`सूत्रधार’ का निमंत्रण
‘मैं राही मासूम’
हैदराबाद की प्रसिद्ध नाट्य शिक्षण संस्था ‘सूत्रधार’ का एक पात्री नाटक ‘मैं राही मासूम’ की ख्याति चारों ओर फैल रही है। इस नाटक को कई शहरों में सराहा गया है जिनमें मुख्यतः बेंगलुरू, मुम्बई, दिल्ली जैसे बड़े शहरों के प्रसिद्ध फिल्मी हस्तियों ने भी देखा है। आज [२२ मई २०११को] हैदराबाद के प्रसिद्ध होटल ‘ताज बन्जारा’ में इस नाटक का २५वां मंचन किया गया है। इस नाटक को देखने का मन विशेष रूप से उस समय बना जब दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में इसे मंचित किया गया था। अवसर था शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशताब्दी और इसमें आये अतिथि डॉ. नामवर सिंह इस नाटक को देख कर रो पड़े थे और कहा था कि ‘मैं यहाँ शमशेर की शमशेरियत देखने आया था और मुझे आपने मेरे बडे भाई मासूम से मिला दिया।’ वे इतने गद्गद थे कि उनका गला रुंध गया था। आज जब सूत्रधार के कर्ताधर्ता और मुख्य सूत्रधार विनय वर्मा ने न्यौता दिया तो मैंने तुरंत हामी भर दी।
‘ताज बन्जारा’ बड़ा नाम है पर हम जैसे छोटों के लिए यह जगह ढूँढ निकालना टेड़ी खीर साबित हुई। दस लोगों से पूछ-पूछ कर वहाँ पहुँचे। देखा कि होटल के खुले लॉन में स्टेज सजा है और अभी लोग आ रहे हैं। मच्छरों का शायद कुछ अधिक ही बोलबाला था तो धुआँ देकर मच्छरों को भगाया गया। साथ में दर्शक भी भाग खडे हुए क्योंकि धुआं तो धुआंधार आ रहा था। कुछ देर बाद हम फिर पहुँचे तो मंच सजा हुआ था।
सब से पहले सूचना दी गई कि प्रसिद्ध कलाकार बादल सरकार के निधन पर एक मिनट का मौन रखा जाएगा। उसके बाद स्पॉंसर ‘सिस्ने फ़ॉर आर्ट्स’ ने अपनी संस्था का परिचय दिया जिन्होंने देश के बड़े कलाकारों को हैदराबाद से जोड़ा है जैसे पं.रविशंकर और अनुश्का, गायिका श्रेया घोषाल, कवि गुलज़ार और सूफ़ी गायिका बेगम आबिदा परवीन आदि।
विनय वर्मा मासूम रज़ा के रूप में
‘मैं मासूम रज़ा’ का एकालाप शुरू होता है...न जाने मौत किस लम्हा आएगी...। मासूम दर्शकों की ओर घूम कर अपना जीवनवृत्त बताते है कि किस प्रकार उन्हें आठ वर्ष की आयु में बोन टी.बी. हो गया था और किस प्रकार वे आज़मगढ़ को नहीं बल्कि गाज़ीपुर के गंगोली को अपना गाँव और घर मानते है। वे चाहते थे कि उनके देहांत के बाद उनके शरीर को गंगोली की गंगा में बहा दिया जाय। वे अपने को तीन माँओं का बेटा मानते थे। एक तो उन्हें जन्म देने वाली माँ, दूसरे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और तीसरे गंगा। पहली माँ को आयु खा गई, दूसरी माँ ने उन्हें इसलिए उखाड़ फेंका कि उनकी विचारधारा साम्यवादी थी। इस पर उन्होंन यह प्रश्न किया-
मैं तो पत्थर था, उठाकर मुझे फेंक दिया
आज उस शहर में शीशे के मकाँ कैसे हैं?
उनका बेबाक कथन था कि वे पहले हिंदुस्तानी है और बाद में मुसलमान और वे गंगा को अपनी माँ व गंगोली को अपना घर मानते हैं। इस पर मुसलमान उनसे नाराज़ थे; और जब वे मंदिर-मस्जिद के झगड़े को समाप्त करने के लिए वहाँ मासूम बच्चों के लिए फूलों का बगीचा बनाने की बात करते हैं तो हिंदू नाराज़ हो जाते हैं। तभी तो उन्होंने कहा था-
ज़ाहिद तेरी नज़र ने काफ़िर जाना
और काफ़िर समझता है मुसलमान हूँ मैं॥
प्रसिद्ध टी.वी. सीरियल ‘महाभारत’ के संवाद लिखने पर भी लोगों ने बवाल मचाया था। तब उनके मन में जो विचार उमड़े, वे कुछ इस तरह थे-
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहू से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।
प्रसिद्ध निदेशक- डॉ. भास्कर शिवालकर
मासूम के इस एक-पात्री नाटक के लेखन में अभिनव कदम पत्रिका के अलावा उनके उपन्यास आधा गाँव, टोपी शुक्ल, ओस की बूँद आदि से सहयोग लिया गया है। इसे प्रसिद्ध निदेशक व ‘रंगधारा’ नाट्य संस्था के डॉ. भास्कर शिवालकर के निर्देशन में ‘सूत्रधार’ के विनय वर्मा ने मासूम के पात्र में ऐसी जान डाल दी कि दर्शक भी इस पात्र से समन्वय स्थापित कर पाते हैं। हैदराबाद के नाट्य इतिहास में यह पहला एक पात्री नाटक है जो देश के कई शहरों में ख्याति पा चुका है और इसके पच्चीस सफल मंचन हो चुके हैं। मैं विशेष रूप से विनय वर्मा और डॉ. भास्कर शिवालकर को बधाई देता हूँ कि उन्होंने हैदराबाद को रंगमंच के नक्शे में विशेष स्थान दिलाया है। कौन कहता है कि हैदराबाद के लोगों में नाटक का ज़ौक नहीं है???
मैं ने पहली बार इस नाटक के बारे में जाना। यदि नाटक की स्क्रिप्ट मिल जाए तो कोटा के रंगकर्मी इस प्रयोग में साझीदार हो सकते हैं।
जवाब देंहटाएंगहरी रचनायें लिख गये हैं राही मासूम रजा, भारतीयता से ओतप्रोत।
जवाब देंहटाएंसहेजने योग्य पोस्ट है..... एक महान रचनाधर्मी के कर्म से जुड़ी....... आभार
जवाब देंहटाएंनाटक की जानकारी और साथ में रजा साहेब के शेर के लिये धन्यवाद
जवाब देंहटाएंआदरणीय द्विवेदी जी, इसके लिए आप
जवाब देंहटाएंvinay@sutradharactors.com
and www.sutradharactors.com से संपर्क कर सकते हैं॥
Rochak.
जवाब देंहटाएं............
खुशहाली का विज्ञान!
ये है ब्लॉग का मनी सूत्र!
बहुत हई महत्वपूर्ण पोस्ट।
जवाब देंहटाएंNice post.
जवाब देंहटाएंबहुत रोचक बहुत बढ़िया जानकारी दी !
जवाब देंहटाएंपर भाई जी हैदराबाद में तो जादातर नाटक
रविद्र भारती में ही होते है ना क्योंकि वहां का स्टेज
बहुत बढ़िया है ! कभी मराठी नाटक देखा था !
बहुत सुंदर प्रस्तुत कि जानकारी !
आभार.......
इसे समीक्षा कहें या संस्मरण जो भी है ,है बड़ा खूबसूरत और विचार प्रेरक .मजा आगयाआपकी आँखों देखी कानों सुनी का साक्षी बनके .बधाई और शुक्रिया आपका आपने हमसे सांझा की यह विरासत रज़ाजी की .
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी जानकारी और सुन्दर प्रस्तुति । राही मासूम रजा को पढ़कर बहुत अच्छा लगा ।
जवाब देंहटाएंराही मासूम रजा पर महत्वपूर्ण जानकारी...
जवाब देंहटाएंrahi ji mere bahut priya rahe hai
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