णय सही निकला।"  

कुछ देर रुककर उन्होंने कहना शुरू किया-"मेरे माता-पिता सम्पन्न थे और चाहते थे कि मैं भी जीवन में बहुत बड़ा आदमी बनूँ।  इसके लिए उन्होंने छोटी सी उम्र में ही  मुझे एक अच्छे बोर्डिंग स्कूल में भर्ती कराया।  लोगों को क्या पता कि एक नन्हा-सा बालक कितना दुखी होता है अपने घर से दूर, अकेला रह कर,  बिना प्रेम के! रोज़मर्रा जीवन कुछ के लिए अच्छा हो सकता है पर कुछ के लिए कष्टदायी भी।  बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं, जितना लोग समझते हैं, शायद उससे कहीं अधिक, और यदि उनके लिए इस छोटी-सी आयु में प्रेम के द्वार बंद हो जाते हैं तो वे अधिक भावुक हो जाते हैं।  इसकी अति उनके मानसपटल पर इतने गहरे उतरती जाती है कि कभी-कभी यह भयानक मानसिक रूप ले लेती है।

"मैंने कभी कोई खेल नहीं खेला; मेरा कोई मित्र नहीं था।  मुझे हर समय घर की याद सताती रही।  रातों को बिस्तर पर पड़ा रोता रहता और घर की छोटी छोटी यादों को उकेरता रहता- वो यादें, जो शायद किसी के लिए कोई मायने भी नहीं रखती हों पर मेरे लिए अमूल्य थीं।  धीरे धीरे मैं भीतर से टूट गया और छोटी से छोटी अड़चन भी बडी कठिनाई लगने लगती।  मैं बहुत दुखी था।

"इनका परिणाम यह हुआ कि मैं उदास और आत्मकेंद्रित, एकल और मित्ररहित रह गया।  इसका दुष्प्रभाव मेरी सोच और मानसिकता पर पड़ने लगा।  बच्चे बहुत जल्दी भावुक हो जाते है।  उन्हें संरक्षण और प्रेम की उस समय तक अधिक आवश्यकता होती है जब तक वे समझदार न हो जायें।  परंतु इन बातो को कौन समझता है!

"मेरे जीवन में भी यही हुआ।  मैं घर की याद में घुटता रहा।  धीरे-धीरे मेरी मानसिकता में यह नासूर की तरह पनपने लगा।  कोई घर कि बात करता तो मैं रो पड़ता।  वो बच्चे सचमुच भाग्यशाली होते हैं जो संवेदनहीन होते हैं और उन्हें किसी भी बात का कोई असर नहीं होता।

"मैं सोलह वर्ष का हुआ।  अब मुझे हर बात भावुक कर देती थी और मैं अत्यादिक शर्मीला हो गया था।  जानता था कि भाग्य के थपेड़ों के आगे मेरा कोई बस नहीं है, मैंने हर संबंध से अपने को अलग कर लिया।  हर छोटी घटना में मुझे बड़ी आशंका दिखाई देने लगी।  उज्ज्वल भविष्य की आशा या प्रसन्नता की बात सोंचना तो दूर, हर समय मैं भयभीत और आशंकित रहने लगा।  मुझे अहसास हुआ कि मुझे इस परिस्थिति से उबरना चाहिए।  परीक्षा के बाद जब मुझे छः माह की छुट्टी मिली तो अपने भावी जीवन के बारे में सोचने का मौका मिला।  एक छोटी-सी घटना ने मुझे अपने आप को समझने में सहायता की।

"पेडों से घिरा वेर्डियर्स एक छोटा सा गाँव है जहाँ मेरा घर है।  मैं अपने घर से निकल कर अकेला ही पास के जंगल की खुली हवा में घूमने लगा।  मेरे माता पिता अपने व्यवसाय में ही व्यस्त थे।  उन्हें मुझसे बात करने की भी फ़ुर्सत कहाँ!  मैं इस जंगल में घूमते हुए अपने दिवास्वप्नों में खो गया।

"एक शाम जंगल में घूमकर जब मैं घर की ओर लौट रहा था तो एक कुत्ता मेरी ओर तेज़ी से दौड़ कर आने लगा।  उसे देखकर मैं रुक गया।  वह भी मुझसे दस कदम दूर रुक गया और दुम हिलने लगा।  फिर डरते-डरते धीरे-धीरे आत्मसमर्पण की मुद्रा में मेरी ओर बढ़ने लगा।  उसकी दयनीय आँखें, उसका डरते-डरते मेरे हाथों को चाटना मुझे अभिभूत कर गया।  मैंने उसे थपथपाया तो उसका भय दूर हुआ।  वह मेरे पीछे-पीछे घर तक आया।

"यह पहला जीव था जिसने मुझे प्यार दिया और मैं भी उसको दिलोजान से चाहने लगा।  सैम- हाँ, मैंने उसे यही नाम दिया था, मेरे पास ही रहने लगा और साये की तरह साथ लगा रहा।

"एक दिन मैं और सैम सड़क के किनारे चल रहे थे। दूर से एक चार घोड़ोंवाली बग्गी दौड़ी आ रही थी।  कोचवान घोड़ों पर कोड़े बरसा रहा था तो घोडे और तेज़ दौड़ने लगे।  घोड़ों और बग्गी की आवाज़ से चौंक कर सैम सड़क के उस पार से मेरे पास आने के लिए दौड़ पड़ा; परंतु वह मुझ तक नहीं पहुँच सका।  वह घोड़ों और बग्गी के बीच में फंस गया।  देखते ही देखते वह सड़क पर लोट रहा था और दर्द से कराहने लगा।  दौड़कर जब मैं उसके पास पहुँचा तो देखा कि उसका पेट फट चुका और पिछले दोनों पैर कुचल गए हैं।  वह मेरी ओर दयनीय आँखों से देख रहा था और मैं बेबस था; कुछ भी तो नहीं कर सका अपने सैम के लिए।  उसने कराहते हुए मेरी गोद में दम तोड़ दिया।

"इस हादसे के बाद मैं अपने कमरे में एक माह तक बंद रहा।  एक शाम पिताजी कमरे में आये और कुछ उत्तेजित स्वर में कहने लगे-"एक छोटी सी बात का इतना बतंगड़ बना रहे हो!  यदि तुम्हारी पत्नी या बच्चे की मौत जैसी दुखद घटना हो जाय तो तुम क्या करोगे?"

"अचानक मुझे झटका लगा और मैं अपने आप को समझने लगा।  मैंने जाना कि रोज़मर्रा के जीवन में इतनी दुखद घटनाएँ होती रहती हैं और यदि मैं अपनी इस भावुकता के कारण इन्हें सहन नहीं कर पाया तो क्या होगा!  मुझे किसी भोग-विलास की चाह नहीं थी। तब मैंने निश्चय किया कि मुझे इस क्षणभंगुर खुशी को हमेशा के लिए तजना होगा।  जीवन छोटा है, तो क्यों न मानव जाति की सेवा में इसे लगाया जाय और दूसरों के दुख दूर करने में अपना जीवन समर्पित कर दें।"

इतना कह कर पादरी क्यूरे चुप हो गये।  कुछ देर बाद खुद ही कहने लगे-"मैं सही था।  मै इस सांसारिक जीवन के लिए नहीं बना हूँ।"  राजकुमारी चुपचाप सुनती रही।  बहुत देर तक वह भी कुछ नहीं बोली।  लम्बी चुप्पी के बाद राजकुमारी ने कहा-"मेरे लिए तो, यदि ये पोता-पोतियाँ नहीं होते, तो शायद मेरा जीना ही दूभर हो जाता।"

बातों में देर रात बीत चुकी थी।  पादरी क्यूरे उठे और अपने शयन कक्ष की ओर चल दिये।  ऊँची-पूरी काया को जाते हुए राजकुमारी देखती रहीं और उनके मस्तिष्क में ऐसी कई सारी बातें आती रहीं जो युवा भी नहीं सोच सकते थे।


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

अमृत महोत्सव


डॉ.गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ का अमृत महोत्सव

कोई व्यक्ति जब ७५ वर्ष की आयु पर पहुँचता है तो उसके अपनों के लिए यह एक पर्व का अवसर बन जाता है।  ऐसा ही अवसर था वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ का अमृत महोत्सव जो जबलपुर में ४ नवम्बर २०११ को सम्पन्न हुआ।   उनका साहित्यिक फलक इतना विस्तृत था कि इस अवसर पर निकाले गए अभिनंदन ग्रंथ की पृष्ठ संख्या ४०० तक पहुँच गई।  इस अभिनंदन ग्रंथ के सम्पादक हैं आचार्य भगवत दूबे और सम्पादक मंडल के अन्य सदस्य हैं प्रो. जवाहरलाल ‘तरुण’, डॉ.राजकुमार ‘सुमित्र’, डॉ. हरिशंकर दुबे तथा राजेश पाठक ‘प्रवीण’।

जबलपुर को भारत की संस्कारधानी का नाम दिया गया है।  इस अभिनंदन ग्रंथ के संपादकीय में आचार्य भगवत दूबे कहते हैं कि ‘महर्षि जाबालि की तपोभूमि यह नर्मदांचली संस्कारधानी जबलपुर प्रचुर सारस्वत संपदा से सदैव सम्पन्न रही है।  जबलपुर का यह सौभाग्य है कि यहाँ संस्कृत के उद्भव विद्वान महाकवि राजशेखर, प्रसिद्ध वैयाकरण श्री कामता प्रसाद ‘गुरु’, राष्ट्रभक्ति की संवाहिका कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान, शताधिक नाटकों के रचयिता हिंदी के प्रबल पक्षधर सांसद सेठ गोविंददास, कृष्णायन के रचयिता पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र, कविवर रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ एवं व्यंग्यविधा के जनक श्री हरिशंकर परसाईं जैसे सुविख्यात सृजनधर्मी हुए हैं।... उन्हीं में से एक हैं ‘कादम्बरी’ संस्था के अध्यक्ष, शिक्षाविद एवं यशस्वी साहित्यकार डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ जो साहित्य की गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं के पारंगत पुरोधा है।"

डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ न केवल एक उच्च कोटि के शिक्षक रहे, बल्कि अपनी कलम का लोहा मनवा चुके हैं, साथ ही वे सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान दे रहे हैं। वे प्रसिद्ध सामाजिक संस्था रोटरी क्लब तथा संस्कारधानी की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था ‘कादम्बरी’ के अध्यक्ष  हैं।  इस अभिनंदन ग्रंथ से डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ के बहुआयामी व्यक्तित्व का पता चलता है।

हम डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ की लम्बी आयु के साथ साथ उनके स्वस्थ व सानंद जीवन की कामना करते हैं।



सोमवार, 30 जनवरी 2012

मुम्बई का एक नज़ारा

Boot Polish
चित्र :बूटपालिश  [२००७] से साभार



बूटपालिश वाला

रेल व्यवस्था मुम्बई शहर की जीवनरेखा कही जाती है।  हर अपरिचित व्यक्ति इस व्यवस्था को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है।  इतनी तेज़ी से आती जाती रेलगाडियों के बावजूद स्टेशनों पर भीड़ जस की  तस नज़र आती है।  ऐसे में किसी ट्रेन में विंडो सीट मिलना एक प्रतियोगिता जीतने जैसा होता है।  एक दिन मैंने भी यह प्रतियोगिता जीती और बैठ गया ट्रेन की विंडो सीट से बाहर का नज़ारा झांकने। 

रेलवे ट्रैक के समीप बने स्लम की लगातार कतार देख कर लगा कि मुम्बई दो छोरों का शहर है जहाँ ऊँची अट्टालिकाओं के साथ ये झोपड़पट्टियां भी है। सम्पन्न लोग उन अट्टालिकाओं में रहते हैं तो गरीब इन झोपड़ियों में रहकर उनकी सेवा करते हैं! शायद यह आज के हर बड़े शहर की विडम्बना है।

मुम्बई की ट्रेन में बैठे नज़ारे देखने का एक अलग ही अनुभव होता है।  गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी नहीं कि ‘आक्रमण’ के नाद के साथ लोग ट्रेन में घुसने लगते हैं।  यह महाभारत सीरियल की प्रेरणा का असर है।  यह आक्रमण दोतरफ़ा होता है।  ट्रेन में घुसने वाले लोगों को भीतर की ओर ठेलते रहते हैं तो भीतर से उतरने वाले बाहर की ओर ज़ोर लगाते रहते हैं।  इस ठेलम्ठेल में कुछ उतरने वाले नहीं उतर पाते और कुछ चढ़नेवाले छूट जाते हैं।  जो उतर नहीं पाया वह अगले स्टेशन के लिए तैयार रहता है तो जो नहीं चढ़ पाया वह अगले ट्रेन की प्रतीक्षा में।

वैसे तो दूसरी ट्रेन कुछ ही मिनट में आ जाएगी।  इन चंद घडियों में फिर भीड जस की तस हो जाती है।  अभी जो स्टेशन खाली दिख रहा था कुछ ही मिनिट में फिर भर जाता है।  फिर वही ‘आक्रमण’ और वही ठेलम्ठेल का सिलसिला...।

मुम्बई के रेलवे स्टेशन पर दो खास तरह के व्यवसाई दिखाई देते हैं।  ये व्यवसाई  अपने हुनर में बडे तेज़ होते हैं। एक हैं- तेल-मालिश चम्पी करने वाले और दूसरे हैं बूट पालिश वाले। बूट पालिश का ज़िम्मा छोटी आयु के बच्चे निभाते हैं।  मैं अपनी विंडो सीट से बैठा-बैठा एक ऐसे ही बच्चे को देख रहा था।  ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी थी केवल दो मिनट के लिए पर इतने अल्प समय की झलक ने ही मेरे मानस पटल पर एक अमिट छाप छोड़ दी।

प्लेटफ़ार्म के एक कोने में लकडी के छोटे से डिब्बे को स्टूल बना कर एक बारह-तेरह वर्ष का बालक बैठा था।  उसके सामने एक और डिब्बा रखा था जिसपर एक व्यक्ति अपना पैर रखे हुए था।  वह बालक बड़े मनोयोग से एक छोटी-सी डिब्बी से पालिश निकाल कर बडी नज़ाकत से जूते पर मल रहा था।  पालिश अच्छी तरह जूते पर फैला देने के बाद वह अपने कंधे पर रखे कपडे को पट्टी की तरह मोड़ कर उस जूते पर रगड़ने लगा।  लो, जूता चमचमाने लगा।  फिर, जूते के चारों ओर एक ब्रश को  बड़ी सलाहियत से घुमाने लगा।  काम समाप्त हुआ तो जूते को हल्के से ठोका। ग्राहक समझ गया कि उसके एक जूते का काम हो गया है।  उसने दूसरा पाँव उस स्टूल पर रख दिया।  फिर उसी तन्मयता से वह बालक पालिश लगाने लगा।  अब ट्रेन खिसक चली थी।

जब तक निगाह जाती, मैं उसी नज़ारे को देखता रहा।  वह बालक- जिसके कंधे पर शायद परिवार की ज़िम्मेदारी थी, जिसके कंधे पर मैंने वह कपड़ा देखा जो उसकी रोज़ी-रोटी का अभिन्न अंग था, उसी कंधे पर वह अचकन थी जो जगह जगह पालिश के रंग बिखेर रही थी, वह अचकन जिसकी उम्र तमाम हो चुकी थी पर उस बालक के युवा कंधों को ढाँपे थी  और वह युवा हो रहे कंधे परिवार का बोझ उठाने शायद अभी परिपक्व नहीं हुए थे!!!!!!!  

बुधवार, 25 जनवरी 2012

ज़रा सोचिये


लोकतंत्र - कितना सफल



एक और बनता ही जा रहा था 
निर्माण का हिन्दुस्तान
दूसरी ओर गिरता ही जा रहा था 
ईमान का हिंदुस्तान॥

[केदारनाथ अग्रवाल]


हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन के बाद भारत को जब गणतंत्र घोषित किया गया, तब जनता में एक नया उत्साह और उल्लास था कि उन्हें सच्चे मायनों में आज़ादी मिल गई है;  अब वो अपनी तकदीर के मालिक हैं और अपने भविष्य का मार्ग खुद ही तय करेंगे।

भारतवासियों ने अपने राजनैतिक जीवन के लिए लोकतंत्र का मार्ग चुना, जब कि उनके एक और बड़े पड़ोसी देश चीन ने साम्यवाद का रास्ता अपनाया।  लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी और कदाचित सब से बड़ी कमज़ोरी भी, यह है कि उसका नागरिक राजनैतिक स्वतंत्रता में सांस लेता है, पर वह निरंकुश हो जाता है।  उसे साम्यवादी घुटन का सामना नहीं करना पड़ता है।  नतीजा यह होता है कि राजनैतिक तौर पर वह जागरूक तो रहता है पर अपनी स्वतंत्रता पर किसी प्रकार के अंकुश को सहन नहीं करता और अपने दायित्व को भुला बैठता है।  इसका एक प्रमाण है भारत का वह आपातकालीन युग जब राजनैतिक स्वतंत्रता को कुछ अवधि के लिए दबाया गया था यद्यपि उसका परिणाम यह हुआ कि उन नेताओं को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।  इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत के लोकतंत्र की नींव बहुत मजबूत है।

अब सवाल यह है कि लोकतंत्र के अंतरगत भारत ने कितनी राजनैतिक , आर्थिक तथा सामाजिक सफलता प्राप्त की है।  भारत एक कृषि प्रदान देश है तथा उसकी अधिकतम जनता गाँवों में रहती है जो मेहनत मज़दूरी करके अपना उदर-पोषण करती है।  ऐसे नागरिकों को शिक्षा के अधिक अवसर नहीं मिल पाते, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वे काफी परिपक्व साबित हुए हैं।

भारत के हर चुनाव में जनता ने यह प्रमाणित कर दिया है कि वे राजनीतिक तौर पर कितने जागरूक हैं और उन्हें अच्छे-बुरे नेता की परख है।  यह और बात है कि इन नेताओं ने जनता के साथ विश्वासघात किया हो।  झूठे आश्वासन और सुनहरे ख्वाबों के चुनावी वादों को वे वास्तविकता का जमा पहनाने में असफल रहे।  चुनावी वादे केवल वादे बनकर रह गए।  जब यही वादे हर चुनाव में दुहराए जाने लगे तो लोगों ने इन नेताओं को सत्ता से उखाड़ फेंका।  लोकतंत्र में यदि नेता जनता की सेवा न करें और अपनी सत्ता को न सम्भाल सके तो इसमें जनता का कोई दोष नहीं हो सकता।  वो तो सत्ता के भूखे नेताओं की साजिशों का परिणाम मात्र कहा जाएगा।

यदि भारत के लोकतंत्र और पड़ोसी चीन के साम्यवाद पर एक नज़र डालें, तो कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि चीन ने भारत के मुकाबले में अधिक तरक्की की है, परंतु किस मूल्य पर!  यदि इसे सच भी मान लिया जाए तो भी यह गौरतलब है कि उस देश की प्रगति के लिए जनता को क्या कीमत चुकानी पड़ी और क्या वहाँ के आम नागरिक उस प्रगति का फल भोग रहे हैं?  यह एक लम्बी बहस का विषय हो सकता है।

भारत में छः दशक से चले आ रहे लोकतंत्र पर यदि एक दृष्टि डालें तो यह कहा जा सकता है कि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा है यद्यपि किसी भी देश के इतिहास में यह अवधि कोई लम्बी अवधि नहीं मानी जाती।  फिर भी,  इतना तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि इस अवधि में भारत अपने एक सौ से अधिक करोड़ लोगों के लिए अन्न उत्पादन करता है, उसे विदेशों से अब खाद्यान्न आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।  औद्योगिक क्षेत्र में वह काफ़ी आगे बढ़ गया है और संसार के दस औद्योगिक देशों में भारत की गिनती होती है।  उच्च शिक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का योगदान संसार भर में अधिकतम रहा है।

इस लोकतंत्र को सब से बड़ा आघात तब लगा जब नेताओं के भ्रष्ट चरित्र से देश लूटा जाने लगा और यह नासूर फैलते-फैलते अब इस देश के चरित्र को खाए जा रहा है।  ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार अन्य देशों में नहीं है पर हमारा कानून इतना अक्षम साबित हो रहा है कि भ्रष्टाचारी यह जान चुके हैं कि कोई भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता है।  दूसरी ओर हाल ही में चीन के कुछ नेताओं को भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर गोली मार कर इन्साफ़ किया गया।  यदि ऐसे कड़े कानून भारत में भी नहीं बनाए जाते हैं तो भ्रष्टाचार इस देश को पतन के कगार पर ला खड़ा करेगा।  तब भी जनता क्या इसी प्रकार मूक असहाय दर्शक की भाँति देखती रहेगी?  

अंततः यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र को जनता ने सफल बनाया है पर इस लोक और तंत्र को चलानेवालों ने मिलकर उसे विफल कर दिया है।


सोमवार, 23 जनवरी 2012

शुद्ध हास्य


लोकार्पण पिपासा

डिस्क्लेमर: इस लेख के सभी पात्र काल्पनिक हैं।  यदि ऐसा कोई पात्र इस धरती पर चलता फिरता दिखाई दे तो उसकी ज़िम्मेदारी लेखक पर नहीं है :)


हाल ही में तिरबेनी परसाद से रास्ते में भेंट हुई थी।  उन्होंने बताया कि वे एक पुस्तक रच रहे हैं जिसका शीर्षक है ‘महापुरुषों की कारस्तानी’।  फिर उन्होंने उसके प्रकाशन में आने वाली कठिनाइयों का भी ज़िक्र किया। मैं जानता था कि तिरबेनी परसाद उन रचनाकारों में से हैं जो आपको किसी भी नुक्कड़ पर ठोक के भाव मिल जाते हैं।  वे यदाकदा रास्ते में मिल जाते थे तो मेरा हस्बे-आदत यही प्रश्न रहता है- क्या नया लिख डाला!  तब वे अपनी नई रचना के बारे बताते और बात कभी हास-परिहास तक भी पहुँच जाती।

अब देखिए ना, जब उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘महापुरुषों की कारस्तानी’ के बारे में बताया तो निश्चय ही मेरा पूछना लाज़मी था- अरे तिरबेनी बाबू, आपको इनकी कारस्तानियों के बारे में कैसे पता चला जिसको हमारे मीडिया के खोजी कुत्ते भी नहीं सूंघ सके; उन्हें तो ऐसी कारस्तानियों की गंध तो सब से तेज़ लग जाती है।   

उन्होंने बड़े राज़दाराना इस्टाइल में बताया कि यही तो घुंडी है।  हम ठहरे इन महापुरुषों के चमचे जो उनके घर में तो क्या, हमाम में भी घुस जाते हैं।  इनके बारे में हमसे ज़्यादा और कौन जाने है भला।

‘सो तो ठीक है, पर ऐसी पोशीदा बातें तो आम पब्लिक में बताना कापीराइट का उल्लंघन होगा।’  

‘अरे नहीं सा’ब, यही तो असली फ़ंडा है।  हमारे महापुरुष तो जानते हैं कि ऐसी ही बातें उन्हें समाचार में बनाए रखती हैं।’  

मैंने पूछा कि प्रकाशक कौन है?  उन्होंने प्रकाशन की कठिनाइयों का विस्तार से वर्णन करना शुरू किया। उन्होंने बताया- ‘पहले तो प्रकाशक मिलते नहीं और मिलते हैं तो उनका डिमांड बड़ा होता है।  यह कहाँ का इन्साफ़ है कि हम लिखो भी और छापने के लिए उन्हें पैसा भी दो।  अब हमें अपना पैसा लगाना ही है तो हम ही प्रकाशक बन जाते हैं।  इसलिए हमने अपनी पत्नी गंगा बाई के नाम से गंगा प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्था खोल रखी है।  इसी प्रकाशन से अपनी सारी पुस्तकें निकलेंगी।’


कुछ दिन बाद तिरबेनी परसाद फिर निक्कड़ पर मिल गए।  मैंने उनकी पुस्तक की अवस्था के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी वह गर्भावस्था में ही है।  कुछ और कारस्तानियों का बखान उसमें आना है, इसलिए उसकी छपाई पूरी नहीं हो पाई है।

राह चलते एक दिन तिरबेनी बाबू सिर झुकाए चिंतामग्न आ रहे थे।  मुझे देखते ही तपाक से हाथ मिलाया और बताया कि पुस्तक तो छप गई है।  अब लोकार्पण की चिंता में ही भटक रहा था और आप ही के बारे में सोच रहा था। अच्छा हुआ आपसे समय पर भेंट हो गई।

कहिए, मैं क्या सेवा कर सकता हूँ?

ऐसा है सा’ब, आप तो बडी-बडी गोष्ठियों की अध्यक्षता करते रहते हैं, और साहित्य के बडे तोपों से आपका परिचय है;  तो क्यों न आप इस पुस्तक के बढिया लोकार्पण का जुगाड़ करें।  आप ही उस समारोह की अध्यक्षता कर लीजिए।

यह तो ‘आ बैल मुझे मार’ की स्थिति हो गई।  मैं जानता हूँ कि तिरबेनी बाबू बड़े चिपकू हैं और पीछा नहीं छोड़ेंगे।  मैंने कहा कि मुझे अध्यक्षता करने में कोई ऐतेराज़ नहीं है पर सवाल यह है कि इसका संयोजन कौन करेगा?  

‘मैं तो चाहता था कि आप ही सारे कार्यक्रम की रुपरेखा बनाएं और अतिथियों को बुलाने का ज़िम्मा भी लें।’

मैंने कहा कि यह सब मुझ से नहीं होगा।  मेरी अपनी ज़िम्मेदारियां ही बहुत हैं।

‘नहीं साब, आपको मेरी खातिर तो इतना करना ही पड़ेगा।  आपका नाम रहेगा तो लोकार्पण धूम से हो जाएगा, इतना तो साहित्य का बच्चा बच्चा जानता है।’  

मरता क्या न करता, मैं ने कहा कि आप हाल बुक करा लीजिए, मंच पर आसीन अथितियों के लिए अच्छे से स्मृतिचिह्न ला लीजिए।  संचालन के लिए वर्माजी को बुला लीजिए और संयोजन का काम शर्मा जी को सौंप दीजिए।  आपका काम सफल हो जाएगा।

अब क्या था, तिरबेनी बाबू की बांछे खिल गई।  मार्गदर्शन के लिए आभार प्रकट किया और भावी कार्यक्रम की सफलता का अरमान लेकर चले गए।

आखर वो दिन भी आ गया। बहुत सारे लोग इस लोकार्पण के लिए पदार्पण करने लगे।  तिरबेनी बाबू प्रसन्न थे कि कार्यक्रम सफल जा रहा है।  अंत में उन्होंने चमकीली पन्नी में लिपटे पुस्तकों का बंडल लोकार्पणकर्ता को दिया।  उस बंडल से चार पुस्तकें निकली और मंच पर आठ अतिथि थे।  अब लोकार्पणकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ थे। उनकी समस्या यह थी कि किस को पुस्तक दें और किसको नहीं।  इस झंझट से छुटकारा पाने के लिए एक पुस्तक उठाई और दर्शकों को दिखा दिया।  क्लिक, क्लिक... फोटो खींचे गए और दर्शकों ने ताली बजाई।  तिरबेनी बाबू ने मंचासीन अतिथियों को स्मृतिचिह्न दिए।  कार्यक्रम समाप्त हुआ।  

दर्शकों को निराशा हुई कि ताली बजाने के एवज़ में उन्हें चाय तक नहीं मिली।  अतिथियों ने कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अपने स्मृतिचिह्न का अनावरण किया तो निराश हुए कि उसमे सड़कछाप पच्चीस रुपये का फ़ोटोफ़्रेम था।  सब के चेहरे मुर्झा गए।  किसी का चेहरा खीला था तो वो तिरबेनी परसाद का था जिन्हें लोकार्पण की सफलता की प्रसन्नता थी। आखिर हींग लगी न फिटकरी, रंग चोखा जो हो गया था।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

घुटने



ये  घुटने है या बला!





 दिल्ली के सुप्रसिद्ध डॉ. टी.एस.. दराल- ब्लाग जगत के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  अपनी चिकित्सा के तजुर्बे से वे मानव घुटने के बारे में बताते हैं कि " इन्सान में बुढ़ापा सबसे पहले घुटनों में ही आता है । इसीलिए :
* ४० + होते होते आपके घुटनों की व्यथा एक्स रेज समझने लगते हैं ।
* ५० + होने पर आपको भी आभास होने लगता है ।
* ६० + होने पर सब को पता चल जाता है कि आपके घुटने ज़वाब दे चुके ।
* ७० + होकर आप भी भाइयों में भाई बन जाते हैं क्योंकि अब तक सब एक ही किश्ती के सवार बन चुके होते हैं ।"

जब मैं घुटने के बारे में सोंचने लगा तो मुझे बुढापे की चिंता तो नहीं हुई क्योंकि बूढ़ा तो हो ही गया हूँ फिर भी मेरे घुटने अभी तक ढोने में सक्षम हैं। मैं जितना सोचता गया, उतना ही इस ‘घुटने’ के कई रूप सामने आने लगे।   कुछ रूप  जो मस्तिष्क में घूम रहे हैं, उन्हें यहाँ उँडेल देता हूँ :)

इन घुटनों के कारण कभी महिलाओं को सज़ा भी भुगतनी पड़ती है।  आप को याद होगी वह घटना जब सूडान की एक ईसाई किशोरी को घुटने की लंबाई तक की स्कर्ट पहनने को एक जज ने अभद्र करार देते हुए उसे 50 बार कोड़ा मारने की सजा सुनाई है।   पता नहीं मिनि स्कर्ट पहनने पर कितने कोड़े पड़ते!!

ऐसे में घुटने टेकने के सिवाय चारा भी क्या हो सकता है!  घुटने तो हमारे खिलाडी भी खेल के मैदान में यदाकदा टेक ही देते हैं।  जब वेस्ट इंडीज़ से भारत हारा था तो यह समाचार पढ़ने को मिला था-

"भारतीय बल्लेबाजों ने कब्रगाह बनी फिरोजशाह कोटला की पिच पर बेहद निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले क्रिकेट टेस्ट के दूसरे दिन आज यहां घुटने टेक दिए ।"  अब ऑस्ट्रेलिया में जो हश्र हो रहा है, उसका अनुमान आप भी लगा ही सकते हैं।


 इसी प्रकार जब गायक दलजीत  ने कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग किया तो उसे माफ़ी मांगनी पड़ी थी।  तब यह समाचार देखने में आया था कि अपने गीतो में औरतों के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल करने पर दलजीत ने अखिरकार मांफी मांग ली हैं।   पंजाब केसरी के दफ्तर में विशेष तौर पर आए दलजीत ने घुटने टेक कर मांफी मांगते हुए कहा कि उसने कभी भी औरतों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तमाल नही किया।"


आजकल चिकित्सा क्षेत्र ने इतनी तरक्की कर ली है कि घुटने बदल दिए जा रहे हैं।   सवाल यह है कि क्या घुटने बदलने के बाद व्यक्ति की चाल भी बदल गई है।  घुटने की सर्जरी में तो  चार-छः लाख रुपये  लग ही जाते हैं। पर ऑपरेशन के बाद ठीक से चलते  देखा नहीं गया। अपने अटल बिहारी वाजपेयी को ही लें। वह ऑपरेशन से पहले काफी ठीकठाक चलते थे।  अब तो बेचारे बिस्तर पकड़ चुके हैं।

इस लेख को लिखने के असली मकसद पर अब आते हैं।  आपने इसी ब्लाग पर एक निमंत्रण देखा होगा कि यहाँ हैदराबाद लिटरेरी फ़ेस्टिवल २०१२ का आयोजन हो रहा है।  इस आयोजन के आखरी दिन एक हिंदी काव्य गोष्ठी हुई जिसमें एक ‘युवा’ कवि ने अध्यक्षता की। युवा इसलिए कहा जा रहा है कि वे बिना किसी सहायता के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँच गए।  अन्य दो कवि और एक कवयित्री ऐसे थे जिन्हें पकड कर मंच पर चढ़ाना पड़ा था।  कारण.... वही.... घुटने का दर्द!!!!!!




मंगलवार, 17 जनवरी 2012

एक मुद्दा


संयुक्त परिवार क्यों टूट रहे हैं?



एकल परिवार से बेहतर संयुक्त परिवार
संयुक्त परिवार का यह चित्र ‘समय-live' से साभार



आजकल एकल परिवार का चलन हो चला है और संयुक्त परिवार लुप्त होने के कगार पर हैं।  एक समय था जब संयुक्त परिवार भारत की जीवन पद्धति का अभिन्न अंग था।  तो फिर, अब यह बदलाव कैसा?

यह सच है कि आजकल संयुक्त परिवार का चलन कम होता जा रहा है।  इसका कारण न तो कोई सामाजिक उथल-पुथल है और ना ही पाश्चात्य सभ्यता पर इसका भांडा फोडा जा सकता है।  इसका मुख्य कारण हमारी अर्थव्यवस्था में बदलाव दिखाई देता है।

भारत एक कृषि-प्रधान देश था और परिवार के उदर-पोषण का मुख्य स्त्रोत।  कृषि के लिए ज़्यादा हाथों की आवश्यकता होती थी तो सारा परिवार इसी में जुट जाता था।  तब परिवार की परिभाषा के अंतरगत चाचा, भाई, भतीजे, पुत्र-पौत्र सभी आ जाते थे।  औद्योगिकरण ज्यों-ज्यों बढ़ता गया, परिवार बँटने लगे।  कृषि में भी मशीनों ने हाथों का काम ले लिया जिसके कारण हाथों की ज़रूरत कम होने लगी।  तब परिवार में सम्पन्नता के साथ बेरोज़गारी भी बढ़ने लगी।  चाचा-भतीजे अब भार लगने लगे।  रोज़गारी के लिए वे गाँव छोड़कर शहर की ओर जाने लगे।  परिवार में बँटवारा होने लगा और संयुक्त परिवार आहिस्ता आहिस्ता बिखरने लगा।

स्वतंत्रता मानव प्रकृति का अभिन्न अंग है।  जब पालन पोषण की निर्भरता नहीं रही तो हर सदस्य अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाने लगा।   हर सदस्य की आकांक्षाएँ व अपेक्षाएँ बढ़ने लगी और यह मानसिकता हर पुरुष में पनपने लगी कि वह परिवार का अर्थ सिर्फ़ ‘मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे’  समझने लगा।

कदाचित अर्थशास्त्री इसे प्रकृति के उस नियम का अनुसरण कहेंगे, जहाँ कोई भी इकाई बढ़ते-बढ़ते चरम सीमा पर पहुँच कर फिर सिमटने लगती है।  गठन और विघटन एक प्राकृतिक प्रक्रिया जो है!!



शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

अंधविश्वास???


भूत प्रेत : अंधविश्वास या सत्य?

भारत के कई प्रदेशों से यदा-कदा जादू-टोने के समाचार मिलते रहते हैं।  ऐस भी हुआ है कि जादू-टोना करने या करवाने के आरोप में गाँववालों ने जान भी ले ली है।  भूत-प्रेत और साया भगाने के लिए तांत्रिकों के पास जाकर टोना-टोटका भी किया जाता है।  इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कुछ समाज-सेवी संस्थाएं अभियान भी चला रही हैं।  पर क्या यह मात्र अंध-विश्वास है या इसमें कुछ तथ्य भी है?  भारत में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी भूत-प्रेत होते हैं या नहीं, यह चर्चा का विषय बना हुआ है।  हाल ही में ब्रिटेन के शाह एडवर्ड के राजमहल में एक साया घूमता देखा गया था।  इसकी पुष्टि वहाँ के कर्मचारियों ने भी की है।  कहा जाता है कि इस राजमहल में शाह की एक पत्नी का सिर काटकर हत्या कर दी गई थी। तब से उसका साया यदा-कदा वहाँ देखा जाता रहा है।  इस मामले को सुलझाने के लिए तांत्रिकों को बुलाया गया था।  इन तांत्रिकों को वहाँ पैरा-सैकॉलोजिस्ट कहा जाता है।

पूर्व में भी कई देशों में कुछ ऐसी ही विचित्र घटनाओं के समाचार मिलते रहे हैं जिनको साधारण ज्ञान-विज्ञान द्वारा समझ पाना कठिन है।

लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और बाईस यात्री मारे गए थे।  जब हवाई जहाज़ का मलबा साफ करके निकाला जा रहा था तो एक ऊँचे कद के व्यक्ति ने वहाँ आकर पूछा कि क्या उन्हें उसका बस्ता मिला है जिसमें उसके ज़रूरी कागज़ात थे?  वह बेचैनी से बार-बार यही प्रश्न दोहरा रहा था।  आधे घंटे के बाद जब कर्मचारियों ने मलबे में से एक शब को निकाला तो वे डर कर भाग खड़े हुए क्योंकि वह शव उसी व्यक्ति का था जो उस बस्ते के बारे में पूछ रहा था!

अमेरिका जैसा विकसित देश भी ऐसी अनहोनी घटनाओं के समाचारों से नहीं बच सका है।  सब से बड़ा आश्चर्य तो यह है कि वहाँ के राष्ट्रपति भवन [व्हैट हाउज़] में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिसके साक्षी वहाँ पर निवास कर रहे विभिन्न राष्ट्रपति भी हैं।  यह तो सर्वविदित है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या की गई थी।  कहते हैं कि कुछ खास मौकों पर उनका साया व्हैट हाउज़ में घूमता देखा गया है।  उनका सबसे प्रिय स्थल है व्हैट हाउज़ की दूसरी मंज़िल पर स्थित शयन कक्ष।  सन्‌ १९३४ में जब फ़्रेंकलिन रूज़्वेल्ट राष्ट्रपति चुने गए थे, तब उन्होंने व्हैट हाउज़ की दूसरी मंज़िल पर स्थित उस कमरे को ही अपना शयन-कक्ष बनाना चाहा था।  उस स्थान की सफ़ाई शुरू करने के लिए कर्मचारी जब वहाँ गए तो देखा कि राष्ट्रपति लिंकन एक काला सूट पहने, सोफ़े पर बैठे अपने जूतों की डोर बांध रहे हैं! जब रूज़्वेल्ट को इस बात की खबर मिली तो उन्होंने अपना शयन-कक्ष वहाँ बनाने का इरादा तर्क कर दिया।

ऐसा नहीं है कि लिंकन के साए को सिर्फ रूज़्वेल्ट के कर्मचारी  ही देख पाये थे।  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल, अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति ट्रूमैन, आइज़नहॉवर तथा केनेडी को भी इस साये से दो-चार होना पड़ा था।

ऐसी कई घटनाएँ हैं जिन्हें किसी तर्क से समझा नहीं जा सकता।  इसीलिए तो कहा जाता है कि जो इसमें विश्वास करते हैं उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती और जो विश्वास नहीं करते, उनके लिए कितने भी प्रमाण पर्याप्त नहीं होते॥

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

गुरुदयाल अग्रवाल

आप लोगों को याद होगा कि कुछ अर्सा पहले मैंने एक पाठशाला के प्रश्न पत्र के माध्यम से वयोवृद्ध कवि एवं एक ज़िंदादिल इंसान से परिचय कराया था जिनका नाम है गुरूदयाल अग्रवाल।  अग्रवालजी चलता फिरता कविता संग्रह है जिनके मस्तिष्क में न जाने कितनी कविताएं भरी पडी हैं।  कविताएं  धारा प्रवाह कहते हैं भले ही उन्हें कवि का नाम याद न हो।  एक ऐसी ही कविता उनके मस्तिष्क में कौंध गई और उन्होंने इसे भेज दिया।  यदि कोई इस कविता के मालिक का पता ढूंढ सके, तो हम उन्हें यह कविता लौटाने का ज़िम्मा लेते हैं।  तब तक गुरुदयाल अग्रवाल की ज़बानी-बयानी जारी रहेगी।



गीत जग भर के दुखों की आत्मा है
 
                    गीत जग भर के दुखों की आत्मा है
                    प्यार हर इंसान का परमात्मा है
बूँद ने अपनी नई   दुनिया बसाई      
 जब सजाई सिन्धु की नगरी सजाई
इस हिमालय को बडप्पन जब मिला है
भूमी को जब आँख से गंगा पिलाई 
                     इस जगत में हर किसी के प्रिय हैं अलग 
                     किन्तु रचना हर किसी की प्रियतमा है     
                     गीत जग भर के दुखों की आत्मा है
                     प्यार हर इंसान का परमात्मा है
 कुछ नयन इतने दुखी रोया न जाता 
आंसुओं की गोद में सोया न जाता 
उन सभी का दर्द जिसने लिख दिया है 
वो समय की धार  से धोया न जाता 
                          इस  जगत में हर किसी के अहम  हैं अलग    
                           किन्तु ज्ञान सबकी व्यक्तिवादी चेतना है
                           गीत जग भर के दुखों की आत्मा है
                           प्यार हर इंसान का परमात्मा है
 
 
(इस जगत में हर किसी के अहम  हैं अलग) यह मूल शब्द नहीं हैं.  मूल शब्द याद ही नहीं आ रहे हैं अत: मैंने प्रयास किया है.
 
  गुरु दयाल अग्रवाल                     
  

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

लेव टॉलस्टॉय - Leo Tolstoy-एक अनुवाद


लम्बी कैद
मूल: लेव निकोलविच टॉल्सटाय


ईवान दिमित्रिच अक्सेनोव नाम का एक व्यापारी व्लादमीर नगर में रहता था। उसकी अपनी दो दुकानें और एक निजी मकान भी था।  घुंघराले बाल, गोरा-चिट्टा रंग और गठित बदन वाला युवक अक्सेनोव एक हँसमुख और ज़िंदादिल इंसान था।  लहर में आता तो पीता, गाता और नाचता था।  लेकिन यह मौज-मस्ती उस समय बंद हो गई जब उसकी शादी हो गई और अब तो वह दो बच्चों का बाप भी बन गया था।

ग्रीष्म शुरू हो रहा था तो अक्सेनोव ने सोचा कि व्यापार के लिए निज़नी मेले में जाया जाय।  सवेरे उठते ही उसने सामान बाँधा और पत्नी को अलविदा कहा।  यात्रा पर निकलने को था कि पत्नी ने टोका-"इवान दिमित्रिच, आज मत जाओ क्योंकि मैंने एक अजीब सपना देखा है।" अक्सेनोव ने हँसते हुए कहा-"अरे सपने भी कहीं सच होते हैं! चिंता मत करो, मुझे कुछ नहीं होगा।  मैं जल्दी लौट आऊँगा।"  पत्नी ने अपनी चिंता जतलाते हुए बताया कि उसने सपने में देखा कि वह जब लौटा तो उसके केश और दाढ़ी सफ़ेद हो चुके थे।  अक्सेनोव ने कहा-"यह तो अच्छा शगुन है।  तुम चिंता मत करो।  मैं सारा सामान बेच कर तुम्हारे लिए एक अच्छा-सा उपहार ला दूँगा।"  यह कह कर वह अपने परिवार से विदा लेकर यात्रा पर निकल पड़ा।

सफर में रात हो गई तो अक्सेनोव एक सराय में ठहर गया।  वहाँ उसकी भेंट एक और सौदागर से हुई।  दोनों ने मिलकर रात का भोज किया, कुछ देर गाना-बजाना चला और फिर सोने चले गए।  सूर्य निकलने में अभी समय था। अक्सेनोव ने सोचा कि सफर लम्बा है, इसलिए मुँह-अंधेरे ही निकल जाना चाहिए।  वह उठा और अपना सामान लेकर निकल पड़ा।  पच्चीस मील का सफर तय करने के बाद गाड़ीवान ने एक सराय के पास गाड़ी रोकी और घोड़ों को पानी पीने और आराम करने छोड़ा।  अक्सेनोव भी सुस्ताने के लिए बैठ गया और चाय पीने लगा।  तभी एक और गाड़ी आकर रुकी।  उसमें से एक अधिकारी और दो सिपाही बाहर निकले और अक्सेनोव से पूछने लगे कि वह कहाँ से आ रहा है।  उसने बताया कि रात में एक सराय में रुका और एक सौदागर के साथ भोज किया था और मुँह-अंधेरे ही आगे की यात्रा के लिए निकल पड़ा। उसके बाद उनके प्रश्नों की झड़ी लग गई।    

अधिकारी ने बताया कि उस सौदागर की हत्या हो गई है और संदेह की सूँई उसकी ओर है।  उसकी तलाशी ली गई।  सिपाहियों को उसके सामान से एक खून से सना छुरा मिला।  यह देख अक्सेनोव चकित रह गया।  उसे समझ में नहीं आया कि यह छुरा उसके सामान में कैसे आया।  उसने कई दलीलें दीं, मिन्नतें कीं, परंतु कोई सुननेवाला नहीं था।  सज़ा देकर उसपर कोड़े बरसाए गए और सैबेरिया के बंदीगृह में भेज दिया गया।

अक्सेनोव की पत्नी को जब पता चला तो वह अपने बच्चों के साथ आई और जेल में उससे मिली।  अक्सेनोव ने अपनी बेगुनाही के लिए त्सार से अपील करने का सुझाव रखा।  पत्नी ने बताया कि उसके सारे प्रयास बेकार हो चुके हैं।  रोते हुए उसने उस स्वप्न की याद दिलाते हुए कहा- "उस स्वप्न पर ध्यान देकर रुक जाते तो आज यह दिन न देखना पड़ता।...  अब सच बताओ कि तुमने उसका खून क्यों किया?"

अक्सेनोव आश्चर्य से पत्नी की ओर देखता रहा। रुआँसा होकर उसने कहा-"तो क्या तुम भी मुझ पर शक कर रही हो!  फिर तो ईश्वर ही मेरी बेगुनाही साबित कर सकते हैं।"  उसके बाद अक्सेनोव चुप हो गया और अपने परिवार को अंतिम बार अलविदा कहा।

अक्सेनोव ने सैबेरिया की जेल में छब्बीस वर्ष गुज़ारे।  उसके बाल सन की तरह सफेद हो चुके थे और सफेद दाढ़ी लंबी व घनी होकर चेहरे पर बिखरी फैली थी।  उसकी गठित काया भी क्षीण हो चुकी थी और अब वह झुक कर चलने लगा था।  वह हमेशा प्रार्थना में लीन रहता।  उसे किसी ने भी हँसते हुए नहीं देखा था।  जेल में उसने जूते सीने का काम सीख लिया और इससे जो थोड़ी बहुत आय होती, उससे संत पुरुषों की पुस्तकें खरीद कर पढ़ता।  हर रविवार को जेल की चर्च में नियमित रूप से जाता और प्रार्थना गीत में हिस्सा लेता था।

जेल के सभी कैदी अक्सेनोव को पितामह या संत कह कर पुकारते थे।  कभी किसी को कोई पत्र या निवेदन लिखना होता तो उसके पास पहुँच जाते और लिखा लेते थे।  अधिकारी भी उसके शाँत स्वभाव से प्रभावित थे।  एक दिन एक नया कैदी जेल में पहुँचा।  साठ वर्ष का यह कैदी कद-काठी से तंदुरुस्त था।  सब कैदी उसके पास पहुँचे और उसके जुर्म व जीवन के बारे में पूछने लगे।  अक्सेनोव भी उसके पास बैठ गया।  उसने बताया कि यह भी एक विड़म्बना है कि जुर्म करके वह बचता रहा पर अब जबकि उसने कोई जुर्म नहीं किया तो उसे जेल हो गई।  वह अपने एक परिचित की गाड़ी से घोडा खोलकर बैठा और दूसरे शहर जल्दी पहुँचना  चाहता था पर चोरी के आरोप में पकड लिया गया।
"तुम कहाँ से आ रहे हो?" किसी ने पूछा।
"व्लादमीर से।  मेरा पूरा परिवार वहीं रहता है और मेरा नाम मकर सेमेनिच है।"

अक्सेनोव ने सिर उठाकर देखा और पूछा-"यह बताओ कि क्या तुम अक्सेनोव नाम के व्यापारी परिवार को जानते हो?"
"जानता हूँ! अरे, वह तो बड़ा प्रसिद्ध परिवार है;  यद्यपि उनके पिता को सैबेरिया भेज दिया गया था। बुज़ुर्गवार, यह तो बताओ कि आप यहाँ कैसे?"
"मैं यहाँ छब्बीस साल से अपने पाप का फल भोग रहा हूँ।"
"किस पाप का फल?"
"शायद यह भोगमान मुझे भोगना था, यही प्रभू की इच्छा है।"

एक कैदी ने बताया कि पितामह एक व्यापारी के खून के आरोप में यहाँ भेजे गए हैं जबकि वो निर्दोष हैं। मकर यह सुनकर अपनी जांघों पर हाथ मारते हुए कहा-"वाह! वाह! क्या बात है। पर तुम इतने बूढ़े कैसे पितामह?"  मकर पर प्रश्नों की बौछार होने लगी- "तुम इतने चकित क्यों हो?.. क्या तुम इन्हें पहले से जानते हो?.. क्या तुमने उस हत्या के बारे में सुना है?"...

मकर ने हंसते हुए कहा-"कई अफ़वाहें होती हैं। पर यह बात बहुत पुरानी हो गई है, भूल गया हूँ"।
अक्सेनोव ने पूछा-"शायद तुमने सुना होगा कि किसने उस व्यापारी का खून किया था?"
मकर ने फिर हँसते हुए कहा-"हो सकता है कि वही हत्यारा हो जिसके सिराहने रखी थैली में खून से सना छुरा मिला।  वह चोर नहीं होता जो पकड़ा नहीं जाता, चोर तो वही होता है जो पकड़ा जाता है।"

यह सुनकर अक्सेनोव का संदेह पक्का हो गया कि उस व्यापारी की हत्या मकर ने ही की है।  वह वहाँ से उठ कर चला गया।  अब अक्सेनोव प्रतिशोध की आग में जल रहा था।  उसे रात भर नींद नहीं आई।  प्रार्थना करके भी वह अपने मन को स्थिर व शांत नहीं रख पा रहा था।

एक रात जब वह टहल रहा था तो उसे अपने पैरों के नीचे की धरती खिसकती लगी।  कुछ देर के लिए वह रुक गया और देखने लगा कि क्या हो रहा है।  थोडी देर में वहाँ से मकर निकला और अक्सेनोव को देखकर चौंक पड़ा।  फिर उसने बताया कि वे धरती से सुरंग बना कर बाहर निकलने की तैयारी कर रहे हैं।  उसने धमकी दी-"बूढे आदमी, मुँह बंद रखो।  तुम भी बाहर निकल सकते हो।  यदि मुँह खोलोगे तो इल्ज़ाम तुम पर आएगा और वो तुम्हें कोड़े मार-मार कर सीधे ईश्वर के पास पहुँचा देंगे।"

दूसरे दिन सिपाहियों ने मिट्टी के ढेर देखकर सब कैदियों की तलाशी ली और पूछताछ की।  गवर्नर ने सभी से पूछा पर किसी ने मुँह नहीं खोला।  अंत में गवर्नर  ने अक्सेनोव के पास आकर कहा-"तुम सच्चे बूढे आदमी हो, ईश्वर को साक्षी रखकर कहो कि यह सुरंग किसने बनाई?"
अक्सेनोव बहुत देर तक कुछ नहीं बोला, उसके होठ थरथरा रहे थे।  उसके मस्तिष्क में एक ज्वार सा उठ रहा था।  वह सोच रहा था कि उस व्यक्ति को क्या बचाना जिसने उसके जीवन को नर्क बनाया है।  परंतु यदि वह बता भी देगा तो मकर  मारा जाएगा पर उसे क्या मिलेगा?  वह जैसे खो गया था।  इतने में गवर्नर की आवाज़ उसके कानों में पड़ी- "सच सच बताओ, यह ज़मीन कौन खोद रहा था?"  अक्सेनोव ने एक बार मकर की ओर देखा और कहा-"मैं नहीं कह सकता सरकार। ईश्वर की इच्छा नहीं है कि मैं कुछ कहूँ।  आप जो चाहें मुझे सज़ा दे सकते हैं।  मैं तो आपके हाथ में हूँ।"  गवर्नर ने बहुत प्रयास किया पर अक्सेनोव ने मुँह नहीं खोला।  हार कर विषय को वहीं छोड़ दिया गया।

उस रात अक्सेनोव अपने बिस्तर पर लेटा था और आँख लग ही रही थी कि उसे किसी के समीप आने का आभास हुआ। अंधेरे में उसने देखा कि मकर खड़ा है।
"और क्या चाहते हो तुम मुझसे?  अब क्या लेने आए हो?"
मकर खामोश खड़ा रहा।  अक्सेनोव उठकर बैठ गया।
"चले जाओ यहाँ से वर्ना मैं गार्ड को आवाज़ दूँगा।"  
"मुझे क्षमा कर दो इवान दिमित्रिच।" मकर ने उसके पास झुक कर कहा।
"किसलिए?"
"मैं वही पापी हूँ जिसने उस व्यापारी की हत्या की थी और तुम्हारी थैली में वह छुरा छुपा दिया था।  मैं तो तुम्हारी भी हत्या करना चाहता था पर बाहर कुछ आहट सुनकर खिड़की से भाग निकला था।"
अक्सेनोव  खामोश था।  मकर अपने घुटनों के बल बैठ गया और क्षमा माँगने लगा। "इवान दिमित्रिच, मुझे क्षमा कर दो।  मैं सबके सामने अपना गुनाह कबूल कर लूँगा और तुम्हें रिहाई मिल जाएगी। तुम अपने घर जा सकोगे।  मुझे क्षमा कर दो दिमित्रिच।"
"तुम्हारे लिए कहना सरल है मकर, मगर मैंने अपने जीवन के छब्बीस बरस दुख भोगा है। अब कहाँ जाऊँगा! मेरी पत्नी मर चुकी है, मेरे बच्चे मुझे भूल चुके हैं, अब तो कहीं नहीं जा सकता।"

अपना सिर ज़मीन पर पटक-पटक कर मकर माफी मांगने लगा। "मुझे क्षमा कर दो इवान दिमित्रिच।  मुझे उस समय भी इतना कष्ट नहीं हुआ था जब मुझपर जेल में कोड़े बरसाए गए थे।  अब तुम्हारी चुप्पी उन कोड़ों से अधिक वेदना दे रही है।  मुझ नीच पर दया करो और माफ़ी दे दो।"

फफक-फफक कर मकर रोने लगा।  उसको रोता देख अक्सेनोव भी रोने लगा। "ईश्वर तुम्हें क्षमा करेंगे।  शायद मैं तुमसे सौ गुना पापी हूँ।" यह कह कर उसका मन भी हल्का हुआ।  उसे इस जेल को छोड़ कर जाने की कोई इच्छा नहीं थी, बस इच्छा थी तो केवल मृत्यु की।

मकर ने अपना जुर्म कबूल कर लिया और जब तक अक्सेनोव को रिहा करने का आदेश आता, वह चिर निद्रा में सो चुका था।